धारवाड़: कर्नाटक में खेती की जमीन तेजी से खराब हो रही है और इसकी सबसे बड़ी वजह बिना वैज्ञानिक तरीके से खेती करना, भूजल का अत्यधिक इस्तेमाल और मिट्टी-पानी का गलत प्रबंधन बताया जा रहा है। Karnataka Soil Salinity यानी कर्नाटक में बढ़ता मिट्टी का खारापन अब कृषि वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चिंता बन गया है। इस मुद्दे को लेकर सॉइल साइंटिस्ट डॉ. वीबी कुलगोड ने किसानों को गंभीर चेतावनी दी है।
धारवाड़ स्थित Water and Land Management Institute (WALMI) में आयोजित वर्ल्ड अर्थ डे कार्यक्रम के दौरान डॉ. कुलगोड ने कहा कि राज्य में सिंचाई के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन और अधिक नमक वाले बोरवेल के पानी का उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता को तेजी से नुकसान पहुंचा रहा है। उन्होंने बताया कि गलत सिंचाई पद्धतियों और रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल से मिट्टी में खारापन और एल्कलाइनिटी की समस्या लगातार बढ़ रही है।
डॉ. कुलगोड के मुताबिक कर्नाटक में 80,000 हेक्टेयर से अधिक सिंचित कृषि भूमि खारी और एल्कलाइन बन चुकी है। ऐसी जमीन को दोबारा उपजाऊ बनाना बेहद महंगा और समय लेने वाला काम है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे मिट्टी और पानी की जांच करवाने के बाद ही उर्वरकों और केमिकल्स का इस्तेमाल करें।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तरीके से खेती अपनाने से मिट्टी की सेहत लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है। साथ ही इससे खेती की लागत कम होगी और उत्पादन क्षमता भी बेहतर बनी रहेगी।
कार्यक्रम में मौजूद MLC एफएच जक्कप्पनवर ने कहा कि जल संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है। उन्होंने Water Pollution Control Act को सख्ती से लागू करने की मांग की ताकि जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाया जा सके।
उन्होंने किसानों से नियमित मिट्टी परीक्षण कराने और कृषि अनुसंधान आधारित तकनीकों को अपनाने की अपील की। उनका कहना था कि आधुनिक वैज्ञानिक खेती ही भविष्य में किसानों की आय और उत्पादन को सुरक्षित रख सकती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे गिरीश मराडी ने कहा कि तेजी से बढ़ते औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण खेती योग्य जमीन लगातार कम होती जा रही है। इससे आने वाले समय में फूड सिक्योरिटी एक बड़ा संकट बन सकती है।
उन्होंने बताया कि भारत के कुल 329 मिलियन हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र में से केवल 141 मिलियन हेक्टेयर भूमि ही खेती के लिए उपलब्ध है। ऐसे में मिट्टी और पानी के संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन बेहद जरूरी हो गया है।
गिरीश मराडी ने गन्ना, धान, मक्का और कपास जैसी फसलों की लगातार मोनोक्रॉपिंग के खिलाफ चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि एक ही फसल को बार-बार उगाने से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है और जमीन की उर्वरता कम हो जाती है।
उन्होंने किसानों को क्रॉप रोटेशन और इंटीग्रेटेड फार्मिंग अपनाने की सलाह दी। इसमें पशुपालन, बागवानी, पेड़ आधारित खेती और वैल्यू एडेड एग्रीकल्चर को शामिल किया जाता है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलती है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते Karnataka Soil Salinity की समस्या पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में खेती की लागत बढ़ सकती है और उत्पादन घट सकता है। ऐसे में किसानों के लिए वैज्ञानिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग और जल संरक्षण तकनीकों को अपनाना बेहद जरूरी हो गया है।

