भारत जैसे कृषि प्रधान देश में पानी की उपलब्धता और उसका कुशल उपयोग खेती के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता जा रहा है। कृषि क्षेत्र देश में उपलब्ध जल संसाधनों का 80 प्रतिशत से अधिक उपयोग करता है, जबकि शुद्ध बोए गए क्षेत्र का करीब आधा हिस्सा ही सिंचाई सुविधा से जुड़ा है। ऐसे में कम पानी में अधिक उत्पादन हासिल करना भारतीय कृषि के सामने एक बड़ी चुनौती और प्राथमिकता दोनों है। इसी दिशा में सरकार की प्रति बूंद अधिक फसल योजना (PDMC) महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार, जुलाई 2026 तक प्रति बूंद अधिक फसल योजना के तहत 115 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि को बूंद-बूंद सिंचाई के दायरे में लाया जा चुका है। योजना का उद्देश्य किसानों को ऐसी सिंचाई तकनीकों से जोड़ना है, जिनके माध्यम से पानी सीधे फसल की जड़ों तक पहुंचाया जा सके और खेत में पानी की बर्बादी को कम किया जा सके।
योजना के तहत ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके साथ ही किसानों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है, ताकि आधुनिक सिंचाई प्रणालियों को अपनाने की शुरुआती लागत उनके लिए कम हो सके। सरकार के अनुसार, डिजिटल कार्यान्वयन और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के माध्यम से सहायता उपलब्ध कराने से योजना में पारदर्शिता बढ़ी है।
पानी की हर बूंद का बेहतर इस्तेमाल क्यों जरूरी?
भारत में खेती के लिए सिंचाई की मांग लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। देश के उपलब्ध जल संसाधनों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कृषि सिंचाई में इस्तेमाल होता है। दूसरी ओर, सिंचाई सुविधा अभी भी देश के पूरे शुद्ध बोए गए क्षेत्र तक नहीं पहुंची है। ऐसे में परंपरागत सिंचाई पद्धतियों पर निर्भरता कई क्षेत्रों में पानी के अधिक उपयोग का कारण बन सकती है।
बूंद-बूंद सिंचाई इसी चुनौती का तकनीकी समाधान उपलब्ध कराती है। ड्रिप सिस्टम में पानी पाइप और छोटे उत्सर्जकों के जरिए पौधे के जड़ क्षेत्र तक पहुंचता है। इससे खेत के उन हिस्सों में पानी देने की जरूरत कम हो जाती है जहां फसल की जड़ें सक्रिय नहीं होतीं।
स्प्रिंकलर प्रणाली में पानी को दबाव के साथ नोजल के माध्यम से खेत में छिड़का जाता है। यह प्राकृतिक वर्षा जैसी सिंचाई का प्रभाव पैदा करती है और कई प्रकार की फसलों के लिए उपयोगी होती है।
इस तरह प्रति बूंद अधिक फसल योजना का मूल उद्देश्य केवल सिंचाई सुविधा बढ़ाना नहीं, बल्कि उपलब्ध पानी से अधिक कृषि उत्पादन हासिल करना है।
प्रति बूंद अधिक फसल योजना में किसानों को कितनी वित्तीय सहायता?
सरकार किसानों को बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। योजना के तहत एक लाभार्थी को अधिकतम 5 हेक्टेयर भूमि तक सहायता दिए जाने का प्रावधान है।
छोटे और सीमांत किसानों को लागत का 55 प्रतिशत तक, जबकि अन्य किसानों को 45 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता दी जाती है। पिछले तीन वर्षों में केंद्र सरकार की ओर से योजना के तहत 8,123.24 करोड़ रुपये की सहायता जारी की गई है।
इसके अतिरिक्त कुछ राज्य सरकारें अपने बजट से किसानों को अतिरिक्त सहायता भी प्रदान करती हैं। योजना में एक ही भूमि पर स्थापित बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली के लिए सात वर्ष बाद दोबारा वित्तीय सहायता प्राप्त करने का प्रावधान भी है।
इस वित्तीय मॉडल का उद्देश्य किसानों के लिए आधुनिक सिंचाई तकनीक अपनाने की लागत को कम करना और उन्हें पानी बचाने वाली प्रणालियों की ओर प्रोत्साहित करना है।
कब शुरू हुई थी बूंद-बूंद सिंचाई को बढ़ावा देने की पहल?
