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Home कृषि समाचार

Kinnow Farming से बढ़ सकती है किसानों की आमदनी, जानिए पौधरोपण का सही समय, लागत, मुनाफा और आवेदन प्रक्रिया

Kinnow farming can boost farmers' income; learn about the right time for planting, costs, profits, and the application process.

Fiza by Fiza
August 5, 2026
in कृषि समाचार
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Kinnow Farming

Kinnow Farming

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Kinnow Farming: देश के कई राज्यों में किसान अब गेहूं, धान और सरसों जैसी पारंपरिक फसलों के साथ बागवानी की ओर भी बढ़ रहे हैं। फलों की खेती में किन्नू किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प बनकर सामने आया है। बाजार में किन्नू की मांग, लंबे समय तक उत्पादन और प्रसंस्करण की संभावनाओं के कारण Kinnow Farming को आय बढ़ाने वाली खेती माना जा रहा है।

किन्नू एक रसदार खट्टा-मीठा फल है, जिसमें विटामिन-C भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसका उपयोग सीधे खाने के अलावा जूस, स्क्वैश, जैम, कैंडी और अन्य पेय पदार्थ बनाने में भी किया जाता है। सर्दियों के मौसम में इसकी मांग विशेष रूप से बढ़ जाती है।

सही जलवायु, उन्नत पौध सामग्री, ड्रिप सिंचाई और वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ किसान किन्नू का बाग लगाकर कई वर्षों तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि इस खेती से होने वाला वास्तविक लाभ उत्पादन, बाजार भाव, फल की गुणवत्ता, परिवहन खर्च और स्थानीय मौसम पर निर्भर करता है।

किन्नू क्या है?

किन्नू संतरा वर्ग का एक संकर फल है। इसे किंग और विलो लीफ मैंडरिन के संकरण से विकसित किया गया था। यह फल आकार में संतरे जैसा दिखाई देता है, लेकिन इसमें रस की मात्रा अधिक होती है। स्वाद, रंग और अधिक रस के कारण बाजार में इसकी अच्छी मांग रहती है।भारत में किन्नू की खेती मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिमी राज्यों में की जाती है। यह फसल उन क्षेत्रों में बेहतर होती है, जहां गर्मियां शुष्क, सर्दियां ठंडी और सिंचाई की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध हो।

किन राज्यों में होती है किन्नू की खेती?

भारत में किन्नू उत्पादन के प्रमुख राज्यों में पंजाब, राजस्थान और हरियाणा शामिल हैं। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश, जम्मू क्षेत्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी इसकी खेती की जाती है।

राजस्थान के श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले किन्नू उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। पंजाब में अबोहर और फाजिल्का क्षेत्र किन्नू के प्रमुख उत्पादक इलाकों में गिने जाते हैं। हरियाणा के उन जिलों में भी किसान किन्नू के बाग लगा रहे हैं, जहां पर्याप्त सिंचाई और उपयुक्त मिट्टी उपलब्ध है।

किसानों को पौधरोपण से पहले अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र, उद्यान विभाग या कृषि विश्वविद्यालय से यह जानकारी जरूर लेनी चाहिए कि उनका क्षेत्र Citrus Farming के लिए उपयुक्त है या नहीं।

किन्नू की खेती के लिए कैसी जलवायु चाहिए?

किन्नू की खेती के लिए उपोष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त मानी जाती है। पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए गर्म मौसम और फलों की गुणवत्ता के लिए ठंडी सर्दियां लाभकारी होती हैं।लगभग 20 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान में पौधे अच्छी वृद्धि कर सकते हैं। अत्यधिक गर्मी, तेज पाला, लंबे समय तक बारिश और खेत में जलभराव किन्नू के पौधों को नुकसान पहुंचा सकता है। जिन क्षेत्रों में पाला पड़ता है, वहां छोटे पौधों को विशेष सुरक्षा देने की जरूरत होती है। गर्मियों में नियमित सिंचाई की व्यवस्था भी आवश्यक है।

किन्नू के लिए उपयुक्त मिट्टी

किन्नू की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी बेहतर मानी जाती है। खेत में पानी रुकने की समस्या नहीं होनी चाहिए, क्योंकि अधिक नमी से जड़ों में सड़न और गमोसिस जैसे रोगों का खतरा बढ़ सकता है।

भूमि का पीएच मान सामान्यतः 6 से 8 के बीच उपयुक्त माना जाता है। हालांकि पौधरोपण से पहले मिट्टी की जांच कराना जरूरी है। मिट्टी परीक्षण से किसानों को यह पता चलता है कि खेत में कौन से पोषक तत्वों की कमी है और कितनी मात्रा में खाद या उर्वरक देना चाहिए।

