Black Gram: भारत में दलहनी फसलों का किसानों की खेती और आम लोगों के भोजन में विशेष महत्व है। इन्हीं प्रमुख दलहनी फसलों में उड़द यानी काली दाल (Black Gram) शामिल है। उड़द की दाल की बाजार में अच्छी मांग रहती है। इसकी खास बात यह है कि कई परिस्थितियों में यह अपेक्षाकृत कम अवधि में तैयार हो जाती है और फसल चक्र में आसानी से शामिल की जा सकती है।
उड़द की खेती खरीफ के अलावा कुछ क्षेत्रों में गर्मी या जायद के मौसम में भी की जाती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी ICAR ने भी कम अवधि वाली ग्रीष्मकालीन मूंग और उड़द को रबी और खरीफ फसलों के बीच उपलब्ध समय में उगाने की संभावनाओं पर किसानों को जानकारी दी है। (Indian Council of Agricultural Research)
अगर किसान सही किस्म, उपयुक्त मिट्टी, समय पर बुवाई और बेहतर फसल प्रबंधन अपनाते हैं तो उड़द खेती का अच्छा विकल्प बन सकती है। आइए आसान भाषा में जानते हैं कि उड़द की खेती कैसे करें, इसकी बुवाई कब होती है, कौन सी मिट्टी अच्छी है और फसल को कीट व रोगों से कैसे बचाया जा सकता है।
उड़द की फसल क्या है?
उड़द भारत की महत्वपूर्ण दलहनी फसलों में से एक है। इसे अलग-अलग क्षेत्रों में उड़द, उरद या काली दाल जैसे नामों से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Vigna mungo है। उड़द का इस्तेमाल मुख्य रूप से दाल के रूप में किया जाता है। इससे दाल के अलावा पापड़, बड़ी, इडली, डोसा और कई दूसरे खाद्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं। इसी कारण इसकी घरेलू मांग बनी रहती है।
दलहनी फसल होने की वजह से उड़द का खेती की व्यवस्था में एक और महत्वपूर्ण स्थान है। दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन के स्थिरीकरण में योगदान करती हैं और उचित फसल चक्र में मिट्टी की सेहत के लिए उपयोगी हो सकती हैं। ICAR भी दलहनी फसलों के मृदा स्वास्थ्य संबंधी महत्व को रेखांकित करता है। (Indian Council of Agricultural Research)
उड़द की खेती के लिए कैसी मिट्टी चाहिए?
उड़द की खेती के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट से बलुई दोमट मिट्टी सामान्य रूप से उपयुक्त मानी जाती है। खेत में लंबे समय तक पानी जमा नहीं होना चाहिए। भारी बारिश वाले क्षेत्रों में जल निकासी पर विशेष ध्यान देना जरूरी है, क्योंकि खेत में लगातार पानी भरा रहने से पौधों की बढ़वार और जड़ों पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। बुवाई से पहले खेत को इस तरह तैयार करें कि मिट्टी भुरभुरी हो और खेत में बड़े ढेले न रहें। मिट्टी की वास्तविक उर्वरता जानने के लिए किसान समय-समय पर मिट्टी की जांच यानी Soil Test करा सकते हैं। जांच रिपोर्ट के आधार पर ही खाद और पोषक तत्वों का इस्तेमाल करना बेहतर रहता है।
किन राज्यों में होती है उड़द की खेती?
उड़द की खेती भारत के कई हिस्सों में की जाती है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और कुछ अन्य राज्यों में किसान अलग-अलग मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसकी खेती करते हैं।
उड़द केवल मैदानी इलाकों तक सीमित नहीं है। ICAR की खरीफ कृषि सलाह में हिमाचल प्रदेश में भी इसे महत्वपूर्ण दलहनी फसल बताया गया है। (Indian Council of Agricultural Research)
कृषि एवं किसान कल्याण विभाग का अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी निदेशालय भी उड़द को उन प्रमुख फसलों में शामिल करता है जिनके उत्पादन के राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय अनुमान तैयार किए जाते हैं। (Desagri) इसलिए किसी राज्य में उड़द की बुवाई का सही समय और किस्म चुनते समय स्थानीय कृषि जलवायु को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है।
उड़द की बुवाई का सही समय क्या है?