देश में माइक्रो इरिगेशन को बढ़ावा देने की सरकारी पहल कई चरणों से गुजरते हुए वर्तमान प्रति बूंद अधिक फसल योजना तक पहुंची है।
जनवरी 2006 में बूंद-बूंद सिंचाई के लिए केंद्र प्रायोजित योजना शुरू की गई थी। वर्ष 2010-11 में इसे राष्ट्रीय माइक्रो इरिगेशन मिशन (NMMI) के रूप में विस्तारित किया गया।
वित्त वर्ष 2014-15 में इसे राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) के तहत ‘ऑन फार्म वाटर मैनेजमेंट’ यानी कृषि जल प्रबंधन घटक में शामिल किया गया।
इसके बाद वित्त वर्ष 2015-16 से 2021-22 तक इसे आधिकारिक रूप से ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ (PDMC) नाम दिया गया और इसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के प्रमुख घटक के रूप में लागू किया गया।
वर्ष 2022-23 से प्रति बूंद अधिक फसल योजना को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना यानी PM-RKVY के तहत लागू किया जा रहा है।
पीएम-आरकेवीवाई से जुड़ी है योजना
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना की शुरुआत वर्ष 2007-08 में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के समग्र विकास को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। अक्टूबर 2024 में इसे पुनर्गठित कर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) बनाया गया।
यह एक व्यापक योजना के रूप में काम करती है, जिसके तहत कृषि क्षेत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण घटकों को शामिल किया गया है। इनमें प्रति ड्रॉप मोर क्रॉप, कृषि मशीनीकरण, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, फसल विविधीकरण और कृषि स्टार्टअप के लिए एक्सेलेरेटर फंड जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
इस पुनर्गठित व्यवस्था की खासियत यह है कि राज्यों को अपनी स्थानीय कृषि आवश्यकताओं के अनुसार विभिन्न घटकों में धन आवंटित करने में अधिक लचीलापन मिलता है।
इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों, कृषि उत्पादकता, जल दक्षता और कृषि मूल्य श्रृंखला जैसे मुद्दों पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप काम करना है।
वर्ष 2025-26 के दौरान पीएम-आरकेवीवाई के लिए कुल 8,957.72 करोड़ रुपये जारी या स्वीकृत किए गए हैं। इसमें प्रति बूंद अधिक फसल योजना के लिए 3,226.36 करोड़ रुपये शामिल हैं।
फर्टिगेशन से पानी के साथ सीधे जड़ों तक पहुंचते हैं पोषक तत्व
प्रति बूंद अधिक फसल योजना केवल पानी बचाने वाली सिंचाई तकनीक तक सीमित नहीं है। इसके तहत फर्टिगेशन को भी प्रोत्साहित किया जाता है।
फर्टिगेशन में सिंचाई के पानी के साथ उर्वरकों को पौधों के जड़ क्षेत्र तक पहुंचाया जाता है। इससे पानी और पोषक तत्वों का अधिक सटीक उपयोग संभव होता है।
इस तकनीक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि किसानों को एक साथ पानी और उर्वरक दोनों के कुशल उपयोग की आवश्यकता होती है। यदि पोषक तत्व पौधे की जरूरत के मुताबिक और सही स्थान पर पहुंचें तो संसाधनों के उपयोग को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
सरकार पानी की कमी और भूजल स्तर में गिरावट वाले क्षेत्रों को भी योजना में प्राथमिकता देने पर जोर दे रही है।
इसके अलावा ट्यूबवेल, नदी से पानी उठाने वाली सिंचाई प्रणालियों और सौर ऊर्जा से संचालित सिंचाई प्रणालियों के साथ बूंद-बूंद सिंचाई को जोड़ने को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
जुलाई 2026 तक 115 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में पहुंची माइक्रो इरिगेशन
जुलाई 2026 तक 115 लाख हेक्टेयर भूमि को बूंद-बूंद सिंचाई के तहत कवर किया जा चुका है। यह देश के शुद्ध बुवाई क्षेत्र का लगभग 8.11 प्रतिशत है।
वर्ष 2025-26 में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात और राजस्थान में प्रति बूंद अधिक फसल योजना के तहत बूंद-बूंद सिंचाई से कवर किए गए क्षेत्रों में प्रमुख हिस्सेदारी दर्ज की गई।
इसी अवधि में योजना से करीब 12.30 लाख किसान लाभान्वित हुए। लाभार्थियों में लगभग 20 प्रतिशत महिलाएं थीं।
यह आंकड़ा बताता है कि माइक्रो इरिगेशन का विस्तार केवल बड़े किसानों तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में किसानों को इससे जोड़ा जा रहा है।
ड्रिप सिंचाई से किसान को क्या फायदा?
