नई दिल्ली में कृषि क्षेत्र को नई दिशा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री Shivraj Singh Chouhan की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में निर्णय लिया गया कि देश के प्रत्येक राज्य के लिए उसकी भौगोलिक, जलवायु और संसाधन परिस्थितियों के अनुरूप अलग-अलग कृषि रोडमैप तैयार किए जाएंगे। इसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जाएगा, जो इस पूरे कार्य को दिशा और गति देगी।
केंद्रीय मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि कृषि क्षेत्र में स्थायी सुधार और किसानों की आय बढ़ाने के लिए यह पहल बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश के विदिशा, रायसेन, सीहोर और देवास जिलों के लिए पहले ही एक कृषि रोडमैप तैयार किया जा चुका है, जिसे आधार बनाकर अन्य राज्यों के लिए भी इसी तरह के रोडमैप विकसित किए जाएंगे। यह रोडमैप किसानों के लिए एक वैज्ञानिक दस्तावेज के रूप में कार्य करेगा, जिससे वे अपनी मिट्टी, जलवायु, जल संसाधन और उपलब्ध सुविधाओं के अनुसार बेहतर निर्णय ले सकेंगे।
श्री चौहान ने स्पष्ट किया कि यह रोडमैप राज्यों की सहमति और उनकी आवश्यकताओं के आधार पर तैयार किया जाएगा। इसे किसी भी राज्य पर थोपा नहीं जाएगा, बल्कि सहभागिता के मॉडल पर विकसित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि Rajasthan, Andhra Pradesh और Uttar Pradesh जैसे राज्यों ने प्रारंभिक स्तर पर इस पहल के लिए सहमति भी दे दी है। इस पूरी प्रक्रिया में Indian Council of Agricultural Research (आईसीएआर) और कृषि मंत्रालय मिलकर राज्यों के साथ समन्वय स्थापित करेंगे।
इस प्रस्तावित कृषि रोडमैप का मुख्य उद्देश्य उत्पादन और उत्पादकता दोनों में वृद्धि करना है। इसके तहत प्रत्येक राज्य के लिए यह निर्धारित किया जाएगा कि वहां की आदर्श कृषि प्रणाली क्या होनी चाहिए, कौन-सी फसलें स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल और अधिक लाभकारी होंगी, तथा किन क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है। देश के 12 प्रमुख कृषि-जलवायु क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए यह योजना बनाई जाएगी, ताकि हर क्षेत्र की विशेषताओं के अनुसार कृषि गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा सके।
फसल विविधीकरण को इस योजना का एक प्रमुख स्तंभ बताया गया है। केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करते हुए अन्य लाभकारी फसलों को बढ़ावा दिया जाएगा। जिन क्षेत्रों में सोयाबीन जैसी फसलें प्रमुख हैं, वहां उनकी उत्पादकता बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास किए जाएंगे। वहीं, जहां उत्पादन अधिक है, वहां क्लस्टर आधारित विकास को बढ़ावा देते हुए प्रोसेसिंग और मार्केटिंग की मजबूत व्यवस्था विकसित की जाएगी।
इसके साथ ही नवाचार और विशेष कृषि पहलों पर भी जोर दिया जाएगा। ‘पर्पल रेवोल्यूशन’ (लैवेंडर उत्पादन) की सफलता को ध्यान में रखते हुए अन्य राज्यों में भी इसी तरह की विशिष्ट कृषि क्रांतियों को बढ़ावा देने की योजना है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नई तकनीकों और आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
बैठक में यह भी तय किया गया कि एक बार कृषि रोडमैप तैयार हो जाने के बाद राज्यों की आवश्यकताओं का विस्तृत विश्लेषण किया जाएगा। इसके आधार पर आर्थिक, तकनीकी और आधारभूत संरचना से जुड़ी जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए चरणबद्ध तरीके से योजनाओं को लागू किया जाएगा।
कुल मिलाकर, यह पहल भारतीय कृषि को अधिक वैज्ञानिक, क्षेत्र-विशिष्ट और लाभकारी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। इससे न केवल किसानों को बेहतर मार्गदर्शन मिलेगा, बल्कि कृषि क्षेत्र में स्थिरता, विविधता और आय वृद्धि के नए अवसर भी सृजित होंगे।


