भारत में खरीफ सीजन के बाद अब किसानों और सरकार की निगाहें आगामी रबी सीजन पर टिक गई हैं। गेहूं, चना, सरसों, मसूर, जौ और दूसरी महत्वपूर्ण रबी फसलों की बुवाई शुरू होने से ठीक पहले El Nino Impact on Rabi Crops को लेकर चिंता बढ़ गई है। कृषि क्षेत्र के लिए यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के कई हिस्सों में खेती आज भी बारिश और मिट्टी में उपलब्ध नमी पर निर्भर है।
28 सितंबर 2026 को कृषि सचिव अतीश चंद्रा ने रबी सीजन की तैयारियों से जुड़े राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि अल नीनो की परिस्थितियों के कारण वर्षा आधारित इलाकों के लिए आगामी रबी सीजन चुनौतीपूर्ण हो सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि प्रतिकूल परिस्थितियां बनी रहने पर खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है। खासतौर पर उन इलाकों में जोखिम ज्यादा है जहां सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।रबी की फसलों के लिए केवल बुवाई के समय पानी मिलना पर्याप्त नहीं होता। मिट्टी में सही नमी, सर्दियों के दौरान अनुकूल तापमान और फसल की अलग-अलग अवस्थाओं पर पर्याप्त सिंचाई भी अच्छी पैदावार के लिए जरूरी होती है। ऐसे में मानसून की कमजोरी, अनियमित बारिश और मौसम में बढ़ता उतार-चढ़ाव रबी उत्पादन के समीकरण को बदल सकता है।
आखिर क्या है El Nino?
अल नीनो यानी El Nino एक वैश्विक जलवायु घटना है जिसका संबंध उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से होता है। समुद्र के तापमान में होने वाला यह बदलाव दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों की हवा, बारिश और मौसम के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है।
भारत के संदर्भ में El Nino पर विशेष नजर इसलिए रखी जाती है क्योंकि कई वर्षों में इसका संबंध कमजोर या अनियमित मानसून से देखा गया है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर El Nino वर्ष में भारत में एक जैसा प्रभाव दिखाई दे। भारतीय मानसून को Indian Ocean Dipole, स्थानीय समुद्री परिस्थितियों और कई अन्य वायुमंडलीय कारकों से भी प्रभावित किया जाता है।
इसलिए केवल El Nino की मौजूदगी के आधार पर किसी फसल के उत्पादन में निश्चित गिरावट का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। लेकिन जब मानसून कमजोर हो, जलाशयों में पानी की उपलब्धता कम हो और मिट्टी में नमी घट जाए, तब El Nino Agriculture Impact किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
रबी फसल क्या होती है?
भारत में कृषि को मुख्य रूप से खरीफ और रबी सीजन में बांटा जाता है। खरीफ की फसलों की बुवाई मानसून के साथ होती है, जबकि रबी फसलों की बुवाई आमतौर पर अक्टूबर से दिसंबर के बीच शुरू होती है और उनकी कटाई अगले वर्ष वसंत या गर्मी की शुरुआत में की जाती है।भारत की प्रमुख रबी फसलों में गेहूं, चना, सरसों, मसूर, मटर और जौ शामिल हैं। इनमें गेहूं देश की खाद्य सुरक्षा के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण फसलों में से एक है।
कृषि सचिव के अनुसार रबी फसलों की बुवाई सामान्य रूप से करीब 638 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती है। इसमें 300 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र गेहूं, लगभग 140 लाख हेक्टेयर दालों, 87 लाख हेक्टेयर तिलहनों और करीब 55 लाख हेक्टेयर मोटे अनाज के अंतर्गत आता है।
इन आंकड़ों से समझा जा सकता है कि Rabi Crops in India केवल किसानों की आय से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि देश में गेहूं, दाल, खाद्य तेल और अन्य खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता और कीमतों से भी सीधा संबंध रखता है।
रबी सीजन 2026 को लेकर सरकार क्यों चिंतित है?
