भारत में जब भी उर्वरकों की बात होती है, तो यूरिया के बाद सबसे अधिक चर्चा डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) की होती है। हर खरीफ और रबी सीजन में किसान DAP की उपलब्धता और कीमत को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं। कई बार बाजार में इसकी कमी की खबरें आती हैं, तो कभी सरकार को भारी सब्सिडी देकर किसानों को राहत देनी पड़ती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि DAP इतना महंगा क्यों है? आखिर ऐसा क्या है कि इसकी कीमत केवल उत्पादन लागत से नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीतिक घटनाओं से भी प्रभावित होती है?
DAP केवल एक उर्वरक नहीं, बल्कि वैश्विक संसाधनों, कूटनीति और व्यापारिक हितों से जुड़ा एक रणनीतिक उत्पाद बन चुका है। इसकी कीमतों के पीछे की कहानी समझना आज हर किसान, कृषि विशेषज्ञ और नीति निर्माता के लिए जरूरी हो गया है।
DAP क्या है और इसकी जरूरत क्यों है?
DAP यानी डाइ-अमोनियम फॉस्फेट एक प्रमुख फॉस्फेटिक उर्वरक है जिसमें लगभग 18 प्रतिशत नाइट्रोजन और 46 प्रतिशत फॉस्फोरस होता है। फसल की शुरुआती वृद्धि, जड़ों के विकास, फूल और फल बनने की प्रक्रिया में फॉस्फोरस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
गेहूं, धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, दलहन और तिलहन जैसी अधिकांश फसलों में DAP का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है। यही कारण है कि भारत में इसकी मांग हर वर्ष करोड़ों टन तक पहुंच जाती है।
भारत DAP के लिए आयात पर क्यों निर्भर है?
यूरिया के मामले में भारत ने उत्पादन क्षमता काफी बढ़ा ली है, लेकिन DAP के लिए स्थिति अलग है। DAP उत्पादन के लिए फॉस्फेट रॉक, फॉस्फोरिक एसिड और अमोनिया जैसे कच्चे माल की आवश्यकता होती है।
भारत के पास उच्च गुणवत्ता वाले फॉस्फेट रॉक के सीमित भंडार हैं। देश की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है। कई बार तो DAP ही सीधे आयात किया जाता है, जबकि कुछ मामलों में कच्चा माल आयात कर देश में उत्पादन किया जाता है।
यही आयात निर्भरता DAP को वैश्विक बाजार की उठापटक के प्रति बेहद संवेदनशील बना देती है।
दुनिया के कुछ देशों के हाथ में है फॉस्फेट का नियंत्रण
DAP की कीमतों को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि फॉस्फेट संसाधन दुनिया भर में समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं।
मोरक्को और पश्चिमी सहारा क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े फॉस्फेट भंडारों के मालिक माने जाते हैं। इसके अलावा चीन, रूस, सऊदी अरब, जॉर्डन और मिस्र भी प्रमुख उत्पादक देशों में शामिल हैं।
इसका मतलब है कि दुनिया के अधिकांश देश, जिनमें भारत भी शामिल है, इन चुनिंदा देशों की उत्पादन नीतियों और निर्यात फैसलों पर निर्भर रहते हैं।
जब उत्पादन कम होता है या निर्यात प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो पूरी दुनिया में DAP की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं।
चीन की नीतियां क्यों महत्वपूर्ण हैं?
