उत्तरी भारत के पर्वतीय और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में खेती करने वाले किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण कृषि उपलब्धि सामने आई है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख, मणिपुर, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश जैसे उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों के लिए गेहूं की नई उन्नत किस्म वी.एल. 3040 की पहचान की गई है।
नई VL 3040 गेहूं किस्म की पहचान 18 से 20 अगस्त 2026 के दौरान राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा, जयपुर में आयोजित 65वीं अखिल भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान कार्यकर्ता बैठक में “प्रजाति पहचान समिति” द्वारा की गई।
यह उपलब्धि भाकृअनुप–विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, यानी वीपीकेएएस, अल्मोड़ा के वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। नई किस्म को विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों की खेती की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है। इसमें पीला और भूरा रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोध देने वाले महत्वपूर्ण जीन शामिल किए गए हैं।
लोकप्रिय वी.एल. गेहूं 892 का उन्नत रूप है वी.एल. 3040
नई वी.एल. 3040 गेहूं किस्म लोकप्रिय गेहूं प्रजाति वी.एल. गेहूं 892 का उन्नत रूप है। वैज्ञानिकों ने इसका विकास मार्कर बैकक्रॉस प्रजनन तकनीक के माध्यम से किया है।
इस किस्म का विकास भाकृअनुप–विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा के निदेशक एवं प्रधान गेहूं प्रजनक डॉ. लक्ष्मी कान्त के नेतृत्व में किया गया।
इस शोध कार्य में डॉ. नवीन चन्द्र गहत्याड़ी, डॉ. के.के. मिश्रा, डॉ. राकेश भौमिक तथा डॉ. रघु बी.आर. ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
नई किस्म विकसित करते समय वैज्ञानिकों का उद्देश्य वी.एल. गेहूं 892 की पर्वतीय क्षेत्रों के प्रति अनुकूलता को बनाए रखना और उसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता को और मजबूत बनाना था।
पीला और भूरा रतुआ रोग से बेहतर सुरक्षा
VL 3040 गेहूं किस्म की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में इसकी रतुआ रोग प्रतिरोधक क्षमता शामिल है।
इस किस्म में पीला रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोध प्रदान करने वाला Yr10 जीन तथा भूरा रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोध प्रदान करने वाला Lr24 जीन शामिल किया गया है।
रतुआ रोग गेहूं की फसल के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती हो सकता है। फसल पर रोग का प्रभाव पड़ने की स्थिति में उत्पादन प्रभावित होने की संभावना रहती है। ऐसे में रोग प्रतिरोधी किस्मों का विकास किसानों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
वी.एल. 3040 में वैज्ञानिकों ने वी.एल. गेहूं 892 की पर्वतीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलता को बनाए रखते हुए इसकी रतुआ प्रतिरोधक क्षमता में सुधार किया है।
इस तरह नई प्रजाति में उत्पादन, क्षेत्रीय अनुकूलता और रोग प्रतिरोध जैसे महत्वपूर्ण गुणों का संयोजन किया गया है।
दो वर्षों के परीक्षण में अधिक उपज
दो वर्षों तक किए गए समन्वित परीक्षणों में वी.एल. 3040 ने बेहतर उत्पादन प्रदर्शन किया।
परीक्षणों के दौरान इस किस्म की औसत उपज 28.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। इसकी तुलना में मूल किस्म वी.एल. गेहूं 892 की औसत उपज 26.6 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रही।
इस प्रकार नई किस्म ने मूल प्रजाति की तुलना में लगभग 6 प्रतिशत अधिक उपज दर्ज की।
यह उपलब्धि पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, जहां भौगोलिक परिस्थितियां, मौसम और सीमित सिंचाई जैसी चुनौतियां गेहूं उत्पादन को प्रभावित करती हैं।
देर से बुवाई में भी बेहतर प्रदर्शन
नई VL 3040 गेहूं किस्म की एक महत्वपूर्ण विशेषता देर से बुवाई वाली परिस्थितियों के प्रति इसकी अनुकूलता है।
परीक्षणों में देर से बुवाई की स्थिति में वी.एल. 3040 की उपज अपनी मूल किस्म वी.एल. गेहूं 892 की तुलना में 6.33 प्रतिशत अधिक रही।
वहीं, बहुत देर से बुवाई की स्थिति में भी नई किस्म ने बेहतर प्रदर्शन किया और इसकी उपज मूल किस्म से 2.41 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई।
पर्वतीय क्षेत्रों में कई किसान एक ही खेत में अलग-अलग फसलों का चक्र अपनाते हैं। कई परिस्थितियों में पिछली फसल की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई में देरी हो सकती है।
