भारत में यूरिया सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला उर्वरक है। किसानों का मानना होता है कि खेत में जितनी यूरिया डाली जाएगी, फसल को उतना अधिक नाइट्रोजन मिलेगा और उत्पादन बढ़ेगा। लेकिन कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार खेत में डाली गई पूरी यूरिया पौधों तक नहीं पहुंचती। वास्तव में यूरिया का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न प्राकृतिक प्रक्रियाओं के कारण नष्ट हो जाता है या पौधों की पहुंच से बाहर हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में खेत में डाली गई यूरिया का केवल 30 से 50 प्रतिशत नाइट्रोजन ही फसल द्वारा उपयोग किया जाता है। इसका मतलब है कि 100 किलोग्राम यूरिया से मिलने वाले नाइट्रोजन का लगभग आधा हिस्सा ही पौधों को मिलता है, जबकि बाकी हिस्सा वातावरण, पानी या मिट्टी में विभिन्न रूपों में खो जाता है।
यूरिया में कितना नाइट्रोजन होता है?
यूरिया में लगभग 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है। यानी 100 किलोग्राम यूरिया में करीब 46 किलोग्राम नाइट्रोजन मौजूद होती है। लेकिन यह पूरी मात्रा फसल को उपलब्ध नहीं हो पाती।
यदि यूरिया उपयोग दक्षता (Nitrogen Use Efficiency) 40 प्रतिशत मानी जाए, तो 46 किलोग्राम नाइट्रोजन में से केवल लगभग 18-19 किलोग्राम नाइट्रोजन ही पौधों द्वारा अवशोषित की जाती है।
यूरिया का बाकी हिस्सा कहां चला जाता है?
- अमोनिया गैस बनकर उड़ जाता है
यूरिया की सबसे बड़ी हानि वाष्पीकरण (Volatilization) से होती है।
जब किसान यूरिया को मिट्टी में मिलाने के बजाय सतह पर बिखेर देते हैं, तो उसमें मौजूद नाइट्रोजन अमोनिया गैस के रूप में वातावरण में उड़ सकती है। गर्म मौसम, कम नमी और क्षारीय मिट्टी में यह समस्या और बढ़ जाती है।
कई अध्ययनों में पाया गया है कि इस प्रक्रिया से 10 से 30 प्रतिशत तक नाइट्रोजन का नुकसान हो सकता है।
- बारिश और सिंचाई के पानी के साथ बह जाता है
अधिक वर्षा या जरूरत से ज्यादा सिंचाई होने पर नाइट्रोजन मिट्टी की ऊपरी परत से नीचे चली जाती है। इस प्रक्रिया को लीचिंग (Leaching) कहा जाता है।
रेतीली मिट्टियों में यह समस्या अधिक गंभीर होती है। नाइट्रेट के रूप में मौजूद नाइट्रोजन पानी के साथ बहकर भूजल तक पहुंच सकती है।
- डिनाइट्रीफिकेशन से गैस बन जाती है
जलभराव या ऑक्सीजन की कमी वाली परिस्थितियों में मिट्टी के सूक्ष्मजीव नाइट्रेट को नाइट्रोजन गैस और नाइट्रस ऑक्साइड गैस में बदल देते हैं।
यह गैसें वातावरण में चली जाती हैं और फसल के लिए उपलब्ध नहीं रहतीं।
धान की खेती में यह नुकसान विशेष रूप से देखा जाता है।
- मिट्टी के सूक्ष्मजीव भी उपयोग करते हैं नाइट्रोजन
मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव अपने विकास के लिए नाइट्रोजन का उपयोग करते हैं। इसे नाइट्रोजन इमोबिलाइजेशन कहा जाता है।
हालांकि बाद में इसका कुछ हिस्सा फिर से उपलब्ध हो सकता है, लेकिन शुरुआती अवस्था में फसल को इसकी कमी महसूस हो सकती है।
भारत में यूरिया उपयोग दक्षता कम क्यों है?
