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Home कृषि समाचार

GI Tag से चमकेगा बिहार का ब्रांड, 28 उत्पादों के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ी, किसानों-कारीगरों के लिए खुलेंगे नए बाजार

GI Tag: GI tag to boost Bihar's brand; registration process for 28 products advances; new markets to open for farmers and artisans.

Fiza by Fiza
August 12, 2026
in कृषि समाचार
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GI Tag

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GI Tag: बिहार के पारंपरिक उत्पादों, कृषि उपज, हस्तशिल्प और लोक कलाओं को देश-दुनिया में अलग पहचान दिलाने की दिशा में बड़ा काम आगे बढ़ रहा है। राज्य के विशिष्ट उत्पादों को भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग दिलाने की मुहिम तेज की जा रही है। इसी कड़ी में 28 उत्पादों के GI रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ने से बिहार के स्थानीय ब्रांड को नई ताकत मिलने की उम्मीद है। GI पहचान मिलने पर इन उत्पादों को न केवल कानूनी संरक्षण मिलेगा, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी ब्रांड वैल्यू भी बढ़ सकती है।

बिहार पहले ही अपने कई कृषि और पारंपरिक उत्पादों के जरिए GI के नक्शे पर मजबूत उपस्थिति दर्ज करा चुका है। जून 2026 में नालंदा की बावन बूटी साड़ी एवं फैब्रिक, गयाजी के पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पीढ़िया पेंटिंग को GI टैग मिलने पर राज्य सरकार ने इसे बिहार की पारंपरिक कला और कारीगरों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया था।

बिहार के स्थानीय उत्पाद बनेंगे मजबूत ब्रांड

GI रजिस्ट्रेशन किसी उत्पाद के लिए सिर्फ एक प्रमाणपत्र नहीं होता। यह उस उत्पाद और उसके मूल क्षेत्र के बीच विशेष संबंध को मान्यता देता है। किसी खास इलाके की जलवायु, मिट्टी, पारंपरिक तकनीक, कारीगरी या सांस्कृतिक इतिहास के कारण अलग पहचान रखने वाले उत्पादों को GI के माध्यम से कानूनी और व्यावसायिक पहचान मिलती है।

यही कारण है कि बिहार के अधिक से अधिक क्षेत्रीय उत्पादों को GI व्यवस्था के दायरे में लाने की कोशिश महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे गांव और जिलों में तैयार होने वाले ऐसे उत्पाद, जो अभी मुख्य रूप से स्थानीय बाजारों तक सीमित हैं, बड़े बाजारों तक पहुंच सकते हैं।

GI टैग से ग्राहकों के बीच भी उत्पाद की प्रामाणिकता को लेकर भरोसा बढ़ता है। यदि इसके साथ बेहतर पैकेजिंग, गुणवत्ता नियंत्रण, ई-कॉमर्स, निर्यात और प्रभावी मार्केटिंग को जोड़ा जाए तो बिहार के पारंपरिक उत्पाद राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

किसानों और कारीगरों को मिल सकता है सीधा फायदा

बिहार की GI रणनीति का सबसे बड़ा फायदा किसानों, बुनकरों, कलाकारों और पारंपरिक कारीगरों तक पहुंच सकता है। किसी स्थानीय उत्पाद को GI पहचान मिलने के बाद उसके नाम और विशिष्ट पहचान की सुरक्षा मजबूत होती है। इससे दूसरे क्षेत्रों में बने उत्पादों को उसी भौगोलिक पहचान के नाम से बेचने पर रोक लगाने का कानूनी आधार मिलता है। इसके साथ ही असली उत्पाद बनाने वाले स्थानीय लोगों के लिए बाजार में अलग पहचान तैयार होती है। बेहतर ब्रांडिंग होने पर उत्पादों को प्रीमियम बाजार में पहुंचाने की संभावनाएं भी बढ़ती हैं।

बिहार सरकार पहले भी पारंपरिक उद्योगों, हस्तशिल्प, हथकरघा और लोक कलाओं के संरक्षण तथा संवर्धन को प्राथमिकता देने की बात कह चुकी है। राज्य के तीन पारंपरिक उत्पादों को जून में GI टैग मिलने के बाद सरकार ने इसे स्थानीय कारीगरों और बिहार की सांस्कृतिक विरासत के लिए अहम उपलब्धि के रूप में पेश किया था।