ऐसे में देर से बुवाई के अनुकूल गेहूं की किस्म किसानों को अधिक लचीलापन प्रदान कर सकती है।
आलू और मटर के बाद गेहूं की खेती का मिलेगा बेहतर अवसर
वी.एल. 3040 विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों की देर से बोई जाने वाली और सीमित सिंचाई वाली परिस्थितियों के लिए उपयोगी बताई गई है।
इसकी देर से बुवाई के प्रति अनुकूलता पर्वतीय किसानों को गेहूं की बुवाई से पहले आलू, मटर और अन्य अतिरिक्त फसलें लेने का अवसर दे सकती है।
इससे किसानों को फसल विविधीकरण की दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है। एक ही खेत में कृषि चक्र के अनुसार अधिक फसलें लेने की संभावना बढ़ने से कृषि आय के नए अवसर भी बन सकते हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों में सीमित कृषि भूमि का अधिक कुशल उपयोग किसानों के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसलिए ऐसी किस्म, जो देर से बुवाई में भी उत्पादन क्षमता बनाए रख सके, खेती की योजना बनाने में उपयोगी हो सकती है।
सीमित सिंचाई वाली परिस्थितियों के लिए भी उपयुक्त
भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में सिंचाई की उपलब्धता मैदानी क्षेत्रों की तुलना में कई स्थानों पर अलग परिस्थितियों वाली होती है।
वी.एल. 3040 को विशेष रूप से सीमित सिंचाई वाली परिस्थितियों के लिए उपयोगी बताया गया है।
इसका मतलब है कि यह किस्म उन पर्वतीय कृषि क्षेत्रों के लिए संभावित रूप से उपयोगी हो सकती है, जहां पर्याप्त सिंचाई संसाधन उपलब्ध नहीं हैं और किसान प्राकृतिक वर्षा या सीमित जल स्रोतों पर निर्भर रहते हैं।
नई किस्म का विकास क्षेत्र विशेष की कृषि आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए किया गया है।
पौधे की ऊंचाई और पकने की अवधि
वी.एल. 3040 की पौध ऊंचाई लगभग 80 से 85 सेंटीमीटर है।
इसकी परिपक्वता अवधि लगभग 150 से 155 दिन बताई गई है।
पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम और तापमान के अनुसार फसल अवधि का विशेष महत्व होता है। इसलिए किसी किस्म की पकने की अवधि किसानों को फसल चक्र और अगली फसल की योजना बनाने में मदद कर सकती है।
नई किस्म की देर से बुवाई के प्रति अनुकूलता और इसकी परिपक्वता अवधि इसे पर्वतीय कृषि प्रणाली के लिए उपयोगी विकल्प बना सकती है।
केवल उपज ही नहीं, पोषण में भी खास है वी.एल. 3040
नई VL 3040 गेहूं किस्म की विशेषता केवल इसकी उपज और रतुआ रोग प्रतिरोध तक सीमित नहीं है।
इस किस्म के दानों में औसतन 11.7 प्रतिशत प्रोटीन पाया गया है।
इसके अलावा इसमें लगभग 43.2 पीपीएम लौह तत्व और 32.2 पीपीएम जस्ता मौजूद है।
इस तरह वी.एल. 3040 को उत्पादन के साथ-साथ पोषण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बताया गया है।
गेहूं भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में शामिल है। ऐसे में ऐसी किस्में जिनमें उत्पादन क्षमता के साथ पोषक तत्व भी मौजूद हों, कृषि और पोषण दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण हो सकती हैं।
किन राज्यों के किसानों के लिए होगी उपयोगी?
वी.एल. 3040 की पहचान उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों के लिए की गई है। इसमें निम्नलिखित क्षेत्र शामिल हैं—
- जम्मू-कश्मीर
- हिमाचल प्रदेश
- उत्तराखंड
- लद्दाख
- मणिपुर
- मेघालय
- अरुणाचल प्रदेश
इन क्षेत्रों की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियां मैदानी कृषि क्षेत्रों से काफी अलग हैं। ऊंचाई, तापमान, वर्षा, मिट्टी और सिंचाई की उपलब्धता जैसे कारक फसल उत्पादन को प्रभावित करते हैं।
ऐसे में पर्वतीय क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से विकसित फसल किस्मों का महत्व बढ़ जाता है।
मार्कर बैकक्रॉस प्रजनन तकनीक से हुआ विकास
वी.एल. 3040 को मार्कर बैकक्रॉस प्रजनन के माध्यम से विकसित किया गया है।
इस प्रक्रिया के माध्यम से वैज्ञानिकों ने लोकप्रिय वी.एल. गेहूं 892 की महत्वपूर्ण विशेषताओं को बनाए रखते हुए उसमें रतुआ प्रतिरोध से संबंधित जीनों को शामिल किया।
नई किस्म में Yr10 और Lr24 जीनों का समावेश किया गया है। Yr10 जीन पीला रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोध प्रदान करता है, जबकि Lr24 जीन भूरा रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोध से जुड़ा है।
इस प्रकार वैज्ञानिकों ने मूल किस्म की पर्वतीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलता को बनाए रखते हुए उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने का प्रयास किया।
किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है नई किस्म?
