Moth Bean Farming: मोठ की खेती किसानों के लिए कम पानी और शुष्क मौसम में एक अच्छा विकल्प मानी जाती है। खासकर राजस्थान जैसे कम वर्षा वाले इलाकों में यह खरीफ की महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। सही मिट्टी, समय पर बुवाई, उन्नत किस्म और उचित फसल प्रबंधन अपनाकर किसान मोठ से बेहतर उत्पादन ले सकते हैं। आइए आसान भाषा में जानते हैं कि मोठ की खेती कैसे की जाती है, इसकी बुवाई कब करनी चाहिए, कौन सी मिट्टी उपयुक्त है और सरकारी योजनाओं का लाभ कैसे मिल सकता है।
मोठ क्या है?
मोठ एक दलहनी फसल है, जिसका वैज्ञानिक नाम Vigna aconitifolia है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे मोठ, मोठ बीन और मटकी जैसे नामों से भी जाना जाता है। इसके दानों का इस्तेमाल दाल, अंकुरित अनाज और कई प्रकार के खाद्य पदार्थ बनाने में किया जाता है।
मोठ की सबसे बड़ी खासियत इसकी सूखा सहन करने की क्षमता है। यह कम बारिश और अपेक्षाकृत अधिक तापमान वाली परिस्थितियों में भी उग सकती है। इसी कारण पश्चिमी राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में इसका विशेष महत्व है। वैज्ञानिक साहित्य में भी मोठ को शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के अनुकूल फसल माना गया है। (Taylor & Francis Online)
दलहनी फसल होने के कारण मोठ मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी मदद करती है। इसकी जड़ों से जुड़ी लाभकारी जीवाणु गतिविधियां वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में उपलब्ध कराने में योगदान देती हैं। इसलिए फसल चक्र में मोठ को शामिल करना उपयोगी हो सकता है।
मोठ की खेती के लिए कैसी जलवायु चाहिए?
मोठ गर्म और शुष्क जलवायु की फसल है। इसकी खेती मुख्य रूप से खरीफ के मौसम में की जाती है और यह वर्षा आधारित खेती के लिए काफी उपयोगी है।
अच्छे अंकुरण के लिए खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए। हालांकि मोठ सूखा सहन कर सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि फसल को बिल्कुल पानी की जरूरत नहीं होती। अंकुरण और फूल आने जैसे महत्वपूर्ण चरणों में पर्याप्त नमी मिलने पर उत्पादन बेहतर हो सकता है।
मोठ की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि अत्यधिक पानी इसके लिए नुकसानदायक हो सकता है। खेत में लंबे समय तक पानी भरने से जड़ों और पौधों को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए जल निकासी की व्यवस्था जरूरी है।
मोठ की खेती के लिए कौन सी मिट्टी सबसे अच्छी है?
मोठ की खेती के लिए हल्की, रेतीली और रेतीली दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है। राजस्थान के शुष्क इलाकों में पाई जाने वाली हल्की मिट्टी इस फसल के लिए काफी अनुकूल है। नागौर में किए गए कृषि प्रदर्शनों में भी मोठ को रेतीली दोमट मिट्टी वाली परिस्थितियों में उगाया गया है। (Society of Krishi Vigyan)ऐसी भूमि का चुनाव करें जिसमें बारिश का अतिरिक्त पानी आसानी से बाहर निकल सके। भारी मिट्टी और जलभराव वाले खेत मोठ के लिए उपयुक्त नहीं माने जाते।
से पहले खेत को खरपतवार से साफ करना चाहिए। मिट्टी में उपलब्ध नमी को बचाना विशेष रूप से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है। किसान खेत में खाद या उर्वरक डालने से पहले मिट्टी की जांच करा लें। केवल अनुमान के आधार पर अधिक खाद डालने के बजाय मृदा स्वास्थ्य कार्ड या स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सिफारिश के अनुसार पोषक तत्व देना बेहतर रहता है।
भारत में किन राज्यों में मोठ की खेती होती है?
