भारत में मत्स्य पालन क्षेत्र कृषि से जुड़े सबसे तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्रों में शामिल है। यह क्षेत्र देश की आर्थिक वृद्धि, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, रोजगार सृजन, ग्रामीण आजीविका और निर्यात आय में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। सरकार की ओर से मछुआरों और मछली पालकों की आय तथा सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ मत्स्य पालन और जलीय कृषि के बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं।
मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के मत्स्य विभाग की ओर से लागू योजनाओं में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY), मत्स्य पालन और जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (FIDF) और प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PM-MKSSY) प्रमुख हैं। इसके अलावा मछुआरों और मछली पालकों की कार्यशील पूंजी संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) की सुविधा भी उपलब्ध कराई जा रही है।
मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री श्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने राज्यसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में यह जानकारी दी।
कृषि अर्थव्यवस्था में बढ़ रहा मत्स्य पालन का योगदान
मत्स्य पालन केवल मछली उत्पादन तक सीमित क्षेत्र नहीं है। इसके साथ जलीय कृषि, प्रसंस्करण, परिवहन, कोल्ड चेन, विपणन और निर्यात जैसी गतिविधियां भी जुड़ी हुई हैं। यही वजह है कि यह क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार के लिए लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023-24 में मत्स्य पालन क्षेत्र ने कृषि सकल मूल्य वर्धित (GVA) में लगभग 7.43 प्रतिशत का योगदान दिया। वहीं देश के कुल GVA में मत्स्य पालन क्षेत्र का योगदान लगभग 1.09 प्रतिशत रहा।
मत्स्य क्षेत्र के विस्तार से ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा होने के साथ-साथ किसानों और मछुआरा परिवारों के लिए अतिरिक्त आय के स्रोत विकसित हो रहे हैं।
राज्यों और केंद्र की साझा जिम्मेदारी
भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत मत्स्य पालन से संबंधित जिम्मेदारियां राज्य और केंद्र के बीच विभाजित हैं।
संविधान की सूची-II के अनुच्छेद 21 के तहत मत्स्य पालन राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। वहीं सूची-I के अनुच्छेद 57 के तहत प्रादेशिक जल सीमा यानी क्षेत्रीय जल से बाहर मछली पकड़ना और मत्स्य पालन भारत संघ के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इस व्यवस्था के तहत केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर योजनाओं, वित्तीय सहायता और नीतिगत ढांचे के माध्यम से मत्स्य क्षेत्र को समर्थन देती है, जबकि राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका जमीनी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन और स्थानीय मत्स्य संसाधनों के प्रबंधन में रहती है।
पीएमएमएसवाई से मत्स्य क्षेत्र को व्यापक सहायता
मत्स्य पालन और जलीय कृषि के समग्र विकास के लिए केंद्र सरकार की प्रमुख योजनाओं में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) शामिल है।
इस योजना के माध्यम से मत्स्य उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने, मत्स्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, मछुआरों की आजीविका में सुधार करने और मत्स्य मूल्य श्रृंखला को बेहतर बनाने की दिशा में सहायता दी जा रही है।
पीएमएमएसवाई के तहत उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण और बाजार तक विभिन्न स्तरों पर सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है। इससे छोटे मछली पालकों और मछुआरों के साथ-साथ मत्स्य उद्यमियों को भी अपने कारोबार को आधुनिक बनाने का अवसर मिलता है।
एफआईडीएफ से बुनियादी ढांचे को मजबूती
सरकार ने मत्स्य पालन क्षेत्र में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए मत्स्य पालन और जलीय कृषि अवसंरचना विकास कोष (FIDF) भी लागू किया है।
मत्स्य क्षेत्र के विकास में आधुनिक बुनियादी ढांचे की महत्वपूर्ण भूमिका है। बेहतर उत्पादन सुविधाओं के साथ प्रसंस्करण, भंडारण, कोल्ड चेन और अन्य आधारभूत सुविधाएं मजबूत होने से मछली उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने तथा बाजार तक पहुंच बढ़ाने में मदद मिलती है।
इस तरह की आधारभूत संरचना मछली उत्पादन के बाद होने वाले नुकसान को कम करने और उत्पाद के बेहतर मूल्य प्राप्त करने में भी सहायक हो सकती है।
पीएम-एमकेएसएसवाई में बीमा को बढ़ावा
सरकार ने मत्स्य पालन क्षेत्र में जोखिम कम करने के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (PM-MKSSY) के तहत मत्स्यपालन बीमा को प्रोत्साहित किया है।
इस योजना के अंतर्गत किसानों को मत्स्यपालन बीमा खरीदने के लिए एकमुश्त प्रोत्साहन दिया जाता है। बीमा प्रीमियम पर मिलने वाला प्रोत्साहन भुगतान किए गए प्रीमियम का 40 प्रतिशत है।
सामान्य मत्स्यपालन प्रणालियों के लिए इसकी अधिकतम सीमा 25,000 रुपये प्रति हेक्टेयर या अधिकतम 4 हेक्टेयर जल क्षेत्र के लिए प्रति किसान 1 लाख रुपये, जो निर्धारित सीमा के अनुसार लागू होती है।
इससे मछली पालकों को प्राकृतिक आपदा, बीमारी अथवा अन्य जोखिमों से होने वाले संभावित आर्थिक नुकसान के खिलाफ बेहतर सुरक्षा हासिल करने में मदद मिल सकती है।
आधुनिक मत्स्यपालन प्रणालियों को भी बीमा सहायता
सरकार ने पारंपरिक तालाब आधारित मत्स्यपालन के साथ आधुनिक और गहन मत्स्यपालन प्रणालियों को भी योजना के दायरे में शामिल किया है।
