खरीफ 2026 सीजन को लेकर केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण रणनीतिक फैसला लिया है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) द्वारा कमजोर मानसून की आशंका जताए जाने के बाद सरकार ने खरीफ सीजन के लिए उर्वरकों की अनुमानित आवश्यकता को कम कर दिया है। यह निर्णय राज्यों के साथ विस्तृत चर्चा और फसल क्षेत्र के संभावित आकलन के आधार पर लिया गया है। सरकार का मानना है कि यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है तो कई इलाकों में बुवाई का रकबा प्रभावित हो सकता है, जिससे उर्वरकों की मांग भी घट सकती है।
खरीफ 2026 में यह कदम केवल मांग में कमी का संकेत नहीं है, बल्कि बदलते मौसम और संभावित जोखिमों को देखते हुए सरकार की सतर्क योजना का हिस्सा भी है। साथ ही सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया है कि देश में उर्वरकों का पर्याप्त भंडार उपलब्ध रहे ताकि किसी भी स्थिति में किसानों को कमी का सामना न करना पड़े।
मानसून पर निर्भर है खरीफ खेती
भारत की लगभग 55 प्रतिशत कृषि भूमि आज भी वर्षा आधारित है। दक्षिण-पश्चिम मानसून देश की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा देता है और खरीफ फसलों की सफलता इसी पर निर्भर करती है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, दालें, मूंगफली, गन्ना और कई अन्य प्रमुख खरीफ फसलें समय पर और पर्याप्त वर्षा मिलने पर ही बेहतर उत्पादन देती हैं।
यदि मानसून कमजोर पड़ता है या वर्षा का वितरण असमान रहता है, तो किसानों द्वारा बुवाई का क्षेत्र कम किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में उर्वरकों की वास्तविक मांग भी कम हो जाती है। इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने अपने अनुमान में संशोधन किया है।
उर्वरकों की मांग का नया अनुमान
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने खरीफ 2026 के लिए कुल उर्वरक आवश्यकता का संशोधित अनुमान 38.39 मिलियन टन जारी किया है। इससे पहले यह अनुमान 39.05 मिलियन टन रखा गया था। यानी कुल मांग के अनुमान में लगभग 0.66 मिलियन टन की कमी की गई है।
सबसे अधिक उपयोग होने वाले यूरिया की अनुमानित आवश्यकता पहले 19.40 मिलियन टन थी, जिसे घटाकर 19.03 मिलियन टन कर दिया गया है। इसी प्रकार डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) की आवश्यकता का अनुमान 5.91 मिलियन टन से घटाकर 5.62 मिलियन टन कर दिया गया है।
यूरिया की मांग में लगभग 1.9 प्रतिशत तथा DAP की मांग में करीब 4.9 प्रतिशत की कमी का अनुमान लगाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कटौती संभावित कम बुवाई क्षेत्र और वर्षा आधारित खेती पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखकर की गई है।
सरकार के पास पर्याप्त उर्वरक भंडार
मांग के अनुमान में कमी के बावजूद सरकार ने उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर पूरी तैयारी कर रखी है। वर्तमान में देश के विभिन्न गोदामों में लगभग 19.98 मिलियन टन उर्वरकों का स्टॉक उपलब्ध है। यह संशोधित आवश्यकता का लगभग 52 प्रतिशत है, जो खरीफ सीजन शुरू होने से पहले एक मजबूत स्थिति मानी जाती है।
सरकार का कहना है कि बेहतर लॉजिस्टिक्स, समय से पहले खरीद और राज्यों के साथ समन्वय के कारण यह भंडार तैयार किया गया है। इससे यदि किसी राज्य में अचानक मांग बढ़ती है, तो वहां तत्काल आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी।
वैश्विक चुनौतियों के बावजूद सप्लाई मजबूत
पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय उर्वरक बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। कई देशों में कच्चे माल की आपूर्ति और समुद्री परिवहन प्रभावित हुआ है। इसके बावजूद भारत ने समय रहते आयात अनुबंधों और घरेलू उत्पादन को बढ़ाकर अपनी आपूर्ति व्यवस्था मजबूत कर ली है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार संकट की शुरुआत के बाद से आयात और घरेलू उत्पादन को मिलाकर राष्ट्रीय पूल में 13.24 मिलियन टन उर्वरक जोड़े गए हैं।
सरकार ने विभिन्न वैश्विक निविदाओं के माध्यम से 2.5 मिलियन टन यूरिया, 1.5 मिलियन टन DAP तथा 1 मिलियन टन NPKS उर्वरक की खरीद सुनिश्चित की है। इनकी खेप जून और जुलाई के दौरान भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त 1.7 मिलियन टन यूरिया की खरीद के लिए एक और वैश्विक निविदा प्रक्रिया जारी है।