भारत में मोठ की खेती का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र राजस्थान है। पश्चिमी राजस्थान में यह लंबे समय से वर्षा आधारित खरीफ दलहन के रूप में उगाई जाती रही है। ICAR से जुड़े शोध में राजस्थान के बीकानेर, चूरू, बाड़मेर, नागौर और जोधपुर जैसे जिलों को महत्वपूर्ण मोठ उत्पादक क्षेत्रों में शामिल किया गया है। (Icar E-Pubs)
राजस्थान के अलावा गुजरात, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे गर्म तथा अपेक्षाकृत कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी मोठ की खेती की जाती है। अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए बुवाई का समय और किस्म अलग हो सकती है।
दक्षिण भारत में भी कुछ स्थानों पर इसकी संभावनाओं पर काम हुआ है। उदाहरण के लिए तमिलनाडु के विलुप्पुरम क्षेत्र में ICAR-कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से मोठ की उन्नत उत्पादन तकनीकों के प्रदर्शन किए गए हैं। (ARCC Articles)
मोठ की बुवाई का सही समय क्या है?
मोठ की बुवाई का समय क्षेत्र और मानसून पर निर्भर करता है। खरीफ की फसल होने के कारण इसकी बुवाई आम तौर पर मानसून की पर्याप्त बारिश होने के बाद जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के दौरान की जाती है। पश्चिमी राजस्थान में कई परिस्थितियों में जुलाई का मध्य भाग महत्वपूर्ण बुवाई अवधि माना जाता है। अन्य राज्यों में मानसून जल्दी आने पर बुवाई जून के अंतिम सप्ताह या जुलाई की शुरुआत में हो सकती है।
किसानों को केवल कैलेंडर की तारीख देखकर बुवाई नहीं करनी चाहिए। खेत में अंकुरण के लिए पर्याप्त नमी होना ज्यादा जरूरी है। बहुत सूखी जमीन में बुवाई करने से अंकुरण कमजोर हो सकता है।
यदि मानसून देर से आता है, तो किसान अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र यानी KVK या कृषि विभाग की आकस्मिक फसल सलाह जरूर देखें। राजस्थान सरकार की खरीफ फसल सलाह में भी मानसून में देरी की स्थिति में मोठ के लिए अलग प्रबंधन उपाय सुझाए गए हैं। (Rajasthan Tourism)
मोठ की कौन सी किस्म चुनें?
किसान को अपने राज्य और जिले के लिए कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग द्वारा अनुशंसित किस्म का चयन करना चाहिए। राजस्थान की कृषि सलाह में RMO-40, RMO-257 और RMO-435 जैसी किस्मों का उल्लेख मिलता है। (Rajasthan Tourism) किस्म खरीदते समय केवल अधिक उत्पादन का दावा देखकर फैसला न करें। किस्म की अवधि, स्थानीय वर्षा, रोग प्रतिरोध, मिट्टी और बाजार की मांग को भी ध्यान में रखें। जहां संभव हो प्रमाणित बीज को प्राथमिकता दें। स्थानीय कृषि विभाग या KVK से उस वर्ष के लिए उपलब्ध और अनुशंसित किस्मों की जानकारी लेना सबसे सुरक्षित तरीका है।
बीज की मात्रा और बुवाई का तरीका
बीज की मात्रा किस्म, बुवाई के तरीके और फसल के उद्देश्य के अनुसार बदल सकती है। कुछ कृषि प्रदर्शनों में लगभग 20 किलो बीज प्रति हेक्टेयर और लाइन से बुवाई का इस्तेमाल किया गया है। (ARCC Journals) लेकिन इसे हर क्षेत्र के लिए एक निश्चित मात्रा नहीं मानना चाहिए। किसान अपने जिले के कृषि विश्वविद्यालय या KVK की सिफारिश के अनुसार बीज दर तय करें। कतार में बुवाई करने का एक फायदा यह है कि खेत में निराई-गुड़ाई, पौधों की निगरानी और अन्य कृषि कार्य अपेक्षाकृत आसानी से किए जा सकते हैं।
मोठ की फसल में खाद और उर्वरक प्रबंधन
मोठ दलहनी फसल है, इसलिए इसकी पोषण आवश्यकता अनाज वाली कई फसलों से अलग होती है। खाद और उर्वरक की सही मात्रा मिट्टी की जांच के आधार पर तय करनी चाहिए। अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिट्टी की संरचना सुधारने में उपयोगी हो सकती है। कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर के शोध में जैव उर्वरक, जैविक खाद और अन्य पोषण प्रबंधन को मोठ उत्पादन व्यवस्था में उपयोगी पाया गया है। (SK Rajasthan Agriculture University) किसान बिना आवश्यकता के अधिक नाइट्रोजन या दूसरे उर्वरकों का इस्तेमाल न करें। इससे खेती की लागत बढ़ सकती है और पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है।
सिंचाई कैसे करें?
