देश में डेयरी सहकारी समितियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखते हुए सरकार ने किसानों के हितों की सुरक्षा और सहकारी ढांचे को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
सरकारी जानकारी के अनुसार, अधिकांश जिला सहकारी दुग्ध संघ और राज्य स्तरीय दुग्ध परिसंघ अपने-अपने राज्यों के भीतर ही दूध का प्रापण करते हैं। हालांकि, कुछ समितियां अब राज्य की सीमाओं से बाहर भी अपने कार्यों का विस्तार कर रही हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर दूध प्रापण के आंकड़े एकत्र किए जाते हैं, लेकिन डेयरी सहकारी समितियों के अंतरराज्यीय विस्तार से जुड़े विस्तृत आंकड़े अभी अलग से संकलित नहीं किए जा रहे हैं। साथ ही, इस प्रतिस्पर्धा का जिला और राज्य स्तर की समितियों की वित्तीय स्थिति या उनकी प्रापण क्षमता पर क्या असर पड़ता है, इसका कोई विशेष अध्ययन फिलहाल नहीं किया गया है।
इसी बीच, सरकार ने सहकारी संघवाद को मजबूत करने और स्थानीय किसान-आधारित समितियों को लाभ पहुंचाने के लिए नई पहल शुरू की है। इसके तहत 22 राज्यों में दुग्ध एकत्रण केंद्र (एमसीसी) और 9 राज्यों में दुग्ध पूलिंग केंद्र (एमपीपी) को सहकारी ढांचे में लाने की प्रक्रिया जारी है।
इस योजना के अंतर्गत करीब 45,000 दुग्ध केंद्रों को बहुद्देशीय ग्राम सहकारी समितियों के रूप में पंजीकृत करने का प्रस्ताव है। इन्हें आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर की सहकारी संस्थाओं से भी जोड़ा जाएगा, जिससे उनकी कार्यक्षमता और पहुंच बढ़ेगी।
इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा सीधे किसानों को मिलेगा। उन्हें अपने दूध का बेहतर और सुनिश्चित मूल्य मिलेगा, साथ ही संरक्षण बोनस और शेयरधारिता के आधार पर लाभांश भी प्राप्त होगा। इसके अलावा, पशु चारा, पशु चिकित्सा सेवाएं और अन्य जरूरी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। सरकार का मानना है कि इन कदमों से डेयरी क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी, प्रतिस्पर्धा संतुलित होगी और किसानों की आय में स्थायी सुधार आएगा।

