भारत में खेती की उत्पादकता बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल लंबे समय से किया जाता रहा है। यूरिया, डीएपी, एनपीके और एमओपी जैसे उर्वरक फसलों को जरूरी पोषक तत्व उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन रासायनिक खादों के असंतुलित और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल को लेकर सरकार अब अधिक संतुलित और टिकाऊ खेती पर जोर दे रही है। इसी दिशा में केंद्र सरकार ने PM-PRANAM योजना शुरू की है।
PM-PRANAM का पूरा नाम “Programme for Restoration, Awareness Generation, Nourishment and Amelioration of Mother Earth” है। इसका उद्देश्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने और वैकल्पिक तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित करना है।
PM-PRANAM योजना क्या है?
PM-PRANAM मुख्य रूप से राज्यों को प्रोत्साहन देने वाली योजना है। इसमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश द्वारा रासायनिक उर्वरकों की खपत कम किए जाने पर उसे वित्तीय प्रोत्साहन देने का प्रावधान है।
यूरिया, डीएपी, एनपीके और एमओपी जैसे रासायनिक उर्वरकों की किसी वित्तीय वर्ष में खपत की तुलना पिछले तीन वर्षों की औसत खपत से की जाती है। अगर खपत में कमी आती है और उससे सरकार की उर्वरक सब्सिडी में बचत होती है, तो उस बचत का 50 प्रतिशत संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश को प्रोत्साहन के रूप में दिया जा सकता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल खाद की खपत कम करना नहीं है, बल्कि किसानों को जरूरत के मुताबिक पोषक तत्व उपलब्ध कराते हुए खेती को अधिक संतुलित बनाना है।
सरकार ने ऐसी योजना की जरूरत क्यों महसूस की?
भारत में यूरिया का इस्तेमाल दूसरे प्रमुख पोषक तत्वों की तुलना में काफी अधिक रहा है। कई क्षेत्रों में किसान नाइट्रोजन की जरूरत पूरी करने के लिए यूरिया पर ज्यादा निर्भर रहते हैं, जबकि फसल को फास्फोरस, पोटाश, सल्फर और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी आवश्यकता होती है।
अगर मिट्टी और फसल की जरूरत को ध्यान में रखे बिना लगातार एक ही तरह की खाद का इस्तेमाल किया जाए, तो पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है। सरकार इसलिए संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा स्वास्थ्य और पोषक तत्वों की दक्षता बढ़ाने पर जोर दे रही है। मार्च 2026 में सरकार ने भी रासायनिक खादों के संतुलित इस्तेमाल और टिकाऊ कृषि को PM-PRANAM के प्रमुख उद्देश्यों से जोड़ा है।
योजना में राज्यों को क्या फायदा मिलता है?
PM-PRANAM की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका प्रोत्साहन मॉडल है। राज्य जितनी प्रभावी तरीके से रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करेंगे, उतनी ही सब्सिडी बचत के आधार पर उन्हें प्रोत्साहन मिलने की संभावना होगी।
सरकारी जानकारी के अनुसार, प्रोत्साहन राशि कुल बची हुई उर्वरक सब्सिडी की 50 प्रतिशत के बराबर होती है। इसमें से 95 प्रतिशत राशि संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश को दी जाती है। शेष 5 प्रतिशत राशि निगरानी, सूचना एवं जागरूकता, शोध, क्षमता निर्माण और पुरस्कार जैसी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल की जाती है।
इस तरह योजना में सरकार के सामने दो लक्ष्य एक साथ हैं—रासायनिक खादों की अनावश्यक खपत कम करना और बची हुई सब्सिडी का एक हिस्सा टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने में लगाना।
किसानों तक इसका फायदा कैसे पहुंचेगा?
PM-PRANAM का पैसा सीधे हर किसान के बैंक खाते में जाने वाली योजना के रूप में नहीं बनाया गया है। इसका मुख्य वित्तीय प्रोत्साहन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को मिलता है।
राज्य इस राशि का इस्तेमाल ऐसी गतिविधियों के लिए कर सकते हैं, जिनसे किसानों को संतुलित पोषण और वैकल्पिक कृषि पद्धतियों को अपनाने में मदद मिले। योजना के तहत जैविक और वैकल्पिक उर्वरकों, प्राकृतिक खेती, संसाधन संरक्षण तकनीकों और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने का प्रावधान है।
इसलिए इसका किसान पर असर अप्रत्यक्ष लेकिन महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर राज्य स्तर पर मृदा परीक्षण, जैव उर्वरक, जैविक खाद, प्राकृतिक खेती और संतुलित पोषण को बढ़ावा मिलता है, तो किसानों को लंबे समय में खेती की बेहतर व्यवस्था मिल सकती है।
रासायनिक खाद का इस्तेमाल कैसे कम किया जाएगा?
PM-PRANAM का उद्देश्य यह नहीं है कि किसान अचानक यूरिया या डीएपी का इस्तेमाल बंद कर दें। इसका जोर जरूरत से ज्यादा और असंतुलित इस्तेमाल को कम करने पर है।
इसके लिए कई उपायों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इनमें जैविक खाद, जैव उर्वरक, वैकल्पिक उर्वरक, प्राकृतिक खेती और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन शामिल हैं। इसके अलावा माइक्रो इरिगेशन और जीरो टिलेज जैसी संसाधन संरक्षण तकनीकों को भी प्रोत्साहित किया जाता है।
इसका मतलब है कि किसान को फसल की वास्तविक पोषक जरूरत के अनुसार खाद का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
यूरिया की खपत घटाना क्यों जरूरी है?
