भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत कार्यरत भाकृअनुप–विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-VPKAS), हवालबाग, अल्मोड़ा में शनिवार को एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित हुआ। भाकृअनुप, नई दिल्ली की गवर्निंग बॉडी के सम्मानित सदस्य एवं उत्तराखंड जड़ी-बूटी सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष (राज्य मंत्री स्तर) श्री भुवन विक्रम डबराल ने संस्थान का भ्रमण कर पर्वतीय कृषि अनुसंधान, नई कृषि तकनीकों और किसानों के लिए विकसित आधुनिक समाधानों का विस्तृत अवलोकन किया।
इस दौरान उन्होंने संस्थान के वैज्ञानिकों के साथ विभिन्न अनुसंधान परियोजनाओं पर चर्चा की तथा किसानों के हित में किए जा रहे अनुसंधान एवं कृषि प्रसार कार्यों की जानकारी प्राप्त की। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों की कृषि को आत्मनिर्भर और लाभकारी बनाने में वैज्ञानिक अनुसंधान की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पर्वतीय कृषि अनुसंधान की उपलब्धियों से हुए रूबरू
भ्रमण के दौरान श्री डबराल ने दलहन, तिलहन एवं मक्का की उन्नत प्रजातियों के साथ-साथ मधुमक्खी पालन (Beekeeping), परागण अनुसंधान (Pollination Research), प्राकृतिक खेती (Natural Farming), दीर्घकालीन पोषक तत्व प्रबंधन तथा पर्वतीय क्षेत्रों के लिए विकसित आधुनिक कृषि यंत्रों का निरीक्षण किया।
उन्होंने वैज्ञानिकों से इन तकनीकों के व्यावहारिक उपयोग, किसानों को मिलने वाले लाभ तथा भविष्य की अनुसंधान योजनाओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि ऐसी तकनीकें पहाड़ी किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ टिकाऊ कृषि प्रणाली विकसित करने में भी सहायक होंगी।
निदेशक ने प्रस्तुत की संस्थान की पांच वर्षों की उपलब्धियां
संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कांत ने एक विस्तृत प्रस्तुतीकरण के माध्यम से पिछले पांच वर्षों में संस्थान द्वारा किए गए अनुसंधान कार्यों, विकसित उन्नत फसल किस्मों, कृषि यंत्रीकरण, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन तथा किसानों तक तकनीकों के सफल हस्तांतरण की जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि संस्थान लगातार ऐसी तकनीकों पर कार्य कर रहा है जो पर्वतीय क्षेत्रों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन सुनिश्चित कर सकें। उन्होंने कहा कि अनुसंधान का अंतिम उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना और कृषि को अधिक टिकाऊ बनाना है।
किसानों की आय बढ़ाने में सहायक हैं नई तकनीकें
श्री भुवन विक्रम डबराल ने संस्थान द्वारा विकसित तकनीकों और उन्नत फसल किस्मों की सराहना करते हुए कहा कि ये किसानों को कम समय में अधिक उत्पादन और बेहतर आर्थिक लाभ दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
उन्होंने कहा कि आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से विकसित कृषि तकनीकों को अधिक से अधिक किसानों तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। इससे पर्वतीय क्षेत्रों की कृषि को नई दिशा मिलेगी और युवा भी खेती की ओर आकर्षित होंगे।
महिलाओं के लिए राहत बनीं आधुनिक कृषि मशीनें
भ्रमण के दौरान श्री डबराल ने विशेष रूप से उन कृषि यंत्रों का अवलोकन किया जो पर्वतीय क्षेत्रों की महिलाओं के कठिन कृषि कार्यों को आसान बना रहे हैं।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में खेती का अधिकांश कार्य महिलाएं करती हैं। ऐसे में हल्के, उपयोगी और श्रम बचाने वाले कृषि उपकरण उनके समय, श्रम और शारीरिक मेहनत को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने संस्थान के इस प्रयास को महिला सशक्तिकरण और कृषि विकास की दिशा में सराहनीय कदम बताया।
किसान प्रशिक्षण कार्यक्रमों को मिलेगा विस्तार
कार्यक्रम में उपस्थित भारतीय किसान संघ, उत्तराखंड के महामंत्री श्री कुँवर पाल सिंह ने संस्थान द्वारा विकसित तकनीकों को किसानों की आजीविका सुदृढ़ करने वाला बताया।