पहले से GI पहचान बना रहा बिहार

बिहार में GI को लेकर पिछले कुछ वर्षों से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। राज्य के कृषि उत्पादों से लेकर हस्तशिल्प और पारंपरिक कलाओं तक को इस व्यवस्था से जोड़ने की कोशिश हुई है। इससे पहले कृषि विभाग और बिहार कृषि विश्वविद्यालय के स्तर पर भी बड़ी संख्या में क्षेत्र-विशिष्ट उत्पादों के GI प्रमाणन की दिशा में काम किए जाने की जानकारी सामने आई थी।

अब नए उत्पादों के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ने से बिहार की GI सूची आने वाले समय में और लंबी हो सकती है। हालांकि आवेदन या रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित उत्पादों को GI टैग मिल ही गया है। अंतिम मान्यता निर्धारित जांच और पंजीकरण प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही मिलती है।

क्या होता है GI टैग?

GI यानी Geographical Indication किसी ऐसे उत्पाद को दी जाने वाली भौगोलिक पहचान है, जिसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य खास विशेषता उसके मूल स्थान से जुड़ी होती है। उदाहरण के तौर पर किसी क्षेत्र की विशेष कृषि उपज, वहां की पारंपरिक साड़ी, पेंटिंग, शिल्प या अन्य स्थानीय उत्पाद की पहचान उस इलाके की मिट्टी, मौसम, पीढ़ियों से चली आ रही तकनीक या सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी हो सकती है।

GI रजिस्ट्रेशन ऐसी विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण देने में मदद करता है। भारत में पंजीकृत GI सामान्य तौर पर 10 वर्ष के लिए वैध रहता है और इसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे नवीनीकृत किया जा सकता है।

नकली उत्पादों के खिलाफ भी मिलेगी ताकत

लोकप्रिय क्षेत्रीय उत्पादों के सामने बड़ी चुनौती उनके नाम पर दूसरे स्थानों के उत्पाद बेचे जाने की होती है। इससे असली उत्पाद तैयार करने वाले किसानों और कारीगरों को नुकसान हो सकता है।

GI पहचान इस समस्या से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इससे किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े नाम और उसकी प्रतिष्ठा की सुरक्षा मजबूत होती है। साथ ही उपभोक्ता के लिए असली उत्पाद की पहचान करना आसान बनाया जा सकता है। इसके लिए केवल GI टैग मिलना पर्याप्त नहीं है। उत्पादकों का पंजीकरण, गुणवत्ता मानक, ट्रेसबिलिटी, बेहतर पैकेजिंग और बाजार तक पहुंच भी उतनी ही जरूरी है।

‘लोकल टू ग्लोबल’ की राह पर बिहार

बिहार के गांवों में ऐसे अनेक पारंपरिक उत्पाद तैयार होते हैं जिनकी कहानी कई पीढ़ियों पुरानी है। लेकिन सीमित मार्केटिंग और ब्रांडिंग के कारण बहुत से उत्पाद बड़े बाजार तक नहीं पहुंच पाते। GI रजिस्ट्रेशन इस तस्वीर को बदलने का एक जरिया बन सकता है।

बिहार के उत्पादों को GI पहचान के साथ डिजिटल मार्केटिंग, पर्यटन, ई-कॉमर्स और निर्यात से जोड़ा जाता है तो इससे स्थानीय रोजगार के नए अवसर तैयार हो सकते हैं। खास तौर पर महिला कलाकारों, छोटे किसानों, बुनकरों और पारंपरिक शिल्पकारों को इसका फायदा मिल सकता है। हाल में बावन बूटी, पत्थरकट्टी कला और पीढ़िया पेंटिंग को मिली GI पहचान ने दिखाया है कि बिहार की पारंपरिक विरासत को औपचारिक ब्रांड पहचान में बदलने की प्रक्रिया तेजी पकड़ रही है।

अब नजर उन उत्पादों पर है जिनके GI रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। प्रक्रिया पूरी होने और नए उत्पादों को मान्यता मिलने के साथ बिहार की स्थानीय पहचान को राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार में और मजबूती मिल सकती है। साथ ही GI टैग राज्य के लिए केवल सांस्कृतिक गौरव नहीं, बल्कि कारीगरों की कमाई, किसानों के बाजार और ‘ब्रांड बिहार’ की नई पहचान का जरिया भी बन सकता है।

 

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