भारत सरकार कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल और लागत प्रभावी बनाने के लिए प्राकृतिक एवं जैविक खेती को लगातार बढ़ावा दे रही है। इसी दिशा में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि वैश्विक स्तर पर रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। ऐसे समय में प्राकृतिक और जैविक खेती न केवल किसानों की लागत कम करने का प्रभावी माध्यम है, बल्कि यह कृषि को आत्मनिर्भर और पर्यावरण के अनुकूल बनाने का भी महत्वपूर्ण रास्ता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार किसानों को किसी भी प्रकार की उर्वरक कमी का सामना नहीं करने देगी। सरकार की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक किसान को समय पर पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध हो, ताकि फसल उत्पादन प्रभावित न हो। साथ ही, किसानों को धीरे-धीरे प्राकृतिक और जैविक खेती की ओर प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे भविष्य में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो सके।
वैश्विक स्तर पर क्यों बढ़ रही है उर्वरकों की चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर में उर्वरक बाजार कई कारणों से प्रभावित हुआ है। प्राकृतिक गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव, अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, निर्यात प्रतिबंध तथा बढ़ती मांग ने उर्वरकों की उपलब्धता और कीमत दोनों को प्रभावित किया है। विशेष रूप से यूरिया, डीएपी और पोटाश जैसे प्रमुख उर्वरकों के आयात पर निर्भर देशों को समय-समय पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि देशों में शामिल है और यहां करोड़ों किसान खेती के लिए रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करते हैं। ऐसे में यदि वैश्विक बाजार में आपूर्ति प्रभावित होती है तो उसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए सरकार दीर्घकालिक समाधान के रूप में प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है।
प्राकृतिक खेती क्या है
प्राकृतिक खेती ऐसी कृषि पद्धति है जिसमें रासायनिक उर्वरकों और रासायनिक कीटनाशकों का न्यूनतम या बिल्कुल उपयोग नहीं किया जाता। इसमें स्थानीय संसाधनों, गोबर, गोमूत्र, जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत, मल्चिंग और फसल विविधीकरण जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
इस पद्धति का उद्देश्य मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता बनाए रखना, सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाना तथा खेती की लागत को कम करना है। प्राकृतिक खेती में किसानों की बाहरी इनपुट पर निर्भरता कम होती है, जिससे उत्पादन लागत घटती है और खेती अधिक लाभकारी बन सकती है।
जैविक खेती का बढ़ता महत्व
जैविक खेती में प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त जैविक खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद तथा जैव उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। इसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से परहेज किया जाता है।
आज देश और विदेश में जैविक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। उपभोक्ता स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक हो रहे हैं और रसायन मुक्त खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में जैविक खेती किसानों के लिए बेहतर बाजार और अधिक मूल्य प्राप्त करने का अवसर भी बन सकती है।
किसानों को उर्वरकों की उपलब्धता का भरोसा
केंद्रीय कृषि मंत्री ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने का अर्थ यह नहीं है कि किसानों को आवश्यक रासायनिक उर्वरकों से वंचित किया जाएगा। सरकार का प्रयास है कि सभी राज्यों में समय पर यूरिया, डीएपी, एनपीके और अन्य आवश्यक उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार राज्यों के साथ लगातार समन्वय कर रही है ताकि खरीफ और रबी दोनों मौसम में किसानों को उर्वरकों की कमी का सामना न करना पड़े। आवश्यकता के अनुसार अतिरिक्त आपूर्ति, आयात और वितरण की व्यवस्था भी की जा रही है।
उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता लंबे समय में मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। लगातार असंतुलित उर्वरक उपयोग से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा घटती है और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी बढ़ सकती है।
इसीलिए सरकार संतुलित पोषण प्रबंधन पर जोर दे रही है। इसके तहत रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैव उर्वरक, जैविक खाद, हरी खाद और प्राकृतिक कृषि तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
किसानों की लागत होगी कम
प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा लाभ यह माना जाता है कि इसमें किसानों की उत्पादन लागत कम हो सकती है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की खरीद पर होने वाला खर्च घटने से किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
यदि किसान अपने खेत या गांव में उपलब्ध संसाधनों से खाद और जैविक घोल तैयार करते हैं, तो बाहरी इनपुट पर खर्च काफी कम किया जा सकता है। इससे छोटे और सीमांत किसानों को विशेष लाभ मिलने की संभावना रहती है।
मिट्टी और पर्यावरण को मिलेगा लाभ
रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता, जल स्रोतों और जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके विपरीत प्राकृतिक और जैविक खेती मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने, सूक्ष्मजीवों को संरक्षित करने और जल धारण क्षमता में सुधार करने में सहायक मानी जाती है।
इसके अलावा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में भी टिकाऊ कृषि पद्धतियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
सरकार की विभिन्न पहल
केंद्र सरकार प्राकृतिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रमों और योजनाओं के माध्यम से किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और जागरूकता प्रदान कर रही है। किसानों को स्थानीय संसाधनों के उपयोग, जैविक खाद निर्माण, फसल विविधीकरण और टिकाऊ कृषि तकनीकों की जानकारी दी जा रही है।
इसके साथ ही कृषि विज्ञान केंद्रों, राज्य कृषि विभागों और विभिन्न अनुसंधान संस्थानों के माध्यम से प्राकृतिक खेती के मॉडल विकसित किए जा रहे हैं ताकि किसान व्यावहारिक रूप से इन तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित हों।
भविष्य की दिशा
भारत की बढ़ती आबादी, खाद्य सुरक्षा की आवश्यकता और बदलती जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए कृषि क्षेत्र में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना समय की मांग है। एक ओर किसानों को पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य की कृषि केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि गुणवत्ता, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आर्थिक मजबूती पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। प्राकृतिक एवं जैविक खेती इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
निष्कर्ष
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का यह बयान स्पष्ट संकेत देता है कि सरकार दोहरी रणनीति पर काम कर रही है। पहली, किसानों को समय पर पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध कराकर उत्पादन को प्रभावित नहीं होने देना। दूसरी, प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देकर कृषि को अधिक टिकाऊ, कम लागत वाली और पर्यावरण-अनुकूल बनाना।
यदि वैज्ञानिक सलाह, प्रशिक्षण, बाजार समर्थन और आवश्यक सरकारी सहायता के साथ किसान धीरे-धीरे प्राकृतिक एवं जैविक खेती को अपनाते हैं, तो इससे न केवल उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी बल्कि मिट्टी की सेहत सुधरेगी, पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में भी सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

