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Home कृषि समाचार

मणिपुर में मिथुन पालन को मिलेगा नया बल, आईसीएआर ने वैज्ञानिक तकनीकों और संसाधनों से किसानों को किया सशक्त

Mithun is the cultural and economic identity of the Northeast

Emran Khan by Emran Khan
July 18, 2026
in कृषि समाचार
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जैव विविधता संरक्षण में भी निभा रहा है महत्वपूर्ण योगदान

जैव विविधता संरक्षण में भी निभा रहा है महत्वपूर्ण योगदान

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पूर्वोत्तर भारत की पारंपरिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पशुधन प्रजाति मिथुन (Gayal) के संरक्षण, वैज्ञानिक प्रजनन और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से आईसीएआर–राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केंद्र (ICAR-NRC on Mithun), मेदजिफेमा, नागालैंड ने मणिपुर में एक विशेष जागरूकता एवं सामग्री वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया। यह कार्यक्रम आईसीएआर के 98वें स्थापना दिवस समारोह के अंतर्गत आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य मिथुन पालन को वैज्ञानिक आधार प्रदान करना, नस्ल संरक्षण को बढ़ावा देना तथा पूर्वोत्तर राज्यों में पशुपालकों की आजीविका को सुदृढ़ बनाना था।

कार्यक्रम का आयोजन आईसीएआर-उत्तर पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र अनुसंधान परिसर (ICAR Research Complex for NEH Region), मणिपुर केंद्र, लम्फेलपट स्थित मिथुन प्रजनन एवं संरक्षण केंद्र में किया गया। इस अवसर पर वैज्ञानिकों, पशुपालन विशेषज्ञों, किसानों और स्थानीय समुदाय के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर मिथुन पालन को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने पर विस्तार से चर्चा की।

पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान है मिथुन

मिथुन पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और मेघालय की प्रमुख पशुधन प्रजातियों में से एक है। यह केवल पशुपालन का माध्यम नहीं, बल्कि स्थानीय जनजातीय समाज की संस्कृति, परंपरा और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। विवाह, धार्मिक अनुष्ठानों और सामुदायिक आयोजनों में मिथुन का विशेष महत्व माना जाता है।

इसके साथ ही मिथुन पालन ग्रामीण परिवारों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसका मांस उच्च गुणवत्ता वाला माना जाता है और बाजार में अच्छी कीमत प्राप्त करता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक संस्थान अब इस प्रजाति के संरक्षण और उन्नत प्रजनन तकनीकों पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।

50 किसानों ने लिया प्रशिक्षण, महिलाओं की भी सक्रिय भागीदारी

कार्यक्रम में मणिपुर के कब्हिकुलाई, माची और लौफोंग गांवों से आए 50 लाभार्थियों, जिनमें 11 महिला पशुपालक भी शामिल थीं, ने भाग लिया। किसानों को मिथुन पालन से संबंधित आधुनिक वैज्ञानिक जानकारी देने के लिए विशेषज्ञों द्वारा कई तकनीकी सत्र आयोजित किए गए।

इस कार्यक्रम का आयोजन नॉर्थ ईस्टर्न रीजन कम्युनिटी रिसोर्स मैनेजमेंट प्रोजेक्ट (NERCOMP) के तहत किया गया, जिसे पूर्वोत्तर परिषद (North Eastern Council-NEC) का सहयोग प्राप्त है। इस परियोजना का उद्देश्य पूर्वोत्तर क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और ग्रामीण आजीविका को मजबूत बनाना है।

वैज्ञानिक मिथुन प्रजनन और प्रबंधन की दी गई जानकारी

तकनीकी सत्रों में वैज्ञानिकों ने किसानों को वैज्ञानिक मिथुन प्रजनन, प्रजनन प्रबंधन (Reproductive Management), बेहतर पशुपालन तकनीकों, पोषण प्रबंधन, रोग नियंत्रण तथा संरक्षण तकनीकों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

विशेषज्ञों ने बताया कि वैज्ञानिक तरीके अपनाकर मिथुन की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है, मृत्यु दर कम की जा सकती है और बेहतर नस्ल विकसित की जा सकती है। उन्होंने संतुलित पोषण, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, समय पर टीकाकरण और वैज्ञानिक प्रजनन प्रबंधन को सफल मिथुन पालन की आधारशिला बताया।

किसानों को यह भी समझाया गया कि जलवायु परिवर्तन और बदलते पर्यावरणीय हालात को देखते हुए मिथुन के संरक्षण और बेहतर प्रबंधन के लिए आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाना समय की आवश्यकता है।

