जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौतियों के बीच भारत सरकार का “राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन” (एनएमएसए) किसानों के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच बनकर उभर रहा है। वर्षा आधारित खेती, जल संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य और जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया यह मिशन देश में कृषि को अधिक टिकाऊ और भविष्य के अनुकूल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
भारत में लगभग 60 प्रतिशत खेती वर्षा पर निर्भर है, जो देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में करीब 40 प्रतिशत योगदान देती है। बदलते मौसम, सूखा, बाढ़ और गर्मी की बढ़ती घटनाओं के कारण खेती पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। इसी चुनौती से निपटने के लिए वर्ष 2014-15 में भारत सरकार ने जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के अंतर्गत राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन की शुरुआत की थी।
इस मिशन के तहत सरकार जल उपयोग दक्षता, मृदा स्वास्थ्य सुधार और जलवायु-अनुकूल खेती को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं चला रही है। वर्षा आधारित क्षेत्र विकास (आरएडी), प्रति बूंद अधिक फसल (पीडीएमसी) और मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (एसएचएम) इसके प्रमुख घटक हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014-15 से अब तक वर्षा आधारित क्षेत्र विकास योजना के तहत 8.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया है। इसके लिए 2119.84 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिससे लगभग 14.35 लाख किसानों को लाभ मिला। इस योजना के माध्यम से एकीकृत कृषि प्रणाली को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें फसल उत्पादन के साथ पशुपालन, बागवानी और मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों को भी जोड़ा जाता है। इससे किसानों की आय बढ़ाने और जोखिम कम करने में मदद मिल रही है।
जल संकट से निपटने के लिए “प्रति बूंद अधिक फसल” योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई के जरिए कम पानी में अधिक उत्पादन सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। वर्ष 2015-16 से लागू इस योजना के अंतर्गत अब तक लगभग 109 लाख हेक्टेयर भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के दायरे में लाया जा चुका है। इसके लिए केंद्र सरकार ने 26,325 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की है।
सरकार ने 2025-26 से 2029-30 तक अगले पांच वर्षों में 100 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाने का लक्ष्य रखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल जल संरक्षण के साथ-साथ कृषि उत्पादकता बढ़ाने में भी मददगार साबित होगी।
मृदा स्वास्थ्य सुधार को लेकर भी सरकार बड़े स्तर पर काम कर रही है। “मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना” के माध्यम से किसानों को उनकी जमीन की गुणवत्ता और पोषक तत्वों की जानकारी दी जा रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक 97.53 लाख मृदा नमूने एकत्र किए गए, जिनमें से 92.87 लाख नमूनों का परीक्षण किया गया। फरवरी 2026 तक देशभर में 25.79 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए जा चुके हैं।
इन कार्डों के जरिए किसानों को फसल-विशिष्ट पोषक तत्वों की सिफारिशें दी जाती हैं, जिससे उर्वरकों का संतुलित उपयोग संभव हो पाता है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना से यूरिया के अत्यधिक उपयोग में कमी आई है और मृदा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।
जलवायु-अनुकूल खेती को मजबूत बनाने में Indian Council of Agricultural Research की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आईसीएआर द्वारा संचालित “राष्ट्रीय नवाचार जलवायु-अनुकूल कृषि कार्यक्रम” (NICRA) के तहत जलवायु-प्रतिरोधी फसल किस्मों और आधुनिक तकनीकों का विकास किया जा रहा है। वर्ष 2014 से 2025 के बीच 2996 जलवायु-प्रतिरोधी फसल किस्में विकसित की गई हैं।
इसके अलावा, देश के 151 संवेदनशील जिलों के 448 गांवों में “जलवायु-प्रतिरोधी गांव” विकसित किए गए हैं, जहां किसानों को आधुनिक तकनीकों और जोखिम प्रबंधन की जानकारी दी जाती है। सूखा, बाढ़ और लू जैसी परिस्थितियों से निपटने के लिए स्थान-विशिष्ट कृषि योजनाएं भी तैयार की गई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, जल संरक्षण और ग्रामीण आजीविका को भी मजबूत कर रहा है। यह मिशन संयुक्त राष्ट्र के सतत् विकास लक्ष्यों—विशेष रूप से शून्य भूख, स्वच्छ जल और जलवायु कार्रवाई—के अनुरूप कार्य कर रहा है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के दौर में भारत की कृषि को टिकाऊ और सुरक्षित बनाने के लिए ऐसे मिशनों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी। सरकार की यह पहल किसानों की आय बढ़ाने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और भविष्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