सरकार की सबसे बड़ी चिंता वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों को लेकर है। खरीफ सीजन में कई क्षेत्रों ने अनियमित वर्षा का सामना किया। कहीं कम बारिश हुई तो कहीं कम समय में बहुत ज्यादा बारिश देखने को मिली।
कृषि सचिव ने कहा कि कुछ राज्यों में खेतों में आवश्यकता से अधिक नमी की स्थिति पैदा हो सकती है, जबकि कम बारिश वाले क्षेत्रों में लंबे समय तक मिट्टी में नमी की कमी बनी रह सकती है। दोनों ही परिस्थितियां रबी की बुवाई और आगे चलकर फसल की वृद्धि को प्रभावित कर सकती हैं।
सरकार इससे पहले भी El Nino और कमजोर बारिश से जुड़े जोखिमों की निगरानी कर रही थी। जुलाई 2026 में केंद्र सरकार ने कहा था कि कम बारिश और संभावित सूखे की स्थिति पर नजर रखी जा रही है। जलाशयों और भूजल की स्थिति की निगरानी तथा कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया था।
यही वजह है कि Rabi Season 2026 के लिए सरकार की रणनीति केवल खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रह सकती। इसमें पानी की उपलब्धता, बीज, उर्वरक, फसल चयन, मौसम पूर्वानुमान और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार खेती की योजना भी महत्वपूर्ण होगी।
El Nino का गेहूं की फसल पर क्या असर पड़ सकता है?
गेहूं भारत की सबसे महत्वपूर्ण रबी फसल है और उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और बिहार जैसे राज्य इसके बड़े उत्पादक हैं।El Nino effect on wheat production मुख्य रूप से पानी और तापमान के जरिए दिखाई दे सकता है। गेहूं को बुवाई के समय उचित मिट्टी की नमी की जरूरत होती है। अगर मानसून के बाद जमीन में पर्याप्त नमी नहीं बचती और सिंचाई की सुविधा सीमित होती है तो किसान बुवाई में देरी कर सकते हैं।देर से बुवाई होने पर फसल के महत्वपूर्ण विकास चरण ऐसे समय में पहुंच सकते हैं जब तापमान बढ़ने लगता है। ज्यादा तापमान गेहूं के दाने बनने और उनके वजन पर असर डाल सकता है।दूसरी तरफ सिंचित क्षेत्रों में जोखिम अपेक्षाकृत कम हो सकता है, लेकिन यहां भी पानी और बिजली की उपलब्धता अहम रहेगी। यदि जलाशयों और भूजल पर ज्यादा दबाव पड़ता है तो सिंचाई लागत बढ़ सकती है।इसलिए गेहूं के मामले में सिर्फ कम बारिश ही चिंता नहीं है। बारिश, तापमान और सिंचाई की संयुक्त स्थिति वास्तविक उत्पादन तय करेगी।
सरसों और तिलहन उत्पादन पर भी नजर
भारत खाद्य तेल की अपनी जरूरत का एक हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इस कारण रबी सीजन में सरसों जैसी तिलहन फसलों का उत्पादन आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण है।सरसों कई क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम पानी में उगाई जा सकती है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि फसल पर सूखे का असर नहीं होगा। बुवाई के समय पर्याप्त मिट्टी की नमी और फसल की महत्वपूर्ण अवस्थाओं पर पानी उपलब्ध होना जरूरी है।यदि El Nino के कारण सूखी परिस्थितियां ज्यादा समय तक बनी रहती हैं तो इसका असर सरसों के पौधों की वृद्धि और उपज पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ आवश्यकता से ज्यादा बारिश या गलत समय पर होने वाली बारिश भी नुकसान पहुंचा सकती है।इस कारण El Nino impact on mustard and pulses को सरकार और कृषि वैज्ञानिकों के लिए अलग-अलग राज्यों की परिस्थितियों के आधार पर देखना होगा।
चना, मसूर और दूसरी दालों पर क्या होगा असर?
भारत दुनिया के बड़े दाल उत्पादक और उपभोक्ता देशों में शामिल है। चना और मसूर जैसी कई प्रमुख दालों की खेती रबी सीजन में होती है।दालों की कुछ फसलें गेहूं की तुलना में कम पानी में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं, लेकिन लंबे समय तक अत्यधिक नमी की कमी होने से इनका उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है।देश के लिए दाल उत्पादन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए भारत को कुछ दालों का आयात भी करना पड़ता है। ऐसे में घरेलू उत्पादन कमजोर होने पर बाजार की कीमतों और आयात की जरूरत पर असर पड़ सकता है।कृषि सचिव ने भी कहा है कि भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर है, लेकिन दाल, तिलहन और कुछ बागवानी उत्पादों के लिए अभी भी आयात की जरूरत पड़ती है।इसलिए रबी की दालों का उत्पादन कमजोर होना केवल कृषि उत्पादन का विषय नहीं रहेगा। यह महंगाई, आयात और घरेलू खाद्य बाजार पर भी असर डाल सकता है।
मानसून खत्म होने के बाद भी बारिश क्यों महत्वपूर्ण है?
