देश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की दिशा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), पूसा ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। विश्वविद्यालय द्वारा शुरू किए गए बी.एससी. (ऑनर्स) नेचुरल फार्मिंग पाठ्यक्रम के पहले बैच के सभी 15 विद्यार्थियों को ₹15,000 प्रतिमाह तक की पेड इंटर्नशिप के साथ नौकरी के प्रस्ताव मिले हैं। यह उपलब्धि न केवल विश्वविद्यालय के लिए, बल्कि देश में कृषि शिक्षा और प्राकृतिक खेती के भविष्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल आने वाले वर्षों में अन्य कृषि विश्वविद्यालयों के लिए भी प्रेरणा बनेगा और प्राकृतिक खेती को एक मजबूत करियर विकल्प के रूप में स्थापित करेगा।
देश में पहली बार शुरू हुआ अनोखा डिग्री कार्यक्रम
आरपीसीएयू, पूसा ने देश में प्राकृतिक खेती पर आधारित एक विशेष स्नातक पाठ्यक्रम शुरू किया है। इस कोर्स का उद्देश्य ऐसे कृषि विशेषज्ञ तैयार करना है, जो केवल रसायन मुक्त खेती को समझें ही नहीं, बल्कि उसे व्यावहारिक रूप से किसानों तक पहुंचाने में भी सक्षम हों।
इस डिग्री कार्यक्रम को सेंट्रल एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, इंफाल, आरएलबीसीएयू, झांसी और आरएलबीसीएयू, पूसा के सहयोग से विकसित किया गया है। पाठ्यक्रम को उद्योग की वर्तमान आवश्यकताओं, वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक प्रशिक्षण को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।
विश्वविद्यालय ने छात्रों को केवल कक्षा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि खेतों में वास्तविक परिस्थितियों में प्रशिक्षण देकर उन्हें उद्योग के लिए तैयार किया।
पहले बैच के सभी 15 छात्रों को मिला रोजगार का अवसर
इस पाठ्यक्रम की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि वर्ष 2023-2027 बैच के सभी 15 छात्रों को पढ़ाई पूरी होने से पहले ही रोजगार के अवसर मिल गए।
16 जून को आयोजित “खेत बचाओ अभियान” कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने सभी छात्रों को पेड इंटर्नशिप और प्लेसमेंट के ऑफर लेटर सौंपे।
चयनित छात्रों को 15,000 रुपये प्रतिमाह तक की पेड इंटर्नशिप मिलेगी। इंटर्नशिप पूरी करने के बाद संबंधित संस्थाओं में स्थायी नौकरी मिलने की भी संभावना है।
यह उपलब्धि बताती है कि प्राकृतिक खेती अब केवल एक वैकल्पिक कृषि पद्धति नहीं, बल्कि तेजी से उभरता हुआ रोजगार का क्षेत्र भी बन रही है।
उद्योगों ने छात्रों की स्किल्स को सराहा
प्लेसमेंट देने वाली कंपनियों के प्रतिनिधियों ने बताया कि छात्रों की तकनीकी समझ, व्यावहारिक ज्ञान और प्राकृतिक खेती से जुड़े कौशल ने उन्हें प्रभावित किया।
कंपनियों का कहना है कि ग्रीन एनर्जी, ऑर्गेनिक खेती, प्राकृतिक खेती और टिकाऊ कृषि से जुड़े क्षेत्रों में प्रशिक्षित युवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में पूसा विश्वविद्यालय के छात्रों को उद्योग की जरूरतों के अनुरूप तैयार किया गया है।
यही कारण है कि कई प्रतिष्ठित संस्थानों ने पूरे बैच को इंटर्नशिप के साथ भविष्य में स्थायी नौकरी का प्रस्ताव भी दिया है।
इन परियोजनाओं पर करेंगे काम
चयनित छात्र आने वाले समय में कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं से जुड़ेंगे। इनमें गोवर्धन पहल, वेस्ट टू एनर्जी सिस्टम, प्राकृतिक खेती मॉडल, ग्रामीण सतत विकास कार्यक्रम, जैविक उत्पादों का विपणन और ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट शामिल हैं।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य किसानों को रसायन मुक्त खेती अपनाने के लिए प्रेरित करना, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना और टिकाऊ कृषि मॉडल विकसित करना है।
साथ ही छात्रों को कृषि उत्पादों की ब्रांडिंग, मार्केटिंग और कमर्शियलाइजेशन की भी व्यावहारिक जानकारी मिलेगी, जिससे भारतीय प्राकृतिक उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
प्राकृतिक खेती में तेजी से बढ़ रही रोजगार की संभावनाएं
देश और दुनिया में रसायन मुक्त कृषि उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके साथ ही प्राकृतिक खेती, जैविक उत्पाद, कार्बन क्रेडिट, जल संरक्षण और सतत कृषि से जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञों की आवश्यकता भी बढ़ी है।
यही वजह है कि कई निजी कंपनियां, गैर-सरकारी संगठन (NGO), कृषि स्टार्टअप और ग्रीन एनर्जी कंपनियां अब प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षित युवाओं की भर्ती कर रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह क्षेत्र कृषि क्षेत्र के सबसे अधिक रोजगार देने वाले क्षेत्रों में शामिल हो सकता है।
कृषि शिक्षा को मिला नया आयाम
आरपीसीएयू, पूसा की इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि यदि कृषि शिक्षा को उद्योग की जरूरतों और व्यावहारिक प्रशिक्षण से जोड़ा जाए, तो छात्रों को पढ़ाई पूरी होने से पहले ही रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है।
विश्वविद्यालय का यह मॉडल पारंपरिक शिक्षा से आगे बढ़कर कौशल आधारित शिक्षा पर केंद्रित है। इससे छात्र केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि उद्योग के लिए तैयार पेशेवर बनकर निकल रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अन्य कृषि विश्वविद्यालय भी इसी प्रकार के पाठ्यक्रम शुरू करते हैं, तो देश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी तेजी से बढ़ेंगे।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा द्वारा शुरू किया गया प्राकृतिक खेती का डिग्री कार्यक्रम कृषि शिक्षा के क्षेत्र में एक नई शुरुआत माना जा रहा है। पहले ही बैच के सभी छात्रों को पेड इंटर्नशिप और नौकरी का प्रस्ताव मिलना इस बात का प्रमाण है कि कौशल आधारित कृषि शिक्षा आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है।
यह पहल न केवल युवाओं के लिए बेहतर करियर के अवसर पैदा करेगी, बल्कि प्राकृतिक खेती, सतत कृषि और ग्रामीण विकास को भी नई दिशा देगी। आने वाले समय में पूसा का यह मॉडल देश के अन्य कृषि विश्वविद्यालयों के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण बन सकता है।