उड़द की बुवाई का समय इस बात पर निर्भर करता है कि किसान खरीफ, गर्मी या किसी विशेष स्थानीय फसल चक्र में इसकी खेती कर रहे हैं।
खरीफ की उड़द: मानसून आने और पर्याप्त नमी मिलने के बाद सामान्य रूप से जून से जुलाई के दौरान बुवाई की जाती है। क्षेत्र के अनुसार इसमें बदलाव हो सकता है।
उदाहरण के लिए ICAR की हिमाचल प्रदेश संबंधी खरीफ सलाह में उड़द की बुवाई जून के अंत तक शुरू करने और जुलाई के पहले पखवाड़े में पूरी करने की सलाह दी गई है। (Indian Council of Agricultural Research)
ग्रीष्मकालीन उड़द: सिंचाई की सुविधा वाले कुछ क्षेत्रों में रबी की फसल कटने के बाद गर्मी में भी उड़द लगाई जा सकती है। ICAR ने फरवरी से मई के बीच उपलब्ध अवधि में कम अवधि वाली ग्रीष्मकालीन मूंग और उड़द की खेती की संभावनाओं का उल्लेख किया है। (Indian Council of Agricultural Research)
किसान केवल कैलेंडर देखकर बुवाई न करें। स्थानीय मौसम, मिट्टी में नमी, सिंचाई की सुविधा और कृषि विभाग की क्षेत्रीय सलाह को भी ध्यान में रखें।
उड़द की किस्म कैसे चुनें?
उड़द की अच्छी पैदावार में किस्म की बड़ी भूमिका होती है। किसान हमेशा अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित और प्रमाणित बीज को प्राथमिकता दें। देश के अलग-अलग कृषि जलवायु क्षेत्रों के लिए अलग-अलग किस्में उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए ICAR की हिमाचल प्रदेश संबंधी सलाह में कुछ क्षेत्रों के लिए UG-218, हिम माश-1 और PB-114 जैसी किस्मों का उल्लेख किया गया है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए किस्म का चुनाव अलग हो सकता है। (Indian Council of Agricultural Research) इसका अर्थ यह है कि किसी एक किस्म को पूरे भारत के लिए सबसे अच्छी मानना सही नहीं होगा। बीज खरीदते समय किसान अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि विश्वविद्यालय, राज्य कृषि विभाग या अधिकृत बीज विक्रेता से स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार जानकारी प्राप्त करें।
बुवाई से पहले बीज उपचार क्यों जरूरी है?
बीज उपचार फसल प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे शुरुआती अवस्था में पौधों को कुछ मिट्टी और बीज जनित समस्याओं से बचाने में मदद मिल सकती है।दलहनी फसलों में उपयुक्त राइजोबियम और PSB कल्चर का इस्तेमाल भी किया जाता है। ICAR की उड़द संबंधी खरीफ सलाह में बेहतर पौध संख्या और उत्पादन के लिए बुवाई से पहले राइजोबियम तथा PSB कल्चर से बीज उपचार की सलाह दी गई है। (Indian Council of Agricultural Research)
हालांकि बीज उपचार के लिए किसी रासायनिक उत्पाद का चुनाव करते समय स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह और उत्पाद के आधिकारिक लेबल का पालन करें।
उड़द में खाद और उर्वरक का प्रबंधन
उड़द दलहनी फसल है, इसलिए इसके पोषण प्रबंधन को गेहूं या धान जैसी फसलों की तरह नहीं देखना चाहिए। सबसे अच्छा तरीका है कि किसान पहले मिट्टी की जांच करवाएं और उसके आधार पर खाद तथा उर्वरक की मात्रा तय करें। खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई जैविक खाद उपलब्ध होने पर उसका उपयोग मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में मदद कर सकता है। अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी और कृषि परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए पूरे देश के लिए एक ही उर्वरक मात्रा अपनाना उचित नहीं है।
ICAR की क्षेत्र विशेष की उड़द सलाह में भी पोषण प्रबंधन की सिफारिश दी गई है, जिससे साफ है कि किसानों को अपने क्षेत्र की कृषि सिफारिश के अनुसार पोषण प्रबंधन करना चाहिए। (Indian Council of Agricultural Research)
उड़द में सिंचाई कैसे करें?
खरीफ में उड़द की खेती काफी हद तक बारिश पर निर्भर हो सकती है। यदि समय पर बारिश होती रहे तो सिंचाई की आवश्यकता कम पड़ सकती है। लेकिन बारिश में लंबा अंतर आने और मिट्टी में नमी बहुत कम होने पर सिंचाई की आवश्यकता हो सकती है। गर्मी की फसल में सिंचाई का महत्व और बढ़ जाता है। फूल और फलियां बनने का समय फसल के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान बहुत अधिक नमी की कमी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। साथ ही किसान इस बात का ध्यान रखें कि खेत में पानी जमा न रहे। इसके लिए पहले से उचित जल निकासी की व्यवस्था रखें।
उड़द की फसल में कौन-कौन से कीट और रोग आ सकते हैं?
