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Home कृषि समाचार

UP और Rajasthan में Crop Residue Management: पराली से Pollution नहीं, Profit की ओर

Crop Residue Management in UP and Rajasthan: Moving from Stubble Pollution to Profit

Fiza by Fiza
October 3, 2026
in कृषि समाचार
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Crop Residue Management

Crop Residue Management

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उत्तर प्रदेश और राजस्थान भारत के प्रमुख कृषि राज्यों में शामिल हैं। दोनों राज्यों की खेती का स्वरूप अलग-अलग होने के बावजूद एक समस्या तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही है, और वह है Crop Residue Management, यानी फसल कटाई के बाद खेत में बचने वाले अवशेषों का सही प्रबंधन। धान का पुआल, गेहूं की पराली, सरसों के डंठल, बाजरे और मक्का के अवशेष, गन्ने की पत्तियां तथा दूसरी फसलों से निकलने वाला जैविक पदार्थ किसान के लिए कभी उपयोगी संसाधन होता है तो कभी अगली फसल की तैयारी में बाधा बन जाता है।

समस्या तब बढ़ती है जब किसान के पास खेत खाली करने के लिए समय कम हो, मजदूर उपलब्ध न हों, मशीन महंगी हो या अवशेष के उपयोग का स्थानीय बाजार मौजूद न हो। ऐसी स्थिति में खेत में अवशेष जलाना सबसे आसान विकल्प दिखाई देता है। लेकिन इससे खेत तुरंत साफ भले हो जाए, लंबे समय में मिट्टी, हवा और खेती की लागत पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।

आज जरूरत इस बात की है कि Crop Residue को बेकार सामग्री के बजाय कृषि संसाधन के रूप में देखा जाए। सही तकनीक, मशीनरी, किसान समूह, स्थानीय उद्योग और सरकारी सहायता को एक साथ जोड़ दिया जाए तो उत्तर प्रदेश और राजस्थान में फसल अवशेष से खाद, पशु चारा, Biomass Fuel, Bioenergy, Compost, Mulch और औद्योगिक कच्चा माल तैयार किया जा सकता है।

क्या है Crop Residue Management?

फसल काटने के बाद खेत या खलिहान में बचा पौधों का हिस्सा Crop Residue कहलाता है। इसमें तना, पत्तियां, भूसा, डंठल, जड़ और अन्य जैविक पदार्थ शामिल हो सकते हैं। इन अवशेषों को खेत में मिलाना, सतह पर फैलाना, खाद में बदलना, पशुओं के लिए उपयोग करना, मशीन से इकट्ठा करना या ऊर्जा उत्पादन के लिए भेजना Crop Residue Management कहलाता है।  इसके दो प्रमुख तरीके हैं: In-situ Crop Residue Management में अवशेष खेत के अंदर ही प्रबंधित किए जाते हैं। इसमें Mulching, Incorporation, Bio-Decomposer और Happy Seeder जैसी तकनीकें शामिल हैं। दूसरा तरीका Ex-situ Crop Residue Management है। इसमें अवशेष को खेत से बाहर निकालकर पशु चारा, Compost, Biomass Pellet, Biofuel, Industrial Fuel या अन्य उपयोगों के लिए भेजा जाता है।

दोनों तरीके जरूरी हैं। प्रत्येक किसान और प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक ही तकनीक उपयोगी हो, यह आवश्यक नहीं है। समाधान फसल, मिट्टी, सिंचाई, उपलब्ध मशीन, बाजार और अगली फसल की बुवाई के समय को देखकर तय किया जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश में Crop Residue Management की स्थिति

उत्तर प्रदेश में धान-गेहूं आधारित खेती बड़े क्षेत्र में की जाती है। धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच कई क्षेत्रों में समय काफी कम मिलता है। खासकर Combine Harvester से धान की कटाई होने पर खेत में बड़ी मात्रा में पुआल और ठूंठ रह जाते हैं। ICAR के अनुसार उत्तर प्रदेश में सालाना लगभग 20 million tonnes धान का पुआल पैदा होता है। इसका एक हिस्सा पशु चारे और घरेलू उपयोग में जाता है, लेकिन बड़ी मात्रा का बेहतर उपयोग करने की गुंजाइश अभी भी मौजूद है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश और तराई क्षेत्रों में धान महत्वपूर्ण फसल है, जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गेहूं, धान और गन्ना प्रमुख हैं। इसलिए हर क्षेत्र में Crop Residue Management की चुनौती एक जैसी नहीं है।

गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में Sugarcane Trash का उपयोग Mulching और Composting में किया जा सकता है। धान वाले क्षेत्रों में Happy Seeder, Super Seeder, Zero Till Drill, Mulcher और Bio-Decomposer अधिक उपयोगी हो सकते हैं। गेहूं के भूसे की पशुपालन में मांग होने के कारण उसका आर्थिक उपयोग अपेक्षाकृत आसान है। इसका अर्थ यह है कि उत्तर प्रदेश को एक ही मॉडल पर निर्भर रहने के बजाय District-specific Crop Residue Management Model अपनाने की जरूरत है।

राजस्थान में फसल अवशेष की चुनौती अलग क्यों है?

राजस्थान की कृषि परिस्थितियां उत्तर प्रदेश से काफी अलग हैं। राज्य के बड़े हिस्से में कम वर्षा, सीमित सिंचाई और शुष्क जलवायु खेती को प्रभावित करती है। यहां बाजरा, गेहूं, सरसों, चना, जौ, मक्का, कपास और अन्य फसलों से विभिन्न प्रकार के Crop Residue उत्पन्न होते हैं।

राजस्थान में पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के कारण फसल अवशेष का बड़ा भाग Fodder यानी पशु चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। बाजरे की कड़बी और गेहूं का भूसा इसका सामान्य उदाहरण हैं।

इसके बावजूद प्रत्येक प्रकार का अवशेष पशु चारे के लिए उपयुक्त नहीं होता। सरसों, कपास और कुछ दूसरी फसलों के डंठल बड़ी मात्रा में खेतों में रह सकते हैं। ऐसे अवशेषों को Biomass, Composting, Mulching और औद्योगिक उपयोग से जोड़ना उपयोगी हो सकता है।

राजस्थान में Crop Residue Management का एक और महत्वपूर्ण लाभ मिट्टी में नमी संरक्षण से जुड़ा है। शुष्क क्षेत्रों में खेत की सतह पर नियंत्रित मात्रा में Residue Mulch रखने से मिट्टी से पानी के तेजी से वाष्पीकरण को कम करने में मदद मिल सकती है। Conservation Agriculture के संदर्भ में यह तरीका काफी महत्वपूर्ण है।

पराली जलाने से समस्या क्यों बढ़ती है?

फसल अवशेष जलाने का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव धुएं के रूप में दिखाई देता है। Burning से निकलने वाला धुआं स्थानीय Air Quality को खराब कर सकता है और आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण बढ़ा सकता है। लेकिन नुकसान केवल हवा तक सीमित नहीं रहता। बार-बार आग लगाने से मिट्टी की सतह पर मौजूद उपयोगी जैविक पदार्थ कम हो सकते हैं। मिट्टी के Microorganisms और Soil Biological Activity प्रभावित हो सकती है। Crop Residue में मौजूद Carbon और Nutrients का वह हिस्सा भी खेत से निकल जाता है, जिसे उचित प्रबंधन के जरिए मिट्टी में वापस पहुंचाया जा सकता था। Residue को जलाने की जगह मिट्टी में मिलाने या Mulch के रूप में रखने से धीरे-धीरे Soil Organic Matter बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

पराली को केवल प्रदूषण का विषय मानना भी अधूरा दृष्टिकोण है। किसान अक्सर समय, लागत और संसाधनों की मजबूरी में ऐसा कदम उठाता है। इसलिए केवल प्रतिबंध लगाने से स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। किसान के सामने ऐसा विकल्प होना चाहिए जो आसानी से उपलब्ध हो, आर्थिक रूप से संभव हो और अगली फसल की बुवाई में देरी न करे।

In-situ Crop Residue Management कैसे काम करता है?

