नई दिल्ली: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की ओर से जारी एक प्रशासनिक आदेश ने देश के कृषि वैज्ञानिकों और मीडिया के बीच नई बहस छेड़ दी है। इस सर्कुलर में वैज्ञानिकों के मीडिया से सीधे संवाद पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं, जिसे कई विशेषज्ञ ‘अघोषित सेंसरशिप’ के रूप में देख रहे हैं। आदेश के मुताबिक अब कोई भी वैज्ञानिक या अधिकारी बिना सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के मीडिया को बयान, ब्रीफिंग या बाइट नहीं दे सकेगा।
यह आदेश ICAR के सहायक महानिदेशक अनिल कुमार की ओर से जारी किया गया है, जिसमें केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 का हवाला दिया गया है। दलील दी गई है कि इससे ‘सटीक और प्रामाणिक’ सूचना का प्रसार सुनिश्चित होगा। हालांकि, जमीनी स्तर पर इसका असर उल्टा दिखाई दे रहा है, जहां वैज्ञानिक अब पत्रकारों से बातचीत करने से बच रहे हैं।
‘लैब टू लैंड’ मिशन पर असर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि वैज्ञानिक अनुसंधान का लाभ सीधे किसानों तक पहुंचे। ‘लैब टू लैंड’ की इस सोच के तहत नई किस्मों, कीट प्रबंधन, और मौसम आधारित सलाह किसानों तक समय पर पहुंचाना बेहद जरूरी है। लेकिन नए आदेश के चलते वैज्ञानिकों में भय का माहौल बन गया है, जिससे सूचना का प्रवाह धीमा पड़ सकता है।
कई वैज्ञानिकों का कहना है कि मीडिया के जरिए वे किसानों तक तेजी से जानकारी पहुंचाते थे, लेकिन अब अनुमति की प्रक्रिया इतनी जटिल हो सकती है कि सूचना का महत्व ही खत्म हो जाए। खासकर कीट हमलों या मौसम से जुड़ी त्वरित चेतावनियों में देरी किसानों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है।
कृषि मंत्री की नाराजगी
इस पूरे मामले पर जब कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से प्रतिक्रिया ली गई, तो उन्होंने स्पष्ट नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि ऐसा आदेश नहीं होना चाहिए और अगर जारी हुआ है तो यह पूरी तरह गलत है। उन्होंने यह भी कहा कि इससे किसानों और समाज के बीच गलत संदेश जाएगा।
मंत्री ने तुरंत अपने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि मामले की जांच की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि वैज्ञानिकों, किसानों और मीडिया के बीच संवाद प्रभावित न हो। उन्होंने यह भी माना कि किसानों तक सही जानकारी पहुंचाने में मीडिया की भूमिका बेहद अहम है।
विशेषज्ञों की चिंता
कृषि क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश पारदर्शिता के सिद्धांत के खिलाफ है। उनका कहना है कि कृषि एक तेजी से बदलने वाला क्षेत्र है, जहां समय पर सूचना ही सबसे बड़ा हथियार होती है। यदि हर जानकारी के लिए ‘पूर्व अनुमति’ की बाध्यता होगी, तो यह व्यवस्था सूचना के प्रवाह को बाधित कर सकती है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सरकार जहां एक ओर किसानों की आय बढ़ाने और तकनीक को खेत तक पहुंचाने की बात करती है, वहीं इस तरह के आदेश उस दिशा में बाधा बन सकते हैं।
अब आगे क्या?
फिलहाल, इस मुद्दे पर सबकी नजरें केंद्र सरकार और कृषि मंत्रालय पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद इस विवादित आदेश में बदलाव करता है या उसे वापस लेता है। अगर ऐसा नहीं होता, तो यह मामला और बड़ा रूप ले सकता है और वैज्ञानिक समुदाय में असंतोष बढ़ सकता है।

