Ganga River Flood: नदी के जलस्तर में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने तटवर्ती इलाकों के किसानों की चिंता बढ़ा दी है। नदी का पानी निचले इलाकों और खेतों तक पहुंचने के बाद सैकड़ों बीघे में लगी सब्जियों की फसल जलमग्न हो गई है। जिन खेतों में कुछ दिन पहले तक हरी-भरी फसलें दिखाई दे रही थीं, वहां अब गंगा का पानी नजर आ रहा है। किसानों को आशंका है कि यदि जलस्तर जल्द नहीं घटा तो उनकी महीनों की मेहनत के साथ खेती में लगाई गई पूरी पूंजी भी डूब सकती है।
गंगा किनारे बसे इलाकों में बड़ी संख्या में किसान सब्जी की खेती पर निर्भर हैं। नदी के किनारे की उपजाऊ जमीन पर किसान हर साल मौसमी सब्जियां उगाकर अपने परिवार का खर्च चलाते हैं। लेकिन इस बार गंगा के बढ़ते जलस्तर ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। कई खेत पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं, जबकि कुछ खेतों में पानी तेजी से बढ़ रहा है।
खेतों तक पहुंचा गंगा का पानी
पिछले कुछ दिनों में गंगा के जलस्तर में बढ़ोतरी के कारण नदी का पानी आसपास के निचले इलाकों में फैलने लगा है। इसका सबसे ज्यादा असर नदी किनारे खेती करने वाले किसानों पर दिखाई दे रहा है। खेतों में पानी भरने के कारण सब्जियों की फसल को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ गया है।
किसानों का कहना है कि सब्जी की खेती में समय और मेहनत के साथ अच्छी-खासी रकम खर्च करनी पड़ती है। बीज खरीदने से लेकर खेत तैयार करने, सिंचाई, खाद और अन्य कृषि कार्यों पर पैसा लगाया जाता है। फसल तैयार होने के बाद किसान बेहतर उत्पादन और बाजार में उचित कीमत मिलने की उम्मीद करते हैं। मगर कटाई से पहले ही खेतों में पानी भर जाने से उनकी पूरी लागत संकट में पड़ गई है।
सैकड़ों बीघे की खेती जलमग्न
गंगा के बढ़ते पानी ने बड़े कृषि क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है। तटवर्ती क्षेत्रों में सैकड़ों बीघे में की गई सब्जियों की खेती पानी में समा गई है। खेतों में कई जगह इतना पानी भर गया है कि फसल का केवल ऊपरी हिस्सा ही दिखाई दे रहा है।
जलभराव लंबे समय तक बने रहने की स्थिति में सब्जियों के पौधों के खराब होने का खतरा रहता है। ऐसे में पानी उतरने के बाद भी पूरी फसल बच पाना मुश्किल हो सकता है। यही वजह है कि किसान लगातार नदी के जलस्तर पर नजर बनाए हुए हैं।
कुछ किसान खेतों से समय रहते तैयार सब्जियां निकालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जिन खेतों में अधिक पानी भर चुका है, वहां पहुंचना भी मुश्किल हो गया है। किसानों के सामने समस्या यह है कि वे अपनी आंखों के सामने फसल को पानी में डूबते देख रहे हैं, लेकिन उसे बचाने के विकल्प सीमित हैं।
लागत डूबने का सता रहा डर
सब्जियों की खेती करने वाले किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता लागत की है। खेत की तैयारी के बाद बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी समेत कई मदों में खर्च होता है। कई किसान अपनी बचत से खेती करते हैं, जबकि कुछ खेती के लिए उधार लेकर भी पैसा लगाते हैं।
ऐसे में फसल खराब होने पर नुकसान केवल वर्तमान सीजन तक सीमित नहीं रहता। इसका असर किसान के परिवार की आर्थिक स्थिति और अगली फसल की तैयारी पर भी पड़ सकता है।
किसानों का कहना है कि फसल तैयार होने की स्थिति में पहुंच रही थी और उन्हें उम्मीद थी कि बिक्री से अच्छी आमदनी होगी। लेकिन अचानक खेतों में पानी आने से अब लागत निकलने की उम्मीद भी कमजोर पड़ गई है। यदि पानी कई दिनों तक खेतों में जमा रहा तो सब्जियों की गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ पूरी फसल खराब होने का खतरा है।
नदी किनारे खेती करने वालों पर सबसे ज्यादा असर
गंगा किनारे की जमीन को खेती के लिए उपजाऊ माना जाता है। पानी कम होने के बाद नदी के आसपास खाली होने वाली जमीन पर किसान बड़े पैमाने पर सब्जियों की खेती करते हैं। यहां उगाई जाने वाली सब्जियां आसपास की स्थानीय मंडियों और बाजारों तक पहुंचती हैं।
इस खेती से बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसानों को आय मिलती है। लेकिन नदी के जलस्तर में अचानक वृद्धि होने पर यही खेती सबसे पहले प्रभावित होती है। खेत नदी के करीब होने के कारण पानी तेजी से उनमें प्रवेश करता है और किसानों को फसल बचाने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।इस बार भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। गंगा का पानी बढ़ते ही निचले खेतों में भरना शुरू हो गया। इसके बाद धीरे-धीरे आसपास के अन्य खेत भी जलमग्न होते चले गए।
