नई दिल्ली: इंडियन माइक्रो फर्टिलाइज़र मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IMMA) ने सब्सिडी वाले उर्वरकों के साथ स्पेशलिटी फर्टिलाइज़र की जबरन बिक्री (फोर्स्ड टैगिंग) पर कड़ी आपत्ति जताई है। एसोसिएशन का कहना है कि यूरिया और डीएपी जैसे सब्सिडी वाले उर्वरकों के साथ बायोस्टिमुलेंट्स, पानी में घुलनशील (Water Soluble) उर्वरक और माइक्रोन्यूट्रिएंट उत्पादों को अनिवार्य रूप से जोड़कर बेचना न केवल गैर-कानूनी है, बल्कि इससे किसानों और लगभग 8,200 करोड़ रुपये (करीब 918 मिलियन डॉलर) के स्पेशलिटी फर्टिलाइज़र उद्योग को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है।
यह मुद्दा 2 से 4 जुलाई तक आयोजित स्पेशलिटी फर्टिलाइज़र समिट एंड B2B एक्सपो (SOMS 2026) के दौरान प्रमुखता से उठाया गया। IMMA ने इसे पूरे देश के लिए गंभीर नीति संबंधी विषय बताते हुए सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की।
किसानों पर पड़ रहा अतिरिक्त आर्थिक बोझ
IMMA के अध्यक्ष राहुल मिर्चंदानी ने कहा कि कई स्थानों पर उर्वरक विक्रेता किसानों को सब्सिडी वाले यूरिया या डीएपी तभी उपलब्ध कराते हैं, जब वे उसके साथ कोई स्पेशलिटी फर्टिलाइज़र भी खरीदें। कई बार किसान को उस अतिरिक्त उत्पाद की आवश्यकता भी नहीं होती, फिर भी उसे मजबूरी में खरीदना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि इस तरह की टैगिंग किसानों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डालती है और उन्हें अपनी वास्तविक आवश्यकता के बजाय अतिरिक्त खर्च करने के लिए मजबूर करती है। इससे किसानों का भरोसा भी प्रभावित होता है और बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा समाप्त होती है।
ब्रांड की साख पर पड़ रहा असर
राहुल मिर्चंदानी ने कहा कि स्पेशलिटी फर्टिलाइज़र उद्योग ने वर्षों की मेहनत, अनुसंधान और किसानों के बीच जागरूकता फैलाकर अपनी पहचान बनाई है। लेकिन जब इन उत्पादों को जबरन बेचा जाता है, तो किसान इन्हें अपनी पसंद से नहीं बल्कि मजबूरी में खरीदते हैं।
उनके अनुसार इससे गुणवत्ता वाले उत्पादों और प्रतिष्ठित ब्रांडों की छवि खराब होती है। किसानों के मन में यह धारणा बनती है कि ये उत्पाद केवल अतिरिक्त बिक्री बढ़ाने के लिए दिए जा रहे हैं, जबकि कई मामलों में इनका वैज्ञानिक उपयोग फसल उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
कानून के खिलाफ है जबरन टैगिंग
IMMA ने स्पष्ट किया कि सब्सिडी वाले उर्वरकों के साथ स्पेशलिटी फर्टिलाइज़र को अनिवार्य रूप से जोड़कर बेचना कई कानूनों का उल्लंघन है।
एसोसिएशन के अनुसार यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत अनुचित व्यापार व्यवहार (Unfair Trade Practice) की श्रेणी में आता है। वहीं प्रतिस्पर्धा अधिनियम (Competition Act) के तहत इसे प्रतिबंधित “टाई-इन अरेंजमेंट” माना जाता है।
इसके अलावा फर्टिलाइज़र कंट्रोल ऑर्डर (FCO) के क्लॉज 31 के अनुसार यदि कोई डीलर इस प्रकार की अनियमितता करता है, तो उसका लाइसेंस निलंबित या रद्द किया जा सकता है।
CCI और संसदीय समिति का भी हवाला
IMMA ने बताया कि अगस्त 2025 में भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने एक मामले में प्रारंभिक स्तर पर माना था कि जबरन टैगिंग से बाजार में प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है और यह बाजार शक्ति के दुरुपयोग का मामला बन सकता है।
एसोसिएशन ने लोकसभा की स्थायी समिति की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि किसी भी लाभार्थी किसान को सब्सिडी वाले यूरिया के साथ कोई अन्य उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
IMMA का कहना है कि इन टिप्पणियों से स्पष्ट है कि इस प्रकार की बिक्री व्यवस्था कानून और नीति दोनों के विरुद्ध है।
कई राज्यों ने शुरू की कार्रवाई
एसोसिएशन के अनुसार कई राज्य सरकारों ने इस प्रथा के खिलाफ कार्रवाई भी शुरू कर दी है।
