कृषि अनुसंधान, वैज्ञानिक नवाचार और किसानों के बीच सूचना के प्रभावी आदान-प्रदान को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत भाकृअनुप-राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी (ICAR-NAARM), हैदराबाद ने “कृषि-मीडिया समन्वय: सहयोगात्मक संचार को बढ़ाना” विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया।
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य कृषि अनुसंधान संस्थानों और मीडिया के बीच सहयोग को मजबूत करना तथा किसानों, कृषि क्षेत्र से जुड़े हितधारकों और आम जनता तक वैज्ञानिक विकास, नई कृषि प्रौद्योगिकियों और नवाचारों की जानकारी को अधिक प्रभावी, सरल और विश्वसनीय तरीके से पहुंचाना रहा।
कृषि क्षेत्र में लगातार नई तकनीकें विकसित हो रही हैं। उन्नत बीज, फसल प्रबंधन तकनीक, कृषि मशीनरी, डिजिटल कृषि, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जल प्रबंधन, जैविक एवं प्राकृतिक खेती, मौसम आधारित सलाह और अन्य वैज्ञानिक नवाचार किसानों के लिए महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। लेकिन इन तकनीकों का वास्तविक लाभ तभी व्यापक स्तर पर पहुंच सकता है, जब उनके बारे में सही और समझने योग्य जानकारी किसानों तक समय पर पहुंचे।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए आयोजित यह कार्यशाला कृषि विज्ञान और मीडिया के बीच संवाद को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मंच बनी।
कृषि अनुसंधान और किसानों के बीच संचार की खाई पाटने पर जोर
कार्यशाला का उद्घाटन भाकृअनुप-नार्म के निदेशक डॉ. आर.एम. सुंदरम ने किया। प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए उन्होंने शोधकर्ताओं, किसानों और अन्य हितधारकों के बीच मौजूद संचार की खाई को कम करने के लिए एक व्यवस्थित और प्रभावी संचार रोडमैप की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि कृषि अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों और नवाचारों का प्रभाव तभी व्यापक होगा, जब उनकी जानकारी सही परिप्रेक्ष्य और सही दिशा में संबंधित लोगों तक पहुंचाई जाए।
कृषि अनुसंधान संस्थानों में वैज्ञानिक लंबे समय तक शोध करके ऐसी तकनीकें विकसित करते हैं जो किसानों की उत्पादकता, आय, संसाधन दक्षता और कृषि की स्थिरता में सुधार करने में मदद कर सकती हैं। लेकिन वैज्ञानिक शोध की भाषा आमतौर पर तकनीकी होती है, जबकि किसान और आम जनता जानकारी को सरल और व्यावहारिक रूप में समझना चाहते हैं।
ऐसे में कृषि-मीडिया समन्वय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
मीडिया वैज्ञानिक उपलब्धियों को किसानों और आम जनता के लिए सरल भाषा में प्रस्तुत करने का माध्यम बन सकता है। दूसरी ओर, मीडिया के माध्यम से किसानों की वास्तविक समस्याएं और उनकी जरूरतें भी कृषि अनुसंधान संस्थानों तक पहुंच सकती हैं।
रणनीतिक संचार, पारदर्शिता और नवाचार बने प्रमुख स्तंभ
डॉ. सुंदरम ने प्रभावी जनसंचार के लिए रणनीतिक संचार, पारदर्शिता और नवाचार को प्रमुख स्तंभ बताया।
उन्होंने संचार और मीडिया पेशेवरों से वैज्ञानिक विषयों को सरल और स्पष्ट भाषा में प्रस्तुत करने का आह्वान किया। उनका जोर इस बात पर रहा कि वैज्ञानिक ज्ञान केवल संस्थागत सीमाओं तक सीमित न रहे, बल्कि व्यापक जनसमूह के लिए सुलभ बनाया जाए।
कृषि क्षेत्र में संचार की चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसानों की भाषाई, सामाजिक और भौगोलिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। देश में कृषि संबंधी जानकारी को केवल एक भाषा या एक माध्यम तक सीमित रखने से उसका प्रभाव सीमित हो सकता है।
