भारत में कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ अब उर्वरकों (Fertilizers) के संतुलित एवं वैज्ञानिक उपयोग पर भी विशेष जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) के 98वें स्थापना दिवस पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विकसित भारत-2047 के लिए जो रोडमैप प्रस्तुत किया, उसमें उर्वरक प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य, जलवायु-अनुकूल खेती तथा किसानों तक आधुनिक कृषि तकनीकों की पहुंच को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खेती को टिकाऊ बनाना है, तो केवल अधिक उर्वरक उपयोग से नहीं बल्कि सही उर्वरक, सही मात्रा, सही समय और सही विधि (4R Nutrient Stewardship) को अपनाना होगा। ICAR का नया विजन इसी सोच को मजबूत करता है।
उर्वरक दक्षता होगी विकसित कृषि की आधारशिला
केंद्रीय कृषि मंत्री ने स्पष्ट किया कि विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब खेती अधिक उत्पादक होने के साथ-साथ संसाधनों का कुशल उपयोग भी सुनिश्चित करेगी। इसके लिए ICAR को ऐसी तकनीकों के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा जो किसानों को कम लागत में अधिक उत्पादन दिला सकें।
उर्वरक क्षेत्र में इसका सीधा अर्थ है कि भविष्य में अनुसंधान केवल नई फसल किस्मों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नैनो उर्वरक, नियंत्रित रिलीज (Controlled Release) उर्वरक, जल में घुलनशील उर्वरक, बायोफर्टिलाइजर, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और क्लाइमेट-स्मार्ट पोषण प्रबंधन जैसी तकनीकों पर भी अधिक निवेश किया जाएगा।
100 क्लाइमेट स्मार्ट विलेज में होगा संतुलित पोषण प्रबंधन
ICAR को 100 क्लाइमेट स्मार्ट विलेज विकसित करने का लक्ष्य दिया गया है। इन गांवों में केवल जल संरक्षण या जलवायु-अनुकूल खेती ही नहीं, बल्कि मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन भी प्रमुख घटक होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। ऐसे में पारंपरिक तरीके से उर्वरक डालने पर पोषक तत्वों की हानि बढ़ जाती है। यदि किसानों को मौसम आधारित उर्वरक सलाह, ड्रिप फर्टिगेशन, सटीक पोषण प्रबंधन और डिजिटल निर्णय सहायता प्रणाली उपलब्ध कराई जाए, तो उर्वरकों की उपयोग दक्षता कई गुना बढ़ सकती है।
10 करोड़ किसानों तक पहुंचेगी ICAR की उर्वरक तकनीक
शिवराज सिंह चौहान ने ICAR को अपनी तकनीकों के माध्यम से 100 मिलियन (10 करोड़) किसानों तक पहुंचने का लक्ष्य दिया है। इसमें उर्वरक प्रबंधन से जुड़ी आधुनिक तकनीकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी।
आज भी देश के कई किसान अनुमान के आधार पर यूरिया, डीएपी और अन्य उर्वरकों का उपयोग करते हैं, जिसके कारण उत्पादन लागत बढ़ती है और मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है।
यदि ICAR की नई डिजिटल तकनीकें किसानों तक पहुंचती हैं, तो वे आसानी से जान सकेंगे—
- किस फसल में कौन-सा उर्वरक आवश्यक है।
- कितनी मात्रा में उर्वरक डालना चाहिए।
- किस समय उर्वरक का प्रयोग सबसे अधिक प्रभावी होगा।
- किन सूक्ष्म पोषक तत्वों (Micronutrients) की कमी है।
- कौन-सा जैव उर्वरक उपयोगी रहेगा।
इससे उर्वरकों का वैज्ञानिक उपयोग बढ़ेगा और किसानों की लागत कम होगी।
‘वन इंस्टीट्यूट-वन ग्रैंड इनोवेशन‘ से उर्वरक अनुसंधान को मिलेगा बढ़ावा
ICAR के प्रत्येक संस्थान को अगले दो वर्षों में एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि विकसित करने का लक्ष्य दिया गया है।
उर्वरक क्षेत्र में यह पहल कई महत्वपूर्ण नवाचारों का मार्ग खोल सकती है, जैसे—
- अधिक पोषक दक्षता वाले उर्वरक।
- नैनो आधारित पोषण तकनीक।
- कार्बन फुटप्रिंट कम करने वाले उर्वरक।
- जैव उर्वरकों की नई पीढ़ी।
- मिट्टी में पोषक तत्वों की वास्तविक समय निगरानी करने वाली डिजिटल तकनीक।
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित फर्टिलाइजर एडवाइजरी सिस्टम।
यदि इन क्षेत्रों में सफल अनुसंधान होता है, तो भारत उर्वरक नवाचार में वैश्विक स्तर पर नई पहचान बना सकता है।
नकली उर्वरकों और कृषि इनपुट पर होगी सख्ती
