Kisan Utpad Vyapar Evam Vanijy Adhiniyam: वर्ष 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन प्रमुख कृषि कानूनों में से एक था। इसका आधिकारिक नाम “कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम, 2020” था। इसका घोषित उद्देश्य किसानों को अपनी कृषि उपज बेचने के लिए अधिक विकल्प देना, राज्यों के बीच कृषि व्यापार को आसान बनाना और अधिसूचित कृषि उपज मंडियों के बाहर वैकल्पिक व्यापारिक व्यवस्था विकसित करना था।
इस कानून के अंतर्गत किसान खेत, गोदाम, शीतगृह, कारखाना परिसर, निजी खरीद केंद्र तथा अन्य निर्धारित स्थानों पर अपनी उपज बेच सकते थे। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री को भी मान्यता दी गई थी।
हालांकि कानून लागू होने के बाद इसके कई प्रावधानों को लेकर देशभर में विरोध शुरू हुआ। किसान संगठनों ने आशंका जताई कि मंडियों के बाहर कर-मुक्त व्यापार बढ़ने से APMC मंडियां कमजोर हो सकती हैं और भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद प्रभावित हो सकती है।
लगभग एक वर्ष तक चले विरोध और व्यापक किसान आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने इसे वापस लेने का निर्णय लिया। कृषि विधि निरसन अधिनियम, 2021 ने किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम सहित तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों को निरस्त कर दिया। यह निरसन अधिनियम 30 नवंबर 2021 को अधिनियमित हुआ।
इस लेख में कानून के मूल प्रावधानों, संभावित लाभों, किसानों की आशंकाओं, विवादों और इसकी वर्तमान कानूनी स्थिति को सरल भाषा में समझाया गया है।
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम क्या था?
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम वर्ष 2020 का एक केंद्रीय कानून था। इसका उद्देश्य एक ऐसी व्यवस्था बनाना था जिसमें किसान और व्यापारी अधिसूचित कृषि उपज मंडी समितियों के भौतिक परिसर से बाहर भी कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री कर सकें।
कानून की प्रस्तावना में किसानों और व्यापारियों को बिक्री तथा खरीद के स्थान के चयन की स्वतंत्रता देने, प्रतिस्पर्धी वैकल्पिक व्यापार माध्यम विकसित करने और अंतरराज्यीय तथा राज्य के भीतर बाधा-मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने की बात कही गई थी।
परंपरागत व्यवस्था में कई राज्यों में कृषि उपज का संगठित व्यापार मुख्य रूप से APMC मंडियों के माध्यम से होता था। मंडियों में लाइसेंस प्राप्त व्यापारी, कमीशन एजेंट, मंडी शुल्क और राज्य के नियम लागू होते थे।
नए कानून ने मंडी परिसर से बाहर होने वाले व्यापार के लिए एक अलग केंद्रीय ढांचा प्रस्तुत किया था। सरकार का तर्क था कि इससे किसान को केवल स्थानीय मंडी या सीमित खरीदारों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
कानून का आधिकारिक नाम
इस कानून का अंग्रेजी नाम था: The Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act, 2020 इसे अधिनियम संख्या 21, वर्ष 2020 के रूप में पारित किया गया था। इससे पहले इसी विषय पर जून 2020 में एक अध्यादेश जारी किया गया था। बाद में संसद ने सितंबर 2020 में विधेयक पारित किया और अध्यादेश के स्थान पर अधिनियम लागू किया।
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम की वर्तमान स्थिति
इस कानून के बारे में जानकारी प्राप्त करते समय इसकी वर्तमान स्थिति समझना सबसे जरूरी है। किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम अब लागू नहीं है।
संसद ने नवंबर 2021 में कृषि विधि निरसन विधेयक पारित किया। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह कृषि विधि निरसन अधिनियम, 2021 बना। इस अधिनियम की धारा 2 के अंतर्गत निम्न तीन कानून निरस्त किए गए:
- कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य संवर्धन एवं सरलीकरण अधिनियम, 2020
- कृषक सशक्तीकरण और संरक्षण कीमत आश्वासन एवं कृषि सेवा पर करार अधिनियम, 2020
- आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम, 2020
कृषि विधि निरसन अधिनियम 30 नवंबर 2021 को अधिनियमित हुआ। इसलिए किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम के प्रावधानों को वर्तमान कृषि व्यापार का लागू केंद्रीय कानून नहीं माना जाना चाहिए।
वर्तमान समय में कृषि उपज की खरीद-बिक्री पर संबंधित राज्य के APMC कानून, राज्य सरकार के नियम, केंद्र सरकार की खरीद नीतियां, ई-नाम व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा संबंधी नियम और अन्य लागू कानून प्रभाव डाल सकते हैं।
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम लाने का उद्देश्य
इस कानून को लाने के पीछे सरकार ने कृषि बाजार में प्रतिस्पर्धा और किसानों के लिए अधिक बिक्री विकल्प उपलब्ध कराने का उद्देश्य बताया था।
किसानों को बिक्री का अतिरिक्त विकल्प देना
कानून के अनुसार किसान अपनी उपज केवल मंडी परिसर में ही नहीं, बल्कि अन्य व्यापार क्षेत्रों में भी बेच सकते थे। इसमें खेत का द्वार, गोदाम, शीतगृह, साइलो और प्रसंस्करण इकाई जैसे स्थान शामिल हो सकते थे।
इसका अर्थ यह नहीं था कि APMC मंडियों को तुरंत समाप्त कर दिया गया था। कानून के अनुसार मंडियां अपने राज्य कानूनों के अंतर्गत बनी रह सकती थीं। इसके साथ मंडी के बाहर एक अलग व्यापारिक व्यवस्था की अनुमति दी गई थी।
अंतरराज्यीय व्यापार को आसान बनाना
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम का एक प्रमुख उद्देश्य किसानों की उपज को एक राज्य से दूसरे राज्य तक बेचने में आने वाली बाधाओं को कम करना था।
सरकार का मानना था कि यदि किसान स्थानीय बाजार के साथ अन्य राज्यों के खरीदारों तक भी पहुंच सके, तो उसे बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना
अधिक खरीदारों की उपलब्धता से प्रतिस्पर्धा बढ़ने की उम्मीद की गई थी। सिद्धांत रूप से जब कई व्यापारी किसान की उपज खरीदने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो किसान को मूल्य तय करने में बेहतर स्थिति मिल सकती है।
इलेक्ट्रॉनिक कृषि व्यापार को प्रोत्साहन
कानून में इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री की व्यवस्था भी शामिल थी। इसका उद्देश्य तकनीक की सहायता से किसानों और खरीदारों को जोड़ना था।
हालांकि डिजिटल व्यापार की वास्तविक सफलता इंटरनेट, पारदर्शी मूल्य खोज, विश्वसनीय खरीदार, गुणवत्ता जांच, लॉजिस्टिक्स और समय पर भुगतान जैसी सुविधाओं पर निर्भर करती है।
कानून में व्यापार क्षेत्र की अवधारणा
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम में “व्यापार क्षेत्र” एक महत्वपूर्ण अवधारणा थी।
व्यापार क्षेत्र से आशय ऐसे स्थानों से था जो राज्य के APMC कानून के तहत अधिसूचित मंडी परिसर या बाजार यार्ड से बाहर स्थित हों। इनमें निम्न स्थान शामिल हो सकते थे:
- किसान का खेत
- फार्म गेट
- गोदाम
- शीतगृह
- साइलो
- फैक्टरी परिसर
- प्रसंस्करण इकाई
- निजी संग्रह केंद्र
- अन्य निर्धारित व्यापार स्थल
इस व्यवस्था का उद्देश्य खरीदार को सीधे किसान के खेत या उपज के भंडारण स्थल तक पहुंचने की सुविधा देना था। फार्म गेट खरीद से किसान को परिवहन, लोडिंग और मंडी तक उपज पहुंचाने की कुछ लागतों में कमी हो सकती थी। दूसरी ओर, छोटे किसानों के पास सीमित मात्रा में उपज होने के कारण खरीदार को आकर्षित करना हमेशा आसान नहीं होता। ऐसे किसानों के लिए किसान उत्पादक संगठन यानी FPO की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती थी।
किन कृषि उत्पादों को कानून में शामिल किया गया था?