क्षेत्रीय भाषाओं में कृषि संबंधी सामग्री तैयार करना, स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार जानकारी देना और डिजिटल माध्यमों का उपयोग करना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
समाचारों में डेटा और तथ्यों की भूमिका महत्वपूर्ण
कार्यशाला में कृषि समाचारों और वैज्ञानिक उपलब्धियों की रिपोर्टिंग में डेटा, तथ्यों, आंकड़ों और इन्फोग्राफिक्स को शामिल करने की आवश्यकता पर विशेष चर्चा हुई।
किसी कृषि तकनीक के प्रभाव को केवल दावों के माध्यम से प्रस्तुत करने के बजाय उसके परिणामों को आंकड़ों और प्रमाणित जानकारी के साथ दिखाने से पाठकों और किसानों का भरोसा बढ़ सकता है।
उदाहरण के लिए, किसी नई फसल किस्म के बारे में जानकारी देते समय उसकी औसत उपज, रोग प्रतिरोधक क्षमता, पानी की आवश्यकता, खेती की लागत या अन्य संबंधित आंकड़ों को प्रस्तुत करना किसानों के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है।
इसी तरह किसी कृषि तकनीक की सफलता की जानकारी देते समय उसके वास्तविक परिणामों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है।
कार्यशाला में इस बात पर जोर दिया गया कि मानव-केंद्रित कथानक और डेटा आधारित रिपोर्टिंग को एक साथ इस्तेमाल करने से वैज्ञानिक खोजों और कृषि नवाचारों को अधिक प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचाया जा सकता है।
तस्वीरों और छोटे वीडियो से बढ़ेगी कृषि जानकारी की पहुंच
डिजिटल मीडिया के विस्तार के साथ कृषि संचार के स्वरूप में भी तेजी से बदलाव आया है। आज किसान और ग्रामीण दर्शक केवल पारंपरिक समाचार माध्यमों पर निर्भर नहीं हैं। मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट, इन्फोग्राफिक्स और अन्य डिजिटल सामग्री तक उनकी पहुंच बढ़ी है।
कार्यशाला में उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरों और छोटे वीडियो सहित बहु-प्रारूप संचार पद्धतियों को अपनाने की जरूरत पर जोर दिया गया।
कृषि तकनीक को केवल शब्दों में समझाने की तुलना में उसका वीडियो प्रदर्शन कई बार अधिक प्रभावी हो सकता है। उदाहरण के लिए ड्रिप सिंचाई की स्थापना, कृषि मशीन का संचालन, किसी नई फसल किस्म की विशेषता या वैज्ञानिक तकनीक के खेत स्तर पर उपयोग को छोटे वीडियो के माध्यम से आसानी से समझाया जा सकता है।
इसी तरह इन्फोग्राफिक्स के माध्यम से आंकड़ों को सरल रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
AI आधारित मीडिया के दौर में बदल रही संचार की तस्वीर
आज मीडिया का वातावरण तेजी से डिजिटल और AI-संचालित हो रहा है। इस बदलाव ने कृषि विज्ञान संचार के सामने नए अवसर और नई चुनौतियां दोनों पैदा की हैं।
AI आधारित उपकरणों के माध्यम से बड़ी मात्रा में जानकारी को व्यवस्थित करने, विभिन्न प्रारूपों में सामग्री तैयार करने और अलग-अलग दर्शक समूहों तक जानकारी पहुंचाने की संभावनाएं बढ़ी हैं।
हालांकि कृषि और विज्ञान से संबंधित जानकारी में तथ्यात्मक शुद्धता का विशेष महत्व है। गलत या अपुष्ट जानकारी किसानों के निर्णयों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए डिजिटल और AI आधारित माध्यमों के इस्तेमाल के साथ विश्वसनीय स्रोत, तथ्य जांच और वैज्ञानिक सत्यापन को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
कार्यशाला में बदलते डिजिटल और AI-संचालित मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र के संदर्भ में भाकृअनुप की प्रौद्योगिकियों और वैज्ञानिक उपलब्धियों की दृश्यता एवं पहुंच बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
क्षेत्रीय भाषाओं में कृषि सामग्री की आवश्यकता
भारत में कृषि का स्वरूप क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग है। अलग-अलग राज्यों में किसान विभिन्न भाषाओं और स्थानीय बोलियों में जानकारी प्राप्त करते हैं।