उत्तर प्रदेश सरकार ने जबरन टैगिंग रोकने के लिए विशेष आदेश जारी किया है और इस संबंध में सात एफआईआर दर्ज की गई हैं।
गुजरात में 41 शिकायतें मिलने के बाद सरकार ने सर्कुलर जारी किया, जिसके आधार पर 12 उर्वरक विक्रेताओं के लाइसेंस निलंबित किए गए। साथ ही नैनो उर्वरकों के वितरण को सामान्य उर्वरक आपूर्ति व्यवस्था से अलग किया गया।
मध्य प्रदेश में कुछ कंपनियों के फॉर्म A-2 लाइसेंस निलंबित किए गए हैं। हरियाणा में अंबाला जिले में जिला स्तर पर टैगिंग आधारित बिक्री पर रोक लगाई गई है। वहीं महाराष्ट्र सरकार ने भी CCI की जांच के बाद राज्यभर में ऐसी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश जारी किए हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर नीति की मांग
IMMA का कहना है कि अलग-अलग राज्यों द्वारा उठाए गए कदम सराहनीय हैं, लेकिन इस समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है जब पूरे देश में एक समान नीति लागू की जाए।
एसोसिएशन ने जबरन टैगिंग समाप्त करने को “राष्ट्रीय आवश्यकता” बताते हुए कहा कि इससे किसानों के हितों की रक्षा होगी, ईमानदार डीलरों को समान अवसर मिलेगा और स्पेशलिटी फर्टिलाइज़र क्षेत्र में कार्यरत हजारों सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) को भी सुरक्षा मिलेगी।
IMMA ने घोषणा की कि वह इस मुद्दे को सितंबर में नई दिल्ली में आयोजित सरकारी नीति संवाद और फरवरी में होने वाले नेशनल क्रॉप न्यूट्रिशन समिट में भी प्रमुखता से उठाएगा।
8,200 करोड़ रुपये का बन चुका है उद्योग
इस वर्ष अपने 40 वर्ष पूरे कर रहे IMMA ने पहली बार भारत के स्पेशलिटी फर्टिलाइज़र क्षेत्र के आकार का स्वतंत्र अध्ययन भी कराया है।
अध्ययन के अनुसार देश में बायोस्टिमुलेंट्स, पानी में घुलनशील उर्वरक और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का संयुक्त बाजार लगभग 918 मिलियन डॉलर, यानी करीब 8,200 करोड़ रुपये का हो चुका है।
यह दर्शाता है कि भारतीय कृषि में स्पेशलिटी उर्वरकों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है और किसान बेहतर उत्पादन तथा गुणवत्ता के लिए इन उत्पादों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
कौन-सा सेगमेंट सबसे बड़ा?
अध्ययन के अनुसार पानी में घुलनशील उर्वरकों (Water Soluble Fertilizers) का बाजार लगभग 3,700 करोड़ रुपये का है और यह करीब 7 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ रहा है। हालांकि इस श्रेणी की लगभग 65 प्रतिशत मांग अभी भी आयात के माध्यम से पूरी होती है। घरेलू कंपनियां आयात पर निर्भरता कम करने के लिए उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं।
बायोस्टिमुलेंट्स का बाजार करीब 2,350 करोड़ रुपये का है और यह 11.5 प्रतिशत CAGR के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाला क्षेत्र बन चुका है। पिछले वर्ष इस श्रेणी को फर्टिलाइज़र कंट्रोल ऑर्डर के तहत लाने के बाद पंजीकृत कंपनियों की संख्या लगभग 8,000 से घटकर केवल 140 रह गई, जिससे गुणवत्ता नियंत्रण मजबूत हुआ है।
वहीं माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का बाजार लगभग 2,142 करोड़ रुपये का है और यह लगातार स्थिर गति से विस्तार कर रहा है।
निष्कर्ष
स्पेशलिटी फर्टिलाइज़र उद्योग का तेजी से विस्तार भारतीय कृषि में वैज्ञानिक पोषण प्रबंधन की बढ़ती आवश्यकता को दर्शाता है। लेकिन यदि इन उत्पादों की बिक्री किसानों की इच्छा के बजाय मजबूरी के आधार पर होगी, तो इससे न केवल किसानों का आर्थिक हित प्रभावित होगा बल्कि पूरे उद्योग की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे।
ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि सब्सिडी वाले उर्वरकों की पारदर्शी बिक्री, कानूनों का सख्ती से पालन और किसानों को उनकी वास्तविक आवश्यकता के अनुसार उत्पाद उपलब्ध कराना ही टिकाऊ और संतुलित कृषि व्यवस्था की दिशा में सबसे प्रभावी कदम होगा।