कानून में किसान की उपज की परिभाषा व्यापक रखी गई थी। इसमें सामान्य रूप से निम्न प्रकार के उत्पाद शामिल हो सकते थे:
| उत्पाद श्रेणी | प्रमुख उदाहरण |
|---|---|
| अनाज | गेहूं, धान, मक्का, ज्वार और बाजरा |
| दालें | चना, अरहर, मूंग, उड़द और मसूर |
| तिलहन | सरसों, सोयाबीन, मूंगफली और तिल |
| बागवानी उत्पाद | फल, सब्जियां, फूल और मसाले |
| पशुपालन उत्पाद | दूध से जुड़े कुछ उत्पाद और पशुधन उत्पाद |
| मत्स्य उत्पाद | मछली एवं संबंधित उत्पाद |
| अन्य उपज | कपास, जूट, गन्ना और निर्धारित कृषि उत्पाद |
किस उत्पाद पर कौन-सा विशेष राज्य या केंद्रीय नियम लागू होगा, यह उसकी प्रकृति, राज्य की व्यवस्था और संबंधित कानून पर निर्भर कर सकता था।
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम के प्रमुख प्रावधान
1. मंडी से बाहर कृषि व्यापार की अनुमति
किसान और व्यापारी अधिसूचित APMC मंडी परिसर के बाहर कृषि उपज की खरीद-बिक्री कर सकते थे। इसके लिए कानून ने एक वैकल्पिक व्यापार क्षेत्र की व्यवस्था बनाई थी।
2. राज्य के भीतर और राज्यों के बीच व्यापार
कानून राज्य के भीतर होने वाले व्यापार के साथ एक राज्य से दूसरे राज्य में होने वाले कृषि व्यापार को भी सुविधाजनक बनाने का प्रयास करता था।
3. इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म
कंपनियां, सहकारी संस्थाएं, किसान उत्पादक संगठन और अन्य पात्र संस्थाएं इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म स्थापित कर सकती थीं।
इन प्लेटफॉर्म पर कृषि उपज की ऑनलाइन खरीद, बिक्री, भुगतान और अन्य व्यापारिक प्रक्रियाएं की जा सकती थीं।
4. मंडी शुल्क से छूट
राज्य सरकारों और APMC संस्थाओं को मंडी के बाहर कानून के तहत होने वाले व्यापार पर मंडी शुल्क, उपकर या लेवी लगाने की अनुमति नहीं थी।
यही प्रावधान कानून से जुड़े प्रमुख विवादों में से एक बना। आलोचकों का कहना था कि मंडी के भीतर शुल्क और मंडी के बाहर शुल्क-मुक्त व्यापार की दोहरी व्यवस्था से व्यापारी धीरे-धीरे मंडियों से बाहर जा सकते हैं।
5. समय पर भुगतान
व्यापारी को कृषि उत्पाद की डिलीवरी स्वीकार करने के दिन ही किसान को भुगतान करना था। कुछ परिस्थितियों में भुगतान की रसीद देकर निर्धारित अवधि में पूरा भुगतान करने की व्यवस्था थी।
इस प्रावधान का उद्देश्य किसानों को लंबी भुगतान देरी से बचाना था। हालांकि किसी भी व्यापार व्यवस्था की वास्तविक विश्वसनीयता उसके प्रभावी प्रवर्तन और खरीदार की वित्तीय क्षमता पर निर्भर करती है।
6. विवाद समाधान व्यवस्था
किसान और व्यापारी के बीच विवाद होने पर पहले समझौता बोर्ड के माध्यम से समाधान का प्रयास किया जाना था। समाधान न निकलने पर संबंधित पक्ष उप-मंडल मजिस्ट्रेट यानी SDM के समक्ष आवेदन कर सकता था। इसके बाद अपील की व्यवस्था भी निर्धारित प्रशासनिक अधिकारी के पास थी।
अधिनियम के अंतर्गत व्यापारी कौन हो सकता था?