इसलिए कृषि अनुसंधान से जुड़ी जानकारी को केवल अंग्रेजी या सीमित भाषाओं में उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। किसानों तक वैज्ञानिक जानकारी की व्यापक पहुंच के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री तैयार करना महत्वपूर्ण है।
कार्यशाला में कृषि अनुसंधान संगठनों द्वारा डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के उपयोग को बढ़ाने के साथ क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री तैयार करने की जरूरत पर भी जोर दिया गया।
इससे नई कृषि तकनीकों, वैज्ञानिक सलाह और अनुसंधान उपलब्धियों को अधिक व्यापक किसान समुदाय तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
ICAR विज्ञान संचार नीति पर भी हुई चर्चा
कार्यशाला में भाकृअनुप विज्ञान संचार नीति और संस्थागत संचार को मजबूत करने में उसकी भूमिका पर भी चर्चा की गई।
कृषि अनुसंधान संस्थानों के लिए यह जरूरी है कि उनके द्वारा किए जा रहे शोध, विकसित तकनीकों और वैज्ञानिक उपलब्धियों के बारे में व्यवस्थित रूप से जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
यदि संस्थानों के पास प्रभावी संचार व्यवस्था होती है तो वैज्ञानिक उपलब्धियों को समय पर मीडिया तक पहुंचाना आसान हो सकता है। इससे मीडिया भी अधिक तथ्यपूर्ण और विश्वसनीय कृषि रिपोर्टिंग कर सकता है।
इसी संदर्भ में कार्यशाला ने संस्थागत संचार को कृषि अनुसंधान और समाज के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा।
NAREES में मानव संसाधन क्षमता मजबूत करने की दिशा
कार्यशाला में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार प्रणाली (NAREES) में मानव संसाधनों की क्षमता को मजबूत करने की दिशा में ICAR-NAARM की गतिविधियों और योगदानों को भी रेखांकित किया गया।
कृषि अनुसंधान से जुड़े वैज्ञानिकों और संचार पेशेवरों को केवल वैज्ञानिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि प्रभावी संचार कौशल की भी आवश्यकता है।
किसी जटिल वैज्ञानिक अवधारणा को किसान के लिए सरल भाषा में समझाना एक विशेष कौशल है। इसी तरह मीडिया पेशेवरों के लिए कृषि विज्ञान, तकनीकी शब्दावली और अनुसंधान प्रक्रिया की बुनियादी समझ उपयोगी होती है।
इसलिए दोनों पक्षों के बीच संवाद और क्षमता निर्माण को बढ़ावा देने की आवश्यकता कार्यशाला में प्रमुख रूप से सामने आई।
मीडिया और कृषि वैज्ञानिकों के बीच लगातार संवाद जरूरी
कार्यशाला में यह विचार सामने आया कि कृषि-मीडिया सहयोग केवल किसी एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं होना चाहिए।
कृषि अनुसंधान संस्थानों और मीडिया के बीच नियमित संवाद से दोनों पक्ष एक-दूसरे की आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
मीडिया को कृषि विज्ञान से जुड़े विषयों पर विशेषज्ञों और विश्वसनीय डेटा तक समय पर पहुंच मिल सके तो रिपोर्टिंग की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। दूसरी ओर, वैज्ञानिकों को भी मीडिया की कार्यप्रणाली, समाचार की आवश्यकताओं और आम दर्शकों की रुचि के बारे में जानकारी मिल सकती है।
इस तरह दोनों के बीच निरंतर पेशेवर सहयोग कृषि विज्ञान संचार को अधिक प्रभावी बना सकता है।
नोडल संचार अधिकारियों के प्रशिक्षण का सुझाव
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों ने सुझाव दिया कि भाकृअनुप-नार्म को भाकृअनुप संस्थानों के नोडल संचार अधिकारियों के लिए जागरूकता और क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए।
इसका उद्देश्य संस्थानों में संचार से जुड़े अधिकारियों की क्षमता को मजबूत करना और उन्हें आधुनिक मीडिया आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करना हो सकता है।
