देशव्यापी “खेत बचाओ अभियान-2026” के तहत बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के टेटरिया प्रखंड स्थित उजिलपुर गांव में किसानों के लिए विशेष जागरूकता एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महात्मा गांधी समेकित कृषि अनुसंधान संस्थान, मोतिहारी द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित पोषण प्रबंधन तथा जलवायु अनुकूल खेती की तकनीकों के प्रति जागरूक करना था।
उजिलपुर गांव आईसीएआर के “फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम” के अंतर्गत गोद लिए गए गांवों में शामिल है। यहां वैज्ञानिक लंबे समय से किसानों के साथ मिलकर टिकाऊ, संसाधन-सक्षम और जलवायु-लचीली कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देने के लिए कार्य कर रहे हैं। कार्यक्रम में किसानों और वैज्ञानिकों के बीच सीधा संवाद स्थापित किया गया, जिससे किसानों को वैज्ञानिक खेती के नवीनतम तरीकों की जानकारी प्राप्त हुई।
मृदा स्वास्थ्य संरक्षण और टिकाऊ खेती पर विशेष फोकस
कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लगातार बढ़ते रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मृदा स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है, जिसके कारण भविष्य में उत्पादन क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों ने किसानों को मृदा स्वास्थ्य सुधारने के लिए संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने की सलाह दी। किसानों को बताया गया कि वैज्ञानिक तरीके से उर्वरकों का उपयोग करने से न केवल लागत कम होती है बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।
धान, मक्का और गेहूं में संतुलित उर्वरक उपयोग की सलाह
कार्यक्रम में धान, मक्का और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों में रासायनिक उर्वरकों और जैव उर्वरकों के संतुलित उपयोग पर विशेष जोर दिया गया। वैज्ञानिकों ने कहा कि केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भर रहने के बजाय जैविक स्रोतों को भी खेती का हिस्सा बनाना आवश्यक है।
किसानों को ढैंचा (सेसबानिया) के माध्यम से हरी खाद को बढ़ावा देने, मूंग जैसी दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करने तथा एजोला को जैविक नाइट्रोजन स्रोत के रूप में अपनाने की सलाह दी गई। इसके अलावा मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों के उपयोग, फसल अवशेष प्रबंधन और संरक्षण कृषि तकनीकों को अपनाने के लाभों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई।
दलहनी फसलें बढ़ाएंगी मिट्टी की उर्वरता और किसानों की आय
वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि वर्षभर के फसल चक्र में कम से कम एक दलहनी फसल को शामिल करने से मिट्टी की उर्वरता में उल्लेखनीय सुधार होता है। दलहनी फसलें जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से मिट्टी में नाइट्रोजन की उपलब्धता बढ़ाती हैं, जिससे अगली फसल के लिए रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार दलहनी फसलों का समावेश किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पोषण सुरक्षा को भी मजबूत करता है। मूंग, उड़द और अन्य दलहनी फसलें कम लागत में बेहतर लाभ देने वाली फसलें मानी जाती हैं।
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती के बाद धान की फसल में नाइट्रोजन उर्वरकों की आवश्यकता काफी कम हो जाती है, जिससे किसानों की लागत घटती है और मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है।
वर्मी कम्पोस्ट को बताया पर्यावरण अनुकूल विकल्प
कार्यक्रम में वर्मी कम्पोस्ट के उपयोग को भी बढ़ावा दिया गया। वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि केंचुआ खाद एक उत्कृष्ट जैविक उर्वरक है, जो खेतों, सब्जी उत्पादन और बागवानी फसलों के लिए अत्यंत लाभकारी साबित होती है।
वर्मी कम्पोस्ट मिट्टी की संरचना सुधारने, सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने और जल धारण क्षमता को बेहतर बनाने में मदद करती है। इससे फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों में सुधार होता है।
किसानों को घर पर ही कम लागत में वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने की तकनीक के बारे में भी जानकारी दी गई।
किसानों ने साझा किए अपने अनुभव
कार्यक्रम के दौरान आयोजित संवाद सत्र में किसानों ने संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन को लेकर गहरी रुचि दिखाई। कई किसानों ने ग्रीष्मकालीन मूंग की खेती के अपने अनुभव साझा किए और बताया कि इससे धान की अगली फसल में उर्वरकों की आवश्यकता कम हुई है।
किसानों ने ढैंचा की खेती और हरी खाद के उपयोग में भी रुचि दिखाई। हालांकि उन्होंने बताया कि गुणवत्तायुक्त बीजों की समय पर उपलब्धता बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। किसानों ने वैज्ञानिकों से बीज उपलब्धता और तकनीकी मार्गदर्शन को और मजबूत करने का अनुरोध किया।
मृदा परीक्षण के महत्व पर दिया गया जोर
कार्यक्रम में किसानों को यह समझाया गया कि उर्वरकों के उपयोग से पहले मृदा परीक्षण कराना बेहद आवश्यक है। वैज्ञानिकों ने कहा कि बिना मृदा परीक्षण के अंधाधुंध उर्वरक प्रयोग करने से उत्पादन लागत बढ़ती है और मिट्टी की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
किसानों को सलाह दी गई कि वे मृदा परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर ही पोषक तत्वों की अनुशंसित मात्रा का उपयोग करें। इससे फसल उत्पादकता बढ़ेगी, लागत कम होगी और उर्वरकों की उपयोग दक्षता में सुधार होगा।
विशेषज्ञों ने बताया कि संतुलित उर्वरीकरण से न केवल फसलों की उपज बढ़ती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और मृदा स्वास्थ्य सुधार में भी मदद मिलती है।
खेत बचाओ अभियान और फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम को मिली मजबूती
यह कार्यक्रम आईसीएआर के “फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम” और “खेत बचाओ अभियान” दोनों के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हुआ। दोनों पहलें किसानों को कृषि नवाचारों के केंद्र में रखने, मृदा स्वास्थ्य सुधारने, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में सक्षम कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देने पर केंद्रित हैं।
कार्यक्रम में कुल 39 किसानों ने सक्रिय भागीदारी की और वैज्ञानिकों के साथ विस्तृत चर्चा की। किसानों ने वैज्ञानिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाकर मृदा स्वास्थ्य सुधारने और कृषि उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में कार्य करने का संकल्प लिया।
इस अवसर पर विशेषज्ञों ने कहा कि यदि किसान मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग, दलहनी फसलों का समावेश और जैविक संसाधनों के उपयोग को अपनाते हैं, तो भविष्य में खेती अधिक लाभकारी, टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बन सकती है। खेत बचाओ अभियान के माध्यम से यही संदेश किसानों तक पहुंचाया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए कृषि भूमि की उर्वरता और उत्पादकता सुरक्षित रखी जा सके।