किन्नू की पौध लगाने का सही समय

  • किन्नू की बुआई बीज से करने के बजाय सामान्यतः नर्सरी में तैयार कलमी या बडिंग वाले पौधों से की जाती है। इसलिए इसे बुआई के बजाय पौधरोपण कहना अधिक उचित है।
  • किन्नू के पौधे लगाने का प्रमुख समय जुलाई से सितंबर के बीच माना जाता है। मानसून के दौरान मिट्टी में नमी बनी रहती है, जिससे पौधों की जड़ें जल्दी स्थापित हो सकती हैं।
  • सिंचाई की पर्याप्त सुविधा होने पर फरवरी से मार्च के दौरान भी पौधरोपण किया जा सकता है। अत्यधिक गर्मी, कड़ाके की ठंड या पाले के समय पौधे लगाने से बचना चाहिए।
  • पौधरोपण की सही तारीख राज्य और स्थानीय मौसम के अनुसार बदल सकती है। इसलिए किसान स्थानीय उद्यान विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही पौधे लगाएं।

प्रमाणित नर्सरी से खरीदें पौधे

किन्नू का बाग कई वर्षों का निवेश होता है। इसलिए पौधों का चयन सावधानी से करना जरूरी है। किसान केवल सरकारी, पंजीकृत या प्रमाणित नर्सरी से ही स्वस्थ पौधे खरीदें।

पौधा खरीदते समय ध्यान रखें कि उसकी जड़ें अच्छी तरह विकसित हों, तना मजबूत हो और उस पर किसी रोग या कीट के लक्षण दिखाई न दें। कमजोर या संक्रमित पौधे लगाने से पूरा बाग प्रभावित हो सकता है। स्थानीय क्षेत्र के लिए अनुशंसित रूटस्टॉक और किस्म का चयन कृषि विशेषज्ञ की सलाह से करना चाहिए।

खेत की तैयारी कैसे करें?

किन्नू का बाग लगाने से पहले खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए। इसके बाद पुरानी फसल के अवशेष, झाड़ियां और खरपतवार हटा देने चाहिए। खेत को समतल कर जल निकासी की उचित व्यवस्था बनानी चाहिए।

पौधे लगाने के लिए सामान्यतः 60 सेंटीमीटर से लेकर एक मीटर तक के गड्ढे तैयार किए जा सकते हैं। गड्ढों का आकार मिट्टी की प्रकृति और स्थानीय सिफारिश के अनुसार तय किया जाता है।

गड्ढों में ऊपरी उपजाऊ मिट्टी के साथ अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाई जा सकती है। आवश्यकता के अनुसार नीम की खली और अन्य पोषक तत्व भी डाले जा सकते हैं। बिना विशेषज्ञ सलाह के अधिक मात्रा में रासायनिक खाद या कीटनाशक गड्ढे में नहीं डालना चाहिए।

पौधों के बीच कितनी दूरी रखें?

किन्नू के पौधों के बीच आमतौर पर लगभग 6 मीटर की दूरी रखी जाती है। कई क्षेत्रों में 6×6 मीटर या 6×7 मीटर की दूरी अपनाई जाती है।दूरी का चयन मिट्टी, सिंचाई व्यवस्था, किस्म, रूटस्टॉक और कृषि मशीनों के उपयोग के अनुसार किया जाना चाहिए। बहुत कम दूरी पर पौधे लगाने से बाद में शाखाएं आपस में टकराने लगती हैं। इससे धूप और हवा का आवागमन कम हो सकता है तथा रोगों का खतरा बढ़ सकता है। छह मीटर की दूरी के आधार पर एक हेक्टेयर में लगभग 275 पौधे लगाए जा सकते हैं। वास्तविक पौध संख्या खेत की बनावट और दूरी पर निर्भर करेगी।

सिंचाई का सही तरीका

नए लगाए गए किन्नू पौधों के लिए नियमित सिंचाई जरूरी है। पौधरोपण के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए, ताकि जड़ों के आसपास की मिट्टी ठीक से बैठ जाए।

गर्मियों में कम अंतराल पर और सर्दियों में अधिक अंतराल पर सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है। बारिश के मौसम में खेत की नमी देखकर ही पानी देना चाहिए।

