पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव केवल एक भू-राजनीतिक संकट नहीं है, बल्कि यह भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। यह स्थिति हमें याद दिलाती है कि खाद्य सुरक्षा केवल खेतों में होने वाले उत्पादन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक व्यापार मार्गों, उर्वरक उपलब्धता और अंतरराष्ट्रीय बाजारों की स्थिरता से भी गहराई से जुड़ी हुई है। आज के वैश्विक दौर में किसी एक क्षेत्र में पैदा हुआ संकट हजारों किलोमीटर दूर स्थित देशों की कृषि और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
भारत इसका एक प्रमुख उदाहरण है। यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर असर पड़ता है, तो तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप ऊर्जा की कीमतें बढ़ेंगी, उर्वरकों का उत्पादन महंगा होगा और कृषि लागत में वृद्धि होगी। आखिरकार इसका असर किसानों की आय, खाद्य पदार्थों की कीमतों और देश की आर्थिक स्थिरता पर दिखाई देगा।
वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर है भारत की उर्वरक व्यवस्था
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि देशों में से एक है, लेकिन उर्वरकों के मामले में उसकी निर्भरता अभी भी काफी हद तक आयात पर आधारित है। देश अपनी DAP (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की जरूरत का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, जबकि पोटाश की आवश्यकता लगभग पूरी तरह विदेशी स्रोतों से पूरी होती है। इसके अलावा घरेलू यूरिया उत्पादन भी बड़े पैमाने पर प्राकृतिक गैस पर आधारित है, जिसका महत्वपूर्ण हिस्सा आयात किया जाता है।
ऊर्जा क्षेत्र में भी भारत की स्थिति कुछ ऐसी ही है। देश अपनी लगभग 50 प्रतिशत प्राकृतिक गैस और करीब 85 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरतों के लिए विदेशी बाजारों पर निर्भर है। ऐसे में जब भी वैश्विक स्तर पर ऊर्जा कीमतों में उछाल आता है, उसका सीधा असर उर्वरक उद्योग और कृषि क्षेत्र पर पड़ता है।
बढ़ती कीमतों ने बढ़ाई चिंता
हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई उथल-पुथल ने इस जोखिम को और स्पष्ट कर दिया है। फरवरी से अप्रैल 2026 के बीच कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 58 प्रतिशत और उर्वरकों की कीमतों में करीब 66 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई। यह बढ़ोतरी केवल व्यापारिक आंकड़े नहीं हैं, बल्कि इनके दूरगामी प्रभाव कृषि और खाद्य प्रणाली पर पड़ सकते हैं।
IFPRI और ICAR के अर्थशास्त्रियों द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार यदि इन बढ़ी हुई लागतों का पूरा बोझ उत्पादकों और उपभोक्ताओं पर डाल दिया जाता, तो अप्रैल 2026 में भारत की खुदरा महंगाई दर 3.48 प्रतिशत के बजाय लगभग 5 प्रतिशत तक पहुंच सकती थी। इसका मतलब है कि उर्वरक और ऊर्जा बाजार में होने वाला उतार-चढ़ाव केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।
ग्रामीण परिवारों पर सबसे अधिक असर
महंगाई का सबसे बड़ा प्रभाव ग्रामीण परिवारों पर पड़ता है। गांवों में रहने वाले अधिकांश परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन, ईंधन और परिवहन पर खर्च करते हैं। जब डीजल, गैस और खाद की कीमतें बढ़ती हैं, तो खेती की लागत बढ़ जाती है और किसानों का लाभ घट जाता है।
यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो किसान निवेश कम कर सकते हैं, जिससे उत्पादन पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने से उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। इस प्रकार एक वैश्विक संकट धीरे-धीरे कृषि, उपभोग और आर्थिक विकास को प्रभावित करने लगता है।
केवल उर्वरक संकट नहीं, आर्थिक जोखिम भी
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऊर्जा और उर्वरकों की आयात लागत में 45 प्रतिशत तक वृद्धि हो जाए और साथ ही यूरिया की उपलब्धता में 10 प्रतिशत की कमी आ जाए, तो भारत की GDP में लगभग 1 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।
यह दर्शाता है कि उर्वरक संकट को केवल कृषि लागत की समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह महंगाई, सरकारी सब्सिडी, निवेश, उपभोक्ता खर्च और आर्थिक विकास से जुड़ा व्यापक आर्थिक जोखिम बन सकता है। सरकार को किसानों की सुरक्षा के साथ-साथ देश की वित्तीय स्थिरता को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
