भारत का कृषि क्षेत्र अब पारंपरिक खाद्यान्न फसलों से आगे बढ़कर तेजी से अधिक मूल्य वाली फसलों की ओर बढ़ रहा है। मसाले और तिलहन जैसी कमोडिटीज कृषि अर्थव्यवस्था की वृद्धि के प्रमुख चालक बनकर उभर रही हैं। उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी, घरेलू खपत में बदलाव और वैश्विक बाजारों में भारतीय कृषि उत्पादों की बढ़ती भागीदारी के बीच किसानों, व्यापारियों, प्रोसेसर और निर्यातकों के लिए कीमतों में उतार-चढ़ाव से होने वाले जोखिम का प्रबंधन पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
इसी बदलते कृषि परिदृश्य को रेखांकित करते हुए मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया (MCX) की रिपोर्ट “Harvesting Value: India’s Agricultural Commodity Markets” जारी की गई है। यह रिपोर्ट Global Commodity Conclave (GCC) के माध्यम से सामने आई। रिपोर्ट में भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की बदलती संरचना, उच्च-मूल्य वाली फसलों के बढ़ते महत्व और कृषि कमोडिटी बाजारों में डेरिवेटिव्स की भूमिका का विश्लेषण किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में जैसे-जैसे मसाले, तिलहन और अन्य व्यावसायिक फसलों का उत्पादन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे संगठित प्राइस डिस्कवरी यानी मूल्य खोज और रिस्क मैनेजमेंट की आवश्यकता भी बढ़ रही है।
मसालों के उत्पादन में 85.9 प्रतिशत की वृद्धि
रिपोर्ट में शामिल विभिन्न फसल श्रेणियों में मसालों ने सबसे मजबूत उत्पादन वृद्धि दर्ज की है। वर्ष 2015-16 में भारत में मसालों का उत्पादन लगभग 6.99 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) था, जो 2024-25 में बढ़कर 12.99 MMT हो गया। इस अवधि में मसालों के उत्पादन में 85.9 प्रतिशत की संचयी वृद्धि दर्ज की गई।
रिपोर्ट के अनुमानों के अनुसार मसालों का उत्पादन वर्ष 2029-30 तक लगभग 18.12 MMT तक पहुंच सकता है। इसके लिए 6.87 प्रतिशत की अनुमानित CAGR बताई गई है।
मसालों की विभिन्न प्रमुख फसलों में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है। रिपोर्ट के अनुसार अजवाइन का उत्पादन 2015-16 से 2024-25 के बीच तीन गुना से अधिक बढ़ा है। वहीं अदरक के उत्पादन में 9.12 प्रतिशत CAGR, जीरे में 8.75 प्रतिशत CAGR और लहसुन में 8.23 प्रतिशत CAGR दर्ज किया गया है।
यह वृद्धि इस बात का संकेत देती है कि भारतीय कृषि में किसानों की रुचि उच्च-मूल्य वाली फसलों की ओर बढ़ रही है। मसालों की घरेलू और निर्यात मांग को देखते हुए आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में और विस्तार की संभावना बनी हुई है।
तिलहन उत्पादन में भी तेज बढ़ोतरी
मसालों के साथ-साथ तिलहन क्षेत्र ने भी पिछले एक दशक में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। MCX की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015-16 में भारत में तिलहन का उत्पादन 25.25 MMT था, जो 2024-25 में बढ़कर 42.99 MMT हो गया। यानी इस अवधि में तिलहन उत्पादन में लगभग 70.2 प्रतिशत की संचयी वृद्धि हुई।
तिलहन क्षेत्र की वृद्धि दर लगभग 5.46 प्रतिशत CAGR रही, जो रिपोर्ट में विश्लेषण की गई आठ कृषि फसल श्रेणियों में दूसरी सबसे अधिक वृद्धि दर है।
अनुमान है कि वर्ष 2029-30 तक भारत में तिलहन उत्पादन लगभग 56.7 MMT तक पहुंच सकता है।
तिलहन में भी कुछ प्रमुख फसलों ने विशेष रूप से बेहतर प्रदर्शन किया है। रेपसीड और सरसों का उत्पादन 86.4 प्रतिशत बढ़कर 2024-25 में लगभग 12.67 MMT हो गया। इसी अवधि में सोयाबीन और मूंगफली के उत्पादन में क्रमशः 78.2 प्रतिशत और 77.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023-24 में मूंगफली, रेपसीड एवं सरसों तथा सोयाबीन ने मिलकर तिलहन क्षेत्र के 2,135.3 अरब रुपये के आर्थिक उत्पादन का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा बनाया।