भारत में यूरिया अपेक्षाकृत सस्ती होने के कारण किसान अक्सर इसकी जरूरत से ज्यादा मात्रा का उपयोग करते हैं।
इसके अलावा कई क्षेत्रों में:
- मिट्टी परीक्षण नहीं कराया जाता
- संतुलित उर्वरक उपयोग नहीं होता
- एक बार में पूरी यूरिया डाल दी जाती है
- जैविक पदार्थों की कमी होती है
- सिंचाई प्रबंधन कमजोर होता है
इन कारणों से यूरिया की दक्षता घट जाती है।
फसलों में यूरिया उपयोग दक्षता कितनी होती है?
सामान्यतः:
| फसल | औसत नाइट्रोजन उपयोग दक्षता |
| धान | 30-40% |
| गेहूं | 40-50% |
| मक्का | 45-55% |
| गन्ना | 35-50% |
यह आंकड़े मिट्टी, मौसम, सिंचाई और प्रबंधन के अनुसार बदल सकते हैं।
यूरिया का अधिक उपयोग क्यों नुकसानदायक है?
कई किसान उत्पादन बढ़ाने की उम्मीद में अधिक यूरिया डाल देते हैं, लेकिन इससे कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
- फसल गिरने (Lodging) का खतरा बढ़ता है
- कीट और रोग का प्रकोप बढ़ सकता है
- गुणवत्ता प्रभावित होती है
- मिट्टी का पोषण संतुलन बिगड़ता है
- उत्पादन लागत बढ़ती है
- पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है
यूरिया उपयोग दक्षता कैसे बढ़ाएं?
- मिट्टी परीक्षण के आधार पर खाद दें
मिट्टी परीक्षण से वास्तविक आवश्यकता का पता चलता है और अनावश्यक यूरिया उपयोग से बचा जा सकता है।
- यूरिया को विभाजित खुराक में दें
पूरी मात्रा एक बार में देने के बजाय 2-3 हिस्सों में देना अधिक लाभकारी होता है।
- यूरिया को मिट्टी में मिलाएं
सतह पर बिखेरने के बजाय मिट्टी में मिलाने से वाष्पीकरण कम होता है।
- नीम-कोटेड यूरिया का उपयोग करें
नीम-कोटेड यूरिया नाइट्रोजन की हानि कम करती है और पौधों को लंबे समय तक पोषण उपलब्ध कराती है।
- संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाएं
केवल नाइट्रोजन पर निर्भर रहने के बजाय फॉस्फोरस, पोटाश, सल्फर और सूक्ष्म पोषक तत्वों का भी संतुलित उपयोग करें।
- नैनो यूरिया का उपयोग
नैनो यूरिया को पारंपरिक यूरिया के पूरक के रूप में देखा जा रहा है। इसके माध्यम से नाइट्रोजन उपयोग दक्षता बढ़ाने और उर्वरक की मात्रा कम करने की संभावना जताई जाती है।
निष्कर्ष
खेत में डाली गई यूरिया का पूरा हिस्सा फसल नहीं खाती। सामान्य परिस्थितियों में केवल 30 से 50 प्रतिशत नाइट्रोजन ही पौधों द्वारा उपयोग की जाती है, जबकि बाकी हिस्सा गैस बनकर उड़ जाता है, पानी के साथ बह जाता है या अन्य प्रक्रियाओं में खो जाता है। इसलिए अधिक यूरिया डालना हमेशा अधिक उत्पादन की गारंटी नहीं है। सही समय, सही मात्रा और सही तरीके से यूरिया का उपयोग ही उसकी दक्षता बढ़ाने और खेती को अधिक लाभदायक बनाने की कुंजी है। किसानों को वैज्ञानिक उर्वरक प्रबंधन अपनाकर न केवल लागत कम करनी चाहिए बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण की भी रक्षा करनी चाहिए।