किसानों की बढ़ी बेचैनी, हर घंटे जलस्तर पर नजर
गंगा के किनारे रहने वाले किसानों की नजर अब नदी के जलस्तर पर टिकी है। पानी बढ़ने की स्थिति में और खेत प्रभावित हो सकते हैं, जबकि जलस्तर में गिरावट आने पर किसानों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है।
किसानों के लिए आने वाले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। जिन खेतों में अभी कम पानी है, वहां फसल बचने की संभावना बनी हुई है। लेकिन यदि पानी और बढ़ा तो नुकसान का दायरा भी बढ़ सकता है।
कई किसान दिन में कई बार खेतों का हाल देखने पहुंच रहे हैं। जहां तक संभव है, तैयार फसल को निकालने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि पानी से घिरे खेतों में काम करना कठिन हो गया है।
बाजार पर भी पड़ सकता है असर
सब्जियों की खेती को हुए बड़े नुकसान का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रह सकता। यदि बड़े क्षेत्र में तैयार फसल खराब होती है तो स्थानीय बाजार में सब्जियों की आवक प्रभावित हो सकती है। उत्पादन कम होने पर कुछ सब्जियों की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिल सकता है।
स्थानीय स्तर पर होने वाली सब्जी की खेती आसपास के बाजारों की मांग पूरी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। खेतों से निकलने वाली ताजी सब्जियां स्थानीय मंडियों में पहुंचती हैं और वहां से फुटकर बाजार तक जाती हैं। ऐसे में फसल नुकसान की स्थिति में आपूर्ति व्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।
हालांकि बाजार पर वास्तविक असर कितना होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पानी कितने समय तक खेतों में रहता है और कुल कितने क्षेत्र की फसल प्रभावित होती है।
पानी जल्दी उतरा तो बच सकती है कुछ फसल
किसानों की उम्मीद अब इस बात पर टिकी है कि गंगा का जलस्तर जल्द कम हो और खेतों में जमा पानी निकल जाए। अगर जलभराव कम समय के लिए रहता है तो कुछ खेतों में फसल बचने की संभावना हो सकती है। लेकिन लंबे समय तक पानी जमा रहने पर नुकसान बढ़ सकता है।
किसानों के मुताबिक सब्जियों की फसल दूसरी कई फसलों की तुलना में जलभराव के प्रति अधिक संवेदनशील होती है। खेतों में पानी भरने से पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है और तैयार सब्जियां भी खराब हो सकती हैं।
पानी उतरने के बाद किसानों को खेतों की वास्तविक स्थिति का पता चलेगा। फिलहाल कई स्थानों पर खेतों तक पहुंचना मुश्किल होने के कारण नुकसान का पूरा आकलन भी नहीं हो पा रहा है।
नुकसान के आकलन और मदद की उम्मीद
प्रभावित किसान चाहते हैं कि जलस्तर कम होने के बाद खेतों का सर्वे कर फसल को हुए नुकसान का सही आकलन किया जाए। जिन किसानों की फसल पूरी तरह बर्बाद हुई है, उनके लिए सरकारी स्तर पर उपलब्ध नियमों और योजनाओं के तहत सहायता मिलने की उम्मीद भी जताई जा रही है।
किसानों के लिए तत्काल चिंता फसल बचाने की है, लेकिन इसके बाद आर्थिक नुकसान की भरपाई बड़ा मुद्दा बन सकता है। छोटे किसानों के लिए एक सीजन की फसल खराब होना बड़ा आर्थिक झटका साबित हो सकता है।
यदि नुकसान व्यापक स्तर पर हुआ तो किसानों को अगली फसल लगाने के लिए भी आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए प्रभावित क्षेत्रों में नुकसान का समय पर आकलन किसानों के लिए महत्वपूर्ण होगा।
प्रकृति के आगे बेबस नजर आ रहे किसान
गंगा के किनारे खेती करने वाले किसानों के लिए नदी वरदान भी है और चुनौती भी। नदी से मिलने वाली उपजाऊ मिट्टी किसानों को अच्छी पैदावार देती है, लेकिन मानसून के दौरान बढ़ता जलस्तर उनकी फसल को कुछ ही समय में बर्बाद भी कर सकता है।
इस समय किसानों के सामने कुछ ऐसी ही स्थिति है। महीनों की मेहनत से तैयार की गई फसल पानी में डूबी है और किसान नदी का जलस्तर कम होने का इंतजार कर रहे हैं। जिन परिवारों की आजीविका मुख्य रूप से खेती पर निर्भर है, उनके लिए नुकसान की आशंका चिंता बढ़ाने वाली है।
बढ़ता पानी बढ़ा रहा खतरा
गंगा के जलस्तर पर आने वाले दिनों में स्थिति काफी हद तक निर्भर करेगी। यदि पानी और बढ़ता है तो अभी सुरक्षित बचे निचले खेत भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। वहीं जलस्तर कम होने पर नुकसान का दायरा सीमित रहने की उम्मीद की जा सकती है।
फिलहाल गंगा के उफान ने तटवर्ती किसानों की चिंता बढ़ा दी है। सैकड़ों बीघे में लगी सब्जियों की खेती पानी में डूबी हुई है और खेतों में लगाई गई लागत पर संकट मंडरा रहा है। किसान अब आसमान और गंगा दोनों की ओर उम्मीद लगाए बैठे हैं कि पानी जल्द कम हो, ताकि जो फसल बच सकती है उसे बचाया जा सके।

