बिहार के पूर्णिया जिले में लगातार बढ़ते रासायनिक उर्वरकों के उपयोग और घटती मृदा उर्वरता को देखते हुए किसानों को वैज्ञानिक एवं टिकाऊ खेती के प्रति जागरूक करने के लिए एक महत्वपूर्ण किसान–वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। ICAR Research Complex for Eastern Region तथा Krishi Vigyan Kendra Purnea के संयुक्त तत्वावधान में जलालगढ़ प्रखंड के कथैली गांव में आयोजित इस कार्यक्रम में लगभग 100 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 30 महिला किसान भी शामिल रहीं।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों को “संतुलित उर्वरक उपयोग” और “समेकित पोषक तत्व प्रबंधन” की वैज्ञानिक जानकारी देना था, ताकि मिट्टी की गुणवत्ता को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके और खेती की बढ़ती लागत को कम किया जा सके।
विशेषज्ञों ने बताया कि पूर्णिया की उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी धान, मक्का और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन अधिक उत्पादन की होड़ में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग से मिट्टी की उर्वरता तेजी से घट रही है। इससे उत्पादन लागत बढ़ रही है और मिट्टी की प्राकृतिक क्षमता पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
कार्यक्रम में Anup Das ने किसानों को संदेश देते हुए कहा कि खेती को लाभकारी बनाए रखने के लिए मृदा स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि किसान फसल अवशेषों का पुनर्चक्रण और हरी खाद जैसी तकनीकों को अपनाएं, तो रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम की जा सकती है और खेती की लागत में भी उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
उन्होंने यह भी बताया कि दीर्घकालीन रूप से मृदा स्वास्थ्य को सुरक्षित रखना ही स्थायी उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने का सबसे प्रभावी तरीका है। वैज्ञानिकों ने किसानों को समझाया कि केवल रासायनिक उर्वरकों के सहारे खेती करना भविष्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
कार्यक्रम के दौरान समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने किसानों को बताया कि रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ गोबर खाद, कम्पोस्ट और हरी खाद जैसे जैविक स्रोतों का संतुलित उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखता है। इससे मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है और पोषक तत्वों की उपलब्धता भी संतुलित रहती है।
हरी खाद के महत्व पर चर्चा करते हुए वैज्ञानिकों ने किसानों को ढैंचा जैसी फसलों की उपयोगिता के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि ग्रीष्मकाल में ढैंचा उगाकर धान की बुआई से पहले उसे मिट्टी में पलट देने से मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है और नाइट्रोजन सहित कई आवश्यक पोषक तत्व स्वाभाविक रूप से उपलब्ध होते हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है और खेती अधिक टिकाऊ बनती है।
इसी पहल को बढ़ावा देने के लिए कार्यक्रम में किसानों को ढैंचा के बीज भी वितरित किए गए ताकि वे इस तकनीक को अपने खेतों में अपनाकर व्यावहारिक लाभ प्राप्त कर सकें।
संवाद सत्र के दौरान किसानों ने मृदा उर्वरता में कमी, बढ़ती उत्पादन लागत और उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता जैसी समस्याएं विशेषज्ञों के सामने रखीं। वैज्ञानिकों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार व्यावहारिक समाधान सुझाए और किसानों को वैज्ञानिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम में किसानों को मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन अपनाने की सलाह भी दी गई। विशेषज्ञों ने कहा कि “मृदा स्वास्थ्य कार्ड” के आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि फसल की जरूरत के अनुसार सही मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध कराए जा सकें। इससे उर्वरकों की बर्बादी कम होगी और उत्पादन लागत भी घटेगी।
वैज्ञानिकों ने उर्वरकों के सही समय, सही मात्रा और सही विधि से उपयोग की जानकारी भी दी। उन्होंने बताया that संतुलित उर्वरक प्रबंधन से पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ती है, जिससे कम लागत में बेहतर उत्पादन संभव हो पाता है।
कार्यक्रम में Santosh Kumar, Gaus Ali, K. M. Singh, जिला कृषि पदाधिकारी Haridwar Chaurasia तथा प्रखंड कृषि पदाधिकारी Kamlesh Mishra सहित कई विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा परीक्षण और जैविक विकल्पों को अपनाते हैं तो इससे मिट्टी की गुणवत्ता लंबे समय तक सुरक्षित रह सकेगी और खेती अधिक लाभकारी एवं पर्यावरण अनुकूल बन सकेगी।

