New Delhi: देशभर के किसानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अनुमान जताया है कि इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 26 मई को केरल तट पर पहुंच सकता है, जो सामान्य तारीख से करीब छह दिन पहले है। आमतौर पर मॉनसून 1 जून के आसपास केरल में दस्तक देता है। मौसम विभाग का कहना है कि अनुमान में चार दिन तक का अंतर संभव है, लेकिन यदि मॉनसून तय समय से पहले आता है तो इससे खरीफ फसलों की बुआई जल्दी शुरू हो सकेगी।
समय से पहले मॉनसून आने की संभावना ने किसानों में नई उम्मीद जगा दी है। खासकर धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और गन्ना जैसी खरीफ फसलों की खेती करने वाले किसान जल्दी बुआई की तैयारी में जुट सकते हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर या जल्दी आने वाला मॉनसून खेती के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि इससे मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती है और फसलों की शुरुआती वृद्धि बेहतर होती है।
भारत की कृषि व्यवस्था काफी हद तक मॉनसून पर निर्भर है। देश के कुल कृषि क्षेत्र का बड़ा हिस्सा अब भी वर्षा आधारित खेती पर टिका हुआ है। ऐसे में मॉनसून की समय पर शुरुआत किसानों की आय, खाद्यान्न उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। मॉनसून की अच्छी बारिश जलाशयों, नदियों और भूजल स्तर को भी बेहतर बनाती है, जिससे सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता बढ़ती है।
मौसम विभाग के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मॉनसून भारत की लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम भूमिका निभाता है। देश में होने वाली कुल बारिश का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा मॉनसून से मिलता है। यही बारिश खेती, बिजली उत्पादन, पेयजल आपूर्ति और उद्योगों के लिए जरूरी जल संसाधनों को बनाए रखने में मदद करती है।
हालांकि मॉनसून के जल्दी आने की संभावना सकारात्मक संकेत मानी जा रही है, लेकिन मौसम विभाग की पिछली भविष्यवाणी ने कुछ चिंताएं भी बढ़ाई थीं। पिछले महीने भारतीय मौसम विभाग ने वर्ष 2026 में सामान्य से कम मॉनसून बारिश होने का अनुमान जताया था। यदि पूरे सीजन में बारिश सामान्य से कम रहती है तो इसका असर कृषि उत्पादन, खाद्य कीमतों और आर्थिक वृद्धि पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कम बारिश की स्थिति में धान, दालें और तिलहन जैसी फसलें प्रभावित हो सकती हैं। इसके अलावा ग्रामीण मांग और किसानों की आय पर भी असर पड़ सकता है। भारत पहले से ही वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय तनावों के कारण महंगाई के दबाव का सामना कर रहा है। ऐसे में कमजोर मॉनसून खाद्य महंगाई को और बढ़ा सकता है।
भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक, सामान्य या औसत मॉनसून बारिश का मतलब चार महीने के मॉनसून सीजन में 50 वर्षों के औसत 87 सेंटीमीटर वर्षा का 96 प्रतिशत से 104 प्रतिशत के बीच रहना है। यदि बारिश इस दायरे में रहती है तो उसे सामान्य मॉनसून माना जाता है।
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि मॉनसून की शुरुआती स्थिति भले ही सकारात्मक हो, लेकिन पूरे सीजन के दौरान बारिश का वितरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। यदि जून से सितंबर तक विभिन्न राज्यों में संतुलित बारिश होती है तो खरीफ उत्पादन अच्छा रहने की संभावना रहती है। दूसरी ओर, लंबे सूखे अंतराल या अत्यधिक बारिश जैसी परिस्थितियां फसलों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
फिलहाल मॉनसून के जल्दी आने की संभावना ने किसानों, कृषि बाजारों और नीति निर्माताओं को राहत दी है। आने वाले दिनों में मौसम विभाग की निगरानी और पूर्वानुमान पर सभी की नजरें रहेंगी, क्योंकि देश की खेती और अर्थव्यवस्था काफी हद तक मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है।