ड्रिप सिंचाई में पानी को सीधे पौधे के जड़ क्षेत्र तक पहुंचाया जाता है। पाइप में लगे छोटे-छोटे ड्रिपर या उत्सर्जक धीरे-धीरे पानी छोड़ते हैं।
इससे खेत में पानी के अनावश्यक बहाव को कम करने में मदद मिलती है। साथ ही, पौधे को उसकी जरूरत के अनुसार पानी उपलब्ध कराया जा सकता है।
ड्रिप सिंचाई के प्रमुख फायदे हैं—
- पानी की बर्बादी में कमी
- सिंचाई दक्षता में सुधार
- पानी और उर्वरक का बेहतर उपयोग
- ऊर्जा और श्रम की बचत
- फसल उत्पादकता में संभावित वृद्धि
- बागवानी फसलों के विस्तार में मदद
- फसल की तीव्रता बढ़ाने में सहायता
- सीमांत भूमि के उत्पादक उपयोग की संभावना
- खेती की लागत कम करने में मदद
- किसानों की आय बढ़ाने में सहयोग
विशेष रूप से बागवानी फसलों के लिए ड्रिप सिंचाई उपयोगी तकनीक मानी जाती है, क्योंकि अलग-अलग पौधों को उनकी स्थिति और आवश्यकता के अनुसार पानी उपलब्ध कराया जा सकता है।
ड्रिप सिंचाई के दो प्रमुख प्रकार
पीडीएमसी के तहत ड्रिप सिंचाई को मुख्य रूप से दो प्रकारों में बताया गया है।
1. ऑन-लाइन ड्रिप सिंचाई
इस प्रणाली में छोटे ड्रिपर पाइप के साथ जरूरत के अनुसार लगाए जाते हैं। प्रत्येक पौधे के स्थान के अनुरूप ड्रिपर लगाने की सुविधा होती है।
इसलिए यह ऐसी फसलों के लिए उपयोगी हो सकती है जिनमें पौधों के बीच की दूरी समान नहीं होती।
2. इन-लाइन ड्रिप सिंचाई
इन-लाइन प्रणाली में ड्रिपर पाइप के भीतर निश्चित अंतराल पर बने होते हैं। इससे एक निर्धारित दूरी पर स्थित पौधों को समान रूप से पानी उपलब्ध कराया जा सकता है।
इस प्रकार की प्रणाली उन फसलों के लिए उपयोगी होती है जिनमें पौधों की दूरी लगभग समान होती है।
स्प्रिंकलर सिंचाई कैसे करती है काम?
स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली में पाइपों के नेटवर्क से जुड़े नोजल के माध्यम से दबाव के साथ पानी हवा में छोड़ा जाता है। पानी बूंदों के रूप में खेत में गिरता है और वर्षा जैसी सिंचाई का प्रभाव पैदा करता है।
यह प्रणाली विशेष रूप से उन फसलों के लिए उपयोगी हो सकती है जहां पौधों का घनत्व अधिक होता है। अनाज, दालों, बीज, मसालों और विभिन्न खेत फसलों में इसका उपयोग किया जाता है।
स्प्रिंकलर प्रणाली को कई प्रकारों में विभाजित किया गया है।
पोर्टेबल स्प्रिंकलर
इस प्रणाली में मुख्य और उप-मुख्य पाइपों को जरूरत के अनुसार खेत के अलग-अलग हिस्सों में स्थानांतरित किया जा सकता है। इससे अलग-अलग क्षेत्रों की फसल आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करना संभव होता है।
माइक्रो स्प्रिंकलर
माइक्रो स्प्रिंकलर का सिंचाई क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटा होता है। इनका इस्तेमाल पत्तेदार सब्जियों, नर्सरी और रोपाई जैसी गतिविधियों में किया जाता है।
मिनी स्प्रिंकलर
मिनी स्प्रिंकलर का इस्तेमाल मूंगफली, आलू, प्याज, अदरक और छोटी चारा फसलों जैसी नजदीकी फसलों में किया जा सकता है। इनका कवरेज माइक्रो स्प्रिंकलर की तुलना में अधिक होता है।
अर्ध-स्थायी स्प्रिंकलर
इस प्रणाली में मुख्य और पार्श्व पाइपों को जमीन के नीचे स्थायी रूप से लगाया जाता है। रिसर पाइप से जुड़े स्प्रिंकलर नोजल को आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर ले जाया जा सकता है।
रेन-गन
बड़े क्षेत्र में कम संख्या में स्प्रिंकलर के माध्यम से सिंचाई के लिए रेन-गन प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इसमें पानी का डिस्चार्ज 10,000 से 32,000 लीटर प्रति घंटे तक और थ्रो की त्रिज्या 24 से 36 मीटर तक हो सकती है।
ऐसी प्रणाली के लिए उच्च दबाव और अधिक डिस्चार्ज वाले पाइप तथा पंप की आवश्यकता होती है। कम समय में बड़े क्षेत्र की सिंचाई के लिए इनका उपयोग किया जाता है।
