ग्रामीण भारत में किसानों, छोटे उद्यमियों, कमजोर वर्गों और अन्य ग्रामीण परिवारों को संस्थागत ऋण उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (Regional Rural Banks-RRBs) ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान ऋण वितरण और प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण के क्षेत्र में मजबूत प्रदर्शन किया है। वित्त वर्ष के दौरान आरआरबी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ऋण जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ वित्तीय समावेशन को आगे बढ़ाने पर अपना विशेष ध्यान बनाए रखा।
सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में 5,24,163 करोड़ रुपये रहा आरआरबी का सकल बकाया ऋण वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर 5,78,349 करोड़ रुपये हो गया। इस तरह आरआरबी के सकल बकाया ऋण में एक वर्ष के दौरान 10.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
यह वृद्धि ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि, संबद्ध गतिविधियों, सूक्ष्म उद्यमों और स्वरोजगार के लिए संस्थागत वित्त की आवश्यकता लगातार बनी हुई है। आरआरबी की बढ़ती ऋण पहुंच किसानों और ग्रामीण उद्यमियों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण में 91.7 प्रतिशत की औसत उपलब्धि
आरआरबी के प्रदर्शन का एक महत्वपूर्ण पहलू प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending-PSL) रहा। भारतीय रिजर्व बैंक के प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण ढांचे के तहत आरआरबी के लिए निर्धारित समग्र पीएसएल लक्ष्य समायोजित शुद्ध बैंक ऋण (ANBC) का 75 प्रतिशत है।
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान आरआरबी ने इस निर्धारित लक्ष्य से कहीं अधिक प्रदर्शन किया। आंकड़ों के अनुसार, आरआरबी की प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण में औसत उपलब्धि एएनबीसी के 91.7 प्रतिशत तक पहुंच गई।
लगभग सभी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने निर्धारित समग्र पीएसएल लक्ष्य हासिल किया। यह प्रदर्शन दर्शाता है कि आरआरबी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उन क्षेत्रों तक संस्थागत ऋण पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जिन्हें प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के अंतर्गत रखा गया है।
पीएसएल का उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली के ऋण को कृषि, एमएसएमई, कमजोर वर्गों और अन्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों तक पहुंचाना है। आरआरबी का 91.7 प्रतिशत का औसत प्रदर्शन इस दिशा में उनकी मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
कृषि और संबद्ध गतिविधियां आरआरबी के ऋण पोर्टफोलियो का सबसे बड़ा हिस्सा
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के ऋण पोर्टफोलियो में कृषि एवं संबद्ध गतिविधियां सबसे बड़ा घटक बनी हुई हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के तहत कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए लगभग 3.78 लाख करोड़ रुपये का बकाया ऋण दर्ज किया गया।
यह कुल प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण का लगभग 77 प्रतिशत है।
यह आंकड़ा बताता है कि ग्रामीण भारत में कृषि वित्त उपलब्ध कराने में आरआरबी की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। किसान फसल उत्पादन के साथ-साथ कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियों के लिए भी ऋण की आवश्यकता महसूस करते हैं। कृषि ऋण के माध्यम से किसानों को उत्पादन संबंधी खर्च, कृषि गतिविधियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश के लिए वित्तीय सहायता मिलती है।
सरकार के अनुसार कृषि ऋण में फसल खेती, संबद्ध कृषि गतिविधियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश को समर्थन मिला। इससे कृषि क्षेत्र की संस्थागत ऋण जरूरतों को पूरा करने में आरआरबी की भूमिका मजबूत हुई है।
कृषि ऋण में लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा
आरआरबी के प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण में कृषि का महत्व इस बात से भी स्पष्ट होता है कि कृषि ऋण कृषि क्षेत्र से संबंधित कुल ऋण का लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा रहा।
कृषि क्षेत्र में संस्थागत ऋण की उपलब्धता किसानों को अनौपचारिक ऋण स्रोतों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती है। विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए समय पर बैंकिंग ऋण कृषि गतिविधियों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कृषि के साथ संबद्ध गतिविधियों को भी आरआरबी के ऋण पोर्टफोलियो में महत्वपूर्ण स्थान मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन और अन्य कृषि आधारित गतिविधियां किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत बन रही हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों के लिए संस्थागत ऋण ग्रामीण आय में विविधता लाने में मददगार हो सकता है।
एमएसएमई को 66,978 करोड़ रुपये का ऋण
ग्रामीण आर्थिक विकास केवल कृषि पर निर्भर नहीं है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में छोटे व्यवसाय, स्वरोजगार, कारीगर और सूक्ष्म उद्यम भी रोजगार तथा स्थानीय आर्थिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण आधार हैं।
