Agricultural Water Management Scheme: देश में लगातार घटते भूजल स्तर, अनियमित मानसून और बढ़ती सिंचाई लागत के बीच कृषि जल प्रबंधन किसानों के लिए बेहद जरूरी हो गया है। खेती के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध न होने के कारण कई क्षेत्रों में किसानों को फसल का रकबा कम करना पड़ता है। वहीं कुछ इलाकों में पारंपरिक बाढ़ सिंचाई के कारण बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद हो जाता है। इन समस्याओं को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रति बूंद अधिक फसल कार्यक्रम, जलग्रहण क्षेत्र विकास और आधुनिक कमांड क्षेत्र जल प्रबंधन जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों को सहायता दे रही हैं।
इन पहलों को सामान्य रूप से कृषि जल प्रबंधन योजना के रूप में समझा जा सकता है। इनका उद्देश्य खेत तक सिंचाई का पानी पहुंचाना, उपलब्ध पानी का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करना, वर्षा जल का संरक्षण करना और ड्रिप तथा स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देना है।
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की शुरुआत 1 जुलाई 2015 को हुई थी। योजना का लक्ष्य सुनिश्चित सिंचाई का विस्तार करना, खेत स्तर पर पानी के उपयोग की दक्षता बढ़ाना और टिकाऊ जल संरक्षण को प्रोत्साहित करना है। अगस्त 2025 तक योजना के विभिन्न कार्यक्रमों से 2.7 करोड़ से अधिक किसानों को लाभ पहुंचने और 2.46 करोड़ हेक्टेयर से अधिक भूमि को विकसित करने या सिंचाई सुविधा से जोड़ने की जानकारी सरकार ने दी है।
क्या है कृषि जल प्रबंधन योजना?
कृषि जल प्रबंधन योजना केवल किसानों को सिंचाई उपकरण देने तक सीमित नहीं है। यह जल स्रोत से लेकर किसान के खेत और पौधे की जड़ तक पानी पहुंचाने की पूरी व्यवस्था को बेहतर बनाने का प्रयास है।
इसके अंतर्गत नहरों का आधुनिकीकरण, भूमिगत पाइपलाइन, खेत तालाब, वर्षा जल संचयन, जलग्रहण क्षेत्र विकास, ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर सिंचाई, भूजल पुनर्भरण और डिजिटल जल वितरण जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाता है।
सरकार का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि कम पानी में अधिक क्षेत्र की सिंचाई हो सके। इससे किसानों की फसल सुरक्षित रहे, उत्पादन बढ़े और सिंचाई पर होने वाला डीजल, बिजली तथा मजदूरी का खर्च कम किया जा सके।
योजना का मुख्य उद्देश्य
कृषि जल प्रबंधन से जुड़ी योजनाओं का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य “हर खेत को पानी” पहुंचाना है। देश में आज भी बड़ी संख्या में किसान मानसून पर निर्भर हैं। बारिश समय पर नहीं होने पर बुवाई प्रभावित होती है और खड़ी फसल सूखने का खतरा बढ़ जाता है।
योजना के माध्यम से ऐसे क्षेत्रों में छोटे जल स्रोत, खेत तालाब, नहरें, पाइपलाइन और सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली विकसित करने पर जोर दिया जाता है। साथ ही पहले से उपलब्ध पानी को कम नुकसान के साथ खेतों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।
