खरीफ 2026 सीजन के दौरान किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराना केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। हर वर्ष की तरह इस बार भी सरकार ने खरीफ सीजन शुरू होने से पहले ही उर्वरकों की मांग का आकलन कर व्यापक रणनीति तैयार की। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय तथा उर्वरक विभाग के बीच बेहतर समन्वय, घरेलू उत्पादन में वृद्धि, समय पर आयात, डिजिटल निगरानी और राज्यों के साथ निरंतर संपर्क के कारण देशभर में यूरिया, डीएपी (DAP), एमओपी (MOP) और एनपीके (NPK) उर्वरकों की उपलब्धता संतोषजनक बनी हुई है।
सरकार का दावा है कि वर्तमान में अधिकांश राज्यों में उर्वरकों की आपूर्ति मांग के अनुरूप हो रही है और कहीं भी व्यापक स्तर पर कमी की स्थिति नहीं है। इसके अलावा यदि किसी राज्य या जिले में अचानक मांग बढ़ती है, तो वहां अतिरिक्त आवंटन भेजने की व्यवस्था भी तैयार रखी गई है।
खरीफ सीजन के लिए पहले से बनाई गई व्यापक रणनीति
भारत में खरीफ सीजन देश की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, बाजरा, मूंगफली और दालों जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई इसी मौसम में होती है। इन फसलों की अच्छी पैदावार काफी हद तक समय पर उपलब्ध उर्वरकों पर निर्भर करती है।
इसी को ध्यान में रखते हुए कृषि एवं किसान कल्याण विभाग प्रत्येक वर्ष खरीफ और रबी सीजन से पहले सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ बैठक करता है। इन बैठकों में राज्यवार, फसलवार तथा माहवार उर्वरकों की आवश्यकता का विस्तृत आकलन किया जाता है। राज्यों से प्राप्त मांग के आधार पर उर्वरक विभाग उत्पादन कंपनियों, आयात एजेंसियों और परिवहन विभागों के साथ समन्वय स्थापित कर मासिक आवंटन योजना तैयार करता है।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी राज्य में बुवाई के समय उर्वरकों की कमी न हो और किसानों को निर्धारित समय पर आवश्यक मात्रा में खाद उपलब्ध हो सके।
iFMS के माध्यम से हो रही डिजिटल निगरानी
खरीफ 2026 में उर्वरकों की आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत बनाने में Integrated Fertilizer Management System (iFMS) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
यह डिजिटल प्लेटफॉर्म देशभर में उर्वरकों के उत्पादन, आयात, गोदामों में उपलब्ध स्टॉक, रेलवे एवं सड़क मार्ग से परिवहन तथा खुदरा विक्रेताओं तक वितरण की वास्तविक समय (Real-Time) निगरानी करता है।
इस प्रणाली के माध्यम से सरकार यह जान पाती है कि—
- किस राज्य में कितना स्टॉक उपलब्ध है।
- किन जिलों में मांग तेजी से बढ़ रही है।
- कौन-सी कंपनियां कितना उत्पादन कर रही हैं।
- आयातित उर्वरकों की खेप कब और कहां पहुंच रही है।
- किन क्षेत्रों में अतिरिक्त आवंटन की आवश्यकता है।
डिजिटल निगरानी के कारण आपूर्ति श्रृंखला अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनी है तथा किसी भी संभावित कमी का समय रहते समाधान किया जा सकता है।
मांग से अधिक उपलब्ध रहे प्रमुख उर्वरक
सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 19 से 21 जुलाई 2026 तक देश में प्रमुख उर्वरकों की उपलब्धता मांग से अधिक रही। इससे स्पष्ट होता है कि खरीफ सीजन के दौरान आपूर्ति व्यवस्था प्रभावी ढंग से संचालित की जा रही है।
यूरिया
यूरिया भारत में सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला नाइट्रोजन आधारित उर्वरक है। सरकार के अनुसार जुलाई के तीसरे सप्ताह तक इसकी उपलब्धता किसानों की तत्काल आवश्यकता से अधिक रही। पर्याप्त स्टॉक होने के कारण अधिकांश राज्यों में यूरिया की नियमित आपूर्ति जारी रही।
डीएपी (DAP)
डीएपी खरीफ फसलों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण फॉस्फेटिक उर्वरक है। वैश्विक बाजार में कच्चे माल की कीमतें बढ़ने के बावजूद देश में इसका पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहा। सरकार ने समय पर आयात और घरेलू उत्पादन के माध्यम से इसकी आपूर्ति बनाए रखी।
एमओपी (MOP)
पोटाश आधारित उर्वरक एमओपी की उपलब्धता भी मांग के अनुरूप रही। इससे किसानों को फसलों के संतुलित पोषण के लिए आवश्यक पोटाश समय पर मिल सका।
एनपीके (NPK)
एनपीके मिश्रित उर्वरकों की उपलब्धता भी संतोषजनक रही। इन उर्वरकों का उपयोग विशेष रूप से संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के लिए किया जाता है।
इसके अतिरिक्त राज्यों में उपलब्ध क्लोजिंग स्टॉक भी पर्याप्त बताया गया है, जिससे आगामी महीनों की मांग को पूरा करने में सहायता मिलेगी।
DAP की कीमत ₹1,350 प्रति बैग बरकरार
खरीफ 2026 के दौरान किसानों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने डीएपी पर विशेष वित्तीय सहायता जारी रखने का निर्णय लिया है।
वैश्विक स्तर पर फॉस्फेटिक उर्वरकों और उनके कच्चे माल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। यदि इन बढ़ी हुई कीमतों का पूरा असर किसानों पर डाला जाता, तो डीएपी काफी महंगा हो सकता था।
इसी स्थिति को देखते हुए सरकार ने 50 किलोग्राम डीएपी की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) ₹1,350 प्रति बैग बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सब्सिडी प्रदान की है।