केज कल्चर, रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS), बायोफ्लॉक और रेसवे जैसी प्रणालियों के लिए भी बीमा प्रोत्साहन का प्रावधान है।
इन प्रणालियों में भुगतान किए गए बीमा प्रीमियम का 40 प्रतिशत प्रोत्साहन दिया जाता है, जिसकी अधिकतम सीमा 1,800 वर्ग मीटर क्षेत्र के लिए प्रति किसान 1 लाख रुपये तक निर्धारित है।
आधुनिक मत्स्यपालन प्रणालियों में निवेश अधिक होने के कारण जोखिम प्रबंधन का महत्व भी बढ़ जाता है। ऐसे में बीमा प्रोत्साहन किसानों को आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।
महिलाओं और एससी-एसटी लाभार्थियों को अतिरिक्त प्रोत्साहन
योजना में सामाजिक समावेशन पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला लाभार्थियों को सामान्य श्रेणी के लाभार्थियों की तुलना में 10 प्रतिशत अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाता है।
इस प्रावधान का उद्देश्य मत्स्य पालन क्षेत्र में महिलाओं और वंचित वर्गों की भागीदारी बढ़ाना तथा उन्हें आर्थिक गतिविधियों से अधिक मजबूती से जोड़ना है।
महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से मछली प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, विपणन और छोटे स्तर के मत्स्य उद्यमों में महत्वपूर्ण हो सकती है। अतिरिक्त सहायता से इन गतिविधियों में निवेश के अवसर बढ़ सकते हैं।
किसान क्रेडिट कार्ड से कार्यशील पूंजी की सुविधा
मत्स्य क्षेत्र में काम करने वाले किसानों और मछुआरों के लिए कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करना भी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
इसी उद्देश्य से वित्त वर्ष 2018-19 से मछुआरों और मछली पालकों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।
केसीसी के माध्यम से पात्र लाभार्थियों को मत्स्य पालन से जुड़ी कार्यशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है। इससे चारा, बीज, संचालन और अन्य दैनिक गतिविधियों के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों तक पहुंच आसान हो सकती है।
रोजगार और ग्रामीण आजीविका के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र
मत्स्य पालन का विकास केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इस क्षेत्र से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका जुड़ी है।
मछली पालन, मछली पकड़ने, प्रसंस्करण, परिवहन, पैकेजिंग, विपणन और निर्यात जैसी गतिविधियों में रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। विशेष रूप से ग्रामीण, तटीय और नदी आधारित क्षेत्रों में मत्स्य पालन परिवारों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत है।
सरकार द्वारा उत्पादन से लेकर बाजार तक पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने का प्रयास इसी वजह से महत्वपूर्ण है।
खाद्य और पोषण सुरक्षा में भी अहम भूमिका
मछली उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसके अलावा इसमें कई आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं। ऐसे में मत्स्य क्षेत्र का विकास देश की खाद्य और पोषण सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
घरेलू स्तर पर मछली की उपलब्धता बढ़ने के साथ इसके प्रसंस्करण और वितरण की बेहतर व्यवस्था उपभोक्ताओं तक सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण मत्स्य उत्पाद पहुंचाने में मदद कर सकती है।
निर्यात बढ़ाने की भी बड़ी संभावना
भारत दुनिया के प्रमुख मत्स्य उत्पादक देशों में शामिल है और समुद्री खाद्य उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय बाजार भी भारतीय मत्स्य क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।
बेहतर प्रसंस्करण, कोल्ड चेन, गुणवत्ता नियंत्रण, मूल्य संवर्धन और आधुनिक बुनियादी ढांचे के विकास से भारतीय मत्स्य उत्पादों की वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत किया जा सकता है।
सरकार की योजनाओं का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य घरेलू मत्स्य क्षेत्र को मजबूत करने के साथ निर्यात क्षमता को भी बढ़ाना है।
समग्र विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा क्षेत्र
मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए लागू की जा रही योजनाओं को एक साथ देखा जाए तो सरकार का फोकस उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ बीमा सुरक्षा, संस्थागत वित्त, बुनियादी ढांचा, आधुनिक तकनीक, मूल्य संवर्धन और बाजार संपर्क को मजबूत करने पर है।
पीएमएमएसवाई, एफआईडीएफ और पीएम-एमकेएसएसवाई जैसी योजनाओं के माध्यम से अलग-अलग जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा मछुआरों और मछली पालकों की कार्यशील पूंजी संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मददगार है।
भारत में मत्स्य पालन क्षेत्र तेजी से एक महत्वपूर्ण कृषि-संबद्ध आर्थिक क्षेत्र के रूप में उभर रहा है। कृषि GVA में 7.43 प्रतिशत योगदान इसकी बढ़ती आर्थिक भूमिका को दर्शाता है। सरकार की योजनाओं के जरिए उत्पादन, बुनियादी ढांचे, वित्तीय सहायता, बीमा और आधुनिक मत्स्यपालन को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।
विशेष रूप से पीएम-एमकेएसएसवाई के तहत बीमा प्रीमियम पर 40 प्रतिशत प्रोत्साहन और महिलाओं तथा एससी/एसटी लाभार्थियों के लिए अतिरिक्त सहायता जैसे प्रावधान छोटे मछली पालकों के लिए जोखिम कम करने में मददगार हो सकते हैं।
यदि इन योजनाओं का लाभ प्रभावी तरीके से जमीनी स्तर तक पहुंचता है, तो इससे मछुआरों और मछली पालकों की आय, रोजगार, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ भारत के मत्स्य क्षेत्र को अधिक आधुनिक, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिल सकती है।

