देश में आत्महत्या के मामलों को लेकर जारी हुई राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ताजा रिपोर्ट ‘Accidental Deaths & Suicides in India 2024’ ने एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2024 में देशभर में कुल 1,70,746 लोगों ने आत्महत्या की. हालांकि यह आंकड़ा 2023 के मुकाबले 0.4 फीसदी कम है, लेकिन कृषि क्षेत्र से जुड़ी आत्महत्याओं की स्थिति अब भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है.
रिपोर्ट बताती है कि 2024 में कृषि क्षेत्र से जुड़े कुल 10,546 लोगों ने आत्महत्या की, जो देश में हुई कुल आत्महत्याओं का 6.2 फीसदी हिस्सा है. इनमें 4,633 किसान या काश्तकार और 5,913 खेतिहर मजदूर शामिल हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के मामले किसानों से भी ज्यादा सामने आए हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमजोर हालत को दिखाता है.
आंकड़ों के अनुसार, आत्महत्या करने वाले किसानों में 4,481 पुरुष और 152 महिलाएं थीं. वहीं खेतिहर मजदूरों में 5,352 पुरुष और 561 महिलाएं शामिल रहीं. विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती लागत, मौसम की मार, कर्ज का बोझ, फसल नुकसान और आय में अस्थिरता किसानों और मजदूरों को मानसिक तनाव की ओर धकेल रही है.
कृषि अर्थशास्त्रियों के अनुसार, छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. खेती में लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि फसल का उचित दाम नहीं मिलने से किसानों की आर्थिक हालत बिगड़ रही है. दूसरी ओर खेतिहर मजदूरों के सामने रोजगार और मजदूरी की अस्थिरता भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. ग्रामीण इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी स्थिति को और गंभीर बना रही है.
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि किसानों और खेत मजदूरों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली भी मजबूत करनी होगी. कृषि बीमा योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाना, कर्ज राहत, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी और ग्रामीण रोजगार के अवसर बढ़ाना जरूरी हो गया है.
हालांकि NCRB रिपोर्ट में कुल आत्महत्याओं में मामूली गिरावट दर्ज की गई है, लेकिन कृषि क्षेत्र के आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि गांवों और खेती से जुड़े लोगों की समस्याएं अभी भी कम नहीं हुई हैं. विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा सकता है.
देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले किसान आज आर्थिक और मानसिक दबाव के दोहरे संकट से गुजर रहे हैं. ऐसे में यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि नीति निर्माताओं के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है.