इस निर्णय से किसानों को दो प्रमुख लाभ मिल रहे हैं—
- खेती की लागत नियंत्रित बनी हुई है।
- किसानों को निर्धारित मूल्य पर डीएपी उपलब्ध हो रहा है।
घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर विशेष जोर
सरकार केवल आयात पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी लगातार काम कर रही है।
देश में कई उर्वरक संयंत्रों का आधुनिकीकरण किया गया है तथा नई उत्पादन परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे भविष्य में आयात पर निर्भरता कम होने की संभावना है।
घरेलू उत्पादन बढ़ने से—
- आपूर्ति अधिक स्थिर रहती है।
- परिवहन लागत कम होती है।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव का प्रभाव सीमित होता है।
- किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराना आसान होता है।
दीर्घकालिक आयात समझौतों से मिली मजबूती
भारत अपनी उर्वरक आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से भी पूरा करता है। इसलिए सरकार ने कई देशों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते किए हैं।
रूस, मोरक्को, सऊदी अरब, जॉर्डन तथा अन्य प्रमुख देशों के साथ हुए समझौतों के कारण भारत को नियमित रूप से उर्वरकों और कच्चे माल की आपूर्ति मिल रही है।
सरकारी जानकारी के अनुसार चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 32 लाख टन से अधिक उर्वरकों का आयात किया गया। इससे देश के विभिन्न बंदरगाहों पर पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध हुआ और राज्यों तक समय पर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकी।
वैश्विक चुनौतियों के बावजूद आपूर्ति रही सुरक्षित
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक उर्वरक बाजार कई चुनौतियों से गुजरा है। पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव, समुद्री परिवहन लागत में वृद्धि, प्राकृतिक गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान जैसी परिस्थितियों ने कई देशों में उर्वरकों की उपलब्धता को प्रभावित किया।
इसके बावजूद भारत ने पहले से बनाई गई रणनीति के तहत आयात स्रोतों में विविधता लाई। सरकार ने केवल एक या दो देशों पर निर्भर रहने के बजाय कई देशों से खरीद बढ़ाई, जिससे किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर भी देश की आपूर्ति प्रभावित न हो।
यही कारण है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत में उर्वरकों की उपलब्धता फिलहाल संतोषजनक बनी हुई है।
राज्यों के साथ निरंतर समन्वय
उर्वरक विभाग राज्यों के कृषि विभागों के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए है। यदि किसी जिले में मांग अचानक बढ़ जाती है या किसी कारण से आपूर्ति बाधित होती है, तो अतिरिक्त स्टॉक तुरंत भेजने की व्यवस्था की जाती है।
रेलवे, बंदरगाह, परिवहन एजेंसियों और उर्वरक कंपनियों के बीच बेहतर समन्वय के कारण लॉजिस्टिक्स प्रणाली पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हुई है
किसानों के लिए महत्वपूर्ण सलाह
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग भी उतना ही आवश्यक है।
किसानों को सलाह दी जा रही है कि—
- केवल अधिकृत एवं लाइसेंसधारी विक्रेताओं से ही उर्वरक खरीदें।
- घबराकर अनावश्यक मात्रा में उर्वरकों का भंडारण न करें।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड एवं मिट्टी परीक्षण की रिपोर्ट के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करें।
- केवल यूरिया पर निर्भर रहने के बजाय डीएपी, एनपीके, एमओपी तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग अपनाएं।
- निर्धारित एमआरपी से अधिक कीमत वसूलने या कालाबाजारी की स्थिति में संबंधित कृषि विभाग को तुरंत सूचना दें।
आगे की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में उर्वरकों की उपलब्धता को और मजबूत बनाने के लिए घरेलू उत्पादन क्षमता में निरंतर वृद्धि, हरित अमोनिया आधारित उत्पादन, डिजिटल सप्लाई चेन, आधुनिक गोदाम, बेहतर रेल परिवहन और उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देना आवश्यक होगा।
साथ ही राज्यों में बफर स्टॉक व्यवस्था और जिला स्तर पर रियल-टाइम मॉनिटरिंग को और मजबूत करने से किसी भी आपात स्थिति में किसानों तक समय पर उर्वरक पहुंचाना आसान होगा।
निष्कर्ष
खरीफ 2026 सीजन में केंद्र सरकार ने अग्रिम योजना, डिजिटल निगरानी, पर्याप्त घरेलू उत्पादन, समयबद्ध आयात, राज्यों के साथ समन्वय और विशेष वित्तीय सहायता के माध्यम से उर्वरकों की आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत बनाए रखा है। यूरिया, डीएपी, एमओपी और एनपीके की उपलब्धता फिलहाल संतोषजनक है तथा अधिकांश राज्यों में मांग के अनुरूप आपूर्ति जारी है।
डीएपी की 50 किलोग्राम प्रति बैग कीमत ₹1,350 पर बनाए रखना किसानों को राहत देने वाला महत्वपूर्ण निर्णय है। यदि सरकार इसी प्रकार उत्पादन, आयात, वितरण और डिजिटल निगरानी पर लगातार ध्यान देती रही, तो आने वाले वर्षों में भी किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने और कृषि उत्पादन को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण सफलता मिल सकती है।