अक्सर यह माना जाता है कि मानसून खत्म होने के बाद रबी खेती पूरी तरह सिंचाई पर निर्भर हो जाती है। वास्तविकता इससे अधिक जटिल है।देश के बड़े हिस्से में किसान खरीफ के बाद मिट्टी में बची नमी के आधार पर रबी फसल बोते हैं। इसे residual soil moisture यानी मिट्टी में बची हुई नमी कहा जाता है।मानसून के दौरान अच्छी और संतुलित बारिश होने पर जमीन में लंबे समय तक नमी बनी रह सकती है। इससे किसान रबी की बुवाई समय पर कर पाते हैं और शुरुआती सिंचाई की जरूरत कम हो सकती है।इसके उलट यदि बारिश कम हो, बहुत असमान हो या लंबे dry spell देखने को मिलें तो मिट्टी की नमी तेजी से कम हो सकती है।इसी कारण effect of low rainfall on Rabi crops का असर मानसून खत्म होने के बाद भी कई महीनों तक दिखाई दे सकता है।
वर्षा आधारित क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा जोखिम
भारत में बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान ऐसी जमीन पर खेती करते हैं जहां सिंचाई के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे क्षेत्रों में फसल सीधे बारिश और मिट्टी की नमी पर निर्भर रहती है।कृषि मंत्रालय ने 2026 में El Nino से जुड़े जोखिम को देखते हुए कई संवेदनशील जिलों के लिए contingency plans तैयार करने पर जोर दिया है। केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर कम पानी वाली फसलों, जल संरक्षण और स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक फसल रणनीति अपनाने की बात कही है।
वर्षा आधारित इलाकों के लिए समस्या यह है कि किसान पानी की कमी की भरपाई आसानी से नहीं कर सकते। जहां नहर, ट्यूबवेल या पर्याप्त भूजल उपलब्ध है वहां जरूरत पड़ने पर सिंचाई की जा सकती है। लेकिन rainfed agriculture में मौसम की भूमिका बहुत अधिक होती है।यही कारण है कि Rainfed Agriculture India आगामी रबी सीजन की सबसे महत्वपूर्ण चिंताओं में शामिल है।
खाद्यान्न उत्पादन पर कितना बड़ा असर पड़ सकता है?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगा कि देश का खाद्यान्न उत्पादन निश्चित रूप से कितना घटेगा। कृषि सचिव ने उत्पादन प्रभावित होने की आशंका जताई है, लेकिन अंतिम स्थिति आने वाले महीनों के मौसम, बुवाई क्षेत्र और फसलों की उत्पादकता पर निर्भर करेगी।
इसके साथ एक महत्वपूर्ण संदर्भ यह भी है कि भारत ने 2025-26 में मजबूत कृषि उत्पादन दर्ज किया था। कृषि मंत्रालय के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार 2025-26 का कुल खाद्यान्न उत्पादन लगभग 376.563 मिलियन टन रहने का अनुमान लगाया गया था। इसमें गेहूं उत्पादन लगभग 120.657 मिलियन टन अनुमानित था।
इसलिए मौजूदा चिंता को पिछले मजबूत उत्पादन के संदर्भ में देखना जरूरी है। सरकार के पास खाद्यान्न उपलब्धता को लेकर फिलहाल एक आधार मौजूद है। जुलाई में केंद्र ने यह भी कहा था कि देश में चावल और गेहूं सहित आवश्यक खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार मौजूद है।
फिर भी यदि रबी उत्पादन अपेक्षा से कमजोर रहता है तो अगले वर्ष सरकारी खरीद, खुले बाजार में उपलब्धता और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
खाद्य महंगाई पर पड़ सकता है असर
El Nino impact on food grain production आम उपभोक्ताओं के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि फसल उत्पादन में कमी का असर बाजार कीमतों तक पहुंच सकता है।