आंध्र प्रदेश के किसान ने अपनाई ड्रिप सिंचाई
बूंद-बूंद सिंचाई के प्रभाव का एक उदाहरण आंध्र प्रदेश के पलनाडु के किसान एलएएम श्रीनिवास राव के अनुभव से सामने आता है।
उन्होंने राज्य बूंद-बूंद सिंचाई परियोजना और पीडीएमसी योजना के तहत अपने दो एकड़ के अम्लीय नींबू के बगीचे में ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित की। इससे पहले वह पारंपरिक बाढ़ सिंचाई पर निर्भर थे।
ड्रिप प्रणाली अपनाने के बाद फर्टिगेशन के माध्यम से पानी और पोषक तत्वों का अधिक सटीक इस्तेमाल किया गया।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उनकी उपज 90 क्विंटल से बढ़कर 105 क्विंटल प्रति एकड़ हो गई। वहीं खेती की लागत 30 लाख रुपये से घटकर 2.4 लाख रुपये हो गई।
स्थिर बाजार कीमतों के साथ उनकी शुद्ध आय 1.5 लाख रुपये से बढ़कर 2.85 लाख रुपये हुई। यानी उनकी आय में 1.35 लाख रुपये की वृद्धि दर्ज की गई।
यह उदाहरण बताता है कि सही परिस्थितियों और उपयुक्त फसल में माइक्रो इरिगेशन तकनीक उत्पादन और लागत दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।
जल संरक्षण के लिए अब राज्यों को अधिक लचीलापन
सरकार ने प्रति बूंद अधिक फसल योजना के तहत जल संरक्षण और जल भंडारण से जुड़े प्रावधानों को भी मजबूत किया है।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्थानीय स्तर पर जल भंडारण और जल संरक्षण की गतिविधियां शुरू करने की सुविधा दी गई है। ‘अन्य हस्तक्षेप’ घटक के तहत डिग्गी, बड़े जल भंडारण टैंक, खेत तालाब और जल संचयन प्रणालियों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इन संरचनाओं का इस्तेमाल व्यक्तिगत या सामुदायिक जरूरत के अनुसार किया जा सकता है। इसका उद्देश्य किसानों को ड्रिप और अन्य कुशल सिंचाई प्रणालियों के लिए अधिक स्थायी जल स्रोत उपलब्ध कराना है।
संशोधित दिशा-निर्देशों के तहत जल संरक्षण परियोजनाओं के लिए पहले लागू फंडिंग सीमा को हटा दिया गया है। पहले सामान्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ऐसी गतिविधियों के लिए कुल आवंटन का अधिकतम 20 प्रतिशत खर्च किया जा सकता था। पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों तथा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लिए यह सीमा 40 प्रतिशत थी।
अब राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों के आधार पर इन निर्धारित सीमाओं से अधिक राशि खर्च करने की स्वतंत्रता दी गई है।
स्वतंत्र अध्ययनों में सामने आए सकारात्मक परिणाम
प्रति बूंद अधिक फसल योजना के प्रभाव को लेकर विभिन्न स्वतंत्र अध्ययनों में सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
नीति आयोग द्वारा वर्ष 2020-21 के दौरान किए गए मूल्यांकन में योजना को जल उपयोग दक्षता बढ़ाने, फसल उत्पादकता में सुधार, रोजगार सृजन और किसानों की आय बढ़ाने जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप पाया गया।
अध्ययन में किसानों की आय में 10 से 69 प्रतिशत तक लाभ दर्ज किया गया। वहीं जल उपयोग दक्षता में 30 से 70 प्रतिशत तक सुधार की जानकारी सामने आई।
आर्थिक समीक्षा 2020-21 के अनुसार बूंद-बूंद सिंचाई से 20 से 48 प्रतिशत पानी की बचत, 10 से 17 प्रतिशत ऊर्जा बचत, 30 से 40 प्रतिशत श्रम लागत में कमी और 11 से 19 प्रतिशत उर्वरक बचत दर्ज की गई।
इसी अध्ययन में फसल उपज में 20 से 38 प्रतिशत तक वृद्धि की जानकारी दी गई।
इसके अलावा भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद द्वारा वर्ष 2023 में छह राज्यों में किए गए अध्ययन ने भी योजना के कार्यान्वयन का आकलन किया। अध्ययन में किसानों द्वारा अपनी फसल की जरूरत, गिरते भूजल स्तर और दीर्घकालिक कृषि लाभ जैसे कारणों से ड्रिप सिंचाई अपनाने की पुष्टि की गई।