कानून के अनुसार कृषि उपज खरीदने वाले व्यापारी के लिए कुछ पहचान संबंधी शर्तें रखी गई थीं। व्यापारी के पास आयकर अधिनियम के अंतर्गत स्थायी खाता संख्या यानी PAN या केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित कोई अन्य दस्तावेज होना आवश्यक हो सकता था।
किसान उत्पादक संगठन और कृषि सहकारी समितियां भी इस व्यापारिक व्यवस्था में भाग ले सकती थीं।
हालांकि किसान संगठनों का कहना था कि केवल PAN आधारित प्रवेश व्यवस्था बड़े वित्तीय लेन-देन और किसानों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती। उन्होंने व्यापारी पंजीकरण, सुरक्षा जमा, भुगतान गारंटी और सत्यापन जैसी अधिक मजबूत व्यवस्थाओं की मांग की थी।
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम और APMC मंडी में अंतर
| आधार | APMC मंडी व्यवस्था | 2020 के अधिनियम का व्यापार क्षेत्र |
|---|---|---|
| व्यापार का स्थान | अधिसूचित मंडी परिसर | मंडी परिसर के बाहर |
| नियंत्रण | संबंधित राज्य का APMC कानून | केंद्रीय अधिनियम |
| व्यापारी | सामान्यतः मंडी लाइसेंसधारी | निर्धारित पहचान वाला व्यापारी |
| मंडी शुल्क | राज्य कानून के अनुसार लागू | व्यापार क्षेत्र में शुल्क निषिद्ध था |
| विवाद समाधान | मंडी बोर्ड या राज्य व्यवस्था | समझौता बोर्ड और प्रशासनिक अधिकारी |
| बिक्री का माध्यम | प्रत्यक्ष नीलामी या मंडी व्यापार | प्रत्यक्ष और इलेक्ट्रॉनिक व्यापार |
| कीमत निर्धारण | नीलामी, बातचीत या सरकारी खरीद | किसान और खरीदार की आपसी सहमति |
| वर्तमान स्थिति | राज्यों के अनुसार लागू | नवंबर 2021 में निरस्त |
यह समझना जरूरी है कि भारत में सभी राज्यों की APMC व्यवस्था एक जैसी नहीं है। मंडी शुल्क, लाइसेंस, बाजार संरचना और खरीद प्रक्रिया राज्य के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
किसानों को बताए गए संभावित लाभ
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम के समर्थकों ने इसके कई संभावित लाभ बताए थे।
अधिक खरीदारों तक पहुंच
किसान स्थानीय मंडी के अतिरिक्त निजी व्यापारी, प्रसंस्करण इकाई, निर्यातक, खुदरा कंपनी या अन्य राज्य के खरीदार तक पहुंच सकता था।
बड़ी संख्या में खरीदार उपलब्ध होने पर प्रतिस्पर्धा बढ़ने और किसान को बेहतर भाव मिलने की संभावना व्यक्त की गई थी।
परिवहन खर्च में संभावित कमी
यदि खरीदार खेत या गांव से उपज खरीदता, तो किसान को मंडी तक परिवहन की पूरी लागत नहीं उठानी पड़ती। इससे विशेष रूप से सब्जी, फल और जल्दी खराब होने वाली उपज के किसानों को लाभ हो सकता था।
बिचौलियों पर निर्भरता कम होने की संभावना
प्रत्यक्ष खरीद से किसान और अंतिम खरीदार के बीच मौजूद कुछ व्यापारिक स्तर कम हो सकते थे। हालांकि व्यावहारिक रूप से संग्रह, ग्रेडिंग, परिवहन और वित्त की आवश्यकता के कारण मध्यस्थों की भूमिका पूरी तरह समाप्त होना जरूरी नहीं था।
बेहतर बाजार जानकारी
डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से विभिन्न स्थानों के भाव, खरीदार और मांग की जानकारी उपलब्ध होने की संभावना थी। लेकिन इसके लिए भरोसेमंद डेटा और किसानों की डिजिटल पहुंच जरूरी थी।
FPO को अवसर
छोटे किसान व्यक्तिगत रूप से कम मात्रा में उत्पादन करते हैं। किसान उत्पादक संगठन अनेक किसानों की उपज एकत्र कर बड़ी मात्रा में बिक्री कर सकते हैं।
इसके माध्यम से FPO ग्रेडिंग, पैकेजिंग, भंडारण और खरीदारों से सामूहिक सौदेबाजी कर सकता था।
किसानों की प्रमुख आशंकाएं
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम का सबसे अधिक विरोध पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अन्य कृषि क्षेत्रों में देखा गया। विरोध का कारण केवल एक प्रावधान नहीं, बल्कि कृषि बाजार के भविष्य को लेकर कई आशंकाएं थीं।
MSP की कानूनी गारंटी नहीं
किसान संगठनों की सबसे बड़ी चिंता न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP को लेकर थी।
अधिनियम में निजी व्यापारी के लिए MSP से कम कीमत पर खरीद को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करने वाला सामान्य प्रावधान नहीं था। सरकार ने MSP और सरकारी खरीद जारी रहने की बात कही, लेकिन किसानों ने MSP को कानूनी अधिकार बनाने की मांग की।
कानून और MSP व्यवस्था अलग विषय थे। अधिनियम ने MSP को समाप्त करने का स्पष्ट प्रावधान नहीं किया था, लेकिन इसमें MSP की कानूनी गारंटी भी शामिल नहीं थी।
APMC मंडियों के कमजोर होने का डर