चीन दुनिया के सबसे बड़े फॉस्फेट उर्वरक उत्पादकों और निर्यातकों में से एक है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने कई बार घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए फॉस्फेट उर्वरकों के निर्यात पर प्रतिबंध या नियंत्रण लगाए हैं।
जब चीन निर्यात कम करता है, तो वैश्विक बाजार में सप्लाई घट जाती है। परिणामस्वरूप DAP की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ जाती हैं।
भारत जैसे बड़े आयातक देशों को तब वैकल्पिक स्रोतों से अधिक कीमत पर खरीदारी करनी पड़ती है। इसका असर सीधे सब्सिडी बिल और आपूर्ति लागत पर पड़ता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध का DAP पर असर
2022 में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक उर्वरक बाजार को झकझोर कर रख दिया था। रूस दुनिया के प्रमुख उर्वरक और कच्चे माल निर्यातकों में से एक है।
युद्ध के बाद लगाए गए प्रतिबंधों, बैंकिंग बाधाओं और शिपिंग समस्याओं ने उर्वरकों की वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप DAP और अन्य फॉस्फेट उर्वरकों की कीमतों में रिकॉर्ड वृद्धि देखने को मिली।
हालांकि बाद में बाजार में कुछ स्थिरता आई, लेकिन इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि भू-राजनीतिक घटनाएं सीधे खेत तक पहुंचने वाले उर्वरकों की कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं।
पश्चिम एशिया का महत्व
DAP उत्पादन में अमोनिया एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है। अमोनिया का उत्पादन मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस से होता है और पश्चिम एशिया गैस संसाधनों का बड़ा केंद्र माना जाता है।
यदि क्षेत्र में राजनीतिक तनाव, संघर्ष या समुद्री मार्गों में बाधा आती है, तो गैस और अमोनिया दोनों की कीमतें प्रभावित होती हैं। इससे DAP उत्पादन लागत बढ़ जाती है।
हाल के वर्षों में लाल सागर और पश्चिम एशिया क्षेत्र में बढ़े तनाव ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लागत को भी बढ़ाया है, जिसका असर उर्वरक व्यापार पर पड़ा।
ऊर्जा की कीमतें भी तय करती हैं DAP की कीमत
DAP उत्पादन एक ऊर्जा-गहन प्रक्रिया है। प्राकृतिक गैस, बिजली और औद्योगिक ईंधन की कीमतों में वृद्धि होने पर उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है।
2021 और 2022 के दौरान वैश्विक ऊर्जा संकट ने उर्वरक उद्योग पर गहरा प्रभाव डाला था। कई देशों में उत्पादन लागत इतनी बढ़ गई कि कुछ संयंत्रों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा।
जब उत्पादन कम होता है और मांग बनी रहती है, तो कीमतों में वृद्धि स्वाभाविक हो जाती है।
अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और लॉजिस्टिक्स की भूमिका
DAP केवल फैक्ट्री से खेत तक नहीं पहुंचता। इसे हजारों किलोमीटर की समुद्री यात्रा करनी पड़ती है।
जहाजों का किराया, कंटेनर उपलब्धता, बंदरगाह शुल्क, बीमा और परिवहन लागत सभी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं।
कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक लॉजिस्टिक्स प्रणाली प्रभावित हुई थी। उस समय माल ढुलाई लागत कई गुना बढ़ गई थी, जिसका असर उर्वरक बाजार पर भी देखने को मिला।
भारत सरकार को क्यों देनी पड़ती है भारी सब्सिडी?
यदि DAP को पूरी तरह बाजार मूल्य पर बेचा जाए तो किसानों के लिए इसकी कीमत काफी अधिक हो सकती है। इसलिए सरकार सब्सिडी के माध्यम से कीमतों को नियंत्रित रखती है।
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP महंगा होता है, तब सरकार को अधिक सब्सिडी देनी पड़ती है ताकि किसानों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।
यानी वैश्विक कीमत बढ़ने का असर सीधे सरकारी वित्त पर पड़ता है। यही कारण है कि उर्वरक सब्सिडी का बजट कई बार अनुमान से काफी अधिक हो जाता है।
भविष्य में क्या चुनौतियां हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में फॉस्फेट संसाधनों पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है। जनसंख्या वृद्धि, खाद्य उत्पादन की बढ़ती जरूरत और सीमित प्राकृतिक संसाधन DAP की मांग को ऊंचा बनाए रखेंगे।
भारत इस चुनौती से निपटने के लिए विदेशों में फॉस्फेट खदानों में निवेश, दीर्घकालिक आयात समझौते और वैकल्पिक पोषक तत्वों के उपयोग को बढ़ावा देने जैसे कदम उठा रहा है।
इसके अलावा संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक स्रोतों और नई तकनीकों पर भी जोर दिया जा रहा है।
निष्कर्ष
DAP की कीमत केवल एक उर्वरक की कीमत नहीं होती, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, प्राकृतिक संसाधनों, ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीतिक घटनाओं का संयुक्त परिणाम होती है। मोरक्को की खदानों से लेकर चीन की निर्यात नीति, रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर पश्चिम एशिया के तनाव तक, दुनिया की कई घटनाएं भारतीय किसान के खेत तक पहुंचने वाले DAP की लागत तय करती हैं।
इसीलिए जब बाजार में DAP की कीमत बढ़ती है या इसकी कमी की खबर आती है, तो उसके पीछे केवल स्थानीय कारण नहीं बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था की कहानी छिपी होती है।

