Indian Food Export: दुनिया के बड़े कृषि और खाद्य निर्यातक देशों में शामिल भारत के कुछ उत्पादों को लेकर विदेशी बाजारों में लगातार गुणवत्ता संबंधी सवाल सामने आते रहे हैं। कभी गेहूं और चावल की खेप जांच में अटकती है, तो कभी भारतीय आम, मूंगफली, मसालों और समुद्री उत्पादों को लेकर कार्रवाई की खबर आती है। इन मामलों ने Food Safety और Export Quality को लेकर नई बहस खड़ी कर दी है।
भारत अपने चावल, मसालों, आम, मूंगफली और समुद्री उत्पादों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। इनका निर्यात किसानों से लेकर प्रोसेसिंग कंपनियों और निर्यातकों तक लाखों लोगों के कारोबार से जुड़ा हुआ है। ऐसे में किसी विदेशी बाजार में भारतीय खाद्य उत्पाद की खेप वापस होने या किसी खास उत्पाद पर रोक लगने की खबर केवल संबंधित कंपनी या निर्यातक के लिए चिंता का विषय नहीं होती। इसका असर भारत के कृषि निर्यात की छवि पर भी पड़ सकता है।
हालांकि किसी एक खेप के रिजेक्ट होने और पूरे भारतीय उत्पाद पर प्रतिबंध लगने में बड़ा अंतर है। अलग-अलग देशों के अपने खाद्य सुरक्षा और आयात मानक होते हैं। इसलिए किसी shipment के rejection, product recall, temporary suspension और पूरे देश से होने वाले आयात पर ban को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
जापान में भारतीय आम को लेकर क्यों उठे सवाल?
भारत में आम को फलों का राजा कहा जाता है। अल्फांसो, केसर, लंगड़ा, दशहरी, चौसा और बंगनपल्ली जैसी किस्में देश के साथ विदेशी बाजारों में भी अपनी पहचान रखती हैं। जापान जैसे देशों में फलों के आयात के लिए बेहद सख्त नियम लागू होते हैं। वहां भेजे जाने वाले भारतीय आमों के लिए भी विशेष treatment और phytosanitary requirements का पालन करना पड़ता है।
इन्हीं आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भारत में Vapor Heat Treatment यानी VHT जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसका उद्देश्य आम के साथ कीट या बीमारी के दूसरे देश तक पहुंचने के खतरे को कम करना है।
भारतीय आम के जापानी बाजार में प्रवेश को लेकर अलग-अलग समय पर तकनीकी नियम और प्रतिबंध चर्चा में रहे हैं। जापान भारतीय आम का सबसे बड़ा बाजार भले न हो, लेकिन वहां लागू होने वाले कड़े गुणवत्ता मानकों के कारण ऐसे फैसलों को भारतीय निर्यात के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। अमेरिका में भी भारतीय आम भेजने के लिए विशेष treatment और phytosanitary standards का पालन करना जरूरी होता है।
तुर्की पहुंचा भारतीय गेहूं क्यों बना था विवाद का कारण?
साल 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद दुनिया में गेहूं की सप्लाई को लेकर बड़ी चिंता पैदा हो गई थी। दोनों देश वैश्विक अनाज कारोबार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। युद्ध के कारण सप्लाई प्रभावित हुई तो भारत से गेहूं निर्यात की संभावनाएं बढ़ीं।
इसी दौरान भारत से तुर्की भेजी गई करीब 50 हजार टन से अधिक गेहूं की एक खेप स्वीकार नहीं किए जाने की खबर सामने आई थी। उस समय भारतीय गेहूं को लेकर phytosanitary concern की बात कही गई थी। मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि भारत से गेहूं निर्यात बढ़ने की उम्मीद की जा रही थी।
कृषि उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में phytosanitary certificate बेहद महत्वपूर्ण होता है। आयातक देश यह सुनिश्चित करना चाहता है कि विदेश से आने वाला अनाज या कृषि उत्पाद ऐसा कोई कीट या पौध रोग लेकर न आए, जिससे उसकी घरेलू खेती प्रभावित हो।
भारतीय चावल की खेपों पर भी उठते रहे सवाल
भारत दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण चावल निर्यातक देशों में शामिल है। बासमती चावल के अलावा भारत बड़ी मात्रा में गैर-बासमती चावल भी विदेशी बाजारों में भेजता है। इसलिए भारतीय चावल से जुड़ी किसी गुणवत्ता संबंधी आपत्ति का आर्थिक महत्व काफी बड़ा हो जाता है।
अलग-अलग समय पर विदेशी बाजारों में भारतीय चावल की कुछ खेपों को गुणवत्ता, phytosanitary requirements और अन्य तकनीकी कारणों से जांच का सामना करना पड़ा है। चीन और बांग्लादेश से जुड़े मामलों में भी भारतीय चावल को लेकर सवाल उठने की खबरें सामने आई हैं।
चावल की अंतरराष्ट्रीय खरीद में केवल स्वाद और दाने की गुणवत्ता नहीं देखी जाती। नमी, टूटे हुए दानों का प्रतिशत, pesticide residue, फंगस, कीट और दूसरे तकनीकी मानकों की भी जांच की जा सकती है। कुछ देशों में genetically modified यानी GM food को लेकर भी बेहद कड़े नियम हैं।