In-situ Management का अर्थ है कि अवशेष को खेत से बाहर ले जाने के बजाय वहीं उपयोग किया जाए। इसके कई तरीके हैं।

Happy Seeder

धान कटने के बाद गेहूं की सीधी बुवाई के लिए Happy Seeder महत्वपूर्ण मशीन मानी जाती है। यह मशीन धान के अवशेष के बीच गेहूं का बीज बो सकती है और कटे हुए Straw को मिट्टी की सतह पर Mulch की तरह रहने देती है।

ICAR के अनुसार Happy Seeder धान कटाई के बाद खेत में गेहूं की Direct Seeding करने के लिए बनाया गया है। Residue को सतह पर रखने से Soil Moisture Conservation और Soil Health में सहायता मिल सकती है। इस तकनीक का बड़ा लाभ यह है कि किसान को केवल खेत साफ करने के लिए पराली जलाने की आवश्यकता कम हो सकती है।

Super Seeder

Super Seeder Crop Residue Management और गेहूं की बुवाई दोनों कार्यों को एक साथ करने में मदद करता है। यह खेत में मौजूद धान के अवशेष को मिट्टी में मिलाते हुए Seed Sowing कर सकता है। जहां किसान Residue को पूरी तरह Mulch के रूप में नहीं रखना चाहता, वहां यह उपयोगी विकल्प हो सकता है।

Zero Till Drill

Zero Tillage खेती की ऐसी पद्धति है जिसमें खेत को बार-बार जोतने की जरूरत कम की जाती है। Zero Till Drill के जरिए कम Tillage के साथ बीज बोया जा सकता है। इससे समय, Diesel, Labour और Field Preparation Cost में कमी लाने की संभावना रहती है। धान के बाद गेहूं की जल्दी बुवाई करने वाले क्षेत्रों में Zero Tillage विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है।

Mulcher और Straw Chopper

Mulcher या Straw Chopper फसल अवशेष को छोटे टुकड़ों में काटकर खेत में समान रूप से फैला सकता है। छोटे आकार के Crop Residue मिट्टी में जल्दी मिलने लगते हैं। सतह पर छोड़ा गया Residue Mulch खेत में नमी बनाए रखने, खरपतवार दबाने और Soil Organic Matter बढ़ाने में योगदान दे सकता है।

Bio-Decomposer की बढ़ती भूमिका

Crop Residue Management में जैविक समाधान भी तेजी से महत्वपूर्ण हो रहे हैं। इनमें Bio-Decomposer प्रमुख है। ICAR-IARI द्वारा विकसित Pusa Decomposer Microbial Consortium आधारित तकनीक है, जिसका इस्तेमाल धान के पुआल सहित विभिन्न कृषि अवशेषों के विघटन को तेज करने के लिए किया जा सकता है। ICAR के अनुसार Microbial Culture को अवशेष मिट्टी में मिलाने से पहले उपयोग करने से Residue Decomposition तेज किया जा सकता है। इसका मूल सिद्धांत काफी सरल है। सूक्ष्मजीव फसल अवशेष को धीरे-धीरे तोड़ते हैं और उसे मिट्टी में मिलने योग्य Organic Material में बदलने में सहायता करते हैं।

लेकिन Bio-Decomposer को जादुई समाधान मानना भी सही नहीं होगा। इसके प्रभाव के लिए Residue का सही फैलाव, पर्याप्त नमी, उचित Field Condition और Application Method जरूरी हैं।

उत्तर प्रदेश में Microbial Technologies पर काफी काम हो रहा है। ICAR-NBAIM, Mau द्वारा किसानों को Microbial Bioinputs, Soil Health और Sustainable Farming से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए गए हैं।

Rapid Composting भी बन सकता है विकल्प

Crop Residue को जलाने के बजाय Compost में बदलना छोटे और मध्यम किसानों के लिए उपयोगी मॉडल बन सकता है।पूर्वी उत्तर प्रदेश में ICAR-NBAIM से जुड़ी Rapid Composting Technology के तहत Crop Residue को छोटे टुकड़ों में काटकर Decomposer, गुड़ तथा गोबर जैसे पदार्थों के साथ Composting प्रक्रिया में इस्तेमाल किया गया है। ICAR द्वारा प्रकाशित जानकारी के अनुसार इस मॉडल में लगभग 60 दिनों में Organic Compost तैयार करने का प्रयोग किया गया।इस तरह किसान के लिए वही Residue, जो पहले खेत खाली करने की समस्या था, बाद में Organic Manure बन सकता है।अगर गांव स्तर पर Community Compost Unit बनाई जाए तो एक किसान को अकेले पूरी व्यवस्था बनाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

Ex-situ Crop Residue Management क्या है?