उन्होंने सुझाव दिया कि अधिक से अधिक किसानों को संस्थान के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जोड़ा जाए ताकि आधुनिक कृषि तकनीकों का लाभ गांव-गांव तक पहुंच सके।
इस पर संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कांत ने सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि संस्थान नियमित रूप से प्रायोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करता है तथा किसान संगठनों के सहयोग से इन कार्यक्रमों का विस्तार करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
40 से अधिक उन्नत दलहन एवं तिलहन किस्मों का विकास
संस्थान की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अनुराधा भारतीय ने बताया कि दलहन एवं तिलहन अनुसंधान परियोजनाओं के अंतर्गत अब तक 40 से अधिक उन्नत किस्में विकसित की जा चुकी हैं।
उन्होंने जानकारी दी कि वैज्ञानिक वर्तमान में अरहर की ऐसी नई प्रजाति विकसित कर रहे हैं जो लगभग 120 दिनों में तैयार हो जाएगी। यह किस्म कम अवधि में बेहतर उत्पादन देने वाली होगी और बदलती जलवायु परिस्थितियों में किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
Biofortified Maize की छह नई प्रजातियां विकसित
संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक एवं मक्का प्रजनक डॉ. राजेश खुल्बे ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में संस्थान ने छह से अधिक जैव संवर्धित (Biofortified) मक्का की प्रजातियां विकसित की हैं।
उन्होंने बताया कि इन नई किस्मों में सामान्य मक्का की तुलना में दोगुनी गुणवत्ता वाला प्रोटीन उपलब्ध है। साथ ही इनकी उत्पादकता 55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक दर्ज की गई है, जिससे किसानों को अधिक उत्पादन और बेहतर पोषण दोनों का लाभ मिलेगा।
उन्होंने कहा कि जैव संवर्धित फसलें भविष्य की पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
प्राकृतिक खेती और मधुमक्खी पालन पर विशेष अनुसंधान
संस्थान प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए भी निरंतर अनुसंधान कर रहा है। वैज्ञानिकों ने बताया कि प्राकृतिक खेती के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, उत्पादन लागत कम करने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने पर कार्य किया जा रहा है।
साथ ही मधुमक्खी पालन और परागण अनुसंधान के माध्यम से फसलों की उत्पादकता बढ़ाने और किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर विकसित किए जा रहे हैं।
सफल आयोजन में वैज्ञानिकों की रही महत्वपूर्ण भूमिका
इस पूरे भ्रमण कार्यक्रम का समन्वय प्रधान वैज्ञानिक एवं विभागाध्यक्ष डॉ. बृज मोहन पांडेय ने किया। कार्यक्रम के दौरान संस्थान के विभिन्न वैज्ञानिकों ने अपने-अपने अनुसंधान कार्यों और उपलब्धियों की जानकारी प्रस्तुत की तथा भविष्य की अनुसंधान योजनाओं पर भी चर्चा की।
ICAR-VPKAS, हवालबाग (अल्मोड़ा) का यह भ्रमण पर्वतीय कृषि अनुसंधान, आधुनिक कृषि तकनीकों और किसानों के हित में किए जा रहे वैज्ञानिक प्रयासों की प्रभावशीलता को दर्शाता है। श्री भुवन विक्रम डबराल ने संस्थान द्वारा विकसित उन्नत फसल किस्मों, जैव संवर्धित मक्का, प्राकृतिक खेती, मधुमक्खी पालन तथा महिलाओं के अनुकूल कृषि यंत्रों की सराहना करते हुए कहा कि ये नवाचार उत्तराखंड सहित देश के पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि विकास की नई संभावनाएं खोल रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन तकनीकों का व्यापक स्तर पर प्रसार किया जाए और अधिक किसानों को प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जोड़ा जाए, तो पर्वतीय कृषि को अधिक उत्पादक, लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सकता है। यह प्रयास किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती प्रदान करेगा।

