दुनिया के कई हिस्सों में जारी भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता, कच्चे माल की उपलब्धता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में लगातार हो रहे बदलावों ने भारत के लिए उर्वरक सुरक्षा को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक मुद्दा बना दिया है। कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा सीधे तौर पर उर्वरकों की उपलब्धता से जुड़ी होने के कारण देश के लिए स्थिर और भरोसेमंद उर्वरक आपूर्ति सुनिश्चित करना पहले से अधिक जरूरी हो गया है।
इसी चुनौती और भविष्य की रणनीति पर चर्चा के लिए फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) की ओर से राजस्थान के उदयपुर में 24 से 26 अगस्त 2026 तक तीन दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम का विषय ‘Fertiliser Security Amid Global Disruptions’ रखा गया है। इसमें उर्वरक उद्योग के वरिष्ठ अधिकारियों, विशेषज्ञों और क्षेत्र से जुड़े अन्य हितधारकों को एक मंच पर लाकर भारत की उर्वरक सुरक्षा को मजबूत करने के उपायों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।
कार्यक्रम में वैश्विक बाजार में अस्थिरता, घरेलू उर्वरक उत्पादन, आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण, नीतिगत चुनौतियां, भू-राजनीतिक जोखिम, ऊर्जा सुरक्षा, ग्रीन अमोनिया और ग्रीन यूरिया, सर्कुलर इकोनॉमी तथा वैकल्पिक उर्वरकों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा केंद्रित है।
उर्वरक सुरक्षा सीधे कृषि और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए FAI के महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी ने कहा कि हाल के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों ने वैश्विक उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियों को उजागर किया है। इन परिस्थितियों ने भारत के लिए आत्मनिर्भरता और बेहतर तैयारी की आवश्यकता को और मजबूत किया है।
उन्होंने कहा कि उर्वरक सुरक्षा का संबंध केवल उर्वरक उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध कृषि और खाद्य सुरक्षा से है। यदि किसी कारण से किसानों को समय पर पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध नहीं होता है तो इसका असर फसल उत्पादन और पूरी कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
डॉ. चौधरी ने कहा कि “जब उर्वरक क्षेत्र सुरक्षित और मजबूत होता है, तो कृषि क्षेत्र भी सुरक्षित महसूस करता है।” उनके अनुसार, भारत के लिए उर्वरक आपूर्ति को स्थिर रखना खाद्य सुरक्षा की व्यापक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
वैश्विक संकटों के बावजूद भारतीय उर्वरक उद्योग ने दिखाई मजबूती
FAI के महानिदेशक के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर कई तरह की आपूर्ति संबंधी बाधाएं सामने आई हैं। इसके बावजूद भारतीय उर्वरक उद्योग ने इन परिस्थितियों में अपनी आपूर्ति बनाए रखने और बाजार की जरूरतों को पूरा करने में लचीलापन दिखाया है।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक केवल आकस्मिक उपायों और संकट के समय किए जाने वाले प्रबंधन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। भविष्य के लिए भारत को ऐसी उर्वरक प्रणाली विकसित करनी होगी जो वैश्विक स्तर पर होने वाले अचानक बदलावों के बावजूद अधिक मजबूती से काम कर सके।
इसके लिए घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने, उर्वरकों के स्रोतों में विविधता लाने, वैकल्पिक कच्चे माल और फीडस्टॉक की तलाश करने तथा गैर-पारंपरिक संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ाने की जरूरत होगी।
एक स्रोत या एक क्षेत्र पर निर्भरता घटाना जरूरी
वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों का असर अब केवल राजनीतिक या कूटनीतिक स्तर तक सीमित नहीं है। इसका सीधा प्रभाव ऊर्जा, कच्चे माल, परिवहन और लॉजिस्टिक्स पर भी पड़ सकता है। उर्वरक उद्योग इन सभी क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है।
ऐसे में यदि किसी एक देश, क्षेत्र या आपूर्तिकर्ता पर अत्यधिक निर्भरता हो तो संकट की स्थिति में आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। FAI ने उर्वरक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सप्लाई सोर्स का विविधीकरण महत्वपूर्ण बताया है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी एक क्षेत्र में उत्पादन या आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भारत के पास दूसरे स्रोतों से उर्वरक प्राप्त करने के पर्याप्त विकल्प मौजूद रहें।
घरेलू उत्पादन बढ़ाना दीर्घकालिक समाधान
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल है और यहां करोड़ों किसान अपनी फसलों के लिए उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए उर्वरक की मांग और उपलब्धता का कृषि उत्पादन पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
FAI के अनुसार, दीर्घकालिक उर्वरक सुरक्षा के लिए घरेलू उत्पादन को मजबूत करना आवश्यक है। इसके साथ उत्पादन इकाइयों की दक्षता बढ़ाने और आधुनिक तकनीक को अपनाने पर भी ध्यान देना होगा।
घरेलू उत्पादन बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक होने वाले बदलावों और आयात से जुड़े जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसके लिए कच्चे माल, ऊर्जा, तकनीक और निवेश से जुड़ी चुनौतियों को भी समानांतर रूप से संबोधित करना जरूरी होगा।
ऊर्जा सुरक्षा बनेगी उर्वरक उद्योग की नई चुनौती
उर्वरक उत्पादन में ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए भविष्य की उर्वरक सुरक्षा को केवल कच्चे माल और उत्पादन क्षमता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। ऊर्जा सुरक्षा भी इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