इसके प्रमुख उद्देश्यों में कृषि भूमि का सिंचित क्षेत्र बढ़ाना, पानी की बर्बादी रोकना, वर्षा जल संग्रह करना, भूजल पर दबाव कम करना, फसल उत्पादकता बढ़ाना और किसानों की आय में सुधार करना शामिल है।
ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई पर मिलती है सहायता
कृषि जल प्रबंधन के अंतर्गत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को विशेष महत्व दिया गया है। ड्रिप प्रणाली में पाइप और छोटी नलिकाओं के माध्यम से पानी सीधे पौधे की जड़ों तक पहुंचाया जाता है। इससे खेत में अनावश्यक पानी नहीं फैलता और मिट्टी में जरूरी नमी बनी रहती है।
स्प्रिंकलर प्रणाली में पानी का छिड़काव बारिश की तरह किया जाता है। यह तकनीक गेहूं, सरसों, दालों, सब्जियों, चारा फसलों और कई अन्य फसलों के लिए उपयोगी हो सकती है। रेतीली तथा असमतल भूमि वाले क्षेत्रों में भी स्प्रिंकलर का उपयोग लाभकारी माना जाता है।
“प्रति बूंद अधिक फसल” कार्यक्रम के तहत छोटे और सीमांत किसानों को ड्रिप तथा स्प्रिंकलर प्रणाली लगाने के लिए निर्धारित लागत की 55 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता दी जाती है। अन्य श्रेणी के किसानों के लिए यह सहायता सामान्यतः 45 प्रतिशत तक है। राज्य सरकारें अपने बजट से अतिरिक्त या टॉप-अप सब्सिडी भी दे सकती हैं। एक लाभार्थी को सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली के लिए दी जाने वाली सहायता सामान्य रूप से अधिकतम पांच हेक्टेयर क्षेत्र तक सीमित रहती है।
हालांकि वास्तविक अनुदान राशि, पात्रता और इकाई लागत राज्य के नियमों, फसल, भूमि क्षेत्र तथा इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक के अनुसार अलग हो सकती है। किसानों को आवेदन से पहले अपने जिले के कृषि या उद्यान विभाग से नवीनतम जानकारी अवश्य प्राप्त करनी चाहिए।
कमांड क्षेत्र विकास और जल प्रबंधन का आधुनिकीकरण
केंद्र सरकार ने 9 अप्रैल 2025 को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत कमांड क्षेत्र विकास और जल प्रबंधन के आधुनिकीकरण की उप-योजना को मंजूरी दी थी। इसे एम-सीएडीडब्ल्यूएम के नाम से जाना जाता है।
इसका उद्देश्य मौजूदा नहरों और दूसरे जल स्रोतों से किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने वाले नेटवर्क को आधुनिक बनाना है। योजना में दबावयुक्त भूमिगत पाइप सिंचाई प्रणाली के माध्यम से जल स्रोत से लगभग एक हेक्टेयर तक के खेतों के लिए सूक्ष्म सिंचाई के अनुकूल बुनियादी ढांचा तैयार करने की बात कही गई है।
जल वितरण की निगरानी और पानी की मात्रा दर्ज करने के लिए एससीएडीए तथा इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसी डिजिटल तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे पानी का समान वितरण होगा, खेत स्तर पर जल उपयोग दक्षता बढ़ेगी और कृषि उत्पादन में सुधार होगा।
इस आधुनिकीकरण कार्यक्रम के लिए शुरुआती स्तर पर 1,600 करोड़ रुपये के परिव्यय का प्रावधान किया गया था। इसे विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में पायलट आधार पर लागू करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
किसानों को क्या-क्या लाभ मिल सकते हैं?