हर Crop Residue को खेत में मिलाना व्यावहारिक नहीं होता। कई बार Residue की मात्रा बहुत अधिक होती है या किसान उसे बेचकर अतिरिक्त आय कमाना चाहता है। ऐसी स्थिति में Ex-situ Management उपयोगी है।सबसे पहले Baler Machine से Residue को इकट्ठा करके गांठों यानी Bales में बदला जा सकता है। इन Bales को Transport करना खुले पुआल की तुलना में आसान होता है।इसके बाद Crop Residue के कई उपयोग संभव हैं: Biomass Power Plants में Fuel, Biomass Pellets या Briquettes का निर्माण, Biofuel Production, Paper और Packaging Industry में Raw Material, Compost Manufacturing, Mushroom Production, Animal Bedding और कुछ स्थितियों में पशु चारा। ICAR द्वारा Crop Residue Management के लिए Baler सहित Ex-situ विकल्पों को भी बढ़ावा दिया गया है।यह मॉडल तभी सफल होगा जब किसान के खेत से Residue उठाने वाला Buyer या Aggregator उपलब्ध हो। केवल मशीन खरीदना पर्याप्त नहीं है। पूरी Supply Chain बनानी पड़ेगी।

Biomass Economy से गांवों को नया अवसर

उत्तर प्रदेश और राजस्थान में Crop Residue Management को यदि Biomass Economy के साथ जोड़ा जाए तो यह किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकता है।कल्पना कीजिए कि एक गांव या Farmer Producer Organisation आसपास के किसानों से Crop Residue एकत्र करता है। Baler से उसे Compact किया जाता है और फिर स्थानीय Biomass Plant या Pellet Unit तक पहुंचाया जाता है।इस व्यवस्था में किसान को Residue का मूल्य मिलता है, गांव में Collection और Transportation का काम पैदा होता है और उद्योग को Raw Material मिलता है।यह Circular Economy का व्यावहारिक उदाहरण हो सकता है, जिसमें खेती से निकला Waste दोबारा आर्थिक चक्र का हिस्सा बनता है।लेकिन इसके लिए Biomass Unit खेत से बहुत ज्यादा दूर नहीं होनी चाहिए। Transportation Cost बढ़ने पर पूरे मॉडल की आर्थिक व्यवहार्यता कमजोर पड़ सकती है।इसलिए Decentralized Biomass Collection Centres और स्थानीय Processing Units की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

Custom Hiring Centre क्यों जरूरी हैं?

Crop Residue Management से जुड़ी मशीनें प्रत्येक छोटे किसान के लिए खरीदना संभव नहीं है। यही कारण है कि Custom Hiring Centre उपयोगी मॉडल है।इस व्यवस्था में किसान मशीन खरीदने के बजाय जरूरत के समय किराए पर ले सकता है।एक Custom Hiring Centre में स्थानीय आवश्यकता के अनुसार Happy Seeder, Super Seeder, Mulcher, Zero Till Drill, Straw Chopper, Baler, Rake और अन्य Farm Machinery रखी जा सकती हैं।लेकिन केवल मशीन उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। मशीन सही समय पर उपलब्ध होनी चाहिए।यदि किसी गांव में 100 किसानों को 10 दिनों के अंदर Super Seeder चाहिए और मशीन केवल एक है तो किसानों की समस्या बनी रहेगी। इसलिए Machine Mapping, Advance Booking और Village-level Scheduling को Crop Residue Management योजना का हिस्सा बनाना जरूरी है।

सरकारी कार्यक्रमों में CRM Machinery, Demonstration और Farmer Training पर भी जोर दिया गया है। ICAR के अनुसार KVKs ने Happy Seeder, Smart Seeder, Super Seeder, Surface Seeder, Zero Till Drill, Mulcher तथा Bio-decomposer जैसे विकल्पों पर प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रम चलाए हैं।

Farmer Producer Organisation की भूमिका

FPO यानी Farmer Producer Organisation Crop Residue Management को बड़े स्तर पर व्यावहारिक बना सकता है। एक छोटे किसान के पास केवल कुछ एकड़ का Residue हो सकता है। इतनी कम मात्रा को अलग से बाजार तक पहुंचाना लाभकारी नहीं होता। लेकिन 200 या 500 किसानों का Residue इकट्ठा हो जाए तो Volume काफी बढ़ जाता है।FPO किसानों से Crop Residue एकत्र कर सकता है, Baling की व्यवस्था कर सकता है, उद्योग के साथ Supply Contract कर सकता है और भुगतान को किसानों तक पहुंचा सकता है।

