डीएपी की कीमतों पर वैश्विक संकट का असर, रबी से पहले बढ़ सकती है सब्सिडी
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बने भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक उर्वरक बाजार पर लगातार दिखाई दे रहा है। ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद पश्चिम एशिया में पैदा हुए संकट ने उर्वरकों की आपूर्ति और उत्पादन लागत को प्रभावित किया है। इसका सबसे ज्यादा दबाव फॉस्फेट आधारित उर्वरकों पर देखा जा रहा है। डाई-अमोनियम फॉस्फेट यानी डीएपी की अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं और आने वाले समय में भी इनके जल्दी नीचे आने की संभावना कम दिखाई दे रही है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस समय डीएपी का भाव करीब 910 से 920 डॉलर प्रति टन के बीच चल रहा है। भारत द्वारा हाल के महीनों में किए गए आयात सौदों में भी कीमतों में कोई बड़ी नरमी नहीं आई है। हालिया सौदों में डीएपी का आयात मूल्य करीब 930 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया है। यानी वैश्विक बाजार में कच्चे माल और उत्पादन लागत बढ़ने का असर भारतीय आयात लागत पर भी साफ तौर पर दिखाई दे रहा है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी के बावजूद किसानों को फिलहाल इसका सीधा बोझ नहीं उठाना पड़ रहा है। सरकार ने डीएपी के 50 किलोग्राम के बैग की अधिकतम खुदरा कीमत यानी एमआरपी 1,350 रुपये पर बनाए रखी है। आयात और उत्पादन लागत तथा किसानों से मिलने वाली कीमत के बीच के अंतर को सरकारी सहायता के माध्यम से पूरा किया जा रहा है।
सल्फर की महंगाई बनी बड़ी वजह
उर्वरक उद्योग से जुड़े जानकारों के अनुसार डीएपी की लागत बढ़ने के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण सल्फर की उपलब्धता और कीमत है। वैश्विक बाजार में सल्फर का भाव 1,000 डॉलर प्रति टन से ऊपर बना हुआ है। सल्फर डीएपी सहित कई फॉस्फेट उर्वरकों के उत्पादन में महत्वपूर्ण कच्चा माल है। ऐसे में इसकी कीमत बढ़ने का सीधा असर उर्वरक निर्माण की लागत पर पड़ता है।
मोरक्को की ओसीपी कंपनी दुनिया के प्रमुख डीएपी निर्यातकों में शामिल है। देश के पास फॉस्फेट का विशाल भंडार है, लेकिन महंगे सल्फर और इसकी सीमित उपलब्धता ने उत्पादन को प्रभावित किया है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि केवल रॉक फॉस्फेट की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है। डीएपी उत्पादन के लिए आवश्यक अन्य कच्चे माल की लागत भी उत्पादन की अंतिम कीमत तय करती है।
सल्फर की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम रिफाइनरियों से आता है। कच्चे तेल को परिष्कृत करने की प्रक्रिया में सल्फर सह-उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण इस क्षेत्र की ऊर्जा और रिफाइनिंग व्यवस्था पर दबाव बढ़ा है। ईरान पर हमलों के बाद संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर तथा अन्य खाड़ी देशों में रिफाइनिंग गतिविधियों को नुकसान पहुंचने की खबरों ने सल्फर आपूर्ति को प्रभावित किया है।
इसी तरह रूस की तेल रिफाइनरियों पर यूक्रेन के हमलों का असर भी वहां की उत्पादन क्षमता पर पड़ा है। इन घटनाओं का संयुक्त प्रभाव अंतरराष्ट्रीय बाजार में सल्फर की उपलब्धता और कीमतों पर देखने को मिल रहा है।
एनपीके और एसएसपी पर भी लागत का दबाव
सल्फर की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल डीएपी तक सीमित नहीं है। एनपीके के विभिन्न मिश्रणों और सिंगल सुपर फॉस्फेट यानी एसएसपी की लागत भी इससे प्रभावित हो रही है। इन उर्वरकों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमत बढ़ने से कंपनियों के लिए उत्पादन खर्च बढ़ गया है।
भारत में डीएपी बनाने वाली घरेलू इकाइयों पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक कुछ संयंत्रों में बढ़ी हुई लागत और कच्चे माल की उपलब्धता के कारण उत्पादन सामान्य क्षमता के अनुसार नहीं हो पा रहा है। इससे आयात पर निर्भरता का महत्व और बढ़ जाता है।
डीएपी की खुदरा कीमत पिछले करीब चार वर्षों से 1,350 रुपये प्रति 50 किलोग्राम बैग के आसपास स्थिर रखी गई है। इसके विपरीत अंतरराष्ट्रीय बाजार में आयात लागत काफी बढ़ चुकी है। यही वजह है कि कंपनियों की लागत और किसानों से मिलने वाली राशि के बीच बड़ा अंतर पैदा हो रहा है।