कृषि जल प्रबंधन योजना (Agricultural Water Management Scheme) का सबसे बड़ा लाभ सिंचाई के पानी की बचत है। पारंपरिक बाढ़ सिंचाई में जरूरत से अधिक पानी खेत में छोड़ दिया जाता है। इससे पानी बहकर खेत से बाहर जा सकता है या जमीन के अंदर जरूरत से अधिक चला जाता है। अधिक पानी के कारण मिट्टी में हवा की कमी और जड़ों में बीमारी का खतरा भी बढ़ सकता है।
ड्रिप सिंचाई में पानी सीधे जड़ क्षेत्र तक पहुंचता है। किसान इसी प्रणाली के माध्यम से घुलनशील उर्वरक भी दे सकते हैं, जिसे फर्टिगेशन कहा जाता है। इससे खाद की बर्बादी कम होती है और पौधों को आवश्यक पोषक तत्व सही समय पर मिलते हैं।
स्प्रिंकलर प्रणाली बड़े क्षेत्र में एकसमान सिंचाई करने में सहायता करती है। इससे खेत में नालियां बनाने की जरूरत कम हो सकती है और मजदूरी की बचत होती है।
सरकार की ओर से जारी एक उदाहरण में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के किसानों द्वारा स्प्रिंकलर प्रणाली अपनाने के बाद फसल उत्पादन में 25 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई। संबंधित किसानों को प्रति हेक्टेयर लगभग 60,000 से 70,000 रुपये तक लाभ होने का उल्लेख भी किया गया है। यह एक विशिष्ट किसान अनुभव है और हर क्षेत्र में परिणाम फसल, मिट्टी, मौसम तथा प्रबंधन के अनुसार अलग हो सकते हैं।
खेत तालाब और वर्षा जल संचयन की भूमिका
जल प्रबंधन के लिए केवल सिंचाई उपकरण लगाना पर्याप्त नहीं है। पानी का स्थानीय स्तर पर संग्रह करना भी जरूरी है। खेत तालाब, चेक डैम, मेड़बंदी, सोख्ता गड्ढा और जल पुनर्भरण संरचनाएं बारिश के पानी को रोकने में मदद करती हैं।
खेत तालाब में जमा पानी का उपयोग फसल की महत्वपूर्ण अवस्था में जीवनरक्षक सिंचाई के लिए किया जा सकता है। विशेष रूप से वर्षा आधारित क्षेत्रों में एक या दो अतिरिक्त सिंचाई भी फसल को सूखने से बचा सकती है।
कुछ राज्य सरकारें खेत तालाब की खुदाई, प्लास्टिक लाइनिंग, सिंचाई पाइपलाइन और जल संचयन संरचनाओं पर अलग-अलग दर से अनुदान देती हैं। इसलिए किसान अपने राज्य के कृषि विभाग, उद्यान विभाग या राजकीय किसान पोर्टल पर उपलब्ध योजनाओं की जांच कर सकते हैं।
किन किसानों को प्राथमिकता मिल सकती है?
योजना का लाभ सामान्यतः सभी पात्र किसानों को दिया जा सकता है, लेकिन छोटे और सीमांत किसानों को अधिक सहायता या प्राथमिकता मिल सकती है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिला किसान, किसान समूह, स्वयं सहायता समूह और किसान उत्पादक संगठन भी राज्य के नियमों के अनुसार पात्र हो सकते हैं।
आवेदक किसान के पास खेती योग्य भूमि, वैध भूमि रिकॉर्ड और सिंचाई के लिए उपयुक्त जल स्रोत होना जरूरी हो सकता है। पट्टे पर खेती करने वाले किसानों के लिए पात्रता राज्य के नियमों और पंजीकृत पट्टा दस्तावेजों पर निर्भर करती है।
आवेदन के लिए जरूरी दस्तावेज
कृषि जल प्रबंधन या सूक्ष्म सिंचाई योजना में आवेदन करते समय किसान को सामान्यतः आधार कार्ड, बैंक पासबुक, पासपोर्ट आकार का फोटो, मोबाइल नंबर, भूमि रिकॉर्ड, खसरा-खतौनी, सिंचाई स्रोत का विवरण और फसल संबंधी जानकारी देनी पड़ सकती है।
कुछ राज्यों में जाति प्रमाणपत्र, लघु या सीमांत किसान प्रमाणपत्र, बिजली कनेक्शन विवरण, जल स्रोत प्रमाण और विक्रेता का कोटेशन भी मांगा जा सकता है। आवेदन में किसी प्रकार की कमी होने पर अनुदान स्वीकृति में देरी हो सकती है, इसलिए दस्तावेज स्पष्ट और अपडेट होने चाहिए।
आवेदन कैसे करें?