किन्नू के बाग में ड्रिप सिंचाई उपयोगी मानी जाती है। इससे पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है और पानी की बचत होती है। ड्रिप के माध्यम से घुलनशील उर्वरक भी दिए जा सकते हैं, लेकिन इसकी मात्रा विशेषज्ञ की सलाह और मिट्टी परीक्षण के आधार पर तय होनी चाहिए।

खेत में जलभराव किसी भी स्थिति में नहीं होने देना चाहिए।

खाद और उर्वरक प्रबंधन

किन्नू के पौधों को उनकी उम्र और उत्पादन क्षमता के अनुसार पोषक तत्वों की जरूरत होती है। सामान्यतः गोबर की खाद के साथ नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का उपयोग किया जाता है।

जिंक, आयरन और मैंगनीज जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होने पर पत्तियां पीली पड़ सकती हैं और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इन पोषक तत्वों का उपयोग केवल जांच और अनुशंसा के आधार पर करना चाहिए।

पौधे की उम्र बढ़ने के साथ खाद और उर्वरक की मात्रा भी बदलती है। एक ही मात्रा सभी आयु के पौधों पर लागू नहीं की जा सकती। किसान अपने जिले के उद्यान अधिकारी से वार्षिक खाद तालिका प्राप्त कर सकते हैं।

बाग में खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार पौधों के साथ पानी, पोषक तत्व और धूप के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसलिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना जरूरी है।पौधों के आसपास मल्चिंग करने से मिट्टी में नमी बनी रहती है और खरपतवार कम उगते हैं। सूखी घास, फसल अवशेष या अनुशंसित जैविक सामग्री से मल्चिंग की जा सकती है।पौधों के तने से मल्च को कुछ दूरी पर रखना चाहिए, ताकि अधिक नमी के कारण फफूंद या दीमक की समस्या न हो।

किन्नू में लगने वाले प्रमुख कीट और रोग

किन्नू के बाग में साइट्रस सिल्ला, लीफ माइनर, एफिड, फल मक्खी और अन्य रस चूसने वाले कीट नुकसान पहुंचा सकते हैं। रोगों में साइट्रस कैंकर, गमोसिस, जड़ सड़न और फल धब्बा जैसी समस्याएं देखी जा सकती हैं।

रोग और कीट नियंत्रण के लिए बाग की नियमित निगरानी जरूरी है। संक्रमित शाखाओं को काटकर सुरक्षित तरीके से नष्ट करना चाहिए। बाग में गिरे हुए खराब फलों और पत्तियों को भी हटाते रहना चाहिए।

कीटनाशक या फफूंदनाशक का प्रयोग केवल कृषि विशेषज्ञ की सलाह और उत्पाद के लेबल पर दी गई मात्रा के अनुसार करें। जरूरत से ज्यादा रसायन का इस्तेमाल फल की गुणवत्ता, पर्यावरण और लाभकारी कीटों को नुकसान पहुंचा सकता है।

पौधों की छंटाई क्यों जरूरी है?

किन्नू के पौधों को सही आकार देने के लिए शुरुआती वर्षों में प्रशिक्षण और छंटाई की जाती है। तने के निचले हिस्से से निकलने वाली अनावश्यक शाखाओं, सूखी टहनियों और रोगग्रस्त हिस्सों को हटाना चाहिए। उचित छंटाई से पौधे के अंदर धूप और हवा पहुंचती है। इससे रोगों का खतरा कम हो सकता है और फलों की गुणवत्ता बेहतर होती है। बहुत अधिक छंटाई से उत्पादन प्रभावित हो सकता है, इसलिए यह काम प्रशिक्षित व्यक्ति की देखरेख में करना बेहतर है।

किन्नू में फल कब आना शुरू होता है?

अच्छी गुणवत्ता के कलमी पौधों में सामान्यतः पौधरोपण के तीन से चार वर्ष बाद सीमित मात्रा में फल आने शुरू हो सकते हैं। व्यावसायिक उत्पादन लगभग पांचवें वर्ष से मिलने लगता है।जैसे-जैसे पौधा विकसित होता है, उत्पादन बढ़ सकता है। पौधे की उत्पादक उम्र प्रबंधन, मिट्टी, पानी, जलवायु और रोग नियंत्रण पर निर्भर करती है। किन्नू के फल सामान्यतः सर्दियों के मौसम में पकते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में दिसंबर से फरवरी के बीच तुड़ाई की जा सकती है। फल पूरी तरह विकसित होने, उचित रंग और मिठास आने के बाद ही तोड़ना चाहिए।

कितनी हो सकती है पैदावार?