मोठ की खेती का बड़ा हिस्सा वर्षा आधारित परिस्थितियों में होता है। इसलिए सामान्य परिस्थितियों में खरीफ मोठ को बार-बार सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती।अगर लंबे समय तक बारिश नहीं होती और सिंचाई का साधन उपलब्ध है, तो फसल की अवस्था, मिट्टी और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार जीवनरक्षक सिंचाई पर विचार किया जा सकता है। इसके उलट बहुत अधिक पानी देना भी नुकसानदायक है। खेत में पानी जमा नहीं होने देना चाहिए। भारी बारिश के बाद जल निकासी की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दें।
मोठ में खरपतवार नियंत्रण
शुरुआती अवस्था में खरपतवार मोठ के पौधों से नमी, पोषक तत्व और धूप के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं। इसलिए शुरुआती दिनों में खेत की नियमित निगरानी करें। कतार में बोई गई फसल में जरूरत के अनुसार निराई-गुड़ाई करना आसान रहता है। खरपतवार नियंत्रण का समय स्थानीय परिस्थितियों और खेत में मौजूद खरपतवारों पर निर्भर करता है। रासायनिक खरपतवारनाशी का चुनाव खुद से करने के बजाय स्थानीय कृषि अधिकारी की सलाह और उत्पाद के अधिकृत लेबल के अनुसार ही करना चाहिए।
मोठ में कौन-कौन से कीट और रोग आ सकते हैं?
मौसम और क्षेत्र के अनुसार मोठ की फसल पर रस चूसने वाले कीट, पत्ती या फली को नुकसान पहुंचाने वाले कीट तथा विभिन्न रोग दिखाई दे सकते हैं। पीला मोजेक जैसे विषाणुजनित रोग भी दलहनी फसलों में चिंता का कारण बन सकते हैं।
सबसे जरूरी बात यह है कि किसान लक्षण देखते ही किसी भी कीटनाशक का छिड़काव न करें। पहले यह पहचानना जरूरी है कि समस्या वास्तव में कीट की है, रोग की है या पोषण की कमी की।
फसल की नियमित निगरानी करें, रोगग्रस्त पौध सामग्री का उचित प्रबंधन करें, खेत को अत्यधिक खरपतवारयुक्त न होने दें और अनुशंसित प्रतिरोधी किस्मों को प्राथमिकता दें। ये एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।
मोठ में कीट लग जाए तो कौन सी दवाई इस्तेमाल करें?
कीटनाशक या रोगनाशक का चुनाव कीट की सही पहचान के बाद ही किया जाना चाहिए। अलग-अलग कीट और रोग के लिए अलग उत्पाद पंजीकृत हो सकते हैं और समय के साथ उनकी सरकारी मंजूरी भी बदल सकती है।
इसलिए किसी एक दवा को हर प्रकार के कीट के लिए इस्तेमाल करना सही नहीं है। किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विभाग या योग्य कृषि विशेषज्ञ से प्रभावित पौधे की जांच कराकर उसी की सलाह से फसल के लिए पंजीकृत उत्पाद चुनें। उत्पाद के अधिकृत लेबल पर दिए गए सुरक्षा निर्देशों का पालन जरूरी है।
जहां संभव हो, पहले गैर-रासायनिक और एकीकृत कीट प्रबंधन के उपाय अपनाएं। अनावश्यक और बार-बार कीटनाशक इस्तेमाल करने से खेती की लागत बढ़ने के साथ लाभकारी कीटों और पर्यावरण को भी नुकसान हो सकता है।
मोठ की फसल पर किसानों को सब्सिडी मिलती है क्या?