राजस्थान जैसे बड़े भौगोलिक क्षेत्र वाले राज्य में Cluster-based FPO Model विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। उत्तर प्रदेश में भी Rice-Wheat और Sugarcane Clusters के अनुसार अलग-अलग Residue Management Business Model बनाए जा सकते हैं।

पशुपालन और Crop Residue का संबंध

राजस्थान और उत्तर प्रदेश दोनों में पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए Crop Residue Management की योजना बनाते समय Fodder Security को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।गेहूं का भूसा और बाजरे की कड़बी जैसे अवशेष पशुओं के लिए पहले से उपयोग किए जाते हैं। ऐसी सामग्री को बिना स्थानीय जरूरत समझे Biomass Plant तक भेजना सही रणनीति नहीं होगी।पहली प्राथमिकता यह समझना होनी चाहिए कि कौन-सा Residue पशु चारे के काम आता है, कौन-सा Compost में उपयोग हो सकता है और कौन-सा Industrial Biomass के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। इसी को Integrated Residue Management Planning कहा जा सकता है।

Soil Health के लिए क्यों महत्वपूर्ण है Crop Residue?

मिट्टी केवल खनिज कणों का मिश्रण नहीं है। उसमें Organic Matter, Microorganisms, Moisture और Nutrients का संतुलन खेती की उत्पादकता तय करता है।फसल खेत से पोषक तत्व लेती है। कटाई के बाद उसके अवशेष में भी Nutrients और Carbon मौजूद रहते हैं। जब Residue का एक हिस्सा मिट्टी में वापस जाता है तो Nutrient Cycling बेहतर करने में मदद मिल सकती है।Residue Retention, Mulching और Compost Application से Soil Organic Carbon को बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।सतह पर Mulch रहने से मिट्टी सीधे तेज धूप के संपर्क में कम आती है। राजस्थान जैसे गर्म और शुष्क क्षेत्रों में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।इसके साथ ही Conservation Agriculture के तीन प्रमुख विचार, Minimum Soil Disturbance, Soil Cover और Crop Diversification, Crop Residue Management से सीधे जुड़े हैं।

किसानों के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक बाधाएं

Crop Residue Management के बारे में तकनीकें उपलब्ध हैं, फिर भी किसान हर जगह इन्हें क्यों नहीं अपनाता?

  • इसका पहला कारण Cost है। मशीन खरीदना हर किसान के लिए संभव नहीं है।
  • दूसरा कारण Availability है। मशीन मौजूद हो लेकिन कटाई के तुरंत बाद उपलब्ध न मिले तो किसान इंतजार नहीं कर सकता।
  • तीसरा कारण अगली फसल की बुवाई का सीमित समय है। धान कटाई और गेहूं बुवाई के बीच कुछ क्षेत्रों में बहुत कम समय मिलता है।
  • चौथा कारण छोटे और बिखरे हुए खेत हैं। बड़ी मशीन हर खेत में आसानी से नहीं चल सकती।
  • पांचवां कारण Crop Residue का सुनिश्चित बाजार न होना है।
  • छठा कारण तकनीकी जानकारी की कमी है। किसान के पास मशीन हो लेकिन सही Speed, Moisture Condition या Field Preparation की जानकारी न हो तो परिणाम अपेक्षा के अनुसार नहीं मिलेंगे।

इसलिए समाधान केवल Subsidy देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। Technology, Training, Logistics और Market Linkage को एक साथ जोड़ना होगा।

UP के लिए कौन-सी रणनीति अधिक उपयोगी हो सकती है?