पशुपालकों को वितरित की गई जरूरी सामग्री

कार्यक्रम के दौरान मिथुन पालकों को वैज्ञानिक पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक सामग्री भी वितरित की गई। इनमें पशु चिकित्सा दवाइयां, कृमिनाशक (डी-वॉर्मर), मिनरल मिश्रण, पशु आहार अनुपूरक (फीड सप्लीमेंट) तथा अन्य आवश्यक पशुधन सामग्री शामिल थीं।

वैज्ञानिकों ने बताया कि इन सामग्रियों के नियमित उपयोग से पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर रहेगा, रोगों की संभावना कम होगी और उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी। साथ ही किसानों का पशुपालन पर होने वाला खर्च भी कम होगा।

मिथुन प्रजनन एवं संरक्षण केंद्र को मिला नया सहयोग

कार्यक्रम के दौरान मिथुन प्रजनन एवं संरक्षण केंद्र को मजबूत बनाने के लिए भी आवश्यक सहायता प्रदान की गई। केंद्र की मरम्मत और बुनियादी सुविधाओं के सुदृढ़ीकरण हेतु कुर्सियां, मेज, पेंट, रंगाई-पुताई की सामग्री तथा अन्य मरम्मत संबंधी उपकरण उपलब्ध कराए गए।

इस पहल का उद्देश्य केंद्र को बेहतर अनुसंधान, प्रशिक्षण और संरक्षण गतिविधियों के लिए अधिक सक्षम बनाना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मजबूत आधारभूत संरचना के माध्यम से मिथुन संरक्षण कार्यक्रमों को और प्रभावी बनाया जा सकेगा।

वैज्ञानिकों और किसानों के बीच हुआ खुला संवाद

कार्यक्रम के अंत में किसानों और वैज्ञानिकों के बीच एक इंटरएक्टिव सत्र आयोजित किया गया। इस दौरान किसानों ने मिथुन पालन में आने वाली विभिन्न समस्याओं जैसे रोग प्रबंधन, प्रजनन, पोषण, बाजार, चारे की उपलब्धता और संरक्षण से जुड़े सवाल पूछे।

वैज्ञानिकों ने किसानों की समस्याओं का समाधान स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार वैज्ञानिक सलाह देकर किया। उन्होंने किसानों को बताया कि आधुनिक तकनीकों को अपनाने से मिथुन पालन अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है और इससे ग्रामीण परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।

पूर्वोत्तर में आजीविका सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

आईसीएआर–राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने बताया कि संस्थान का उद्देश्य केवल अनुसंधान करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तकनीकों को सीधे पशुपालकों तक पहुंचाकर उनकी आय और आजीविका को मजबूत बनाना है। इसके लिए समय-समय पर प्रशिक्षण, जागरूकता कार्यक्रम, स्वास्थ्य शिविर और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

उन्होंने कहा कि मिथुन पालन पूर्वोत्तर भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। यदि इसे वैज्ञानिक ढंग से विकसित किया जाए तो यह रोजगार, पोषण सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि का मजबूत माध्यम बन सकता है।

जैव विविधता संरक्षण में भी निभा रहा है महत्वपूर्ण योगदान

विशेषज्ञों के अनुसार मिथुन केवल आर्थिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पर्वतीय और वन क्षेत्रों में प्राकृतिक चराई पर आधारित इसका पालन पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देता है।

इसी कारण आईसीएआर द्वारा मिथुन संरक्षण, नस्ल सुधार और वैज्ञानिक प्रबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकता दी जा रही है। इससे दुर्लभ पशुधन संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा और भविष्य की पीढ़ियों के लिए इस अनमोल आनुवंशिक संपदा को सुरक्षित रखा जा सकेगा।

विकसित पूर्वोत्तर और आत्मनिर्भर पशुपालन की दिशा में मजबूत कदम

कार्यक्रम के समापन पर सभी प्रतिभागियों ने मिथुन संरक्षण, वैज्ञानिक पशुपालन और सतत आजीविका को बढ़ावा देने का संकल्प लिया। वैज्ञानिकों ने कहा कि अनुसंधान संस्थानों, राज्य सरकारों और स्थानीय समुदायों के संयुक्त प्रयासों से ही मिथुन पालन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है।

आईसीएआर–राष्ट्रीय मिथुन अनुसंधान केंद्र की यह पहल न केवल पूर्वोत्तर भारत में मिथुन पालन को आधुनिक वैज्ञानिक आधार प्रदान करेगी, बल्कि पशुपालकों की आय बढ़ाने, जैव विविधता के संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यह कार्यक्रम इस बात का प्रमाण है कि वैज्ञानिक अनुसंधान और किसानों की भागीदारी के माध्यम से पारंपरिक पशुपालन को आधुनिक, लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सकता है, जिससे ‘विकसित भारत @2047′ के लक्ष्य की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।

 

 

 

Tags: AgricultureFarmingICARPUSA
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