किन्नू की पैदावार पौधों की उम्र, किस्म, सिंचाई, मिट्टी की उर्वरता, रोग प्रबंधन और मौसम पर निर्भर करती है। अच्छे प्रबंधन वाले विकसित बागों में प्रति हेक्टेयर लगभग 20 से 30 टन या इससे अधिक उत्पादन मिलने की संभावना हो सकती है।  हर खेत में समान उत्पादन की गारंटी नहीं दी जा सकती। प्राकृतिक आपदा, पाला, आंधी, रोग, बाजार की समस्या और पानी की कमी से उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसलिए किसी भी आय या पैदावार के अनुमान से पहले स्थानीय बागों का प्रदर्शन और बाजार की स्थिति जरूर समझनी चाहिए।

किन्नू की खेती में कितनी लागत आती है?

किन्नू का बाग लगाने की शुरुआती लागत सामान्य फसलों की तुलना में अधिक हो सकती है। इसमें पौध खरीद, गड्ढों की खुदाई, खेत की तैयारी, गोबर की खाद, ड्रिप सिंचाई, तारबंदी, मजदूरी और पौध सुरक्षा का खर्च शामिल होता है।

पहले तीन से चार वर्षों तक फल उत्पादन सीमित रहता है, लेकिन बाग की देखभाल पर लगातार खर्च करना पड़ता है। इस दौरान किसान पौधों के बीच खाली जगह में कम अवधि वाली फसलें उगाकर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। अंतरवर्ती फसल का चयन इस तरह होना चाहिए कि वह किन्नू के पौधों से पोषण और पानी के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा न करे।

किसानों को कितना फायदा हो सकता है?

किन्नू की खेती से होने वाला फायदा बाजार भाव और उत्पादन के अनुसार बदलता रहता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी विकसित बाग से 20 से 30 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिलता है और किसान को उचित बाजार मूल्य प्राप्त होता है, तो सकल आय कई लाख रुपये तक पहुंच सकती है।

अच्छे बाजार भाव की स्थिति में सकल आय लगभग 8 से 15 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक होने का अनुमान लगाया जाता है। इसमें से मजदूरी, खाद, सिंचाई, पौध सुरक्षा, तुड़ाई, पैकिंग और परिवहन का खर्च घटाना होगा।

कुछ परिस्थितियों में किसान 4 से 8 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर तक शुद्ध लाभ प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन इसे निश्चित आय नहीं माना जाना चाहिए। मंडी भाव गिरने, फल की गुणवत्ता खराब होने या उत्पादन कम रहने पर लाभ भी कम हो सकता है।बाग लगाने से पहले किसान को स्थानीय लागत और पिछले वर्षों के औसत बाजार भाव के आधार पर अपनी परियोजना रिपोर्ट तैयार करनी चाहिए।

ग्रेडिंग और पैकिंग से मिल सकता है बेहतर भाव

फल की तुड़ाई सावधानी से करनी चाहिए। फलों को जमीन पर फेंकने से उनकी गुणवत्ता खराब हो सकती है। तुड़ाई के बाद फलों की आकार, रंग और गुणवत्ता के आधार पर ग्रेडिंग करनी चाहिए।

अच्छी पैकिंग वाले एक समान आकार के फलों को बाजार में बेहतर कीमत मिल सकती है। किसान उत्पादक संगठन, मंडी व्यापारी, सुपरमार्केट, जूस बनाने वाली इकाई और थोक खरीदारों से पहले ही संपर्क कर सकते हैं।

यदि किसान सामूहिक रूप से ग्रेडिंग, पैकिंग और परिवहन करते हैं, तो उनकी लागत कम हो सकती है और सौदेबाजी की क्षमता बढ़ सकती है।

प्रसंस्करण से बढ़ सकती है कमाई

किन्नू का उपयोग केवल ताजे फल के रूप में ही नहीं होता। इससे जूस, स्क्वैश, जैम, कैंडी, पल्प और स्वादयुक्त पेय तैयार किए जा सकते हैं।बाजार में कम कीमत मिलने की स्थिति में प्रसंस्करण किसानों के लिए एक विकल्प हो सकता है। हालांकि खाद्य प्रसंस्करण इकाई लगाने के लिए लाइसेंस, मशीन, गुणवत्ता नियंत्रण, पैकिंग और बाजार व्यवस्था की जरूरत होती है। किसान स्वयं इकाई लगाने के बजाय किसान उत्पादक संगठन या स्थानीय प्रसंस्करण कंपनी से भी जुड़ सकते हैं।

सरकारी सहायता के लिए किसान कैसे आवेदन करें?