घरेलू उत्पादन में भी बढ़ोतरी
सरकार का फोकस केवल आयात पर निर्भर रहने का नहीं बल्कि घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर भी है। मई 2026 में देश का यूरिया उत्पादन 2.51 मिलियन टन तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 0.28 मिलियन टन अधिक है।
घरेलू उत्पादन में यह वृद्धि आयात पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ भविष्य में वैश्विक बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव से सुरक्षा भी प्रदान करेगी।
कमजोर मानसून की आशंका
भारतीय मौसम विभाग ने 2026 के मानसून पूर्वानुमान में संशोधन करते हुए वर्षा का अनुमान लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) के 90 प्रतिशत तक घटा दिया है। इससे पहले यह अनुमान 92 प्रतिशत था।
1971 से 2020 के आंकड़ों के आधार पर भारत की औसत मानसूनी वर्षा 87 सेंटीमीटर मानी जाती है। यदि इस वर्ष वर्षा केवल 90 प्रतिशत के आसपास रहती है, तो यह 2015 के बाद सबसे कमजोर मानसून साबित हो सकता है।
मौसम विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके मॉडल में लगभग चार प्रतिशत तक की त्रुटि की संभावना रहती है। इसके बावजूद समग्र संकेत सामान्य से कम वर्षा की ओर इशारा कर रहे हैं।
एल नीनो का बढ़ता प्रभाव
इस वर्ष एल नीनो की स्थिति को मानसून कमजोर होने का प्रमुख कारण माना जा रहा है। एल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर का सतही तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है, जिसका प्रभाव भारतीय मानसून पर भी पड़ता है।
हालांकि इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) इस वर्ष तटस्थ रहने की संभावना है, जिससे कुछ राहत मिल सकती है। फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि केवल IOD के भरोसे सामान्य मानसून की उम्मीद करना उचित नहीं होगा।
विशेष चिंता का विषय यह है कि देश के कोर मानसून क्षेत्र, जहां अधिकांश वर्षा आधारित खेती होती है, वहां सामान्य से कम वर्षा होने का अनुमान है। ऐसे क्षेत्रों में बुवाई और फसल विकास दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
किन फसलों पर पड़ेगा असर
यदि मानसून अपेक्षा से कमजोर रहता है तो धान, दालें, तिलहन, कपास, गन्ना और अन्य खरीफ फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इन फसलों का बड़ा हिस्सा वर्षा आधारित क्षेत्रों में उगाया जाता है, जहां सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं।
कम उत्पादन का असर केवल किसानों की आय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्यान्न उपलब्धता, खाद्य तेलों की आपूर्ति और बाजार कीमतों पर भी पड़ सकता है। इससे महंगाई बढ़ने की संभावना भी बन सकती है।
सरकार की रणनीति
सरकार ने संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए कई स्तरों पर तैयारी की है। राज्यों के साथ नियमित समीक्षा बैठकें की जा रही हैं। उर्वरकों की उपलब्धता पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। जरूरत के अनुसार राज्यों को अतिरिक्त आवंटन देने की व्यवस्था भी तैयार रखी गई है।
इसके अलावा घरेलू उत्पादन बढ़ाने, आयात अनुबंध समय पर पूरा करने और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को मजबूत बनाने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि किसी भी परिस्थिति में किसानों तक उर्वरक समय पर पहुंच सकें।
आगे की राह
खरीफ 2026 के लिए उर्वरकों की मांग में किया गया संशोधन सरकार की दूरदर्शी और व्यावहारिक नीति का संकेत देता है। कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए मांग का यथार्थवादी आकलन, पर्याप्त स्टॉक का निर्माण, घरेलू उत्पादन में वृद्धि और समय पर आयात की व्यवस्था यह दर्शाती है कि सरकार संभावित जोखिमों के प्रति सतर्क है।
हालांकि आने वाले हफ्तों में मानसून की वास्तविक प्रगति ही तय करेगी कि बुवाई कितनी होती है और उर्वरकों की वास्तविक मांग कितनी रहती है। यदि वर्षा अनुमान से बेहतर होती है तो सरकार के पास पर्याप्त भंडार मौजूद है, जबकि कमजोर मानसून की स्थिति में संशोधित योजना संसाधनों के बेहतर उपयोग में मदद करेगी। ऐसे में खरीफ 2026 का पूरा सीजन मौसम, कृषि नीति और उर्वरक प्रबंधन के बीच संतुलन की एक महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकता है।