गेहूं का उत्पादन कम होने की स्थिति में आटा और गेहूं आधारित खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव बन सकता है। सरसों उत्पादन प्रभावित होने पर सरसों तेल के बाजार पर असर हो सकता है। इसी तरह चना और मसूर उत्पादन में कमी दालों के दाम प्रभावित कर सकती है।हालांकि उत्पादन कम होने और कीमतें बढ़ने के बीच सीधा और निश्चित संबंध नहीं होता। सरकारी भंडार, आयात, निर्यात नीति, घरेलू मांग और वैश्विक बाजार की कीमतें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर खाद्यान्न का इस्तेमाल करती है। इसलिए देश की food security के लिए रबी उत्पादन का मजबूत रहना महत्वपूर्ण है।
किसानों की आय पर El Nino का प्रभाव
Climate change impact on Indian farmers केवल फसल उत्पादन तक सीमित नहीं है। अनिश्चित मौसम किसानों की लागत और आय दोनों को प्रभावित कर सकता है।यदि बारिश कम होती है तो किसानों को अतिरिक्त सिंचाई करनी पड़ सकती है। इससे बिजली, डीजल और पानी पर खर्च बढ़ सकता है। सूखे की स्थिति में किसान दोबारा बुवाई करने या फसल बदलने के लिए मजबूर हो सकते हैं।इसके विपरीत बेमौसम भारी बारिश हुई तो तैयार फसल को नुकसान हो सकता है। ऐसे में किसान द्वारा बीज, उर्वरक, सिंचाई और मजदूरी पर किया गया निवेश जोखिम में पड़ जाता है।छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह जोखिम ज्यादा गंभीर होता है क्योंकि उनकी आर्थिक क्षमता सीमित होती है और एक खराब फसल पूरे वर्ष की घरेलू आय प्रभावित कर सकती है।
यही कारण है कि मौसम आधारित कृषि सलाह, फसल बीमा और समय पर सरकारी सहायता की भूमिका तेजी से बढ़ रही है।
जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा खेती की अनिश्चितता
भारत में कृषि पर चर्चा अब केवल El Nino तक सीमित नहीं रह सकती। कृषि सचिव ने भी जलवायु परिवर्तन को मौजूदा वास्तविकता बताते हुए अनियमित और अत्यधिक बारिश की घटनाओं पर चिंता जताई है।
किसानों के सामने चुनौती यह है कि कभी लंबे समय तक बारिश नहीं होती और कभी बहुत कम समय में जरूरत से ज्यादा बारिश हो जाती है।इसके अलावा तापमान में असामान्य बढ़ोतरी, गर्म हवाएं, देर से आने वाली सर्दी और बदलते मौसम चक्र भी फसलों को प्रभावित कर सकते हैं।इसलिए आने वाले वर्षों में Climate Change and Agriculture भारत की खाद्य सुरक्षा से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक रहेगा।
कृषि क्षेत्र को ज्यादा climate resilient बनाने के लिए केवल आपदा आने के बाद राहत देना पर्याप्त नहीं होगा। फसल किस्मों, सिंचाई तकनीक, मौसम पूर्वानुमान, जल संरक्षण और कृषि बीमा में दीर्घकालिक निवेश की जरूरत होगी।
सरकार की क्या है तैयारी?
केंद्र सरकार पिछले कई महीनों से El Nino से जुड़े कृषि जोखिमों की समीक्षा कर रही है। सरकार ने कम बारिश वाले क्षेत्रों में जल स्रोतों की निगरानी और राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।सरकार का जोर मुख्य रूप से इन क्षेत्रों पर है:
- जलाशयों और भूजल की स्थिति की निगरानी।
- किसानों को स्थानीय मौसम के अनुसार फसल सलाह देना।
- कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को बढ़ावा देना।
- बीज और उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- संवेदनशील जिलों के लिए अलग कृषि contingency plans बनाना।
- जल संरक्षण और micro irrigation को बढ़ावा देना।
- मौसम और फसल की स्थिति की नियमित समीक्षा करना।
आगामी रबी सत्र को लेकर दिल्ली में 28 और 29 सितंबर 2026 को राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन आयोजित किया गया है, जिसमें राज्यों की फसल योजनाओं, बुवाई क्षेत्र, बीज और उर्वरक की जरूरत सहित विभिन्न तैयारियों पर चर्चा होनी है।
किसानों को किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?
