खरीफ सीजन 2026 में संतुलित पोषण प्रबंधन, फसलों की बेहतर वृद्धि, अधिक उत्पादन और मिट्टी के दीर्घकालिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए कृषि विशेषज्ञों ने संतुलित पोषण प्रबंधन (Balanced Nutrient Management) अपनाने पर विशेष जोर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल यूरिया के अत्यधिक उपयोग से फसलों को पर्याप्त पोषण नहीं मिलता, बल्कि इससे मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन भी बिगड़ सकता है। इसलिए किसानों को DAP, पोटाश (MOP), सल्फर और सूक्ष्म पोषक तत्वों का वैज्ञानिक तरीके से संतुलित उपयोग करना चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार, खरीफ सीजन में धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, दालें और अन्य प्रमुख फसलों की अच्छी पैदावार के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्वों की संतुलित उपलब्धता जरूरी है। यदि खेत में केवल नाइट्रोजन की मात्रा अधिक होगी और फॉस्फोरस, पोटाश या सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होगी, तो फसल का विकास प्रभावित हो सकता है।
संतुलित पोषण प्रबंधन क्यों है जरूरी?
संतुलित पोषण प्रबंधन का अर्थ है कि फसल और मिट्टी की आवश्यकता के अनुसार सभी आवश्यक पोषक तत्व सही मात्रा और सही समय पर उपलब्ध कराए जाएं। इसमें प्रमुख (NPK), द्वितीयक (सल्फर, कैल्शियम, मैग्नीशियम) और सूक्ष्म पोषक तत्व (जिंक, बोरॉन, आयरन आदि) शामिल हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार केवल यूरिया का उपयोग करने से मिट्टी में फॉस्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बढ़ सकती है। इससे मिट्टी की उर्वरता घटती है और फसल की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
केवल यूरिया पर निर्भरता क्यों नुकसानदायक?
भारत में यूरिया सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला उर्वरक है क्योंकि यह किसानों को सब्सिडी के कारण कम कीमत पर उपलब्ध होता है। हालांकि केवल यूरिया के अधिक उपयोग से कई समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं—
- मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन।
- फसलों में कमजोर जड़ विकास।
- पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी।
- पोषक तत्व उपयोग दक्षता (Nutrient Use Efficiency) में गिरावट।
- लंबे समय में मिट्टी की उत्पादकता कम होना।
इसीलिए कृषि वैज्ञानिक केवल नाइट्रोजन नहीं, बल्कि संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने की सलाह देते हैं।
DAP और पोटाश की महत्वपूर्ण भूमिका
DAP फॉस्फोरस का प्रमुख स्रोत है, जो पौधों की जड़ों के विकास, ऊर्जा स्थानांतरण और शुरुआती वृद्धि में मदद करता है। वहीं पोटाश पौधों की जल प्रबंधन क्षमता, रोग प्रतिरोधक शक्ति और दानों की गुणवत्ता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
यदि फसल को पर्याप्त मात्रा में DAP और पोटाश नहीं मिलता, तो उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है।
सल्फर और सूक्ष्म पोषक तत्व भी हैं आवश्यक
कई राज्यों में सल्फर और जिंक जैसी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी तेजी से बढ़ रही है। सल्फर तिलहन और दलहन फसलों में प्रोटीन निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि जिंक धान, गेहूं और मक्का जैसी फसलों की वृद्धि में अहम भूमिका निभाता है।
विशेषज्ञ किसानों को सलाह देते हैं कि मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही इन पोषक तत्वों का उपयोग करें।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड का करें उपयोग
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने का सबसे प्रभावी तरीका मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) की सिफारिशों का पालन करना है। इससे किसानों को यह जानकारी मिलती है कि उनके खेत में कौन-से पोषक तत्वों की कमी है और कितनी मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए।
जैव उर्वरकों का बढ़ रहा महत्व
रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैव उर्वरकों (Biofertilizers) और जैविक स्रोतों का उपयोग भी संतुलित पोषण प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। इससे मिट्टी की जैविक सक्रियता बढ़ती है और पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार होता है।
किसानों को क्या होगा लाभ?
यदि किसान संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाते हैं, तो उन्हें कई फायदे मिल सकते हैं—
- फसल की बेहतर वृद्धि।
- अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता।
- उर्वरकों का कुशल उपयोग।
- मिट्टी की उर्वरता में सुधार।
- उत्पादन लागत में कमी।
- लंबे समय तक टिकाऊ खेती।
निष्कर्ष
खरीफ 2026 में कृषि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि केवल यूरिया के सहारे बेहतर उत्पादन संभव नहीं है। संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाकर DAP, पोटाश, सल्फर और सूक्ष्म पोषक तत्वों का वैज्ञानिक उपयोग करने से ही मिट्टी का स्वास्थ्य, फसल की गुणवत्ता और किसानों की आय को दीर्घकालिक रूप से बेहतर बनाया जा सकता है। मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन और संतुलित पोषण प्रबंधन ही भविष्य की टिकाऊ कृषि की मजबूत नींव है।