एक टन डीएपी की लागत करीब एक लाख रुपये
उद्योग के आकलन के मुताबिक यदि डीएपी का आयात मूल्य 910 से 920 डॉलर प्रति टन के आसपास रहता है तो बंदरगाह पर पहुंचने के बाद अन्य शुल्क, परिवहन और ढुलाई आदि खर्च जोड़ने पर इसकी कुल लागत करीब एक लाख रुपये प्रति टन तक पहुंच सकती है।
दूसरी ओर 1,350 रुपये प्रति 50 किलो की एमआरपी के आधार पर कंपनियों को बिक्री से लगभग 27,000 रुपये प्रति टन ही प्राप्त होते हैं। शेष लागत को सरकारी सहायता से पूरा करना पड़ता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार डीएपी पर करीब 32,786 रुपये प्रति टन की सब्सिडी दी जा रही है। इसके अलावा सरकार विशेष प्रोत्साहन के माध्यम से भी लागत के दबाव को कम करने का प्रयास कर रही है।
डीएपी को नियंत्रण-मुक्त उर्वरकों की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन किसानों के लिए इसकी कीमत को स्थिर रखने के कारण इस पर व्यवहार में अप्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण जैसा प्रभाव दिखाई देता है। दूसरी ओर अन्य फॉस्फेट और पोटाश आधारित उर्वरकों के कई उत्पादों की कीमतों में कंपनियों ने बढ़ोतरी की है। इनमें से कई उत्पाद डीएपी की तुलना में महंगे हो चुके हैं।
रबी में बढ़ सकती है डीएपी पर सरकारी सहायता
अब सबकी नजर अक्टूबर से शुरू होने वाले रबी सीजन पर है। सरकार को रबी 2026-27 के लिए न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी यानी एनबीएस की दरें घोषित करनी हैं। मौजूदा खरीफ 2026 की एनबीएस दरें 30 सितंबर तक लागू हैं। इसके बाद नई दरें लागू होंगी।
उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीएपी की लागत ऊंची बनी रहने की स्थिति में सरकार को रबी सीजन के लिए डीएपी पर सहायता बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। रबी में डीएपी की मांग विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहती है। गेहूं, सरसों, आलू सहित कई प्रमुख फसलों में किसान इसका इस्तेमाल करते हैं।
समय पर सब्सिडी दर घोषित होने से आयात करने वाली कंपनियों को भी आगे की खरीद की योजना बनाने में सुविधा होगी। इससे कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में समय रहते सौदे कर सकती हैं और रबी सीजन शुरू होने से पहले पर्याप्त मात्रा में उर्वरक देश में लाने की तैयारी कर सकती हैं।
विशेष प्रोत्साहन पर भी फैसला जरूरी
एनबीएस के अलावा सरकार डीएपी की बढ़ी हुई लागत को संभालने के लिए विशेष प्रोत्साहन भी दे रही है। हालांकि मौजूदा व्यवस्था खरीफ 2026 तक सीमित है। इसलिए रबी सीजन में इस अतिरिक्त सहायता को जारी रखा जाएगा या नहीं, इस पर भी सरकार को निर्णय लेना होगा।
यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें मौजूदा स्तर पर बनी रहती हैं और विशेष प्रोत्साहन समाप्त कर दिया जाता है, तो कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में रबी सीजन में डीएपी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सब्सिडी और विशेष सहायता की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
आयात पर निर्भरता बड़ी चुनौती
भारत में उर्वरकों की सालाना खपत 700 लाख टन से अधिक है। इसमें यूरिया की खपत लगभग 400 लाख टन के आसपास है, जबकि डीएपी की वार्षिक खपत करीब 100 लाख टन रहती है। डीएपी की घरेलू आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा आयात से पूरा किया जाता है।
इतना ही नहीं, देश में तैयार होने वाले डीएपी के उत्पादन के लिए भी रॉक फॉस्फेट और अन्य आवश्यक कच्चे माल का एक हिस्सा विदेशों से मंगाना पड़ता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में होने वाला बदलाव सीधे भारतीय उर्वरक उद्योग को प्रभावित करता है।
फिलहाल सरकार की चुनौती किसानों के लिए डीएपी को सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराने के साथ-साथ कंपनियों को आयात और उत्पादन के लिए आर्थिक रूप से सक्षम बनाए रखने की है। रबी सीजन से पहले एनबीएस दरों और विशेष प्रोत्साहन को लेकर सरकार का फैसला इस लिहाज से महत्वपूर्ण होगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीएपी और सल्फर की कीमतें किस दिशा में जाती हैं, यह भी आने वाले महीनों में भारत की उर्वरक लागत और सब्सिडी आवश्यकता को प्रभावित करेगा।