उत्तर प्रदेश में Rice-Wheat Belt में Happy Seeder, Super Seeder, Zero Tillage और Bio-Decomposer आधारित मॉडल को मजबूत किया जा सकता है।जहां धान का Residue अधिक है और Biomass Industry उपलब्ध है, वहां Baler और Collection Centres विकसित किए जा सकते हैं। गन्ना क्षेत्रों में Sugarcane Trash Mulching और Composting पर विशेष काम किया जा सकता है।पूर्वी उत्तर प्रदेश में छोटे किसानों की संख्या अधिक होने के कारण Individual Machine Ownership के बजाय Custom Hiring और Farmer Group Model ज्यादा व्यावहारिक हो सकता है।साथ ही KVK, FPO, Cooperative और Panchayat को एक ही Platform पर लाकर Harvesting Season से पहले Machine Availability Plan तैयार किया जा सकता है।

Rajasthan के लिए रणनीति कैसी हो?

राजस्थान में Crop Residue Management का मॉडल स्थानीय जलवायु और Livestock Economy के अनुसार होना चाहिए।जहां Residue पशु चारा है, वहां उसका Fodder Value प्राथमिकता में रखा जाए।गैर-चारा Residue को Biomass Pellet, Briquette, Compost और Industrial Fuel के साथ जोड़ा जा सकता है।

सूखे क्षेत्रों में Residue Mulching और Moisture Conservation पर विशेष जोर दिया जा सकता है।Irrigated Areas में Conservation Agriculture और Zero Tillage को स्थानीय फसल प्रणाली के अनुसार अपनाया जा सकता है।राज्य में दूरी अधिक होने के कारण बड़े Centralized Biomass Plants पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय छोटे Decentralized Processing Centres अधिक व्यावहारिक हो सकते हैं।

नई Technology क्या बदलाव ला सकती है?

भविष्य में Crop Residue Management केवल Tractor और Machine तक सीमित नहीं रहेगा।Satellite Monitoring, GIS Mapping, Mobile Apps, Drone Mapping और Digital Machine Booking जैसी तकनीकें पूरे सिस्टम को बेहतर बना सकती हैं।उदाहरण के लिए Harvest Season से पहले प्रत्येक गांव में अनुमान लगाया जा सकता है कि कितने hectare क्षेत्र में धान या अन्य फसल कटेगी और कितना Residue पैदा होगा।इसके आधार पर पहले से तय किया जा सकता है कि कितने Super Seeder, Mulcher और Baler की जरूरत पड़ेगी।Mobile App से किसान मशीन का Slot Book कर सकता है।

GPS आधारित सिस्टम से यह पता चल सकता है कि कौन-सी मशीन किस गांव में काम कर रही है।इसके अलावा Biomass Buyers और किसानों को Digital Platform के माध्यम से जोड़ने से Residue Market को अधिक संगठित किया जा सकता है।

केवल जागरूकता नहीं, आर्थिक लाभ दिखाना होगा

किसान किसी तकनीक को लंबे समय तक तभी अपनाता है जब उसे उसका वास्तविक फायदा दिखाई देता है।इसलिए Crop Residue Management की चर्चा केवल Environment Protection के रूप में नहीं होनी चाहिए।किसान को यह पता होना चाहिए कि इससे उसका कितना Diesel बच सकता है, कितनी Labour कम हो सकती है, अगली फसल कितनी जल्दी बोई जा सकती है, Residue बेचकर कितनी अतिरिक्त आय बन सकती है और लंबे समय में Soil Health पर क्या लाभ हो सकता है।जब Environmental Benefit के साथ Farm Economics जुड़ती है तो नई तकनीक को अपनाना आसान हो जाता है।इसी कारण Demonstration Plot महत्वपूर्ण हैं। किसान जब अपने आसपास के किसी किसान के खेत में Happy Seeder, Zero Tillage या Bio-Decomposer का परिणाम देखता है तो तकनीक पर भरोसा बढ़ता है।

सरकार, किसान और उद्योग को साथ आना होगा

Crop Residue Management किसी एक विभाग के प्रयास से पूरी तरह सफल नहीं हो सकता।Agriculture Department मशीन उपलब्ध करा सकता है। KVK Training दे सकता है। Panchayat Collection Point उपलब्ध करा सकती है। FPO किसानों से Residue इकट्ठा कर सकता है। Biomass Industry इसे खरीद सकती है। Transport Operator इसे Plant तक पहुंचा सकता है।जब ये सभी पक्ष एक Value Chain के रूप में काम करेंगे तभी बड़े स्तर पर बदलाव संभव होगा।