आज किसी कृषि अनुसंधान संस्थान के लिए केवल प्रेस रिलीज जारी करना ही पर्याप्त नहीं है। वेबसाइट, सोशल मीडिया, वीडियो, फोटो, इन्फोग्राफिक्स और अन्य डिजिटल माध्यमों पर भी वैज्ञानिक जानकारी को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करना आवश्यक होता जा रहा है।
मीडिया को उपलब्ध कराया जाए विश्वसनीय डेटा
कृषि विज्ञान की सटीक रिपोर्टिंग के लिए मीडिया को प्रमाणित और प्रासंगिक जानकारी उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
कार्यशाला में सुझाव दिया गया कि कृषि अनुसंधान, नवाचारों और प्रौद्योगिकियों की सटीक और सुलभ रिपोर्टिंग को आसान बनाने के लिए मीडिया पेशेवरों को डेटा, तथ्य, आंकड़े और इन्फोग्राफिक्स उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
साथ ही वैज्ञानिक शब्दावली की स्पष्ट व्याख्या भी दी जानी चाहिए।
इससे पत्रकारों को वैज्ञानिक विषयों को समझने और उन्हें पाठकों तथा दर्शकों के लिए सरल भाषा में प्रस्तुत करने में मदद मिल सकती है।
मीडिया के लिए ICAR संस्थानों के अध्ययन भ्रमण का प्रस्ताव
कार्यशाला में एक महत्वपूर्ण सुझाव यह भी सामने आया कि मीडिया पेशेवरों के लिए हैदराबाद और उसके आसपास स्थित भाकृअनुप संस्थानों में अध्ययन भ्रमण आयोजित किए जाएं।
ऐसे भ्रमण के माध्यम से पत्रकारों को कृषि अनुसंधान की वास्तविक प्रक्रिया, प्रयोगशालाओं, खेत परीक्षणों, तकनीकी विकास और किसानों तक तकनीक पहुंचाने की प्रक्रिया को करीब से समझने का अवसर मिल सकता है।
किसी तकनीक को प्रत्यक्ष रूप से देखने और वैज्ञानिकों से बातचीत करने से मीडिया रिपोर्टिंग में अधिक संदर्भ और गहराई आ सकती है।
इसके साथ ही संस्थानों और मीडिया के बीच व्यक्तिगत एवं पेशेवर संपर्क भी मजबूत हो सकता है।
करीब 35 प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा
कार्यशाला में प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संगठनों के प्रतिनिधियों, कृषि ब्यूरो प्रमुखों, वरिष्ठ संवाददाताओं, जनसंपर्क अधिकारियों और संचार पेशेवरों सहित लगभग 35 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े इन प्रतिभागियों की मौजूदगी ने कार्यशाला को बहुआयामी चर्चा का मंच प्रदान किया।
कृषि पत्रकारिता से जुड़े पेशेवरों के अनुभव और कृषि अनुसंधान संस्थानों के संचार अधिकारियों की जरूरतों के बीच संवाद से कई व्यावहारिक सुझाव सामने आए।
कृषि-मीडिया सहयोग के लिए तैयार हुआ व्यापक रोडमैप
विचार-विमर्श के दौरान कृषि अनुसंधान संगठनों और मीडिया प्रतिनिधियों के बीच सहयोग मजबूत करने के लिए एक सुव्यवस्थित संचार रोडमैप विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
इस रोडमैप का उद्देश्य शोधकर्ताओं, किसानों और अन्य हितधारकों के बीच संचार की खाई को कम करना हो सकता है।
इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के उपयोग को बढ़ाना, क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री तैयार करना, बहु-प्रारूप संचार को अपनाना और मीडिया को विश्वसनीय वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में सामने आए।
किसानों की सूचना जरूरतों को केंद्र में रखने की जरूरत
कृषि-मीडिया समन्वय का अंतिम उद्देश्य केवल संस्थागत उपलब्धियों का प्रचार करना नहीं है। इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष किसानों और अन्य हितधारकों की सूचना जरूरतों को पूरा करना है।
किसान यह जानना चाहते हैं कि कोई नई तकनीक उनके खेत में कैसे काम करेगी, उसकी लागत क्या होगी, उससे उत्पादन पर क्या असर पड़ेगा और उसे अपनाने के लिए उन्हें किन संसाधनों की आवश्यकता होगी।