बढ़ते उत्पादन के साथ कीमतों का जोखिम भी बढ़ा
कृषि उत्पादन बढ़ना किसानों और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसके साथ बाजार जोखिम भी बढ़ते हैं। किसी फसल का उत्पादन बढ़ने पर यदि बाजार में मांग के अनुरूप कीमत नहीं मिलती है तो किसानों की आय प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, प्रोसेसर और व्यापारियों के लिए अचानक कीमतों में वृद्धि लागत बढ़ा सकती है।
मसालों और तिलहन जैसी कमोडिटीज में कीमतों में उतार-चढ़ाव कई कारणों से होता है। मौसम, उत्पादन, घरेलू मांग, निर्यात, अंतरराष्ट्रीय बाजार, मुद्रा विनिमय दर और आपूर्ति श्रृंखला जैसी परिस्थितियां कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं।
ऐसे में संगठित बाजार तंत्र और बेहतर प्राइस रिस्क मैनेजमेंट किसानों तथा पूरी कृषि मूल्य श्रृंखला के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
डेरिवेटिव्स बाजार से बेहतर हो सकती है प्राइस डिस्कवरी
MCX की रिपोर्ट में कृषि डेरिवेटिव्स बाजार को कृषि बाजार के बुनियादी ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, एक प्रभावी कृषि डेरिवेटिव्स बाजार मूल्य खोज, जोखिम प्रबंधन, बाजार पारदर्शिता और आर्थिक विकास में योगदान दे सकता है।
फ्यूचर्स बाजार में उत्पादकों, प्रोसेसर, व्यापारियों और निवेशकों से मिलने वाली जानकारी एक जगह आती है और उसके आधार पर भविष्य की संभावित कीमतों के संकेत मिलते हैं।
ये संकेत किसानों और अन्य बाजार प्रतिभागियों को उत्पादन, खरीद, भंडारण और बिक्री से जुड़े निर्णय लेने में सहायता कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि भविष्य की कीमतों को लेकर सकारात्मक संकेत मिलते हैं तो उत्पादक या व्यापारी यह निर्णय ले सकता है कि फसल को तुरंत बेचना बेहतर है या कुछ समय तक स्टोर करके बाद में बिक्री की जाए।
हेजिंग से कीमतों के उतार-चढ़ाव का जोखिम घटाने में मदद
कृषि बाजार में हेजिंग एक महत्वपूर्ण जोखिम प्रबंधन उपकरण के रूप में सामने आता है। इसका उद्देश्य कीमतों में संभावित उतार-चढ़ाव से होने वाले वित्तीय जोखिम को कम करना है।
किसान, प्रोसेसर, व्यापारी और निर्यातक अपनी जरूरत के अनुसार फ्यूचर्स बाजार का उपयोग करके भविष्य की कीमतों में होने वाले बदलाव के जोखिम को मैनेज कर सकते हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई भारतीय कृषि कमोडिटीज के मामले में फ्यूचर्स कीमतें स्पॉट कीमतों से पहले संकेत देती हैं। इससे फ्यूचर्स कीमतें भौतिक बाजार में होने वाले लेनदेन के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बन सकती हैं।
डिजिटल वेयरहाउसिंग की बढ़ेगी भूमिका
कृषि बाजारों को अधिक प्रभावी बनाने में डिजिटल वेयरहाउसिंग और इलेक्ट्रॉनिक वेयरहाउस रसीदों की भूमिका भी महत्वपूर्ण बताई गई है।
यदि किसान अपनी उपज को प्रमाणित वेयरहाउस में सुरक्षित रखकर उसके आधार पर इलेक्ट्रॉनिक वेयरहाउस रसीद प्राप्त कर सके, तो उसके लिए वित्तीय संसाधनों तक पहुंच आसान हो सकती है। इससे किसान को फसल की तत्काल बिक्री के दबाव से भी राहत मिल सकती है।
वेयरहाउसिंग, फाइनेंसिंग, भौतिक व्यापार और फ्यूचर्स बाजार को एक-दूसरे से जोड़ने वाला तंत्र कृषि मूल्य श्रृंखला में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ-साथ बेहतर मूल्य खोज और जोखिम प्रबंधन में मदद कर सकता है।
कृषि डेरिवेटिव्स बाजार में विस्तार की बड़ी संभावना