उत्तर प्रदेश के NCR क्षेत्र सहित कुछ हिस्सों में Crop Residue Burning को लेकर Monitoring और Action Plans पर सरकारी स्तर पर विशेष ध्यान दिया गया है। CAQM के दस्तावेजों में In-situ Management, Ex-situ Management, Crop Diversification और Stubble Burning Prevention जैसे उपायों को एक साथ लागू करने पर जोर दिया गया है।इससे एक बात साफ है कि भविष्य की नीति केवल खेत में आग रोकने तक सीमित नहीं रह सकती। Residue के लिए वैकल्पिक उपयोग सुनिश्चित करना उतना ही जरूरी है।

Crop Residue से Waste to Wealth की ओर

फसल अवशेष को लंबे समय तक Waste के रूप में देखा गया, जबकि वह वास्तव में Biological Resource है।एक ही Residue को परिस्थितियों के अनुसार Soil Mulch, Compost, Animal Feed, Biomass Fuel, Pellet, Briquette या Industrial Raw Material में बदला जा सकता है।यही Waste to Wealth का वास्तविक अर्थ है।

अगर किसान को Residue बेचने से आय मिले, गांव के युवाओं को Baler, Tractor और Transport Service में रोजगार मिले, स्थानीय उद्योग को Biomass मिले और खेत को Compost मिले तो एक ही समस्या कई आर्थिक अवसर पैदा कर सकती है।इसके लिए स्थानीय स्तर पर Crop Residue Business Model तैयार करने की जरूरत है। हर जिले का Model अलग हो सकता है।

धान वाले जिले में Straw Management प्राथमिकता होगी। सरसों वाले क्षेत्र में Mustard Residue की Value Chain बनाई जा सकती है। बाजरा क्षेत्र में पशु चारा और Surplus Biomass का संतुलन जरूरी होगा। गन्ना क्षेत्रों में Trash Mulching और Composting महत्वपूर्ण होगी।

उत्तर प्रदेश और राजस्थान में Crop Residue Management को केवल पराली जलाने की समस्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह Soil Health, Air Quality, Farm Economics, Livestock, Renewable Energy और Rural Employment से जुड़ा विषय है।

उत्तर प्रदेश में धान-गेहूं प्रणाली के कारण Happy Seeder, Super Seeder, Zero Till Drill, Mulcher, Bio-Decomposer और Rapid Composting जैसी तकनीकों की बड़ी भूमिका हो सकती है। वहीं राजस्थान में Fodder Management, Moisture Conservation, Mulching, Biomass Processing और Decentralized Collection Model अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

सबसे जरूरी बात यह है कि किसान को ऐसा विकल्प मिले जो समय पर उपलब्ध हो और आर्थिक रूप से लाभकारी हो।यदि मशीन केवल कागज पर उपलब्ध है लेकिन कटाई के समय किसान तक नहीं पहुंचती तो योजना प्रभावी नहीं होगी। यदि Biomass Plant है लेकिन Residue खेत से Plant तक पहुंचाने की Supply Chain नहीं है तो बाजार विकसित नहीं होगा। यदि Bio-Decomposer दिया जाता है लेकिन उसके सही उपयोग का प्रशिक्षण नहीं मिलता तो अपेक्षित परिणाम नहीं आएंगे। इसलिए भविष्य का Crop Residue Management चार बातों पर आधारित होना चाहिए: Technology, Farmer Training, Market Linkage और Local Planning।

पराली खेत की समस्या नहीं, एक ऐसा संसाधन है जिसका मूल्य सही व्यवस्था बनने के बाद सामने आता है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े कृषि राज्यों में यदि Crop Residue को व्यवस्थित तरीके से Circular Economy और Sustainable Agriculture से जोड़ा जाए तो इससे प्रदूषण कम करने के साथ किसानों की लागत घटाने, Soil Health सुधारने, Rural Business बढ़ाने और Clean Energy को बढ़ावा देने के नए अवसर बन सकते हैं।

अगला कदम केवल यह पूछना नहीं होना चाहिए कि पराली को जलाने से कैसे रोका जाए। असली सवाल यह होना चाहिए कि किसान के लिए पराली को बचाना, उपयोग करना या बेचना जलाने से ज्यादा आसान और लाभकारी कैसे बनाया जाए। यही सोच Sustainable Crop Residue Management को खेत से लेकर बाजार तक सफल बना सकती है।

 

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