देश में टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्राकृतिक और जैविक खेती को नई गति मिल रही है। केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर इस दिशा में योजनाबद्ध तरीके से कार्य कर रही हैं, जिससे किसानों को न केवल सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन मिल सके, बल्कि उनकी आय में भी स्थायी वृद्धि हो।
इसी कड़ी में ‘फसल क्रांति’ की टीम ने राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र का दौरा किया और संस्थान के निदेशक डॉ. गगनेश शर्मा से विस्तृत बातचीत की। इस संवाद में उन्होंने संस्थान की संरचना, कार्यप्रणाली, प्रमाणीकरण प्रक्रिया, सरकारी योजनाओं की प्रगति और किसानों के लिए उपलब्ध अवसरों पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रस्तुत है यह विशेष साक्षात्कार, जो प्राकृतिक और जैविक खेती की दिशा में आगे बढ़ने वाले किसानों के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकता है।
राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र की संरचना और कार्यक्षेत्र के बारे में विस्तार से बताइए।
राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र, भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत एक प्रमुख अधीनस्थ कार्यालय के रूप में कार्य करता है। यह संस्थान देशभर में जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए नीति-निर्देशन, तकनीकी मार्गदर्शन और अनुसंधान आधारित सहायता प्रदान करता है।
हमारे अधीन पाँच क्षेत्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र कार्यरत हैं। इनमें गाजियाबाद स्थित क्षेत्रीय केंद्र उत्तर भारत के कई राज्यों, जैसे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, दिल्ली और राजस्थान को कवर करता है।
प्रत्येक केंद्र में आधुनिक प्रयोगशालाएँ स्थापित हैं, जहाँ जैविक उर्वरकों और अन्य कृषि इनपुट की गुणवत्ता की जाँच फर्टिलाइजर कंट्रोल ऑर्डर (FCO) के तहत की जाती है। इसके साथ ही, तकनीकी विशेषज्ञ और कृषि वैज्ञानिक किसानों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ प्राकृतिक एवं जैविक खेती अपनाने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
आपके संस्थान के प्रमुख उद्देश्य और प्राथमिकताएँ क्या हैं?
हमारा मुख्य उद्देश्य देशभर में जैविक और प्राकृतिक खेती का प्रभावी प्रचार-प्रसार करना और इसे किसानों के लिए व्यवहारिक एवं लाभकारी बनाना है। इसके लिए हम किसानों को आधुनिक वैज्ञानिक जानकारी और प्रशिक्षण उपलब्ध कराते हैं, ताकि वे पारंपरिक ज्ञान के साथ वैज्ञानिक तकनीकों का समन्वय कर सकें।
इसके अतिरिक्त, प्रमाणीकरण (Certification) की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाना भी हमारी प्राथमिकताओं में शामिल है। इसका उद्देश्य किसानों को उनके जैविक उत्पादों के लिए उचित मूल्य दिलाने में सहायता करना है।
हम किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), स्वयं सहायता समूहों (SHGs), क्लस्टरों और व्यक्तिगत किसानों को प्रशिक्षण देकर उनके क्षमता निर्माण (Capacity Building) पर विशेष ध्यान देते हैं। हमारा प्रयास है कि किसान केवल खेती की तकनीकों तक सीमित न रहें, बल्कि उत्पादन, प्रमाणीकरण, गुणवत्ता, बाजार और मूल्य संवर्धन से जुड़ी पूरी प्रक्रिया को समझें।
जैविक और प्राकृतिक खेती के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया किस प्रकार संचालित होती है?
प्रमाणीकरण की प्रक्रिया एक व्यवस्थित और बहु-स्तरीय तंत्र के माध्यम से संचालित होती है। इसमें क्षेत्रीय परिषदों (Regional Councils) को मुख्य जिम्मेदारी सौंपी गई है, जो आगे किसान समूहों के माध्यम से इस प्रक्रिया को लागू करती हैं।
हम राज्य स्तर के कृषि अधिकारियों, जैसे डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर, को भी विशेष प्रशिक्षण प्रदान करते हैं, ताकि वे किसानों को प्रमाणीकरण की प्रक्रिया और जैविक एवं प्राकृतिक खेती से संबंधित विषयों पर सही दिशा में मार्गदर्शन दे सकें।
इसके अलावा, प्रमाणीकरण और मॉनिटरिंग की पूरी प्रक्रिया को डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी सुदृढ़ किया गया है। इससे प्रक्रिया में पारदर्शिता, निगरानी और दक्षता सुनिश्चित करने में मदद मिलती है।
वर्तमान में जैविक खेती के विस्तार को लेकर क्या प्रमुख आँकड़े सामने आए हैं?