केंद्र और राज्य सरकारें बागवानी विकास, नए बाग लगाने, ड्रिप सिंचाई, पौध सामग्री और अन्य गतिविधियों के लिए समय-समय पर सहायता योजनाएं चलाती हैं। इन योजनाओं की पात्रता, अनुदान राशि और आवेदन प्रक्रिया प्रत्येक राज्य में अलग हो सकती है।किसान Horticulture Subsidy के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए अपने जिले के उद्यान विभाग, कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र या जन सेवा केंद्र से संपर्क कर सकते हैं।आवेदन के लिए आमतौर पर निम्न दस्तावेज मांगे जा सकते हैं:

  1. आधार कार्ड
  2. बैंक खाते की पासबुक
  3. जमीन से संबंधित दस्तावेज
  4. पासपोर्ट आकार का फोटो
  5. मोबाइल नंबर
  6. खेत का विवरण
  7. सिंचाई के साधन की जानकारी
  8. संबंधित योजना का आवेदन पत्र

कई राज्यों में आवेदन ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से भी स्वीकार किए जाते हैं। किसान को पौधे खरीदने या बाग लगाने से पहले योजना की स्वीकृति और नियमों की जानकारी लेनी चाहिए। कई योजनाओं में पहले आवेदन करना जरूरी होता है। बिना स्वीकृति के किए गए खर्च पर अनुदान न मिलने की संभावना रहती है।

आवेदन के बाद क्या होता है?

आवेदन जमा होने के बाद विभाग किसान के दस्तावेजों और खेत का सत्यापन कर सकता है। पात्र पाए जाने पर किसान को योजना के नियमों के अनुसार स्वीकृति दी जाती है। कई मामलों में पौधरोपण, ड्रिप स्थापना या अन्य कार्य का निरीक्षण होने के बाद सहायता राशि किसान के बैंक खाते में भेजी जाती है। प्रक्रिया राज्य और योजना के अनुसार अलग हो सकती है। किसान को आवेदन की रसीद, पौधों के बिल, ड्रिप के बिल और अन्य जरूरी दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए।

किन्नू की खेती शुरू करने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

किन्नू का बाग लगाने का निर्णय केवल संभावित कमाई देखकर नहीं लेना चाहिए। किसान को पानी की उपलब्धता, मिट्टी, बाजार, परिवहन और शुरुआती वर्षों के खर्च का आकलन करना जरूरी है।

बाग लगाने से पहले इन बातों पर ध्यान दें:

  • मिट्टी और पानी की जांच कराएं।
  • प्रमाणित नर्सरी से पौधे खरीदें।
  • स्थानीय जलवायु के अनुसार किस्म और रूटस्टॉक चुनें।
  • खेत में जल निकासी की व्यवस्था रखें।
  • ड्रिप सिंचाई लगाने पर विचार करें।
  • शुरुआती तीन से चार वर्षों के खर्च की योजना बनाएं।
  • स्थानीय मंडी और खरीदारों की जानकारी जुटाएं।
  • रोग और कीट नियंत्रण के लिए नियमित निगरानी करें।
  • अनुदान योजना में आवेदन करने से पहले नियम पढ़ें।
  • कृषि विशेषज्ञ के संपर्क में रहें।

निष्कर्ष

किन्नू की खेती किसानों के लिए लंबी अवधि की आय का एक अच्छा विकल्प बन सकती है। विशेष रूप से पंजाब, राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में इसकी व्यावसायिक खेती की अच्छी संभावनाएं हैं। सही मिट्टी, उपयुक्त जलवायु, पर्याप्त सिंचाई और वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ किसान बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

हालांकि किन्नू का बाग लगाने के बाद तुरंत आय शुरू नहीं होती। किसानों को शुरुआती वर्षों में पौधों की देखभाल और खर्च के लिए आर्थिक योजना बनानी चाहिए। प्रमाणित पौध सामग्री, ड्रिप सिंचाई, संतुलित पोषण, रोग नियंत्रण और बेहतर विपणन किन्नू की खेती की सफलता के प्रमुख आधार हैं।

सरकारी बागवानी योजनाओं और अनुदान का लाभ लेने के लिए किसानों को अपने राज्य के आधिकारिक उद्यान विभाग से नवीनतम जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। स्थानीय परिस्थितियों को समझकर और विशेषज्ञों की सलाह के साथ खेती शुरू करने पर किन्नू किसानों की आय बढ़ाने वाली लाभकारी फसल साबित हो सकती है।

 

Tags: Citrus FarmingHorticulture SubsidyKinnow Farming
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