मंडी के भीतर व्यापार पर शुल्क लागू हो सकता था, जबकि अधिनियम के तहत मंडी के बाहर होने वाला व्यापार मंडी शुल्क से मुक्त था।
किसान संगठनों को आशंका थी कि व्यापारी शुल्क बचाने के लिए मंडियों से बाहर खरीद करना पसंद करेंगे। इससे मंडी की आय, बुनियादी ढांचा और सार्वजनिक मूल्य खोज व्यवस्था प्रभावित हो सकती थी।
छोटे किसानों की कमजोर सौदेबाजी क्षमता
भारत में बड़ी संख्या में किसान छोटे और सीमांत वर्ग से आते हैं। उनके पास उपज को लंबे समय तक रोकने, दूर बाजार भेजने या कीमत कम होने पर बिक्री टालने की पर्याप्त क्षमता नहीं होती।
ऐसी स्थिति में केवल बाजार विकल्प उपलब्ध होना बेहतर कीमत की गारंटी नहीं देता। गुणवत्ता जांच, भंडारण, परिवहन और बाजार सूचना भी जरूरी हैं।
व्यापारी सत्यापन पर चिंता
आलोचकों ने कहा कि खरीदारों के मजबूत पंजीकरण और वित्तीय सुरक्षा व्यवस्था के अभाव में किसानों को भुगतान धोखाधड़ी का जोखिम हो सकता है।
किसानों ने मांग की कि खरीद करने वाले प्रत्येक व्यापारी का सत्यापन, लाइसेंस, बैंक गारंटी और स्थानीय जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए।
न्यायिक उपाय सीमित होने की आशंका
कानून में विवाद समाधान का मुख्य अधिकार प्रशासनिक अधिकारियों को दिया गया था। किसान संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों के एक वर्ग ने इसे लेकर चिंता जताई।
उनका कहना था कि किसानों को सामान्य सिविल न्यायालय तक सरल और प्रभावी पहुंच मिलनी चाहिए। दूसरी ओर, समर्थकों का तर्क था कि प्रशासनिक प्रक्रिया अदालत की तुलना में तेज हो सकती है।
क्या किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम ने MSP समाप्त कर दिया था?
नहीं, अधिनियम में MSP व्यवस्था को समाप्त करने वाला स्पष्ट प्रावधान नहीं था। इसी प्रकार इसमें निजी खरीद के लिए MSP को अनिवार्य न्यूनतम मूल्य बनाने का प्रावधान भी नहीं था।
MSP केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न फसलों के लिए घोषित प्रशासनिक मूल्य है। सरकारी एजेंसियां निर्धारित गुणवत्ता और खरीद व्यवस्था के अनुसार कुछ फसलों की खरीद करती हैं।
किसानों की चिंता यह थी कि यदि सरकारी मंडियां और खरीद केंद्र कमजोर हो गए, तो MSP की घोषणा का व्यावहारिक लाभ सीमित हो सकता है। इसलिए आंदोलन के दौरान MSP की कानूनी गारंटी की मांग प्रमुख बनी रही।
यह अंतर समझना जरूरी है:
- कानून ने MSP समाप्त करने की बात नहीं कही थी।
- कानून ने प्रत्येक निजी खरीद को MSP से जोड़ने की बाध्यता भी नहीं लगाई थी।
- किसानों की आशंका भविष्य में मंडी और सरकारी खरीद व्यवस्था के कमजोर होने को लेकर थी।
अधिनियम से जुड़े संभावित अवसर और व्यावहारिक चुनौतियां
| संभावित अवसर | प्रमुख चुनौती |
|---|---|
| किसान को अतिरिक्त बाजार | छोटे किसान की सीमित उपज |
| सीधे खरीदार को बिक्री | खरीदार की विश्वसनीयता |
| फार्म गेट पर खरीद | सही वजन और गुणवत्ता जांच |
| अंतरराज्यीय व्यापार | परिवहन और लॉजिस्टिक लागत |
| ऑनलाइन बिक्री | डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट |
| प्रतिस्पर्धी मूल्य | स्थानीय स्तर पर सीमित खरीदार |
| FPO आधारित सामूहिक बिक्री | संगठन और कार्यशील पूंजी की कमी |
| तेजी से भुगतान | भुगतान विवाद और प्रवर्तन |
| भंडारण के बाद बेहतर बिक्री | गोदाम और ऋण सुविधा की कमी |
किसी भी कृषि बाजार सुधार की सफलता केवल नया कानून बनाने से तय नहीं होती। इसके लिए स्थानीय मंडी संरचना, ग्रामीण सड़क, वैज्ञानिक भंडारण, गुणवत्ता परीक्षण, डिजिटल भुगतान, बाजार सूचना और किसान संगठनों को मजबूत करना आवश्यक है।
किसान आंदोलन और कानून का विरोध
सितंबर 2020 में कृषि कानून पारित होने के बाद कई किसान संगठनों ने विरोध शुरू किया। नवंबर 2020 के बाद बड़ी संख्या में किसान दिल्ली की सीमाओं पर एकत्र हुए।
आंदोलन में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने, MSP की कानूनी गारंटी, किसानों के विरुद्ध दर्ज मामलों की वापसी और अन्य कृषि मुद्दों से जुड़ी मांगें उठाई गईं।
केंद्र सरकार और किसान संगठनों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन लंबे समय तक सहमति नहीं बन सकी।
जनवरी 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक लगाई थी। नवंबर 2021 में केंद्र सरकार ने कानून वापस लेने की घोषणा की। इसके बाद संसद ने कृषि विधि निरसन विधेयक पारित किया।
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम कब निरस्त हुआ?
