खरीफ सीजन 2026 में किसानों को यूरिया और DAP की उपलब्धता को लेकर बड़ी राहत की खबर है। केंद्र सरकार का कहना है कि देश में प्रमुख उर्वरकों का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और राज्यों की मांग के अनुसार लगातार आपूर्ति की जा रही है। दूसरी ओर, वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतों और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे में भारत घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर आयात भी कर रहा है।
सवाल यह है कि जब देश में खाद का स्टॉक पर्याप्त है, तो सरकार को यूरिया और दूसरे उर्वरकों का आयात करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? इसके पीछे भारत की बढ़ती कृषि मांग, घरेलू उत्पादन की सीमाएं और वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़े कई कारण हैं।
यूरिया का स्टॉक मजबूत, DAP भी बेहतर स्थिति में
सरकार के अनुसार खरीफ सीजन के लिए उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पहले से ही तैयारी की गई थी। ताजा सरकारी जानकारी के मुताबिक यूरिया और DAP की उपलब्धता को लेकर राज्यों को जरूरत के अनुसार आपूर्ति की जा रही है।
इससे किसानों के लिए सबसे बड़ी राहत यह है कि खरीफ फसलों के महत्वपूर्ण चरण में खाद की उपलब्धता को लेकर बड़े संकट की स्थिति नहीं है।
DD News की रिपोर्ट के अनुसार, 19 मार्च तक यूरिया का स्टॉक 61.14 लाख मीट्रिक टन था, जो पिछले वर्ष के इसी समय के 55.22 लाख मीट्रिक टन से अधिक था। वहीं DAP का स्टॉक बढ़कर 24.24 लाख मीट्रिक टन हो गया था।
यानी सरकार ने इस बार केवल तत्काल जरूरत पूरी करने के बजाय पहले से स्टॉक तैयार रखने पर जोर दिया है।
घरेलू यूरिया उत्पादन में भी बढ़ोतरी
भारत लंबे समय से यूरिया के मामले में आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए पुराने खाद कारखानों को दोबारा शुरू करने, मौजूदा संयंत्रों की क्षमता बढ़ाने और नई उत्पादन क्षमता विकसित करने पर जोर दिया गया है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में देश में यूरिया उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। छह नए यूरिया संयंत्रों के शुरू होने से कुल उत्पादन क्षमता में 76.2 लाख टन की वृद्धि हुई है।
इसका फायदा यह हुआ है कि भारत पहले की तुलना में अधिक यूरिया देश में ही तैयार कर पा रहा है। लेकिन घरेलू उत्पादन अभी भी देश की कुल जरूरत को पूरी तरह पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए आयात को पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है।
फिर क्यों किया जा रहा है यूरिया का आयात?
यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ताओं में शामिल है। देश में हर साल करोड़ों टन यूरिया की जरूरत होती है। घरेलू उत्पादन बढ़ने के बावजूद मांग और उत्पादन के बीच अंतर बना हुआ है।
इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को अंतरराष्ट्रीय बाजार से यूरिया खरीदना पड़ता है।
इसके अलावा सरकार के सामने केवल आज की जरूरत पूरी करने की चुनौती नहीं है। उसे यह भी सुनिश्चित करना होता है कि अगर किसी समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति बाधित होती है, जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है या किसी बड़े निर्यातक देश से सप्लाई कम हो जाती है, तो भारत में किसानों को खाद की कमी न हो।
यही वजह है कि सरकार पहले से आयात सौदों और स्टॉक निर्माण पर जोर देती है।
पश्चिम एशिया संकट ने बढ़ाई चुनौती
इस साल उर्वरक आपूर्ति के सामने एक और बड़ी चुनौती पश्चिम एशिया में पैदा हुई भू-राजनीतिक स्थिति है। उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई में समुद्री मार्गों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
विशेष रूप से खाड़ी क्षेत्र से आने वाले उर्वरक और कच्चे माल की आपूर्ति पर समुद्री मार्गों में किसी भी तरह का व्यवधान असर डाल सकता है।
इसके बावजूद भारत ने वैकल्पिक स्रोतों और सप्लाई चैन का इस्तेमाल करके खाद की उपलब्धता बनाए रखने की कोशिश की है। सरकार के मुताबिक कई उर्वरक जहाज सुरक्षित रूप से भारत पहुंच चुके हैं।
यानी सरकार की रणनीति केवल एक देश या एक समुद्री मार्ग पर निर्भर रहने की नहीं है।
17.70 लाख टन यूरिया की खरीद
