Foot-and-Mouth Disease जिसे हिंदी में “मुंहपका-खुरपका रोग” कहा जाता है, पशुओं में फैलने वाली अत्यंत संक्रामक वायरल बीमारी है। यह रोग मुख्य रूप से गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और सूअर जैसे खुर वाले पशुओं को प्रभावित करता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में, जहां करोड़ों किसान पशुपालन पर निर्भर हैं, यह बीमारी पशुधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है।
मुंहपका-खुरपका रोग सीधे तौर पर पशुओं की उत्पादकता को प्रभावित करता है। इससे दूध उत्पादन कम हो जाता है, पशुओं का वजन घटता है और किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। हालांकि यह बीमारी अधिकांश मामलों में जानलेवा नहीं होती, लेकिन इसकी संक्रामक प्रकृति इसे बेहद खतरनाक बना देती है।
क्या है मुंहपका-खुरपका रोग?
यह एक वायरल रोग है, जो “फुट एंड माउथ डिजीज वायरस”(FMDV) के कारण होता है। यह वायरस बहुत तेजी से फैलता है और संक्रमित पशु के संपर्क में आने वाले अन्य पशुओं को भी प्रभावित कर सकता है। रोग के फैलने की गति इतनी तेज होती है कि यदि समय रहते नियंत्रण न किया जाए तो पूरा गांव या क्षेत्र इसकी चपेट में आ सकता है।
यह बीमारी मुख्य रूप से पशुओं के मुंह, जीभ, होंठ, थनों और खुरों में छाले पैदा करती है। इन छालों के कारण पशु को खाने-पीने और चलने में अत्यधिक परेशानी होती है।
रोग फैलने के प्रमुख कारण
मुंहपका-खुरपका रोग कई माध्यमों से फैल सकता है। संक्रमित पशु की लार, दूध, मल-मूत्र और सांस के जरिए वायरस दूसरे पशुओं तक पहुंच जाता है। इसके अलावा संक्रमित चारा, पानी, वाहन, उपकरण और पशुपालकों के कपड़े भी संक्रमण फैलाने का कारण बन सकते हैं।
पशु मेलों, बाजारों और बिना जांच के पशुओं की खरीद-बिक्री से भी यह बीमारी तेजी से फैलती है। बरसात और ठंड के मौसम में संक्रमण का खतरा अधिक माना जाता है।
रोग के प्रमुख लक्षण
इस बीमारी के लक्षण पशुओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। सबसे पहले पशु को तेज बुखार आता है और वह सुस्त दिखाई देता है। इसके बाद मुंह और जीभ पर छाले बनने लगते हैं, जिससे पशु खाना छोड़ देता है। मुंह से अत्यधिक लार निकलना इस रोग का प्रमुख संकेत माना जाता है।
खुरों में घाव और सूजन के कारण पशु लंगड़ाकर चलने लगता है। कई बार पशु खड़ा होने में भी असमर्थ हो जाता है। दूध देने वाले पशुओं में दूध उत्पादन अचानक कम हो जाता है। छोटे बछड़ों और बच्चों में यह रोग अधिक गंभीर रूप ले सकता है।
पशुपालकों को होने वाला आर्थिक नुकसान
मुंहपका-खुरपका रोग पशुपालकों के लिए आर्थिक रूप से बेहद नुकसानदायक साबित होता है। दूध उत्पादन में कमी आने से डेयरी व्यवसाय प्रभावित होता है। पशुओं का वजन घटने से मांस उत्पादन भी कम हो जाता है।
बीमार पशु कमजोर हो जाते हैं, जिससे उनकी प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ता है। इलाज, दवाइयों और देखभाल पर अतिरिक्त खर्च किसानों की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर देता है। कई बार संक्रमित क्षेत्रों में पशुओं की आवाजाही पर रोक लगाई जाती है, जिससे व्यापार और बाजार व्यवस्था प्रभावित होती है।
भारत में रोग नियंत्रण के प्रयास
भारत सरकार Department of Animal Husbandry and Dairying द्वारा इस बीमारी को नियंत्रित करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। देशभर में नियमित टीकाकरण अभियान चलाए जाते हैं ताकि पशुओं को संक्रमण से बचाया जा सके।
सरकार ने “एफएमडी नियंत्रण कार्यक्रम” के तहत लाखों पशुओं का टीकाकरण किया है। कई राज्यों में पशु स्वास्थ्य शिविर, जागरूकता अभियान और मुफ्त टीकाकरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पशुपालकों को भी रोग की पहचान और रोकथाम के बारे में प्रशिक्षित किया जा रहा है।
बचाव के प्रमुख उपाय
मुंहपका-खुरपका रोग से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका समय पर टीकाकरण है। पशुओं को पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार नियमित रूप से वैक्सीन लगवानी चाहिए। नए खरीदे गए पशुओं को कुछ दिनों तक अलग रखना चाहिए ताकि संक्रमण का खतरा कम हो सके।
पशुशालाओं की नियमित सफाई और कीटाणुनाशक दवाओं का प्रयोग जरूरी है। संक्रमित पशु को तुरंत अलग कर देना चाहिए और उसके संपर्क में आए उपकरणों को साफ करना चाहिए।
पशुओं को स्वच्छ पानी और संतुलित आहार देना भी आवश्यक है, क्योंकि स्वस्थ पशुओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। पशुपालकों को पशुओं में किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
उपचार और देखभाल
मुंहपका-खुरपका रोग का कोई विशेष इलाज नहीं है, क्योंकि यह वायरल बीमारी है। उपचार मुख्य रूप से लक्षणों को नियंत्रित करने और पशु को आराम पहुंचाने पर आधारित होता है।
पशु चिकित्सक संक्रमित पशुओं को दर्द और बुखार कम करने की दवाइयां देते हैं। मुंह के घावों को साफ रखने और संक्रमण रोकने के लिए एंटीसेप्टिक दवाओं का उपयोग किया जाता है। नरम और पौष्टिक आहार देने से पशु जल्दी स्वस्थ हो सकता है।
निष्कर्ष
Foot-and-Mouth Disease भारत के पशुधन क्षेत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है। यह बीमारी न केवल पशुओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर डालती है। हालांकि समय पर टीकाकरण, स्वच्छता और जागरूकता के माध्यम से इस रोग को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
पशुपालकों, पशु चिकित्सकों और सरकार के संयुक्त प्रयास ही इस बीमारी के प्रभाव को कम कर सकते हैं। यदि किसान नियमित रूप से अपने पशुओं की देखभाल करें और टीकाकरण को प्राथमिकता दें, तो मुंहपका-खुरपका रोग से होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।