किसानों की आय बढ़ाने में मददगार हो सकती है जल दक्षता
खेती में पानी की बचत का मतलब केवल जल संसाधन बचाना नहीं है। इसका सीधा संबंध किसान की लागत और उत्पादन से भी है।
यदि किसान कम पानी में फसल की जरूरत पूरी कर पाता है, तो सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा, श्रम और अन्य संसाधनों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। फर्टिगेशन जैसी तकनीकों के साथ इसे जोड़ने पर पानी और पोषक तत्वों के उपयोग को अधिक सटीक बनाया जा सकता है।
यही कारण है कि प्रति बूंद अधिक फसल योजना को जल संरक्षण के साथ-साथ कृषि उत्पादकता और किसानों की आय से जोड़कर देखा जा रहा है।
महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी
वर्ष 2025-26 में योजना से लाभान्वित 12.30 लाख किसानों में लगभग 20 प्रतिशत महिलाएं थीं। कृषि में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए आधुनिक सिंचाई तकनीकों तक उनकी पहुंच बढ़ना ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
माइक्रो इरिगेशन के माध्यम से पानी की उपलब्धता को अधिक व्यवस्थित किया जा सकता है, जिससे बागवानी और उच्च-मूल्य वाली फसलों की खेती के लिए भी संभावनाएं बनती हैं।
जलवायु परिवर्तन के दौर में क्यों महत्वपूर्ण है पीडीएमसी?
अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान, भूजल स्तर में गिरावट और अलग-अलग क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता में असमानता कृषि के सामने नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं।
ऐसे समय में खेती को अधिक संसाधन-कुशल बनाने की जरूरत है। बूंद-बूंद सिंचाई इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी विकल्प है।
पीडीएमसी को पीएम-आरकेवीवाई के साथ जोड़ने से जल प्रबंधन को कृषि मशीनीकरण, मृदा स्वास्थ्य, फसल विविधीकरण और कृषि नवाचार जैसे अन्य क्षेत्रों के साथ जोड़ने की संभावना भी मजबूत होती है।
इससे भविष्य की खेती में केवल अधिक उत्पादन पर नहीं, बल्कि कम संसाधनों में अधिक उत्पादन पर जोर देने की दिशा मजबूत होती है।
आगे की राह: पानी बचेगा तो खेती टिकेगी
भारत में कृषि का भविष्य जल संसाधनों के कुशल प्रबंधन से गहराई से जुड़ा है। देश के कई क्षेत्रों में भूजल पर दबाव बढ़ रहा है और सिंचाई की मांग भी लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है।
ऐसे में प्रति बूंद अधिक फसल योजना किसानों को पारंपरिक सिंचाई से आधुनिक माइक्रो इरिगेशन की ओर ले जाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है।
जुलाई 2026 तक 115 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को बूंद-बूंद सिंचाई के तहत लाया जाना इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति है। वित्तीय सहायता, डिजिटल कार्यान्वयन, फर्टिगेशन, जल भंडारण और संरक्षण गतिविधियों को जोड़ने से योजना का दायरा और प्रभाव दोनों बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।
आने वाले समय में ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों का विस्तार केवल पानी की बचत तक सीमित नहीं रहेगा। इनका प्रभाव फसल उत्पादकता, खेती की लागत, ऊर्जा उपयोग, उर्वरक दक्षता और किसान आय पर भी पड़ सकता है।
भारत की कृषि को यदि जलवायु-स्मार्ट और टिकाऊ बनाना है तो पानी की प्रत्येक बूंद का अधिकतम उपयोग करना जरूरी होगा। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ का लक्ष्य भारतीय कृषि में जल दक्षता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बनकर उभर रहा है।