El Nino की स्थिति में सभी किसानों के लिए एक जैसी रणनीति कारगर नहीं होगी। किसी जिले में पानी की कमी हो सकती है तो दूसरे इलाके में मिट्टी में ज्यादा नमी समस्या बन सकती है।इसलिए किसानों के लिए स्थानीय मौसम और कृषि विभाग की सलाह को प्राथमिकता देना सबसे जरूरी है।समय पर बुवाई, उपयुक्त किस्म का चयन, मिट्टी की नमी का संरक्षण और उपलब्ध पानी का सही इस्तेमाल उत्पादन जोखिम कम करने में मदद कर सकता है।जहां पानी सीमित है वहां स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह से कम पानी वाली फसलों या varieties का चयन उपयोगी हो सकता है। खेत में नमी बनाए रखने के लिए उचित कृषि पद्धतियां भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं।किसानों को IMD, कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य कृषि विभागों द्वारा जारी मौसम तथा फसल संबंधी सलाह पर नजर रखनी चाहिए।
क्या El Nino का मतलब फसल खराब होना तय है?
नहीं। यह समझना बहुत जरूरी है कि El Nino होने का अर्थ यह नहीं है कि रबी फसल निश्चित रूप से खराब हो जाएगी।El Nino एक जोखिम कारक है। वास्तविक उत्पादन कई चीजों पर निर्भर करेगा, जैसे:
- अक्टूबर से मार्च तक मौसम कैसा रहता है
- मिट्टी में कितनी नमी उपलब्ध है
- जलाशयों और भूजल की स्थिति
- सिंचाई की उपलब्धता
- गेहूं और अन्य फसलों की बुवाई कितने क्षेत्र में होती है
- किसानों को समय पर बीज और उर्वरक मिलते हैं या नहीं
- सर्दियों का तापमान कैसा रहता है
- फरवरी और मार्च में गर्मी कितनी तेजी से बढ़ती है
इसलिए अभी सरकार द्वारा जताई गई आशंका को एक warning signal के रूप में देखना बेहतर होगा, न कि अंतिम उत्पादन अनुमान के रूप में।
भारतीय कृषि के लिए बड़ा सबक
El Nino effect on Indian agriculture एक बार फिर दिखाता है कि बदलते मौसम के दौर में भारतीय कृषि को ज्यादा resilient बनाने की जरूरत है।सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के साथ पानी का कुशल इस्तेमाल महत्वपूर्ण होगा। केवल ज्यादा पानी उपलब्ध कराना समाधान नहीं है, बल्कि प्रति बूंद ज्यादा उत्पादन की दिशा में काम करना होगा।इसके अलावा drought tolerant और heat tolerant किस्मों का विकास, स्थानीय स्तर पर मौसम की सटीक जानकारी, फसल विविधीकरण और soil moisture management भी महत्वपूर्ण होंगे।ऐसे क्षेत्रों में जहां पानी लगातार कम होता जा रहा है, वहां फसल पैटर्न पर भी दोबारा विचार करना पड़ सकता है। ज्यादा पानी वाली फसलों की जगह स्थानीय जल उपलब्धता के अनुकूल फसलों को बढ़ावा देना लंबे समय में टिकाऊ विकल्प हो सकता है।
आगे किन बातों पर रहेगी नजर?