डॉ. चौधरी ने भविष्य के लिए ग्रीन एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया जैसे विकल्पों की खोज और इस्तेमाल की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उर्वरक उद्योग को नवीकरणीय ऊर्जा के साथ अधिक एकीकरण की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया जैसी तकनीकों का विकास आने वाले समय में उर्वरक उत्पादन के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने और ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने कहा कि जो कंपनियां नई ऊर्जा तकनीकों और संसाधनों को प्रभावी तरीके से अपनाने में सक्षम होंगी, उन्हें भविष्य में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिल सकता है।
AI और रोबोटिक्स से बढ़ेगी उत्पादन क्षमता
उर्वरक उद्योग में नई तकनीकों की भूमिका भी तेजी से बढ़ रही है। FAI ने उत्पादन प्रक्रियाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रोबोटिक्स और अन्य नई तकनीकों के इस्तेमाल पर जोर दिया है।
इन तकनीकों की मदद से उत्पादन प्रक्रियाओं की निगरानी, ऊर्जा उपयोग को बेहतर बनाने, मशीनरी के रखरखाव और उत्पादन क्षमता में सुधार किया जा सकता है।
भारत ने पिछले वर्षों में उर्वरक उत्पादन में ऊर्जा दक्षता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। हालांकि, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और भविष्य की ऊर्जा चुनौतियों को देखते हुए नई पीढ़ी की तकनीकों में लगातार निवेश करना जरूरी होगा।
FAI का मानना है कि तकनीकी नवाचार केवल उत्पादन बढ़ाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह उर्वरक उद्योग की लागत, दक्षता और प्रतिस्पर्धात्मकता को भी प्रभावित करेगा।
वैकल्पिक उर्वरकों और संतुलित पोषण पर जोर
उर्वरक सुरक्षा के साथ-साथ मिट्टी की सेहत और पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग पर भी ध्यान देना जरूरी है। इसी दिशा में FAI ने इंटीग्रेटेड न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट और वैकल्पिक उर्वरकों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है।
नैनो उर्वरक, प्राकृतिक खेती, जैविक खेती और अन्य वैकल्पिक पोषण प्रबंधन प्रणालियां पारंपरिक उर्वरकों की पूरक बन सकती हैं। इनका उद्देश्य पोषक तत्वों के बेहतर उपयोग, मिट्टी के स्वास्थ्य और कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता को बढ़ावा देना है।
हालांकि, वैकल्पिक उर्वरकों का विस्तार पारंपरिक उर्वरकों के पूरी तरह विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन की व्यापक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।
इससे किसानों को अलग-अलग स्रोतों से पोषक तत्व उपलब्ध कराने और फसल की जरूरत के अनुसार संतुलित पोषण प्रबंधन करने में मदद मिल सकती है।
सरकार, उद्योग और किसानों के बीच समन्वय जरूरी
FAI ने स्पष्ट किया कि भारत की उर्वरक सुरक्षा केवल उद्योग के प्रयासों से हासिल नहीं की जा सकती। इसके लिए सरकार, उर्वरक उद्योग और किसान समुदाय के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।
सरकार की नीतियां उत्पादन, आयात, ऊर्जा, कच्चे माल और निवेश से जुड़े निर्णयों को प्रभावित करती हैं। वहीं उद्योग उत्पादन क्षमता, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दूसरी ओर किसानों की वास्तविक जरूरतों और खेत स्तर की मांग को समझना भी जरूरी है।
इसलिए एक ऐसा नीतिगत वातावरण आवश्यक है जो उर्वरक उद्योग को दीर्घकालिक निवेश, तकनीकी आधुनिकीकरण और वैकल्पिक ऊर्जा संसाधनों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करे।
FAI बनेगा सरकार और उद्योग के बीच महत्वपूर्ण सेतु
फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया उद्योग और सरकार के बीच संवाद के महत्वपूर्ण मंच के रूप में काम करता है। संगठन के अनुसार, वह उर्वरक क्षेत्र से जुड़े उभरते मुद्दों की पहचान करने, ज्ञान साझा करने और नीतिगत सुझाव उपलब्ध कराने की दिशा में अपनी भूमिका जारी रखेगा।
उदयपुर में आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम इसी प्रयास का हिस्सा है, जहां उद्योग और विशेषज्ञ वैश्विक परिस्थितियों के मद्देनजर भारत की उर्वरक सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक रणनीति पर विचार कर रहे हैं।
भविष्य की उर्वरक नीति में आत्मनिर्भरता और विविधीकरण अहम
वैश्विक स्तर पर बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों और आपूर्ति श्रृंखला की अनिश्चितताओं ने भारत के सामने यह स्पष्ट कर दिया है कि उर्वरक सुरक्षा को केवल तत्काल उपलब्धता के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। इसके लिए दीर्घकालिक और बहु-आयामी रणनीति की आवश्यकता होगी।
घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना, आयात स्रोतों का विविधीकरण, वैकल्पिक कच्चे माल की तलाश, ऊर्जा सुरक्षा, ग्रीन अमोनिया और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना तथा AI और रोबोटिक्स जैसी नई तकनीकों को अपनाना इस रणनीति के महत्वपूर्ण हिस्से हो सकते हैं।
इसके साथ ही संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, नैनो उर्वरक, प्राकृतिक और जैविक खेती जैसे विकल्पों को भी वैज्ञानिक आधार पर आगे बढ़ाने की जरूरत होगी।
कुल मिलाकर, भारत की उर्वरक सुरक्षा अब केवल पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराने का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह कृषि, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, तकनीक और वैश्विक व्यापार से जुड़ा रणनीतिक मुद्दा बन चुकी है। उदयपुर में FAI का यह कार्यक्रम इसी बदलती चुनौती के बीच भारत के लिए अधिक मजबूत, आत्मनिर्भर और लचीले उर्वरक तंत्र की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