वी.एल. 3040 में कई ऐसे गुणों का संयोजन है जो पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
पहला, यह मूल किस्म की तुलना में अधिक उपज देने वाली प्रजाति के रूप में सामने आई है।
दूसरा, इसमें पीला और भूरा रतुआ रोग के प्रति प्रतिरोध प्रदान करने वाले जीन शामिल हैं।
तीसरा, यह देर से बुवाई की परिस्थितियों में भी बेहतर प्रदर्शन करने की क्षमता दिखाती है।
चौथा, इसे सीमित सिंचाई वाली पर्वतीय परिस्थितियों के लिए उपयोगी बताया गया है।
पांचवां, इसके दानों में प्रोटीन, लौह और जस्ता जैसे पोषक तत्व भी मौजूद हैं।
इन विशेषताओं का संयोजन इसे पर्वतीय कृषि के लिए एक महत्वपूर्ण उन्नत गेहूं प्रजाति बना सकता है।
पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ेगा फसल विविधीकरण का अवसर
वी.एल. 3040 की देर से बुवाई के प्रति अनुकूलता का एक महत्वपूर्ण लाभ फसल विविधीकरण से जुड़ा हो सकता है।
यदि किसान गेहूं की बुवाई से पहले आलू, मटर या अन्य फसलें ले सकें और उसके बाद भी गेहूं की खेती कर सकें, तो एक ही कृषि भूमि का बेहतर उपयोग संभव हो सकता है।
फसल विविधीकरण से किसानों को बाजार और उत्पादन से जुड़े जोखिमों को कम करने में भी सहायता मिल सकती है।
नई किस्म की विशेषताएं पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि चक्र को अधिक लचीला बनाने में भूमिका निभा सकती हैं।
वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि
भाकृअनुप–विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा विकसित वी.एल. 3040 पर्वतीय कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
डॉ. लक्ष्मी कान्त के नेतृत्व में विकसित इस किस्म के शोध कार्य में डॉ. नवीन चन्द्र गहत्याड़ी, डॉ. के.के. मिश्रा, डॉ. राकेश भौमिक और डॉ. रघु बी.आर. का भी योगदान रहा है।
18 से 20 अगस्त 2026 के बीच जयपुर में आयोजित 65वीं अखिल भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान कार्यकर्ता बैठक में प्रजाति पहचान समिति द्वारा इसकी पहचान किया जाना इस शोध उपलब्धि का महत्वपूर्ण चरण है।
पर्वतीय गेहूं उत्पादन को मिल सकती है नई मजबूती
पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि उत्पादन कई प्राकृतिक और भौगोलिक चुनौतियों से प्रभावित होता है। सीमित सिंचाई, मौसम की अनिश्चितता, फसल रोग और देर से बुवाई जैसी परिस्थितियां किसानों के सामने अलग-अलग चुनौतियां पैदा करती हैं।
ऐसे में एक ऐसी गेहूं किस्म जो पर्वतीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूल होने के साथ अधिक उत्पादन, बेहतर रतुआ प्रतिरोध और देर से बुवाई की क्षमता प्रदान करे, किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है।
वी.एल. 3040 गेहूं किस्म में वी.एल. गेहूं 892 की पर्वतीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलता को बनाए रखते हुए उत्पादन और रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार किया गया है।
दो वर्षों के समन्वित परीक्षणों में मूल किस्म की तुलना में 6 प्रतिशत अधिक औसत उपज, देर से बुवाई में 6.33 प्रतिशत और बहुत देर से बुवाई में 2.41 प्रतिशत अधिक उपज दर्ज होना इसकी संभावनाओं को दर्शाता है।
उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों के लिए पहचानी गई वी.एल. 3040 गेहूं किस्म कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह किस्म अधिक उपज, पीला और भूरा रतुआ प्रतिरोध, देर से बुवाई के प्रति अनुकूलता और सीमित सिंचाई वाली परिस्थितियों में उपयोगिता जैसे गुणों का संयोजन प्रस्तुत करती है।
लगभग 28.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर औसत उपज देने वाली यह किस्म अपनी मूल प्रजाति वी.एल. गेहूं 892 से 6 प्रतिशत अधिक उत्पादन दर्ज कर चुकी है।
इसके दानों में 11.7 प्रतिशत प्रोटीन के साथ लौह और जस्ता जैसे पोषक तत्व भी पाए गए हैं। यही कारण है कि इसे उत्पादन के साथ-साथ पोषण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वी.एल. 3040 की पहचान से जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख, मणिपुर, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में गेहूं उत्पादन को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।
देर से बुवाई और सीमित सिंचाई वाली परिस्थितियों में इसकी उपयोगिता किसानों को फसल विविधीकरण के नए अवसर उपलब्ध करा सकती है। आने वाले समय में यह किस्म पर्वतीय क्षेत्रों में गेहूं उत्पादन की स्थिरता बढ़ाने और किसानों को अधिक लचीले कृषि विकल्प उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