कृषि विधि निरसन विधेयक 29 नवंबर 2021 को संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ। इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर 30 नवंबर 2021 को कृषि विधि निरसन अधिनियम, 2021 अधिनियमित हुआ।
इस अधिनियम की धारा 2 ने किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम सहित तीन कृषि कानूनों को निरस्त कर दिया।
कानून से जुड़ी महत्वपूर्ण समयरेखा
| तारीख | घटनाक्रम |
|---|---|
| 5 जून 2020 | कृषि व्यापार से संबंधित अध्यादेश जारी |
| 14 सितंबर 2020 | लोकसभा में संबंधित विधेयक प्रस्तुत |
| 17 सितंबर 2020 | लोकसभा से विधेयक पारित |
| 20 सितंबर 2020 | राज्यसभा से विधेयक पारित |
| सितंबर 2020 | राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद अधिनियम बना |
| जनवरी 2021 | सर्वोच्च न्यायालय ने क्रियान्वयन पर रोक लगाई |
| 19 नवंबर 2021 | कानून वापस लेने की घोषणा |
| 29 नवंबर 2021 | निरसन विधेयक संसद से पारित |
| 30 नवंबर 2021 | कृषि विधि निरसन अधिनियम बना |
कानून निरस्त होने के बाद कृषि व्यापार की व्यवस्था
कानून निरस्त होने के बाद कृषि विपणन से संबंधित व्यवस्थाएं मुख्य रूप से पहले से मौजूद राज्य कानूनों और योजनाओं के आधार पर संचालित होती हैं।
राज्य APMC कानून
अधिकांश राज्यों में कृषि मंडियों का संचालन राज्य के कृषि उपज विपणन कानूनों के अनुसार होता है। प्रत्येक राज्य में मंडी शुल्क, लाइसेंस, उपज की सूची और व्यापारिक नियम अलग हो सकते हैं।
सरकारी खरीद
गेहूं, धान और कुछ अन्य फसलों की सरकारी खरीद संबंधित सरकारी एजेंसियों, राज्य एजेंसियों और निर्धारित खरीद केंद्रों के माध्यम से की जाती है।
सरकारी खरीद की मात्रा और प्रक्रिया राज्य, फसल, गुणवत्ता तथा केंद्र की नीति पर निर्भर करती है।
ई-नाम
राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी e-NAM एक ऑनलाइन मंच है जो भागीदार मंडियों को डिजिटल रूप से जोड़ने का प्रयास करता है। इसके माध्यम से बोली, मूल्य सूचना और व्यापार प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
प्रत्यक्ष खरीद और निजी बाजार
कुछ राज्यों ने अपने APMC कानूनों में संशोधन कर प्रत्यक्ष खरीद, निजी बाजार, किसान बाजार और इलेक्ट्रॉनिक व्यापार को अनुमति दी है। इसलिए मंडी के बाहर खरीद की वर्तमान स्थिति राज्य के अनुसार जांचना जरूरी है।
किसान उत्पादक संगठन
FPO छोटे किसानों की उपज को एकत्र कर बड़ी मात्रा में बिक्री, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रसंस्करण और विपणन में सहायता कर सकते हैं।
किसानों को उपज बेचते समय क्या सावधानियां रखनी चाहिए?