वर्ष 2016 से संचालित ‘पीजीएस-इंडिया’ (Participatory Guarantee System – India) कार्यक्रम के तहत देश में जैविक खेती का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
मार्च 2026 तक लगभग 78,000 स्थानीय किसान समूह इस कार्यक्रम से जुड़ चुके हैं। करीब 15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र जैविक खेती के अंतर्गत कवर किया जा चुका है और लगभग 23 लाख किसान इस योजना में पंजीकृत हैं।
इनमें से बड़ी संख्या में किसान प्रमाणित हो चुके हैं, जबकि शेष किसान प्रमाणीकरण की प्रक्रिया में हैं। ये आँकड़े दर्शाते हैं कि किसानों के बीच जैविक खेती को लेकर जागरूकता और विश्वास तेजी से बढ़ रहा है।
प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा कौन-कौन से ठोस कदम उठाए जा रहे हैं?
भारत सरकार ने ‘नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग’ (National Mission on Natural Farming) के माध्यम से प्राकृतिक खेती को एक संगठित रूप दिया है। इस मिशन के अंतर्गत किसानों के पंजीकरण और प्रमाणीकरण के लिए एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल विकसित किया गया है, जहाँ किसान समूह के रूप में जुड़ सकते हैं।
वर्तमान में लगभग 18 लाख किसान इस पोर्टल पर पंजीकृत हो चुके हैं और करीब 8 लाख किसानों को प्रमाणपत्र जारी किए जा चुके हैं।
इसके अतिरिक्त, भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) भी प्राकृतिक उत्पादों को मान्यता देने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। इससे प्राकृतिक उत्पादों को बाजार में बेहतर पहचान दिलाने और किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।
जैविक और प्राकृतिक खेती में पैदावार को लेकर किसानों की क्या वास्तविक स्थिति है?
पैदावार को लेकर किसानों के अनुभव अलग-अलग हो सकते हैं। यह पूरी तरह मिट्टी की उर्वरता, जलवायु परिस्थितियों, फसल के प्रकार और अपनाई जाने वाली प्रबंधन पद्धतियों जैसे विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है।
अनुसंधानों और किसानों के अनुभवों से यह सामने आया है कि प्राकृतिक या जैविक खेती की ओर संक्रमण के शुरुआती 2 से 3 वर्षों में उत्पादन में कुछ कमी आ सकती है, क्योंकि इस दौरान मिट्टी नई कृषि प्रणाली के अनुरूप ढल रही होती है।
हालाँकि, इसके बाद उत्पादन में सुधार शुरू हो जाता है और चौथे-पाँचवें वर्ष तक उत्पादन संतुलित होने लगता है। विशेष रूप से बागवानी फसलों में उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव अपेक्षाकृत कम देखा गया है।
इसलिए किसानों को प्राकृतिक या जैविक खेती को केवल एक-दो सीजन के आधार पर नहीं देखना चाहिए। यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जिसमें मिट्टी के स्वास्थ्य, उत्पादन लागत, इनपुट पर निर्भरता और बाजार मूल्य जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। दीर्घकालिक दृष्टि से यह खेती अधिक टिकाऊ और लाभकारी साबित हो सकती है।
किसानों के लिए आपका क्या सुझाव और संदेश है?
मैं किसानों से आग्रह करना चाहूँगा कि वे अपने क्षेत्रीय कृषि संस्थानों, जैसे कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और कृषि विभाग के अधिकारियों से निरंतर संपर्क बनाए रखें। सरकार द्वारा समय-समय पर आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लें और प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए क्लस्टर आधारित मॉडल को प्राथमिकता दें।
किसानों को शुरुआत छोटे स्तर से करनी चाहिए। पहले सीमित क्षेत्र में प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाएँ, उसका अनुभव प्राप्त करें और परिणामों का आकलन करने के बाद धीरे-धीरे अपना क्षेत्र बढ़ाएँ।
इसके साथ ही, क्षमता निर्माण (Capacity Building) और तकनीकी ज्ञान बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकों के साथ-साथ मिट्टी की जाँच, फसल प्रबंधन, जैविक इनपुट की गुणवत्ता, प्रमाणीकरण, बाजार और मूल्य संवर्धन के बारे में भी जानकारी हासिल करनी चाहिए।
इससे वे न केवल अपनी उत्पादन लागत को कम कर पाएंगे, बल्कि अपने उत्पाद के लिए बेहतर बाजार और मूल्य प्राप्त कर अपनी आय में स्थायी वृद्धि की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।
प्राकृतिक और जैविक खेती आज भारतीय कृषि के भविष्य की मजबूत आधारशिला बनती जा रही है। सरकारी समर्थन, वैज्ञानिक अनुसंधान और किसानों की भागीदारी के साथ यह अभियान तेजी से आगे बढ़ रहा है।
हालाँकि, प्राकृतिक या जैविक खेती को अपनाते समय किसानों के लिए वैज्ञानिक सलाह, प्रशिक्षण और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है। यदि किसान सही मार्गदर्शन और प्रशिक्षण के साथ इस दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तो यह न केवल उनकी उत्पादन लागत को कम करने और आय को सुदृढ़ करने में मदद कर सकता है, बल्कि मृदा स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और सुरक्षित खाद्य उत्पादन के लिए भी एक टिकाऊ समाधान साबित हो सकता है।