मोठ दलहनी फसल है। इसलिए किसानों को केंद्र और राज्य सरकार की दलहन उत्पादन से जुड़ी योजनाओं के तहत सहायता मिलने की संभावना रहती है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर राज्य और हर जिले में मोठ के नाम से अलग सब्सिडी उपलब्ध हो।
केंद्र सरकार की National Food Security and Nutrition Mission (NFSNM/NFSM) व्यवस्था में राज्यों के माध्यम से किसानों को सहायता दी जाती है और अधिसूचित किस्मों के प्रमाणित बीज वितरण जैसी गतिविधियां शामिल हैं। आधिकारिक NFSM पोर्टल पर खरीफ 2025 के लिए दलहन बीज मिनीकिट वितरण से संबंधित आदेश भी उपलब्ध हैं। (National Food Security Mission)
इसका मतलब यह है कि मोठ उगाने वाले किसान के लिए प्रमाणित बीज, मिनीकिट, प्रदर्शन, प्रशिक्षण या दूसरी दलहन आधारित सहायता उपलब्ध हो सकती है, लेकिन वास्तविक लाभ राज्य, जिला, योजना के वर्तमान दिशा-निर्देश, लक्ष्य और किसान की पात्रता पर निर्भर करेगा।
किसान अपने जिले के कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र, पंचायत स्तर के कृषि अधिकारी या राज्य के आधिकारिक कृषि पोर्टल पर मौजूदा योजना की जानकारी लें। आवेदन करने से पहले सहायता राशि और पात्रता की नवीनतम जानकारी जरूर जांचें।
मोठ की खेती किसानों के लिए क्यों फायदेमंद हो सकती है?
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मोठ की सबसे बड़ी ताकत इसकी सूखा सहनशीलता है। राजस्थान में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण खरीफ दलहन है और बड़े क्षेत्र में वर्षा आधारित परिस्थितियों में उगाई जाती है। (Icar E-Pubs)
दूसरा फायदा यह है कि मोठ के दाने भोजन में उपयोग होते हैं, जबकि फसल के अवशेष पशुओं के लिए भी काम आ सकते हैं। दलहनी फसल होने से इसे फसल चक्र में शामिल करने पर मिट्टी की उर्वरता प्रबंधन में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि कम पानी सहन करने का अर्थ यह नहीं है कि फसल बिना उचित प्रबंधन के हमेशा अच्छा उत्पादन देगी। उन्नत किस्म, सही समय पर बुवाई, पर्याप्त शुरुआती नमी, खरपतवार नियंत्रण और कीट-रोग प्रबंधन उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
ICAR से जुड़े राजस्थान के प्रदर्शनों में बेहतर किस्म और उन्नत उत्पादन तकनीकों से किसानों की सामान्य पद्धति की तुलना में उत्पादन बढ़ने के परिणाम सामने आए हैं। (ResearchGate)
किसानों के लिए जरूरी सलाह
मोठ की बुवाई मानसून और खेत में पर्याप्त नमी देखकर करें। हल्की और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी चुनें तथा अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित प्रमाणित बीज को प्राथमिकता दें।
बुवाई से पहले मिट्टी की जांच करवाएं और उसी आधार पर पोषण प्रबंधन करें। फसल में कीट या रोग दिखाई देने पर बिना पहचान के दवा का इस्तेमाल न करें। कृषि विशेषज्ञ से समस्या की पुष्टि कराकर केवल मोठ के लिए अधिकृत उत्पाद और उसके लेबल निर्देशों का पालन करें।
सब्सिडी के मामले में भी सोशल मीडिया या पुराने संदेशों पर निर्भर न रहें। सरकारी योजनाओं की राशि और पात्रता समय-समय पर बदल सकती है, इसलिए आवेदन से पहले कृषि विभाग या आधिकारिक पोर्टल से वर्तमान जानकारी की पुष्टि करें।
निष्कर्ष
मोठ की खेती विशेष रूप से कम बारिश और शुष्क जलवायु वाले किसानों के लिए उपयोगी दलहनी विकल्प है। राजस्थान इसका प्रमुख उत्पादक क्षेत्र है, जबकि गुजरात, हरियाणा और महाराष्ट्र सहित अन्य क्षेत्रों में भी इसकी खेती की जाती है।
हल्की रेतीली या रेतीली दोमट मिट्टी, उचित जल निकासी, मानसून के अनुसार समय पर बुवाई और क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्म मोठ की सफल खेती की बुनियाद हैं। किसान अगर मिट्टी की जांच, प्रमाणित बीज, नियमित फसल निगरानी और एकीकृत कीट प्रबंधन जैसी वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाते हैं तो जोखिम कम करने और उत्पादन सुधारने में मदद मिल सकती है।
सरकारी सहायता के लिए दलहन से जुड़ी केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं पर नजर रखें। NFSM के आधिकारिक पोर्टल पर दलहन कार्यक्रमों और बीज मिनीकिट जैसी गतिविधियों की जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। (National Food Security Mission)

