वेस्ट एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार पर भी साफ दिखाई देने लगा है। तेल उत्पादक देशों से जुड़े इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर ऊर्जा बाजार, आपूर्ति श्रृंखला और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ता है। भारत जैसे विकासशील देश, जो अपनी ऊर्जा और उर्वरक जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करते हैं, ऐसे संकटों से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने वर्तमान परिस्थितियों में फ्यूल, फर्टिलाइज़र और फॉरेक्स यानी “3F” को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया है।
मुंबई में आयोजित SIDBI फाउंडेशन डे कार्यक्रम में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को बचाने की अपील मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की मौजूदा आर्थिक चुनौतियां मुख्य रूप से बाहरी कारणों से उत्पन्न हो रही हैं। देश की कच्चे तेल, उर्वरकों और सोने जैसे उत्पादों के लिए आयात पर निर्भरता बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच चिंता का विषय बन गई है।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। इसी प्रकार फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरकों के लिए भी देश को बड़ी मात्रा में विदेशी आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि वेस्ट एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो तेल की कीमतों में उछाल, समुद्री परिवहन लागत में वृद्धि और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान की संभावना बढ़ सकती है। इससे भारत के आयात बिल में भारी बढ़ोतरी हो सकती है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है।
वित्त मंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं, उर्वरकों की आपूर्ति बाधित होती है, निर्यात ऑर्डर प्रभावित होते हैं और उद्योगों की कार्यशील पूंजी पर दबाव बढ़ता है, तो इन सभी चुनौतियों का संयुक्त प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर हो सकता है। उनका कहना था कि वेस्ट एशिया का संकट अब केवल कूटनीतिक या राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा संबंध भारत की आर्थिक स्थिरता से भी जुड़ गया है।
इस पूरे परिदृश्य में सोने का आयात भी सरकार की एक बड़ी चिंता बनकर उभरा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में से एक है। वर्ष 2025-26 में भारत का सोना आयात रिकॉर्ड 71.98 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 24 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्शाता है। यह वृद्धि मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की बढ़ती कीमतों के बावजूद घरेलू मांग मजबूत बने रहने के कारण हुई है।
सोने का आयात सीधे तौर पर विदेशी मुद्रा भंडार को प्रभावित करता है क्योंकि इसके लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से अपील की थी कि वे कम-से-कम एक वर्ष तक गैर-जरूरी सोने की खरीदारी, विदेशों में महंगी शादियां और विदेशी पर्यटन जैसी गतिविधियों को सीमित करें। उनका मानना है कि यदि देशवासी कुछ समय के लिए ऐसे खर्चों में कमी लाते हैं तो भारत अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचा सकता है।
सरकार ने सोने और चांदी के आयात को नियंत्रित करने के लिए आयात शुल्क को भी बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया है। इसका उद्देश्य एक ओर घरेलू मांग को संतुलित करना है, वहीं दूसरी ओर विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाले दबाव को कम करना भी है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आयात शुल्क बढ़ाने से समस्या का पूर्ण समाधान नहीं होगा। इसके लिए घरेलू स्तर पर गोल्ड रीसाइक्लिंग और गोल्ड मॉनेटाइजेशन जैसी योजनाओं को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता होगी।
वेस्ट एशिया संकट का असर केवल बड़े उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव आम नागरिकों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) पर भी पड़ सकता है। यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो परिवहन लागत में वृद्धि होगी, जिससे खाद्य पदार्थों, उपभोक्ता वस्तुओं और कृषि इनपुट की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इससे महंगाई बढ़ने की आशंका रहेगी। दूसरी ओर, यदि उर्वरकों की आपूर्ति प्रभावित होती है तो कृषि क्षेत्र पर भी दबाव बढ़ सकता है।
एमएसएमई क्षेत्र, जो पहले से ही लागत बढ़ने और वैश्विक मांग में अनिश्चितता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे हालात में अतिरिक्त दबाव महसूस कर सकता है। वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार की प्राथमिकता नागरिकों, निर्यातकों और छोटे व्यवसायों को वैश्विक अस्थिरता के प्रभाव से बचाना है। सरकार यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है कि आपूर्ति श्रृंखलाएं सुचारू रूप से चलती रहें और आर्थिक गतिविधियां प्रभावित न हों।
वित्त मंत्री ने अपने संबोधन में उन आलोचनाओं का भी जवाब दिया जो भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर नकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश करती हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग जानबूझकर निराशावादी तस्वीर पेश कर रहे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि बाहरी चुनौतियों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। मजबूत घरेलू मांग, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाएं भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रही हैं।
आर्थिक विशेषज्ञ भी मानते हैं कि भारत के चालू खाते (Current Account) पर सबसे अधिक दबाव पैदा करने वाले कारकों में सोने का आयात प्रमुख है। कैपिटलमाइंड म्यूचुअल फंड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी दीपक शेनॉय का कहना है कि यदि सोने के आयात को समीकरण से बाहर कर दिया जाए तो भारत का चालू खाता अधिकांश तिमाहियों में अधिशेष की स्थिति में दिखाई देगा। उनके अनुसार, देश में पहले से मौजूद निष्क्रिय सोने का बेहतर उपयोग और गोल्ड रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देकर विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाले दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, वेस्ट एशिया में बढ़ता तनाव भारत के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक चुनौती बनकर उभर रहा है। फ्यूल, फर्टिलाइज़र और फॉरेक्स पर सरकार का विशेष फोकस इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू उत्पादन बढ़ाना, विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखना और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाना भारत की आर्थिक रणनीति के प्रमुख स्तंभ होंगे। यदि सरकार, उद्योग और आम नागरिक मिलकर संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की दिशा में कदम उठाते हैं, तो भारत इन वैश्विक चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है।