यूरिया में मुख्य रूप से नाइट्रोजन होता है। पौधों की शुरुआती वृद्धि और हरित विकास के लिए नाइट्रोजन जरूरी है, लेकिन केवल नाइट्रोजन पर ज्यादा निर्भरता संतुलित पोषण की समस्या पैदा कर सकती है।
इसलिए किसान को मिट्टी की जांच और फसल की जरूरत के आधार पर खाद का चयन करना चाहिए। जहां फसल को फास्फोरस या पोटाश की आवश्यकता हो, वहां केवल यूरिया की मात्रा बढ़ाना समाधान नहीं है।
PM-PRANAM इसी सोच को बढ़ावा देता है कि खाद की मात्रा बढ़ाने के बजाय पोषक तत्वों का सही संतुलन बनाया जाए।
क्या जैविक खाद रासायनिक खाद की जगह पूरी तरह ले सकती है?
यह बात समझना जरूरी है कि PM-PRANAM का मतलब हर जगह रासायनिक खाद को पूरी तरह समाप्त करना नहीं है। अलग-अलग फसलों, मिट्टी और कृषि परिस्थितियों में पोषक तत्वों की जरूरत अलग होती है।
जैविक खाद और जैव उर्वरक मिट्टी के स्वास्थ्य में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन किसान को किसी भी रासायनिक खाद को अचानक बंद करने के बजाय कृषि विशेषज्ञ या मृदा परीक्षण की सलाह के आधार पर पोषक तत्व प्रबंधन करना चाहिए।
योजना का व्यापक लक्ष्य रासायनिक खाद के अंधाधुंध इस्तेमाल को कम करके संतुलित और टिकाऊ कृषि व्यवस्था तैयार करना है।
PM-PRANAM से सब्सिडी का बोझ भी कम हो सकता है
रासायनिक उर्वरकों पर सरकार बड़े स्तर पर सब्सिडी देती है। अगर राज्यों में खाद की अनावश्यक खपत कम होती है, तो सरकार की उर्वरक सब्सिडी में भी बचत हो सकती है।
PM-PRANAM में इसी बचत का एक हिस्सा राज्यों को प्रोत्साहन के रूप में वापस देने की व्यवस्था है। यानी योजना में बचत को फिर से टिकाऊ कृषि और पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल करने की सोच है।
क्या योजना से रासायनिक खाद की खपत वास्तव में घटी है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में 14 राज्यों में रासायनिक उर्वरकों की खपत उनके पिछले तीन वर्षों के औसत की तुलना में 15.14 लाख टन कम रही। यह आंकड़ा PM-PRANAM के तहत राज्यों में खपत घटाने की दिशा में हुई प्रगति को दिखाता है।
हालांकि मार्च 2026 में केंद्र सरकार ने बताया कि PM-PRANAM के तहत अभी तक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कोई प्रोत्साहन राशि वितरित नहीं की गई थी। यानी खपत में कमी के आंकड़े सामने आए हैं, लेकिन प्रोत्साहन राशि के वितरण की प्रक्रिया अलग चरणों और निर्धारित नियमों के अनुसार होती है।
किसानों के लिए इसका क्या मतलब है?
किसानों के लिए PM-PRANAM का सबसे बड़ा संदेश है—खाद का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार करें। ज्यादा खाद डालने का मतलब हमेशा ज्यादा उत्पादन नहीं होता।
मृदा परीक्षण के आधार पर पोषक तत्वों की जरूरत समझना, संतुलित उर्वरक का इस्तेमाल करना, जैविक खाद और जैव उर्वरकों को उचित तरीके से अपनाना तथा प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना लंबे समय में खेती के लिए फायदेमंद हो सकता है।
सरकार भी इसी दिशा में राज्यों को प्रोत्साहित कर रही है, ताकि रासायनिक खादों की अनावश्यक खपत घटे और मिट्टी की सेहत पर ध्यान बढ़े।
निष्कर्ष
PM-PRANAM योजना भारत की उर्वरक नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती है। इसका उद्देश्य किसानों को खाद से वंचित करना नहीं, बल्कि रासायनिक उर्वरकों के संतुलित और जरूरत आधारित इस्तेमाल को बढ़ावा देना है।
योजना के तहत रासायनिक खादों की खपत कम करने वाले राज्यों को बची हुई उर्वरक सब्सिडी का 50 प्रतिशत तक प्रोत्साहन देने का प्रावधान है। इस राशि का बड़ा हिस्सा राज्य स्तर पर टिकाऊ कृषि से जुड़ी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
आने वाले वर्षों में PM-PRANAM की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्यों में मिलने वाले प्रोत्साहन का इस्तेमाल किसानों तक वैकल्पिक पोषक स्रोत, मृदा परीक्षण, जैविक एवं प्राकृतिक खेती और संतुलित उर्वरक प्रबंधन की सुविधाएं पहुंचाने में कितना प्रभावी ढंग से किया जाता है।
