देश में ग्रीष्मकालीन फसलों की बुवाई को लेकर ताजा आंकड़े कृषि क्षेत्र की बदलती तस्वीर पेश कर रहे हैं। है, हालांकि कुछ प्रमुख फसलों में गिरावट भी देखने को मिली है। कुल मिलाकर 2026 में अब तक 72.30 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हो चुकी है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 70.19 लाख हेक्टेयर था। इस तरह कुल बुवाई क्षेत्र में 2.11 लाख हेक्टेयर की वृद्धि दर्ज की गई है, जो कृषि क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
अगर प्रमुख फसलों की बात करें तो चावल की बुवाई में इस बार गिरावट देखने को मिली है। 2026 में अब तक 30.68 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में चावल की बुवाई हुई है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 32.31 लाख हेक्टेयर थी। यानी चावल के क्षेत्र में 1.63 लाख हेक्टेयर की कमी आई है। विशेषज्ञों के अनुसार, जल संकट और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने की नीतियों के कारण किसान धीरे-धीरे चावल से अन्य फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
दूसरी ओर, दालों की बुवाई में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस वर्ष 17.19 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में दालों की बुवाई हुई है, जो पिछले वर्ष के 15.93 लाख हेक्टेयर से 1.26 लाख हेक्टेयर अधिक है। इसमें मूंग और उड़द का योगदान प्रमुख रहा है। मूंग की बुवाई 13.17 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि उड़द का क्षेत्र बढ़कर 3.72 लाख हेक्टेयर हो गया है। यह संकेत देता है कि किसान दलहनी फसलों की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं, जिससे देश में प्रोटीन की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
श्रीअन्न और मोटे अनाजों की बात करें तो इसमें भी सकारात्मक रुझान देखने को मिला है। इस श्रेणी में कुल बुवाई क्षेत्र 15.21 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष के 14.25 लाख हेक्टेयर से 0.97 लाख हेक्टेयर अधिक है। खासतौर पर मक्का की बुवाई में 1.00 लाख हेक्टेयर की वृद्धि दर्ज की गई है, जो किसानों के बदलते रुझान को दर्शाता है। हालांकि बाजरा में हल्की गिरावट देखी गई है, लेकिन ज्वार और रागी जैसी फसलों में स्थिरता बनी हुई है।
तिलहनों के क्षेत्र में भी अच्छी प्रगति दर्ज की गई है। इस वर्ष 9.21 लाख हेक्टेयर में तिलहनों की बुवाई हुई है, जो पिछले वर्ष के 7.71 लाख हेक्टेयर से 1.50 लाख हेक्टेयर अधिक है। इसमें मूंगफली की बुवाई में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी देखने को मिली है, जो 5.51 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है। इसके अलावा सूरजमुखी और तिल जैसी फसलों में भी मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह रुझान देश में खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव सरकार की फसल विविधीकरण नीतियों, बाजार की मांग और जलवायु परिस्थितियों के प्रभाव का परिणाम है। किसान अब पारंपरिक फसलों के बजाय अधिक लाभकारी और कम पानी में उगने वाली फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। साथ ही, दलहन और तिलहन जैसी फसलों पर बढ़ता जोर देश की पोषण और आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में सहायक हो सकता है।
कुल मिलाकर, ग्रीष्मकालीन बुवाई के ये आंकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय कृषि धीरे-धीरे संतुलित और विविधतापूर्ण दिशा में आगे बढ़ रही है। हालांकि चावल जैसी फसलों में गिरावट चिंता का विषय हो सकती है, लेकिन दालों, मोटे अनाजों और तिलहनों में बढ़ोतरी से यह स्पष्ट है कि कृषि क्षेत्र में बदलाव की प्रक्रिया जारी है, जो भविष्य में किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