वित्त वर्ष 2025-26 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्र को 66,978 करोड़ रुपये का ऋण उपलब्ध कराया। यह आरआरबी के कुल प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण का लगभग 13.6 प्रतिशत रहा।
एमएसएमई क्षेत्र को आरआरबी द्वारा दिए गए ऋण का 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सूक्ष्म उद्यमों को गया। इससे पता चलता है कि आरआरबी का ध्यान ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में छोटे स्तर पर व्यवसाय शुरू करने वाले लोगों तक वित्तीय सहायता पहुंचाने पर है।
इनमें पहली पीढ़ी के उद्यमी, स्वरोजगार से जुड़े लोग, कारीगर और छोटी व्यावसायिक इकाइयां शामिल हैं।
सेवा क्षेत्र को एमएसएमई ऋण में सबसे अधिक हिस्सा
एमएसएमई ऋण में सेवा क्षेत्र का हिस्सा सबसे बड़ा रहा। इसके बाद विनिर्माण उद्यम और खादी एवं ग्रामोद्योग का स्थान रहा।
ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा क्षेत्र का विस्तार रोजगार और आय के नए अवसर पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। छोटे व्यवसायों को बैंक ऋण मिलने से वे अपनी गतिविधियों का विस्तार करने, उपकरण खरीदने और रोजगार पैदा करने में सक्षम हो सकते हैं।
वहीं विनिर्माण तथा खादी एवं ग्रामोद्योग से जुड़े उद्यमों को ऋण उपलब्ध कराने से स्थानीय स्तर पर उत्पादन और स्वरोजगार को बढ़ावा मिल सकता है।
आरआरबी द्वारा सूक्ष्म उद्यमों पर विशेष ध्यान ग्रामीण अर्थव्यवस्था में छोटे व्यवसायों के महत्व को भी दर्शाता है।
कमजोर वर्गों को 3.49 लाख करोड़ रुपये का ऋण
वित्तीय समावेशन के लिहाज से आरआरबी के प्रदर्शन का एक और महत्वपूर्ण पहलू कमजोर वर्गों को ऋण उपलब्ध कराना रहा।
वित्त वर्ष 2025-26 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने कमजोर वर्गों को लगभग 3.49 लाख करोड़ रुपये का ऋण उपलब्ध कराया।
यह आंकड़ा ग्रामीण समाज के उन वर्गों तक संस्थागत ऋण पहुंचाने में आरआरबी की भूमिका को रेखांकित करता है, जिनके लिए औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था तक पहुंच विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
कमजोर वर्गों को संस्थागत ऋण उपलब्ध होने से उनकी वित्तीय जरूरतों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से पूरा करने में मदद मिलती है। इससे वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के साथ-साथ ग्रामीण परिवारों की आर्थिक गतिविधियों को भी समर्थन मिल सकता है।
आवास और शिक्षा के लिए भी ऋण सुविधा
आरआरबी ने केवल कृषि और व्यवसायों तक ऋण को सीमित नहीं रखा, बल्कि आवास, शिक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा और सामाजिक अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में भी ऋण उपलब्ध कराया।
आवास ऋण ग्रामीण परिवारों को अपनी आवासीय परिसंपत्तियां विकसित करने में मदद कर सकता है, जबकि शिक्षा ऋण मानव पूंजी निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।
इसी तरह नवीकरणीय ऊर्जा के लिए वित्तीय सहायता स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने की दिशा में योगदान कर सकती है। सामाजिक अवसंरचना के लिए ऋण स्थानीय स्तर पर आवश्यक सुविधाओं के निर्माण और विकास को समर्थन दे सकता है।
इस प्रकार आरआरबी का ऋण वितरण ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को एक साथ समर्थन देने की दिशा में आगे बढ़ा है।
वित्तीय समावेशन को मिला मजबूत आधार
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना का मूल उद्देश्य ग्रामीण और कृषि प्रधान क्षेत्रों में बैंकिंग एवं ऋण सुविधाओं को मजबूत करना रहा है। ऐसे में वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि आरआरबी अभी भी ग्रामीण वित्तीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
सकल बकाया ऋण में 10.3 प्रतिशत की वृद्धि, पीएसएल में 91.7 प्रतिशत की औसत उपलब्धि, कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों के लिए 3.78 लाख करोड़ रुपये का बकाया ऋण और कमजोर वर्गों को 3.49 लाख करोड़ रुपये का ऋण इस भूमिका को स्पष्ट करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग पहुंच बढ़ने से किसान और छोटे उद्यमी औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जुड़ सकते हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलने की संभावना बढ़ती है।
किसानों के लिए संस्थागत ऋण का महत्व
कृषि में समय पर वित्त की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण होती है। किसान को फसल उत्पादन के अलग-अलग चरणों में वित्तीय जरूरत होती है। इसके अलावा कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियों के लिए भी पूंजी की आवश्यकता होती है।
आरआरबी द्वारा कृषि और संबद्ध क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर ऋण उपलब्ध कराया जाना ग्रामीण वित्तीय व्यवस्था में कृषि की केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है।
कृषि ऋण के साथ-साथ पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी जैसी गतिविधियों को वित्तीय सहायता मिलने से किसान अपनी आय के स्रोतों में विविधता ला सकते हैं। यह ग्रामीण परिवारों को केवल एक फसल या एक आय स्रोत पर निर्भरता से बाहर निकलने में मदद कर सकता है।
ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने में आरआरबी की भूमिका
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय बढ़ाने के लिए स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देना आवश्यक है। छोटे दुकानदारों, कारीगरों, सेवा प्रदाताओं और सूक्ष्म उद्यमियों को समय पर वित्त उपलब्ध होने से वे अपने कारोबार को आगे बढ़ा सकते हैं।
एमएसएमई क्षेत्र में दिए गए 66,978 करोड़ रुपये के ऋण में 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सूक्ष्म उद्यमों को जाना इस बात का संकेत है कि आरआरबी छोटे स्तर के उद्यमों को वित्तीय सहायता देने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।
पहली पीढ़ी के उद्यमियों के लिए बैंक ऋण विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि उनके पास बड़े व्यवसाय की तरह पर्याप्त पूंजी या संपत्ति का आधार हमेशा उपलब्ध नहीं होता।
वित्तीय समावेशन से आगे बढ़कर समावेशी विकास
आरआरबी की भूमिका केवल बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। इन बैंकों के माध्यम से कृषि, छोटे व्यवसाय, आवास, शिक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा और कमजोर वर्गों जैसे अनेक क्षेत्रों को ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है।
इससे वित्तीय समावेशन को समावेशी आर्थिक विकास से जोड़ने में मदद मिलती है।
यदि ग्रामीण परिवारों, किसानों और छोटे उद्यमियों को संस्थागत वित्त आसानी से उपलब्ध होता है, तो वे अपनी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने और परिसंपत्तियां बनाने में निवेश कर सकते हैं।
इसी तरह शिक्षा और आवास जैसे क्षेत्रों में ऋण ग्रामीण परिवारों की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में योगदान दे सकता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संकेत
वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ऋण की मांग और संस्थागत वित्त की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है।
सकल बकाया ऋण का 5.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचना आरआरबी की ऋण वितरण क्षमता में विस्तार को दर्शाता है। वहीं प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र में 91.7 प्रतिशत की औसत उपलब्धि बताती है कि इन बैंकों ने ग्रामीण और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में ऋण पहुंच बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया है।
कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों का 77 प्रतिशत हिस्सा यह भी बताता है कि आरआरबी का ऋण पोर्टफोलियो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरतों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
समावेशी और संतुलित आर्थिक विकास की दिशा में कदम
सरकार के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में आरआरबी का वित्तीय प्रदर्शन ग्रामीण ऋण के निरंतर विस्तार, राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं के साथ मजबूत तालमेल और किसानों, सूक्ष्म उद्यमों तथा अन्य वंचित वर्गों को लगातार सहायता को दर्शाता है।
आरआरबी वित्तीय समावेशन को बढ़ाने और ग्रामीण आजीविकाओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण आधार स्तंभ बने हुए हैं।
ग्रामीण भारत में कृषि और गैर-कृषि दोनों क्षेत्रों के विकास के लिए संस्थागत वित्त की भूमिका आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है। कृषि के साथ ग्रामीण उद्यमिता, एमएसएमई, नवीकरणीय ऊर्जा और सामाजिक अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में ऋण विस्तार से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में व्यापक आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।
वित्त वर्ष 2025-26 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का प्रदर्शन ग्रामीण भारत के लिए महत्वपूर्ण संकेत लेकर आया है। सकल बकाया ऋण में 10.3 प्रतिशत की वृद्धि के साथ यह आंकड़ा 5.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। वहीं प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण में आरआरबी की औसत उपलब्धि 91.7 प्रतिशत रही, जो निर्धारित 75 प्रतिशत लक्ष्य से काफी अधिक है।
कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों को 3.78 लाख करोड़ रुपये, एमएसएमई क्षेत्र को 66,978 करोड़ रुपये और कमजोर वर्गों को 3.49 लाख करोड़ रुपये का ऋण उपलब्ध कराया जाना आरआरबी की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में व्यापक भूमिका को दर्शाता है।
विशेष रूप से सूक्ष्म उद्यमों को एमएसएमई ऋण का 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मिलना ग्रामीण उद्यमिता और स्वरोजगार को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
कुल मिलाकर, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक किसानों, छोटे उद्यमियों, कमजोर वर्गों और ग्रामीण परिवारों को संस्थागत वित्त से जोड़ने के साथ ग्रामीण आजीविका, वित्तीय समावेशन और संतुलित आर्थिक विकास को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आने वाले वर्षों में इन बैंकों की पहुंच, डिजिटल सेवाओं और ऋण क्षमता को और मजबूत करना ग्रामीण भारत की आर्थिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