अगर किसी खास shipment में तय मानकों से अलग परिणाम मिलता है तो उसे रोका या वापस किया जा सकता है। हालांकि किसी shipment का rejection अपने आप में पूरे भारतीय चावल पर प्रतिबंध नहीं माना जा सकता।
मूंगफली के निर्यात में भी गुणवत्ता सबसे बड़ी कसौटी
भारतीय मूंगफली की विदेशी बाजारों में अच्छी मांग रही है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश भारतीय groundnut के संभावित बाजार हैं। मूल रिपोर्ट के अनुसार सितंबर 2025 में इंडोनेशिया की ओर से भारत से मूंगफली आयात से जुड़ी व्यवस्था को निलंबित किए जाने का मामला सामने आया था। मूंगफली के निर्यात में सबसे महत्वपूर्ण Food Safety concerns में से एक aflatoxin है। यह कुछ प्रकार की फंगस से पैदा होने वाला विषैला पदार्थ है।
दुनिया के कई देशों ने खाद्य पदार्थों में aflatoxin की अधिकतम स्वीकार्य सीमा निर्धारित कर रखी है। अगर किसी shipment में यह मात्रा संबंधित देश के तय मानक से अधिक निकलती है तो पूरी खेप प्रभावित हो सकती है। इस समस्या को केवल अंतिम चरण की laboratory testing से नियंत्रित करना आसान नहीं है। फसल की कटाई, सुखाने, storage और transportation तक सही प्रक्रिया अपनानी पड़ती है।
भारतीय मसालों पर 2024 में मचा था हंगामा
भारत और मसालों का रिश्ता सदियों पुराना है। भारतीय हल्दी, मिर्च, जीरा, धनिया और दूसरे मसालों की दुनियाभर में मांग है। लेकिन 2024 में भारतीय मसाला उद्योग उस समय चर्चा में आ गया, जब MDH और Everest के कुछ उत्पादों को लेकर विदेशी बाजारों में कार्रवाई सामने आई। हांगकांग में दोनों ब्रांड के कुछ मसाला उत्पादों को लेकर कदम उठाए गए थे। वहीं सिंगापुर में Everest के एक मसाला उत्पाद को recall करने की कार्रवाई चर्चा में आई। इन मामलों में Ethylene Oxide को लेकर चिंता जताई गई थी।
अलग-अलग देशों में खाद्य उत्पादों में Ethylene Oxide की मौजूदगी को लेकर अलग नियम हैं। कुछ बाजार इस मामले में बेहद कड़े standards अपनाते हैं। भारतीय मसालों के लिए यह मामला महत्वपूर्ण था क्योंकि भारत दुनिया के प्रमुख spice producers और exporters में शामिल है। मसाले भारतीय खाने की वैश्विक पहचान का भी बड़ा हिस्सा हैं। ऐसे में किसी बड़े भारतीय ब्रांड के उत्पाद को लेकर Food Safety का सवाल खड़ा होता है तो उसका असर संबंधित कंपनी से आगे पूरी इंडस्ट्री की छवि तक पहुंच सकता है।
अमेरिका में भारतीय अंडों को लेकर क्या था मामला?
अमेरिका में अंडों की सप्लाई और कीमतों में आए बदलाव के दौरान भारत से अंडे और egg products भेजे जाने की खबरों ने भी ध्यान खींचा। यहां यह समझना जरूरी है कि अमेरिका में इंसानों के खाने के लिए इस्तेमाल होने वाले shell eggs और processed egg products के लिए अलग regulatory requirements होती हैं। Animal feed और pet food के लिए इस्तेमाल होने वाले उत्पाद दूसरी श्रेणी में आ सकते हैं। मूल रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत से अमेरिका पहुंचे कुछ अंडा उत्पादों का इस्तेमाल इंसानों के बजाय pet food के लिए किया जाना था।
ऐसे मामलों में संबंधित shipment की वास्तविक product category और अमेरिकी regulatory classification महत्वपूर्ण होती है। केवल अंडों के निर्यात के आंकड़ों से यह तय नहीं किया जा सकता कि उनका इस्तेमाल इंसानों के भोजन के लिए हुआ या animal/pet food के लिए।
अमेरिका में भारतीय झींगा भी जांच के दायरे में
भारत के Indian Food Export में seafood की महत्वपूर्ण भूमिका है। खासतौर पर shrimp यानी झींगा भारत के प्रमुख समुद्री निर्यात उत्पादों में शामिल है।अमेरिका भारतीय झींगा के बड़े बाजारों में से एक रहा है। लेकिन seafood products को वहां कड़ी खाद्य सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है। किसी shipment में प्रतिबंधित दवा के अवशेष, बैक्टीरिया, contamination, गलत labeling या दूसरी समस्या मिलने पर अमेरिकी अधिकारी उसे रोक सकते हैं। भारतीय shrimp की अलग-अलग shipments को भी समय-समय पर detention या rejection का सामना करना पड़ा है। बार-बार होने वाले ऐसे मामले exporters के लिए मुश्किल बढ़ा सकते हैं। किसी कंपनी की खेप लगातार मानकों पर खरी नहीं उतरती तो उसके उत्पादों की जांच बढ़ सकती है। इससे समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं।
आखिर भारतीय खाद्य उत्पाद विदेशों में क्यों फंसते हैं?