आने वाले कुछ सप्ताह रबी सत्र के लिए बेहद अहम रहने वाले हैं। सबसे पहले यह देखना होगा कि खरीफ के बाद अलग-अलग राज्यों में मिट्टी की नमी की स्थिति कैसी रहती है।इसके बाद अक्टूबर और नवंबर में गेहूं, सरसों, चना और अन्य फसलों की बुवाई का रकबा महत्वपूर्ण संकेत देगा।सर्दियों का तापमान तीसरा बड़ा कारक होगा। गेहूं जैसी फसलों को विकास के महत्वपूर्ण चरणों में अनुकूल ठंड की जरूरत होती है।इसके अलावा जलाशयों में उपलब्ध पानी और भूजल की स्थिति पर भी लगातार नजर रखी जाएगी।
यदि आने वाले महीनों में मौसम अनुकूल रहता है तो El Nino से जुड़ा जोखिम सीमित रह सकता है। लेकिन लंबे dry spell, पानी की कमी या असामान्य तापमान की स्थिति बनने पर Rabi crop production in India 2026 दबाव में आ सकता है।
निष्कर्ष
El Nino से रबी फसलों पर खतरा फिलहाल भारत के कृषि क्षेत्र के सामने एक गंभीर मौसम संबंधी जोखिम के रूप में उभरा है। कृषि सचिव अतीश चंद्रा ने विशेष रूप से वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए आगामी रबी सीजन को चुनौतीपूर्ण बताया है और खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होने की आशंका जताई है।गेहूं, चना, मसूर, सरसों और दूसरी रबी फसलों की बुवाई का समय नजदीक होने के कारण अगले कुछ महीने बेहद महत्वपूर्ण होंगे।
हालांकि स्थिति को लेकर घबराने के बजाय वास्तविक मौसम संकेतों पर नजर रखना जरूरी है। भारत ने 2025-26 में रिकॉर्ड स्तर के आसपास खाद्यान्न उत्पादन का अनुमान दर्ज किया था और सरकार ने चावल तथा गेहूं के पर्याप्त भंडार की बात भी कही है।सबसे बड़ी चुनौती उन वर्षा आधारित क्षेत्रों में होगी जहां किसानों के पास सिंचाई के वैकल्पिक साधन सीमित हैं।आगे का रबी उत्पादन मानसून के बाद बची मिट्टी की नमी, सर्दियों के तापमान, पानी की उपलब्धता, सरकारी तैयारी और किसानों द्वारा अपनाई जाने वाली कृषि रणनीति पर निर्भर करेगा।
एक बात साफ है कि El Nino और जलवायु परिवर्तन जैसी परिस्थितियां भारत को climate-resilient agriculture की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने का संकेत दे रही हैं। जल संरक्षण, बेहतर बीज, सटीक मौसम पूर्वानुमान, फसल विविधीकरण और स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक खेती भविष्य में भारतीय खाद्य सुरक्षा के लिए निर्णायक साबित हो सकती है।
FAQs: El Nino और रबी फसलों से जुड़े सवाल
1. El Nino का रबी फसलों पर क्या असर पड़ सकता है?
El Nino के कारण कमजोर या अनियमित बारिश की स्थिति बनने पर मिट्टी में नमी कम हो सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर वर्षा आधारित क्षेत्रों में गेहूं, चना, सरसों और दूसरी रबी फसलों की बुवाई तथा उत्पादकता पर पड़ सकता है।
2. क्या El Nino से गेहूं उत्पादन कम हो जाएगा?
अभी निश्चित रूप से ऐसा कहना संभव नहीं है। गेहूं उत्पादन बुवाई क्षेत्र, सिंचाई, मिट्टी की नमी और सर्दियों के तापमान सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा।
3. सरकार ने रबी उत्पादन को लेकर क्या कहा है?
28 सितंबर 2026 को कृषि सचिव अतीश चंद्रा ने कहा कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में आगामी रबी सीजन चुनौतीपूर्ण हो सकता है और खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।
4. भारत की प्रमुख रबी फसलें कौन सी हैं?
गेहूं, चना, सरसों, मसूर, मटर और जौ भारत की प्रमुख रबी फसलों में शामिल हैं।
5. El Nino से सबसे ज्यादा खतरा किन क्षेत्रों को है?
ऐसे कृषि क्षेत्र जहां सिंचाई सीमित है और खेती मुख्य रूप से बारिश तथा मिट्टी की नमी पर निर्भर है, वहां जोखिम अधिक हो सकता है।
6. क्या El Nino आने पर फसल खराब होना तय है?
नहीं। El Nino केवल जोखिम बढ़ाता है। वास्तविक फसल उत्पादन स्थानीय बारिश, तापमान, सिंचाई और कृषि प्रबंधन पर निर्भर करता है।
7. El Nino का खाद्य महंगाई पर क्या असर हो सकता है?
यदि प्रमुख फसलों का उत्पादन काफी कम होता है तो गेहूं, दाल और खाद्य तेल जैसी वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बन सकता है। हालांकि सरकारी स्टॉक, आयात और बाजार नीति भी कीमतों को प्रभावित करते हैं।
8. किसानों को El Nino के दौरान क्या करना चाहिए?
किसानों को स्थानीय कृषि विभाग और मौसम विभाग की सलाह के अनुसार फसल तथा किस्म का चयन करना चाहिए। उपलब्ध पानी और मिट्टी की नमी का बेहतर प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है।