उड़द की फसल में क्षेत्र और मौसम के अनुसार सफेद मक्खी, माहू, थ्रिप्स तथा फली को नुकसान पहुंचाने वाले कीट दिखाई दे सकते हैं। इसके अलावा पीला मोजेक रोग जैसी समस्या भी किसानों के लिए चिंता का कारण बन सकती है।
पीला मोजेक रोग में पत्तियों पर पीले और हरे रंग का असामान्य पैटर्न दिखाई दे सकता है। सफेद मक्खी इस रोग के प्रसार से जुड़ी महत्वपूर्ण वाहक मानी जाती है।
इसलिए केवल रोग दिखाई देने के बाद कार्रवाई करने के बजाय शुरुआत से खेत की नियमित निगरानी करना ज्यादा उपयोगी है।
कीट लगने पर कौन सी दवा इस्तेमाल करें?
यहां किसानों को विशेष सावधानी रखने की जरूरत है। किसी कीट को देखकर तुरंत कोई भी कीटनाशक खरीदकर छिड़कना सही तरीका नहीं है। सबसे पहले यह पहचान करना जरूरी है कि फसल में वास्तव में कौन सा कीट या रोग है। कई बार पोषक तत्वों की कमी और बीमारी के लक्षण भी किसान कीट का प्रकोप समझ लेते हैं।
कीट दिखाई देने पर किसान प्रभावित पौधों की जांच करवाएं और कृषि विज्ञान केंद्र, राज्य कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ से उस समय उड़द की फसल के लिए पंजीकृत कीटनाशक की जानकारी लें।
दवा का चयन फसल, कीट, कीट की अवस्था, प्रकोप की गंभीरता और संबंधित राज्य की वर्तमान कृषि सिफारिश के आधार पर किया जाना चाहिए। केवल उड़द की फसल के लिए स्वीकृत उत्पाद का ही प्रयोग करें और उसके लेबल पर दिए सुरक्षा निर्देशों का पालन करें।
रासायनिक नियंत्रण से पहले एकीकृत कीट प्रबंधन यानी IPM पर ध्यान देना बेहतर है। खेत की नियमित निगरानी, रोगग्रस्त पौधों का उचित प्रबंधन, खेत की साफ-सफाई और कृषि विशेषज्ञ द्वारा सुझाए गए जैविक या अन्य सुरक्षित नियंत्रण उपाय इसमें शामिल हो सकते हैं।
ICAR भी फसलों में जैव-गहन एकीकृत कीट प्रबंधन तकनीकों के अनुसंधान और प्रसार पर जोर देता है। (Indian Council of Agricultural Research)
महत्वपूर्ण: कीटनाशक की मात्रा, मिश्रण या छिड़काव अपनी ओर से तय न करें। गलत दवा या गलत मात्रा फसल, किसान, उपयोगी कीट और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकती है। स्थानीय कृषि विशेषज्ञ और उत्पाद के स्वीकृत लेबल के निर्देशों का पालन करें।
खरपतवार से भी फसल को बचाना जरूरी
उड़द की शुरुआती अवस्था में खरपतवार फसल के साथ पानी, पोषक तत्व, धूप और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसलिए समय पर खरपतवार प्रबंधन जरूरी है। छोटे खेतों में किसान निराई-गुड़ाई का सहारा ले सकते हैं। किसी खरपतवारनाशी का इस्तेमाल करना हो तो अपने क्षेत्र में उड़द के लिए वर्तमान में स्वीकृत उत्पाद और उसके उपयोग की जानकारी कृषि विशेषज्ञ से लें। ICAR की खरीफ कृषि सलाह में भी उड़द के लिए खरपतवार प्रबंधन को फसल प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। (Indian Council of Agricultural Research)
उड़द की फसल कब तैयार होती है?
उड़द की फसल तैयार होने का समय किस्म, मौसम और खेती के क्षेत्र पर निर्भर करता है। कई कम अवधि वाली किस्में लगभग दो से तीन महीने के आसपास तैयार हो सकती हैं, जबकि दूसरी किस्मों में ज्यादा समय लग सकता है। ICAR ने कुछ परिस्थितियों में 60 से 70 दिन की कम अवधि वाली ग्रीष्मकालीन मूंग और उड़द की खेती की संभावना बताई है। (Indian Council of Agricultural Research) जब फलियां और पौधे परिपक्व होने लगें तो समय पर कटाई करना महत्वपूर्ण है। बहुत ज्यादा देर करने पर कुछ किस्मों में फलियां चटकने से दाने गिरने और नुकसान की आशंका बढ़ सकती है। कटाई के समय मौसम साफ रहने पर किसानों को फायदा होता है।
उड़द की खेती पर किसानों को सब्सिडी मिलती है क्या?