बार-बार सामने आ रही है वही कमजोरी
कोविड-19 महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और अब पश्चिम एशिया संकट ने एक समान संदेश दिया है। भारत की कृषि प्रणाली अभी भी आयातित ऊर्जा, विदेशी कच्चे माल और वैश्विक सप्लाई चेन पर अत्यधिक निर्भर है।
पहले इन घटनाओं को अस्थायी व्यवधान माना जाता था, लेकिन अब यह स्पष्ट हो गया है कि वैश्विक अस्थिरता आने वाले वर्षों में भी बनी रह सकती है। इसलिए केवल संकट आने पर प्रतिक्रिया देना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को ऐसी नीतियां विकसित करनी होंगी जो भविष्य के जोखिमों को पहले से कम कर सकें।
सब्सिडी जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं
जब उर्वरकों की कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार किसानों को राहत देने के लिए सब्सिडी का सहारा लेती है। यह कदम जरूरी भी है क्योंकि अचानक बढ़ी हुई लागत किसानों पर नहीं डाली जा सकती।
हालांकि केवल सब्सिडी आधारित व्यवस्था लंबे समय तक टिकाऊ नहीं मानी जा सकती। यदि वैश्विक कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव बना रहता है, तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ तेजी से बढ़ सकता है। इससे सार्वजनिक वित्त पर दबाव पड़ता है और अन्य विकास योजनाओं के लिए संसाधन सीमित हो सकते हैं।
इसीलिए अब समय आ गया है कि भारत केवल मूल्य प्रबंधन (Price Management) तक सीमित न रहे, बल्कि जोखिम प्रबंधन (Risk Management) आधारित उर्वरक सुरक्षा रणनीति अपनाए।
PM-PRANAM जैसी योजनाओं को गति देने की जरूरत
उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार ने PM-PRANAM योजना शुरू की थी। इस योजना का उद्देश्य राज्यों को रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग और वैकल्पिक पोषण प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित करना है।
हालांकि योजना की दिशा सही होने के बावजूद इसका प्रभाव अभी तक अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल प्रोत्साहन घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। राज्यों को भरोसेमंद डेटा, तकनीकी सहायता, किसानों के लिए व्यवहारिक विकल्प और पर्याप्त संसाधन भी उपलब्ध कराने होंगे।
एकीकृत नीति दृष्टिकोण की आवश्यकता
उर्वरक नीति को केवल कृषि विभाग का विषय मानना अब पर्याप्त नहीं है। यह ऊर्जा सुरक्षा, आयात नीति, मिट्टी की सेहत, जल प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और सार्वजनिक वित्त से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।
उदाहरण के लिए यदि गैस की कीमत बढ़ती है तो उर्वरक उत्पादन महंगा हो जाता है। यदि शिपिंग मार्ग प्रभावित होते हैं तो आयात लागत बढ़ जाती है। यदि मिट्टी की सेहत खराब होती है तो उर्वरकों की मांग बढ़ती है। इन सभी कारकों का प्रभाव अंततः किसान और उपभोक्ता दोनों पर पड़ता है।
इसलिए विभिन्न मंत्रालयों और संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है, ताकि खाद्य प्रणाली से जुड़े निर्णय अलग-अलग नहीं बल्कि एकीकृत दृष्टिकोण के साथ लिए जा सकें।
भविष्य की राह
भारत को एक ऐसे उर्वरक-जोखिम निगरानी तंत्र की आवश्यकता है जो वैश्विक ऊर्जा कीमतों, भू-राजनीतिक घटनाओं, शिपिंग मार्गों, घरेलू स्टॉक, सब्सिडी व्यय और कृषि मांग जैसे संकेतकों पर लगातार नजर रख सके। इससे संभावित संकटों की पहले से पहचान कर समय रहते नीतिगत कदम उठाए जा सकते हैं।
पश्चिम एशिया का वर्तमान संकट यह स्पष्ट करता है कि खाद्य सुरक्षा केवल खेतों तक सीमित विषय नहीं है। यह ऊर्जा, व्यापार, वित्त, जलवायु और वैश्विक राजनीति से जुड़ा हुआ व्यापक मुद्दा है। यदि भारत को भविष्य में कृषि और खाद्य प्रणाली को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाना है, तो उसे अल्पकालिक राहत उपायों के साथ-साथ दीर्घकालिक जोखिम प्रबंधन रणनीतियों पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।
आखिरकार, एक मजबूत और लचीली उर्वरक व्यवस्था केवल किसानों की सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और सतत विकास का आधार भी है।