हालांकि मंत्री ने विशेष रूप से नकली बीज और कीटनाशकों का उल्लेख किया, लेकिन कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यही सख्ती नकली एवं घटिया गुणवत्ता वाले उर्वरकों पर भी लागू होना आवश्यक है।
देश के कई हिस्सों में किसानों को समय-समय पर निम्न गुणवत्ता वाले उर्वरकों की शिकायतें मिलती रही हैं। इससे फसल उत्पादन प्रभावित होता है और किसानों का आर्थिक नुकसान होता है।
ICAR के वैज्ञानिकों को ऐसे फील्ड-लेवल डायग्नोस्टिक टूल विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई है जिनकी सहायता से किसान स्वयं उर्वरकों एवं अन्य कृषि इनपुट की गुणवत्ता की प्रारंभिक जांच कर सकें।
यदि ऐसी तकनीक सफल होती है, तो नकली उत्पादों पर नियंत्रण मजबूत होगा और किसानों का विश्वास बढ़ेगा।
मृदा स्वास्थ्य को मिलेगा नया महत्व
केंद्रीय कृषि मंत्री ने स्पष्ट किया कि अब केवल अधिक उत्पादन पर्याप्त नहीं है, बल्कि गुणवत्ता आधारित कृषि की आवश्यकता है।
इसका सबसे महत्वपूर्ण आधार स्वस्थ मिट्टी है।
लंबे समय तक असंतुलित उर्वरक उपयोग से—
- मिट्टी में जैविक कार्बन घटता है।
- सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बढ़ती है।
- उर्वरक उपयोग दक्षता कम होती है।
- उत्पादन लागत बढ़ जाती है।
- जल प्रदूषण का खतरा बढ़ता है।
इसी कारण ICAR भविष्य में मृदा स्वास्थ्य कार्ड, जैविक कार्बन सुधार, माइक्रोन्यूट्रिएंट मैनेजमेंट तथा इंटीग्रेटेड न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट (INM) पर अधिक अनुसंधान करेगा।
जलवायु परिवर्तन के दौर में उर्वरक प्रबंधन होगा महत्वपूर्ण
एल-नीनो, अनियमित वर्षा और बढ़ते तापमान जैसी चुनौतियों के बीच उर्वरक प्रबंधन की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
अधिक वर्षा होने पर नाइट्रोजन लीचिंग बढ़ जाती है, जबकि सूखे की स्थिति में पौधे उर्वरकों का पूरा उपयोग नहीं कर पाते।
इसलिए भविष्य की खेती में—
- मौसम आधारित उर्वरक सिफारिश,
- ड्रोन आधारित पोषण प्रबंधन,
- सेंसर आधारित खेत निगरानी,
- सटीक कृषि (Precision Agriculture),
- डिजिटल फार्म एडवाइजरी
जैसी तकनीकों का उपयोग तेजी से बढ़ने की संभावना है।
अनुसंधान के व्यावसायीकरण से बढ़ेगी कृषि नवाचार की गति
केंद्रीय कृषि मंत्री ने ICAR को अपनी तकनीकों, उन्नत किस्मों, वैक्सीन और नवाचारों का व्यावसायीकरण बढ़ाने का भी लक्ष्य दिया।
उर्वरक क्षेत्र में इसका अर्थ है कि ICAR द्वारा विकसित नई पोषण तकनीकें, जैव उर्वरक, माइक्रोबियल उत्पाद, डिजिटल पोषण समाधान तथा नई उर्वरक तकनीकें उद्योग के सहयोग से किसानों तक तेजी से पहुंच सकेंगी।
सरकार ने वर्ष 2029 तक ICAR के लिए 10,000 करोड़ रुपये का आंतरिक राजस्व उत्पन्न करने का लक्ष्य रखा है। यदि उर्वरक नवाचारों का सफल व्यावसायीकरण होता है, तो यह लक्ष्य प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
स्थापना दिवस पर जारी हुई नई तकनीकें
ICAR ने स्थापना दिवस के अवसर पर 43 नई फसल किस्में, 17 नई तकनीकें एवं उत्पाद तथा 14 महत्वपूर्ण प्रकाशन जारी किए।
इनमें कई ऐसी तकनीकें शामिल हैं जो भविष्य में उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाने, पोषण प्रबंधन सुधारने, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने तथा टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
निष्कर्ष
ICAR के 98वें स्थापना दिवस पर प्रस्तुत रोडमैप यह स्पष्ट संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में भारत की कृषि नीति केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, जलवायु-अनुकूल पोषण प्रबंधन और वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को विकास का प्रमुख आधार बनाया जाएगा।
यदि ICAR अपने निर्धारित लक्ष्यों—100 क्लाइमेट स्मार्ट विलेज, 10 करोड़ किसानों तक तकनीक पहुंचाने, उर्वरक दक्षता बढ़ाने वाले नवाचार विकसित करने तथा कृषि अनुसंधान के व्यावसायीकरण—को सफलतापूर्वक पूरा करता है, तो इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी बल्कि भारत की कृषि अधिक टिकाऊ, प्रतिस्पर्धी और आत्मनिर्भर भी बनेगी। विकसित भारत-2047 की दिशा में यह पहल उर्वरक क्षेत्र के लिए भी एक नई शुरुआत साबित हो सकती है।