भारत की आयात रणनीति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाल के एक वैश्विक टेंडर में लगभग 17.70 लाख टन यूरिया की खरीद की गई है।
इस तरह की बड़ी खरीद का उद्देश्य केवल मौजूदा कमी को पूरा करना नहीं होता। सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्धता और कीमतों को देखते हुए पहले से खाद सुरक्षित करने की कोशिश करती है।
इससे खरीफ सीजन के दौरान अचानक मांग बढ़ने पर किसानों को खाद उपलब्ध कराने में मदद मिलती है।
किसानों को DAP महंगा क्यों नहीं पड़ रहा?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की कीमत घरेलू कीमत से काफी अलग हो सकती है। इसके बावजूद भारतीय किसान को DAP सरकार द्वारा निर्धारित व्यवस्था के तहत अपेक्षाकृत कम कीमत पर मिलता है।
सरकार उर्वरकों पर सब्सिडी देकर किसानों पर पड़ने वाले बोझ को कम करती है। खरीफ 2026 के लिए P&K उर्वरकों के लिए Nutrient Based Subsidy यानी NBS दरों को भी मंजूरी दी गई है।
इसका अर्थ यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर उसका पूरा असर सीधे किसान की जेब पर नहीं पड़ता।
One Nation, One Fertilizer से वितरण पर नजर
उर्वरक उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ सरकार वितरण व्यवस्था को भी मजबूत कर रही है।
One Nation, One Fertilizer पहल के तहत पूरे देश में उर्वरकों की ब्रांडिंग और वितरण व्यवस्था को अधिक एकरूप बनाने का प्रयास किया गया है। इसका उद्देश्य किसानों तक खाद की उपलब्धता और वितरण को अधिक व्यवस्थित बनाना है।
डिजिटल निगरानी के कारण सरकार को यह पता लगाने में भी मदद मिलती है कि किस क्षेत्र में कितनी खाद पहुंची और वहां उसकी मांग कितनी है।
असली चुनौती सिर्फ खाद की उपलब्धता नहीं
हालांकि सरकार के लिए खाद उपलब्ध कराना जरूरी है, लेकिन कृषि के लिए एक और बड़ा सवाल है—किसान खाद का इस्तेमाल कितना संतुलित तरीके से करता है?
कई क्षेत्रों में किसान यूरिया को फसल की ज्यादा पैदावार से जोड़कर जरूरत से अधिक इस्तेमाल करते हैं। इससे मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन पैदा हो सकता है।
विशेषज्ञ लंबे समय से किसानों को केवल यूरिया पर निर्भर रहने के बजाय मिट्टी की जरूरत के अनुसार NPK और अन्य पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल करने की सलाह देते रहे हैं।
इसलिए आने वाले वर्षों में भारत के लिए चुनौती केवल अधिक यूरिया बनाने की नहीं, बल्कि संतुलित उर्वरक उपयोग बढ़ाने की भी होगी।
सरकार की रणनीति साफ है—उत्पादन भी बढ़े, आयात भी सुरक्षित रहे
भारत फिलहाल दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है।
पहला, देश में यूरिया का उत्पादन बढ़ाया जाए ताकि लंबे समय में आयात पर निर्भरता कम हो।
दूसरा, जब तक घरेलू उत्पादन देश की पूरी जरूरत को पूरा नहीं करता, तब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार से समय रहते खाद खरीदकर पर्याप्त बफर स्टॉक रखा जाए।
पश्चिम एशिया जैसी परिस्थितियों ने इस रणनीति की अहमियत और बढ़ा दी है। अगर अंतरराष्ट्रीय सप्लाई अचानक प्रभावित होती है तो पहले से तैयार स्टॉक किसानों के लिए सुरक्षा कवच का काम कर सकता है।
किसानों के लिए इसका क्या मतलब?
फिलहाल खरीफ 2026 के लिए सबसे बड़ी राहत यही है कि सरकार के मुताबिक यूरिया और DAP की उपलब्धता पर्याप्त है और राज्यों को मांग के अनुसार खाद उपलब्ध कराने की व्यवस्था जारी है।
लेकिन किसानों को भी खाद खरीदते समय जल्दबाजी में जरूरत से ज्यादा स्टॉक करने से बचना चाहिए। उर्वरक का इस्तेमाल फसल, मिट्टी और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार करना अधिक फायदेमंद है।
निष्कर्ष
भारत में खाद की कहानी अब केवल उत्पादन और आयात की कहानी नहीं रह गई है। यह खाद की कीमत, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, समुद्री रास्तों, गैस की उपलब्धता, सरकारी सब्सिडी और किसान की मिट्टी तक पहुंचने वाली पूरी सप्लाई चेन से जुड़ी हुई है।
आज देश में यूरिया और DAP का स्टॉक मजबूत बताया जा रहा है, घरेलू उत्पादन बढ़ रहा है और सरकार ने आयात के जरिए भी अतिरिक्त सुरक्षा तैयार की है। ऐसे में खरीफ 2026 में किसानों के लिए फिलहाल सबसे बड़ी चिंता खाद की उपलब्धता से ज्यादा सही समय पर सही खाद और सही मात्रा में इस्तेमाल करने की होनी चाहिए।

