भारतीय किसानों के बीच एक आम धारणा लंबे समय से चली आ रही है कि जितनी ज्यादा खाद खेत में डाली जाएगी, उतनी ही ज्यादा पैदावार मिलेगी। कई किसान बेहतर उत्पादन की उम्मीद में सिफारिश से अधिक यूरिया, डीएपी या अन्य उर्वरकों का उपयोग कर देते हैं। लेकिन क्या वास्तव में अधिक खाद डालने से फसल की उपज बढ़ जाती है? कृषि वैज्ञानिकों का जवाब है—नहीं, हमेशा नहीं।
वास्तव में फसल उत्पादन केवल खाद की मात्रा पर निर्भर नहीं करता, बल्कि मिट्टी की उर्वरता, पानी की उपलब्धता, मौसम, बीज की गुणवत्ता और पोषक तत्वों के संतुलन पर भी निर्भर करता है। कई मामलों में जरूरत से ज्यादा उर्वरक डालना लाभ के बजाय नुकसान का कारण बन सकता है।
पौधों को भी चाहिए संतुलित पोषण
जिस तरह मनुष्य को केवल एक ही प्रकार का भोजन नहीं बल्कि संतुलित आहार की जरूरत होती है, उसी तरह फसलों को भी विभिन्न पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। पौधों के लिए मुख्य रूप से नाइट्रोजन (N), फॉस्फोरस (P) और पोटाश (K) आवश्यक होते हैं।
यदि खेत में केवल नाइट्रोजन यानी यूरिया अधिक मात्रा में डाल दिया जाए और अन्य पोषक तत्वों की कमी बनी रहे, तो पौधे का विकास असंतुलित हो सकता है। पौधा हरा-भरा तो दिखाई देगा, लेकिन उत्पादन अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचेगा।
“कम से कम तत्व का सिद्धांत” क्या कहता है?
कृषि विज्ञान में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जिसे लॉ ऑफ मिनिमम (Law of Minimum) कहा जाता है। इसके अनुसार फसल उत्पादन उस पोषक तत्व से सीमित होता है जिसकी उपलब्धता सबसे कम है।
उदाहरण के लिए यदि खेत में नाइट्रोजन पर्याप्त है लेकिन फॉस्फोरस या जिंक की कमी है, तो अतिरिक्त यूरिया डालने से भी उत्पादन में विशेष वृद्धि नहीं होगी। यानी फसल उतनी ही बढ़ेगी जितनी सबसे कम उपलब्ध पोषक तत्व अनुमति देगा।
अधिक यूरिया के नुकसान
कई क्षेत्रों में किसान अधिक उत्पादन की उम्मीद में जरूरत से ज्यादा यूरिया का प्रयोग करते हैं। इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं।
- पौधे अत्यधिक कोमल और कमजोर हो जाते हैं।
- कीट और रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है।
- फसल गिरने (लॉजिंग) की समस्या हो सकती है।
- दाने भरने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
- गुणवत्ता में गिरावट आ सकती है।
धान और गेहूं जैसी फसलों में अधिक नाइट्रोजन कई बार उत्पादन बढ़ाने के बजाय नुकसान पहुंचा सकती है।
मिट्टी की सेहत पर असर
अधिक उर्वरकों का लगातार उपयोग मिट्टी की सेहत को भी प्रभावित करता है। कई बार मिट्टी का pH असंतुलित हो जाता है और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बढ़ने लगती है।
मिट्टी में जैविक कार्बन कम हो सकता है और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। लंबे समय में इससे मिट्टी की उत्पादकता घट सकती है।
इसीलिए कृषि वैज्ञानिक केवल अधिक खाद डालने के बजाय संतुलित पोषण प्रबंधन पर जोर देते हैं।
आर्थिक नुकसान भी संभव
अधिक खाद का मतलब अधिक खर्च। यदि अतिरिक्त उर्वरक से उत्पादन में समान अनुपात में वृद्धि नहीं होती, तो किसान की लागत बढ़ जाती है और लाभ कम हो जाता है।
उदाहरण के लिए यदि किसी खेत के लिए 4 बोरी यूरिया पर्याप्त है और किसान 6 बोरी डाल देता है, तो अतिरिक्त दो बोरियों का खर्च सीधे उसकी लागत में जुड़ जाएगा। यदि उत्पादन में कोई विशेष वृद्धि नहीं हुई, तो यह निवेश घाटे का सौदा बन सकता है।
वैज्ञानिक क्या सलाह देते हैं?
कृषि वैज्ञानिक “4R Nutrient Management” सिद्धांत अपनाने की सलाह देते हैं—
- Right Source (सही उर्वरक)
- Right Rate (सही मात्रा)
- Right Time (सही समय)
- Right Place (सही स्थान पर प्रयोग)
यानी केवल खाद डालना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सही खाद को सही मात्रा में सही समय पर देना अधिक महत्वपूर्ण है।
मिट्टी परीक्षण क्यों जरूरी है?
हर खेत की मिट्टी अलग होती है। कहीं नाइट्रोजन की कमी होती है तो कहीं फॉस्फोरस या जिंक की। इसलिए मिट्टी परीक्षण के बिना उर्वरकों का उपयोग अनुमान के आधार पर किया जाता है।
मृदा परीक्षण से यह पता चलता है कि खेत में किस पोषक तत्व की कितनी आवश्यकता है। इससे उर्वरकों का संतुलित उपयोग संभव होता है और लागत भी कम होती है।
संतुलित पोषण ही सफलता की कुंजी
आज कृषि विशेषज्ञ केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM) की सलाह देते हैं। इसमें रासायनिक उर्वरकों के साथ गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जैव उर्वरक और फसल अवशेषों का उपयोग शामिल होता है।
इससे मिट्टी की सेहत बेहतर रहती है और फसलों को लंबे समय तक संतुलित पोषण मिलता है।
निष्कर्ष
“ज्यादा खाद = ज्यादा उत्पादन” का फार्मूला हमेशा सही नहीं होता। फसल उत्पादन का संबंध केवल उर्वरक की मात्रा से नहीं बल्कि पोषक तत्वों के संतुलन, मिट्टी की स्थिति और वैज्ञानिक प्रबंधन से होता है। जरूरत से ज्यादा खाद डालने से उत्पादन बढ़ने के बजाय लागत बढ़ सकती है, मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो सकती है और पर्यावरण पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
इसलिए किसानों के लिए सबसे बेहतर तरीका यही है कि वे मिट्टी परीक्षण के आधार पर वैज्ञानिक सिफारिशों के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करें। सही मात्रा में दी गई खाद ही वास्तव में अधिक और बेहतर उत्पादन का आधार बनती है।