इसलिए वैज्ञानिक जानकारी को किसान-केंद्रित बनाना आवश्यक है।
यदि किसी शोध की जानकारी किसान की वास्तविक समस्या से जुड़कर प्रस्तुत की जाती है तो उसके उपयोग की संभावना भी बढ़ सकती है।
कृषि पत्रकारिता की भूमिका होगी और महत्वपूर्ण
भारत में कृषि क्षेत्र में तकनीकी बदलाव तेजी से हो रहे हैं। डिजिटल कृषि, AI, ड्रोन, सटीक खेती, जल दक्षता, उन्नत बीज, जैविक इनपुट, जलवायु-स्मार्ट खेती और कृषि मशीनीकरण जैसे विषय लगातार महत्वपूर्ण हो रहे हैं।
इन विषयों पर विश्वसनीय और तथ्य आधारित जानकारी किसानों तक पहुंचाने में कृषि पत्रकारिता की भूमिका महत्वपूर्ण है।
कृषि पत्रकारों को वैज्ञानिक संस्थानों से विश्वसनीय जानकारी और विशेषज्ञों तक पहुंच मिलने से वे जटिल कृषि विषयों को अधिक प्रभावी ढंग से किसानों तक पहुंचा सकते हैं।
इसी प्रकार वैज्ञानिक संस्थानों को भी मीडिया के माध्यम से अपने शोध के वास्तविक उपयोग और किसानों की प्रतिक्रिया को समझने का अवसर मिल सकता है।
संस्थानों और मीडिया के बीच पेशेवर संबंध मजबूत करने पर जोर
कार्यशाला का एक प्रमुख निष्कर्ष यह रहा कि कृषि अनुसंधान संस्थानों और मीडिया के बीच संपर्क को अधिक व्यवस्थित और पेशेवर बनाने की आवश्यकता है।
अक्सर वैज्ञानिक उपलब्धियों और शोध परिणामों की जानकारी किसानों तक पहुंचने में समय लग जाता है। वहीं मीडिया को भी कभी-कभी सही विशेषज्ञ या प्रमाणित डेटा प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है।
ऐसी परिस्थितियों में एक मजबूत संस्थागत संचार प्रणाली दोनों पक्षों के लिए उपयोगी हो सकती है।
नियमित बैठकें, मीडिया संवाद, अध्ययन भ्रमण, प्रशिक्षण कार्यक्रम और डिजिटल सूचना संसाधन इस सहयोग को मजबूत बनाने में भूमिका निभा सकते हैं।
निष्कर्ष: विज्ञान से खेत तक सूचना पहुंचाने की दिशा में अहम पहल
ICAR-NAARM हैदराबाद की “कृषि-मीडिया समन्वय: सहयोगात्मक संचार को बढ़ाना” कार्यशाला कृषि विज्ञान और मीडिया के बीच सहयोग को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आई है।
कार्यशाला में वैज्ञानिक उपलब्धियों को सरल, सटीक और किसान-केंद्रित तरीके से प्रस्तुत करने पर जोर दिया गया। साथ ही डेटा, तथ्यों, आंकड़ों, इन्फोग्राफिक्स, उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरों और छोटे वीडियो जैसे आधुनिक संचार प्रारूपों को अपनाने की आवश्यकता बताई गई।
डिजिटल और AI आधारित मीडिया के बदलते दौर में कृषि अनुसंधान संस्थानों की वैज्ञानिक उपलब्धियों की पहुंच बढ़ाने के लिए नए संचार माध्यमों के प्रभावी उपयोग पर भी चर्चा हुई।
क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री तैयार करने, मीडिया पेशेवरों को विश्वसनीय डेटा उपलब्ध कराने, नोडल संचार अधिकारियों की क्षमता बढ़ाने और मीडिया के लिए ICAR संस्थानों के अध्ययन भ्रमण आयोजित करने जैसे सुझाव भी सामने आए।
कुल मिलाकर, कार्यशाला ने यह स्पष्ट किया कि कृषि अनुसंधान से निकलने वाला वैज्ञानिक ज्ञान तभी वास्तविक प्रभाव पैदा कर सकता है, जब वह समय पर, विश्वसनीय, सरल और किसान-अनुकूल तरीके से खेत तक पहुंचे।
कृषि वैज्ञानिकों, अनुसंधान संस्थानों, संचार विशेषज्ञों और मीडिया के बीच मजबूत सहयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि इस तरह के संवाद और क्षमता निर्माण कार्यक्रम लगातार आयोजित किए जाते हैं, तो कृषि विज्ञान, तकनीक और नवाचारों को किसानों और आम जनता तक पहुंचाने की व्यवस्था और अधिक प्रभावी हो सकती है।
इस कार्यशाला का समापन कृषि अनुसंधान संस्थानों और मीडिया के बीच मजबूत, व्यवस्थित और पेशेवर संपर्क विकसित करने की साझा प्रतिबद्धता के साथ हुआ, ताकि वैज्ञानिक ज्ञान और कृषि नवाचार समय पर, विश्वसनीय और सुलभ तरीके से किसानों और समाज तक पहुंच सकें।