कानून निरस्त हो चुका है, लेकिन निजी व्यापारी या मंडी के बाहर खरीदार को उपज बेचते समय किसानों को सामान्य व्यापारिक सावधानियां अवश्य रखनी चाहिए।
खरीदार की पहचान जांचें
खरीदार का नाम, पता, मोबाइल नंबर, फर्म का पंजीकरण, GST विवरण और PAN जैसी जानकारी सत्यापित करें। केवल मौखिक आश्वासन के आधार पर बड़ी मात्रा में उपज न दें।
लिखित खरीद पर्ची लें
खरीद पर्ची में निम्न विवरण शामिल होना चाहिए:
- किसान का नाम
- खरीदार का नाम और पता
- फसल का नाम
- कुल मात्रा और वजन
- प्रति क्विंटल या प्रति किलोग्राम मूल्य
- गुणवत्ता श्रेणी
- कटौती का विवरण
- कुल भुगतान
- भुगतान की तारीख
- खरीदार के हस्ताक्षर
वजन अपने सामने कराएं
मान्य और सत्यापित कांटे से वजन कराएं। खाली वाहन और भरे वाहन की वजन पर्ची की प्रति अपने पास रखें।
गुणवत्ता जांच स्पष्ट रखें
नमी, टूटे दाने, अशुद्धि और ग्रेड के नाम पर की जाने वाली कटौती पहले से स्पष्ट कर लें। संभव हो तो नमूना और जांच रिपोर्ट सुरक्षित रखें।
डिजिटल भुगतान को प्राथमिकता दें
बड़ी राशि का भुगतान बैंक खाते में लेना बेहतर है। इससे लेन-देन का प्रमाण उपलब्ध रहता है।
भुगतान से पहले दस्तावेज पढ़ें
खाली कागज, बिना पढ़ा हुआ अनुबंध या अस्पष्ट शर्तों वाला दस्तावेज हस्ताक्षर न करें।
विवाद होने पर संबंधित मंडी समिति, कृषि विपणन विभाग, सहकारिता विभाग, उपभोक्ता या कानूनी सहायता संस्था से संपर्क किया जा सकता है। उपाय राज्य और लेन-देन की प्रकृति के अनुसार अलग हो सकते हैं।
कृषि बाजार सुधार में FPO की भूमिका
भारत के छोटे किसानों के लिए व्यक्तिगत रूप से बड़े खरीदार से सौदा करना कठिन हो सकता है। इसलिए किसान उत्पादक संगठन कृषि विपणन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
FPO निम्न कार्य कर सकता है:
- कई किसानों की उपज एक स्थान पर एकत्र करना
- गुणवत्ता के आधार पर ग्रेडिंग करना
- बड़े खरीदार से सामूहिक मूल्य वार्ता करना
- परिवहन लागत साझा करना
- गोदाम और शीतगृह सुविधा उपलब्ध कराना
- प्रसंस्करण और पैकेजिंग करना
- डिजिटल बाजार से किसानों को जोड़ना
- भुगतान और दस्तावेजी प्रक्रिया में सहायता करना
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम के दौरान भी FPO को वैकल्पिक बाजार व्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग माना गया था। कानून निरस्त होने के बाद भी FPO की व्यावहारिक उपयोगिता बनी हुई है।
कृषि व्यापार व्यवस्था में सुधार के लिए क्या जरूरी है?