किसान अपने राज्य के कृषि विभाग, उद्यान विभाग या सूक्ष्म सिंचाई पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। जिन क्षेत्रों में ऑनलाइन सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां किसान ब्लॉक कृषि कार्यालय, जिला कृषि कार्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र या जनसेवा केंद्र की सहायता ले सकते हैं।
आवेदन करने के बाद विभाग द्वारा भूमि और जल स्रोत का सत्यापन किया जा सकता है। स्वीकृति मिलने से पहले किसान को उपकरण खरीदने या स्थापना शुरू करने से बचना चाहिए। कई योजनाओं में पहले से खरीदे गए उपकरणों पर अनुदान नहीं मिलता।
किसानों को केवल विभाग द्वारा निर्धारित मानकों और बीआईएस प्रमाणित सामग्री का उपयोग करना चाहिए। सिस्टम स्थापित होने के बाद अधिकारी द्वारा भौतिक सत्यापन, फोटो अपलोड या जियो-टैगिंग की जा सकती है। प्रक्रिया पूरी होने के बाद अनुदान किसान के बैंक खाते में भेजा जा सकता है या स्वीकृत प्रक्रिया के अनुसार संबंधित एजेंसी को भुगतान किया जा सकता है।
आवेदन करते समय इन बातों का रखें ध्यान
किसान आवेदन की रसीद और पंजीकरण संख्या सुरक्षित रखें। किसी बिचौलिए को नकद भुगतान न करें और अनुदान दिलाने के नाम पर किए जाने वाले झूठे वादों से सावधान रहें।
ड्रिप या स्प्रिंकलर सिस्टम का चयन केवल सब्सिडी देखकर नहीं करना चाहिए। किसान को अपनी फसल, मिट्टी, खेत की ढलान, पानी की गुणवत्ता और उपलब्ध दबाव के अनुसार प्रणाली चुननी चाहिए।
स्थापना से पहले पानी की जांच कराना उपयोगी रहता है। खारे या गंदे पानी के कारण ड्रिप पाइप के छोटे छिद्र बंद हो सकते हैं। इसलिए फिल्टर की नियमित सफाई और पाइपलाइन का रखरखाव जरूरी है।
जल प्रबंधन से बदल सकती है खेती
बढ़ते तापमान और अनिश्चित बारिश के दौर में कृषि जल प्रबंधन केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि भविष्य की खेती की आवश्यकता बन चुका है। खेत में अधिक पानी देना हमेशा अधिक उत्पादन की गारंटी नहीं होता। सही समय पर सही मात्रा में पानी देना अधिक महत्वपूर्ण है।
ड्रिप, स्प्रिंकलर, खेत तालाब, वर्षा जल संचयन, मिट्टी की नमी का संरक्षण और कम पानी वाली फसलों का चयन किसानों को सूखे तथा जल संकट से बचाने में मदद कर सकता है।
कृषि जल प्रबंधन योजना के माध्यम से यदि आधुनिक सिंचाई तकनीक, स्थानीय जल संरक्षण और फसल विविधीकरण को एक साथ अपनाया जाए तो किसान कम पानी में बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। इससे सिंचाई लागत घटेगी, भूजल पर दबाव कम होगा और खेती को लंबे समय तक टिकाऊ बनाया जा सकेगा।
निष्कर्ष
कृषि जल प्रबंधन योजना किसानों को उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का अवसर देती है। सरकार ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली, जलग्रहण विकास, सिंचाई नेटवर्क, भूमिगत पाइपलाइन तथा वर्षा जल संरक्षण जैसे उपायों पर काम कर रही है।
छोटे और सीमांत किसानों के लिए 55 प्रतिशत तथा अन्य किसानों के लिए 45 प्रतिशत तक सहायता सूक्ष्म सिंचाई अपनाने में उपयोगी हो सकती है। हालांकि सब्सिडी की वास्तविक दर और आवेदन प्रक्रिया राज्यों के अनुसार बदल सकती है। इसलिए किसानों को अपने जिले के कृषि विभाग से योजना की वर्तमान स्थिति, लक्ष्य और आवेदन की अंतिम तिथि की पुष्टि करनी चाहिए।
सही तकनीक और सही जल प्रबंधन के साथ किसान पानी की हर बूंद से बेहतर फसल प्राप्त कर सकते हैं। आने वाले समय में वही खेती अधिक लाभदायक और सुरक्षित होगी, जिसमें पानी का उपयोग सोच-समझकर किया जाएगा।
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