कृषि और खाद्य उत्पादों का निर्यात बेहद जटिल प्रक्रिया है। इसमें गुणवत्ता केवल factory या port पर तय नहीं होती। इसकी शुरुआत खेत से होती है।किसान ने फसल पर कौन सा pesticide इस्तेमाल किया, उसकी मात्रा कितनी थी, फसल कब काटी गई, कहां रखी गई, processing कैसे हुई और packaging के दौरान किन नियमों का पालन किया गया, इन सभी चीजों का अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। इसके बाद सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग देशों के अलग standards हैं।
किसी chemical residue की जितनी मात्रा एक देश में स्वीकार्य है, संभव है दूसरे देश में उसकी सीमा उससे काफी कम हो। कोई chemical एक बाजार में निर्धारित सीमा के भीतर इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि दूसरे बाजार में उसके लिए बेहद सख्त नियम हो सकते हैं। यही वजह है कि मजबूत Export Quality system के लिए केवल आखिरी समय में sample testing पर्याप्त नहीं है।
खेत से बंदरगाह तक मजबूत करनी होगी निगरानी
भारत से निर्यात होने वाले कृषि और खाद्य उत्पादों से APEDA, Spices Board, Export Inspection Council और उत्पाद के आधार पर दूसरी संबंधित संस्थाएं जुड़ी हो सकती हैं। इन एजेंसियों और उद्योग के सामने केवल निर्यात बढ़ाने की चुनौती नहीं है। बड़ी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की भी है कि भारत से बाहर जाने वाले उत्पाद संबंधित देश के standards को पूरा करें। इसके लिए traceability system मजबूत करना जरूरी है।
अगर किसी shipment में समस्या निकलती है तो यह पता लगाने की व्यवस्था होनी चाहिए कि उत्पाद किस क्षेत्र या खेत से आया, कौन से inputs इस्तेमाल किए गए, processing किस unit में हुई, laboratory testing कहां हुई और shipment किस exporter ने भेजी। इससे समस्या का कारण जल्दी पता लगाया जा सकता है और पूरी इंडस्ट्री को प्रभावित किए बिना संबंधित source पर कार्रवाई संभव होती है।
Shipment Reject होने का मतलब पूरे भारत पर Ban नहीं
भारतीय खाद्य उत्पादों से संबंधित खबरों में सबसे महत्वपूर्ण बात अलग-अलग regulatory actions के बीच अंतर समझना है। किसी shipment के rejection का मतलब यह हो सकता है कि केवल एक खास खेप तय मानकों पर खरी नहीं उतरी। Product recall का मतलब बाजार में पहुंच चुके किसी खास batch या product को वापस मंगाना हो सकता है। Import suspension किसी कंपनी, उत्पाद या आयात व्यवस्था पर अस्थायी रोक हो सकती है। इसके उलट countrywide ban कहीं ज्यादा व्यापक कार्रवाई होती है। इसलिए किसी एक भारतीय shipment के वापस किए जाने को पूरे भारत के उस उत्पाद पर प्रतिबंध के रूप में पेश करना सही तस्वीर नहीं देता।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है Food Safety और Export Quality?
भारत की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण रोजगार में कृषि की बड़ी भूमिका है। कृषि निर्यात बढ़ने से किसान से लेकर food processing, packaging, logistics, cold storage और export companies तक पूरी supply chain को फायदा मिलता है।लेकिन अंतरराष्ट्रीय खाद्य कारोबार में भरोसा बेहद महत्वपूर्ण है।
किसी देश का buyer जब भारतीय उत्पाद खरीदता है तो उसके लिए कीमत के साथ quality consistency भी मायने रखती है। अगर बार-बार अलग-अलग shipments में समस्याएं सामने आती हैं तो buyers दूसरे suppliers की तरफ जा सकते हैं। यही वजह है कि आने वाले समय में भारत के लिए केवल ज्यादा मात्रा में कृषि उत्पाद विदेश भेजना पर्याप्त नहीं होगा।
देश को Indian Food Export की बढ़ती ताकत के साथ Food Safety और Export Quality पर भी उतना ही जोर देना होगा। खेत से लेकर processing unit, laboratory और port तक मजबूत monitoring, testing और traceability भारत को दुनिया के सबसे सख्त खाद्य बाजारों में भरोसेमंद supplier बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