किसानों को बेहतर बाजार और उचित मूल्य देने के लिए केवल मंडी या निजी बाजार में से किसी एक विकल्प पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। एक मजबूत कृषि बाजार व्यवस्था में दोनों प्रकार के माध्यमों के साथ सुरक्षा और पारदर्शिता आवश्यक है।
पारदर्शी मूल्य खोज
किसान को स्थानीय मंडी, पड़ोसी बाजार, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और प्रमुख उपभोक्ता बाजारों के दैनिक भाव की विश्वसनीय जानकारी मिलनी चाहिए।
वैज्ञानिक गुणवत्ता जांच
उपज की कीमत गुणवत्ता के आधार पर तय होती है। गांव या ब्लॉक स्तर पर नमी, ग्रेड और गुणवत्ता जांच की सस्ती सुविधा उपलब्ध होने से विवाद कम किए जा सकते हैं।
भंडारण और गोदाम रसीद
फसल कटाई के समय बाजार में अधिक आपूर्ति होने से कीमत गिर सकती है। किसान को वैज्ञानिक गोदाम और गोदाम रसीद आधारित ऋण मिले, तो वह तत्काल बिक्री के दबाव से बच सकता है।
समय पर भुगतान
निजी या सरकारी किसी भी खरीद व्यवस्था में निर्धारित समय पर पूरा भुगतान सुनिश्चित होना चाहिए। देरी होने पर स्पष्ट शिकायत और मुआवजा व्यवस्था होनी चाहिए।
विश्वसनीय व्यापारी पंजीकरण
किसानों से कृषि उपज खरीदने वाले व्यापारियों का सत्यापन और रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। बड़े लेन-देन के लिए वित्तीय सुरक्षा व्यवस्था किसानों का जोखिम कम कर सकती है।
मंडियों का आधुनिकीकरण
APMC मंडियों में डिजिटल नीलामी, साफ-सफाई, ग्रेडिंग, गोदाम, शीतगृह, किसान विश्राम गृह और पारदर्शी कटौती व्यवस्था विकसित करना जरूरी है।
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम से जुड़े भ्रम
भ्रम 1: कानून अभी भी लागू है
यह सही नहीं है। इसे कृषि विधि निरसन अधिनियम, 2021 के माध्यम से निरस्त किया जा चुका है।
भ्रम 2: कानून ने APMC मंडियों को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया था
अधिनियम ने APMC मंडियों को समाप्त करने का स्पष्ट प्रावधान नहीं किया था। इसने मंडियों के बाहर एक वैकल्पिक व्यापार क्षेत्र बनाया था।
हालांकि आलोचकों को आशंका थी कि मंडी के बाहर शुल्क-मुक्त व्यापार बढ़ने से मंडियां आर्थिक रूप से कमजोर हो सकती हैं।
भ्रम 3: कानून में MSP समाप्त कर दी गई थी
कानून में MSP समाप्त करने का प्रावधान नहीं था। साथ ही निजी व्यापार में MSP को कानूनी न्यूनतम कीमत बनाने का प्रावधान भी नहीं था।
भ्रम 4: किसान को केवल निजी कंपनी को ही उपज बेचनी थी
कानून ने किसान को किसी एक खरीदार को बेचने के लिए बाध्य नहीं किया था। किसान के लिए मंडी, निजी व्यापारी और अन्य पात्र खरीदारों के विकल्प उपलब्ध रहने की परिकल्पना थी।
भ्रम 5: मंडी के बाहर होने वाली हर खरीद सुरक्षित थी
किसी कानून के अंतर्गत व्यापार की अनुमति होने का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक खरीदार विश्वसनीय होगा। भुगतान, वजन, गुणवत्ता और दस्तावेजों की सावधानी हमेशा आवश्यक होती है।
निष्कर्ष
किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम वर्ष 2020 में कृषि विपणन के लिए एक वैकल्पिक केंद्रीय ढांचा बनाने के उद्देश्य से लाया गया था। इसके माध्यम से किसानों को APMC मंडियों के बाहर, फार्म गेट, गोदाम, शीतगृह और इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर उपज बेचने की सुविधा देने का प्रयास किया गया।
इसके समर्थकों ने इसे बाजार विकल्प, प्रतिस्पर्धा, अंतरराज्यीय व्यापार और प्रत्यक्ष खरीद बढ़ाने वाला सुधार बताया। वहीं किसान संगठनों ने MSP की कानूनी गारंटी न होने, APMC मंडियों के कमजोर होने, छोटे किसानों की सीमित सौदेबाजी क्षमता, व्यापारी सत्यापन और विवाद समाधान व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की।
व्यापक किसान आंदोलन और लंबी बातचीत के बाद किसान उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य अधिनियम को कृषि विधि निरसन अधिनियम, 2021 द्वारा निरस्त कर दिया गया। इसलिए वर्तमान समय में इसे लागू कानून के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
इसके बावजूद इस कानून से जुड़ी बहस ने भारतीय कृषि बाजार की महत्वपूर्ण चुनौतियों को सामने रखा। किसानों को बेहतर मूल्य देने के लिए पारदर्शी मंडियां, वैकल्पिक बाजार, मजबूत FPO, सुरक्षित भुगतान, वैज्ञानिक भंडारण, गुणवत्ता जांच और विश्वसनीय बाजार सूचना एक साथ उपलब्ध कराना आवश्यक है।