केंद्र और राज्य सरकारें समय-समय पर दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के तहत किसानों को सहायता देती हैं। सहायता का स्वरूप राज्य, जिला, किसान श्रेणी और संबंधित वर्ष की योजना के अनुसार अलग हो सकता है।
कुछ कार्यक्रमों में प्रमाणित बीज, प्रदर्शन, जैव उर्वरक, कृषि यंत्र या दूसरी कृषि सामग्री पर सहायता उपलब्ध हो सकती है। उदाहरण के तौर पर ICAR के एक उड़द आधारित प्रदर्शन कार्यक्रम में ATMA परियोजना की वित्तीय सहायता से किसानों को उड़द बीज, जैव उर्वरक और ट्राइकोडर्मा उपलब्ध कराया गया था। (Indian Council of Agricultural Research)
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि देश के हर किसान को उड़द की खेती पर एक निश्चित राशि की सब्सिडी मिलती है।
किसानों को अपने राज्य के कृषि विभाग, जिला कृषि कार्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र या आधिकारिक कृषि पोर्टल से वर्तमान योजना की जानकारी लेनी चाहिए। योजना में आवेदन करने से पहले पात्रता, आवेदन की अंतिम तारीख और आवश्यक दस्तावेज जरूर जांचें।
उड़द की खेती में किसान इन बातों का रखें ध्यान
उड़द की सफल खेती के लिए सबसे पहले अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्म चुनें। प्रमाणित और अच्छी गुणवत्ता वाला बीज इस्तेमाल करें। बुवाई से पहले खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था रखें और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार बीज उपचार करें।
फसल के दौरान खेत की नियमित निगरानी सबसे जरूरी कामों में से एक है। शुरुआती अवस्था में खरपतवार नियंत्रित करें और पत्तियों पर असामान्य पीले धब्बे, कीट या बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर जल्द पहचान कराएं।
खाद और उर्वरक का उपयोग मिट्टी जांच के आधार पर करना बेहतर है। इसी तरह किसी कीटनाशक या खरपतवारनाशी का इस्तेमाल केवल कृषि विशेषज्ञ की सलाह और स्वीकृत लेबल के अनुसार करें। सरकारी सहायता लेने के लिए किसान हर सीजन में अपने राज्य की नई योजनाओं की जानकारी भी जरूर जांचें।
किसानों के लिए क्यों उपयोगी हो सकती है उड़द की खेती?
उड़द कम अवधि में तैयार होने वाली महत्वपूर्ण दलहनी फसल है और अलग-अलग क्षेत्रों में खरीफ के साथ-साथ उपयुक्त परिस्थितियों में गर्मी के मौसम में भी फसल चक्र का हिस्सा बन सकती है।दलहन होने के कारण इसका कृषि व्यवस्था में विशेष महत्व है। बाजार में उड़द दाल की लगातार मांग भी इसे किसानों के लिए उपयोगी फसल विकल्प बनाती है। हालांकि बेहतर उत्पादन के लिए सिर्फ बीज बोना पर्याप्त नहीं है। सही किस्म, सही समय पर बुवाई, मिट्टी की जांच, संतुलित पोषण, जल निकासी और समय पर कीट-रोग प्रबंधन जरूरी है।
निष्कर्ष
उड़द की खेती भारत के किसानों के लिए महत्वपूर्ण दलहनी खेती है। अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी में इसकी खेती की जा सकती है। खरीफ की खेती के लिए सामान्य रूप से मानसून के आसपास जून-जुलाई का समय महत्वपूर्ण रहता है, लेकिन वास्तविक बुवाई का समय राज्य और स्थानीय जलवायु के अनुसार तय करना चाहिए।
किसानों को प्रमाणित बीज और अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्म का चयन करना चाहिए। फसल में कीट या रोग दिखाई देने पर बिना पहचान के दवा का इस्तेमाल करने के बजाय कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित है।
सरकार और राज्यों द्वारा दलहनी फसलों के लिए अलग-अलग योजनाओं में सहायता उपलब्ध हो सकती है। इसलिए किसान बुवाई से पहले अपने जिले के कृषि विभाग या KVK से वर्तमान योजनाओं और सब्सिडी की जानकारी जरूर प्राप्त करें। सही कृषि तकनीक और समय पर फसल प्रबंधन अपनाकर किसान उड़द को अपने फसल चक्र में एक उपयोगी विकल्प के रूप में शामिल कर सकते हैं।