भारत में कृषि कमोडिटी बाजार के विस्तार की अभी काफी गुंजाइश है। रिपोर्ट के अनुसार, कृषि मंत्रालय के वर्गीकरण के तहत पहचानी गई 117 प्रमुख कृषि कमोडिटीज में से केवल 11, यानी लगभग 9 प्रतिशत, के लिए वर्तमान में सक्रिय एक्सचेंज-ट्रेडेड डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट उपलब्ध हैं।
इसका मतलब है कि भारत की बड़ी कृषि अर्थव्यवस्था की तुलना में संगठित डेरिवेटिव्स बाजार अभी शुरुआती स्तर पर है और इसमें विस्तार की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।
MCX के कृषि कमोडिटी पोर्टफोलियो में इलायची, कॉटन, कॉटन सीड वॉश ऑयल, कपास और मेंथा ऑयल जैसी कमोडिटीज शामिल हैं। ये उत्पाद मसाले, फाइबर, कच्चे कपास और तिलहन से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों को कवर करते हैं।
क्रूड सनफ्लावर ऑयल के फ्यूचर्स से बढ़ेंगे विकल्प
MCX ने क्रूड सनफ्लावर ऑयल पर फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट शुरू करने की भी घोषणा की है। इससे भारत की खाद्य तेल मूल्य श्रृंखला से जुड़े कारोबारियों को कीमतों के जोखिम का प्रबंधन करने के लिए एक और संगठित बाजार विकल्प उपलब्ध होगा।
भारत में खाद्य तेलों की मांग बड़ी है और घरेलू उत्पादन तथा आयात दोनों बाजार की आपूर्ति को प्रभावित करते हैं। ऐसे में खाद्य तेल क्षेत्र में बेहतर प्राइस डिस्कवरी और रिस्क मैनेजमेंट तंत्र प्रोसेसर, व्यापारियों और अन्य बाजार प्रतिभागियों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
नीतिगत सुधारों से बाजार को मिल सकती है मजबूती
रिपोर्ट में कृषि डेरिवेटिव्स बाजार को मजबूत करने के लिए कई क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। इनमें कमोडिटी कवरेज बढ़ाना, डिजिटल वेयरहाउसिंग को मजबूत करना, भौतिक बाजार के बुनियादी ढांचे में सुधार, संस्थागत भागीदारी बढ़ाना और लगातार नियामकीय समर्थन शामिल हैं।
इसके अलावा कमोडिटीज का पुनर्वर्गीकरण, क्लाइंट स्तर पर पोजिशन लिमिट बढ़ाना, फिजिकल सेटलमेंट को चरणबद्ध तरीके से लागू करना और वित्तीय संस्थानों की भागीदारी बढ़ाना भी बाजार की लिक्विडिटी और हेजिंग क्षमता को मजबूत कर सकता है।
कृषि बाजार बनेगा ‘कनेक्टिव इकोनॉमिक इंफ्रास्ट्रक्चर’
MCX की रिपोर्ट का व्यापक संदेश यह है कि कृषि डेरिवेटिव्स को केवल ट्रेडिंग का माध्यम मानने के बजाय उन्हें व्यापक कृषि बाजार अवसंरचना के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
यदि प्राइस डिस्कवरी, रिस्क मैनेजमेंट, वेयरहाउसिंग, फाइनेंसिंग और फिजिकल ट्रेड को बेहतर तरीके से एक-दूसरे से जोड़ा जाता है, तो इससे पूरी कृषि मूल्य श्रृंखला अधिक कुशल बन सकती है।
इससे किसानों को अपनी उपज के बेहतर मूल्य की जानकारी मिल सकती है, व्यापारियों और प्रोसेसर को कीमतों के जोखिम को संभालने में मदद मिल सकती है तथा कृषि कारोबार के लिए कार्यशील पूंजी तक पहुंच बेहतर हो सकती है।
भारत में जैसे-जैसे उच्च-मूल्य वाली कृषि कमोडिटीज का उत्पादन और कारोबार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे संगठित बाजार तंत्र की भूमिका भी बढ़ती जा रही है। मसाले और तिलहन इस बदलाव के प्रमुख उदाहरण हैं।
आने वाले वर्षों में यदि भारत अपने कृषि उत्पादन को बेहतर वेयरहाउसिंग, पारदर्शी मूल्य खोज, डिजिटल बाजार और प्रभावी जोखिम प्रबंधन से जोड़ने में सफल होता है, तो इससे न केवल किसानों और कृषि कारोबारियों की आय में स्थिरता आ सकती है, बल्कि भारतीय कृषि कमोडिटी बाजारों की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता भी मजबूत हो सकती है।
इस लिहाज से कृषि डेरिवेटिव्स बाजार भारत की बढ़ती कृषि अर्थव्यवस्था के लिए केवल वित्तीय उपकरण नहीं, बल्कि किसानों से लेकर प्रोसेसर, व्यापारी, निर्यातक और उपभोक्ता तक पूरी वैल्यू चेन को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण आर्थिक बुनियादी ढांचा बन सकता है।

