भारत के समुद्री खाद्य निर्यात ने वित्त वर्ष 2025-26 में नया इतिहास रचते हुए 72,325 करोड़ रुपये (लगभग 8.28 अरब अमेरिकी डॉलर) का सर्वकालिक उच्च स्तर हासिल किया है। यह उपलब्धि न केवल देश के मत्स्यपालन क्षेत्र की मजबूती को दर्शाती है, बल्कि ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी मानी जा रही है। इस सफलता में फ्रोजन झींगा (श्रिम्प) ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई है, जिसने कुल निर्यात आय में दो-तिहाई से अधिक का योगदान दिया।
मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के अंतर्गत मत्स्य विभाग द्वारा किए गए सतत प्रयासों, नीतिगत सुधारों और वैश्विक बाजारों में विस्तार की रणनीति ने इस उपलब्धि को संभव बनाया है। केंद्रीय मंत्री Rajiv Ranjan Singh के नेतृत्व में क्षेत्र को सुदृढ़ करने के लिए कई पहलें की गईं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग, निवेश आकर्षण और मूल्य श्रृंखला के आधुनिकीकरण पर विशेष जोर दिया गया।
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत से कुल 19.32 लाख मीट्रिक टन समुद्री उत्पादों का निर्यात हुआ। इसमें फ्रोजन झींगा का योगदान 47,973 करोड़ रुपये रहा, जो कुल निर्यात का प्रमुख आधार बना। झींगा निर्यात में मात्रा के आधार पर 4.6% और मूल्य के आधार पर 6.35% की वृद्धि दर्ज की गई, जिससे यह स्पष्ट है कि वैश्विक बाजार में भारतीय झींगा की मांग लगातार मजबूत बनी हुई है।
निर्यात बाजारों की बात करें तो अमेरिका भारत का सबसे बड़ा आयातक बना रहा, जहां 2.32 अरब डॉलर का निर्यात हुआ। हालांकि, अमेरिकी बाजार में मात्रा और मूल्य दोनों में गिरावट दर्ज की गई, जिसका मुख्य कारण टैरिफ से जुड़े मुद्दे रहे। इसके बावजूद भारत ने वैकल्पिक बाजारों में शानदार प्रदर्शन करते हुए इस कमी की भरपाई कर ली।
चीन दूसरे सबसे बड़े बाजार के रूप में उभरा, जहां निर्यात मूल्य में 22.7% और मात्रा में 20.1% की वृद्धि हुई। इसी तरह यूरोपीय संघ में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई, जहां निर्यात मूल्य 37.9% और मात्रा 35.2% तक बढ़ी। दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भी 36% से अधिक की वृद्धि ने यह साबित किया कि भारत अब अपने निर्यात बाजारों का सफलतापूर्वक विविधीकरण कर रहा है। जापान में भी स्थिर वृद्धि बनी रही, जबकि पश्चिम एशिया में हल्की गिरावट देखी गई।
सरकार द्वारा उठाए गए कदमों में वैश्विक मानकों के अनुरूप गुणवत्ता सुधार, एंटीबायोटिक नियंत्रण, ट्रेसेबिलिटी फ्रेमवर्क का कार्यान्वयन और पर्यावरणीय मानकों का पालन सुनिश्चित करना शामिल है। विशेष रूप से अमेरिका से समुद्री स्तनधारी संरक्षण अधिनियम (MMPA) के तहत तुलनीयता स्वीकृति प्राप्त करना एक बड़ी उपलब्धि रही, जिससे भारतीय उत्पादों की वैश्विक विश्वसनीयता और बढ़ी है।
इसके अलावा, 39 देशों के राजनयिकों और एडीबी, एफएओ, जेआईसीए जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भागीदारी के साथ आयोजित गोलमेज सम्मेलनों ने निर्यात रणनीति को और मजबूत किया। अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप में निवेशक सम्मेलनों के जरिए निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी बढ़ावा मिला है।
उत्पाद विविधता के स्तर पर भी सकारात्मक संकेत मिले हैं। फ्रोजन मछली, स्क्विड, कटलफिश, सूखे उत्पाद और जीवित समुद्री उत्पादों के निर्यात में वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि सुरिमी, मछली भोजन और मछली तेल के निर्यात में भी सुधार देखा गया है।
लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में विशाखापट्टनम, जेएनपीटी, कोच्चि, कोलकाता और चेन्नई जैसे प्रमुख बंदरगाहों ने कुल निर्यात में लगभग 64% योगदान दिया, जो इन बंदरगाहों की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।
कुल मिलाकर, भारत का समुद्री खाद्य निर्यात न केवल आर्थिक वृद्धि का इंजन बनकर उभरा है, बल्कि लाखों मछुआरों और किसानों की आजीविका को सशक्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आने वाले वर्षों में तकनीक, निवेश और वैश्विक साझेदारी के सहारे यह क्षेत्र और अधिक ऊंचाइयों तक पहुंचने की क्षमता रखता है।

