देश के वर्षा आधारित और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जल उपलब्धता बढ़ाने, भूमि की उत्पादकता सुधारने और किसानों की आय तथा ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने वाटरशेड विकास कार्यक्रम के क्रियान्वयन को और तेज करने पर जोर दिया है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के वाटरशेड विकास घटक यानी WDC-PMKSY की प्रगति की समीक्षा करते हुए राज्यों से परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करने और जमीनी स्तर पर स्पष्ट एवं मापनीय परिणाम सुनिश्चित करने का आह्वान किया।
समीक्षा बैठक के दौरान केंद्रीय मंत्री ने वाटरशेड विकास को “विकसित भारत के लिए सूखा-मुक्त भारत” के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वाटरशेड विकास का उद्देश्य केवल जल संरचनाओं का निर्माण करना नहीं है, बल्कि खेतों तक पानी पहुंचाना, भूमि की उत्पादकता बढ़ाना और किसानों की आय तथा आजीविका को मजबूत करना है।
मंत्री ने कहा कि लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि हर बूंद पानी का बेहतर उपयोग हो और उसका लाभ सीधे किसान तक पहुंचे।
52.93 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 1,220 परियोजनाएं
WDC-PMKSY 2.0 के तहत अब तक 52.93 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करते हुए 1,220 परियोजनाएं स्वीकृत की जा चुकी हैं। इन परियोजनाओं की कुल स्वीकृत लागत 12,404 करोड़ रुपये है। इसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 8,134 करोड़ रुपये है।
केंद्रीय हिस्सेदारी में से अब तक 6,955.75 करोड़ रुपये, यानी करीब 85 प्रतिशत राशि, जारी की जा चुकी है। यह राशि वाटरशेड क्षेत्र में जल संरक्षण, भूमि विकास और ग्रामीण आजीविका से जुड़े विभिन्न कार्यों को आगे बढ़ाने में उपयोग की जा रही है।
इतने बड़े क्षेत्र को वाटरशेड परियोजनाओं के दायरे में लाना यह दर्शाता है कि जल और भूमि संरक्षण को ग्रामीण विकास तथा कृषि उत्पादकता के साथ जोड़कर देखने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
केवल संरचनाएं नहीं, खेत तक पानी पहुंचाना लक्ष्य
वाटरशेड विकास को लेकर केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया कि किसी परियोजना की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि कितनी जल संरचनाएं बनाई गईं या कितनी राशि खर्च हुई।
उनके अनुसार वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब इन परियोजनाओं से किसान के खेत में पानी पहुंचे, खेती का क्षेत्र बढ़े, फसल उत्पादन बेहतर हो और ग्रामीण परिवारों की आय एवं आजीविका में सकारात्मक बदलाव आए।
मंत्री ने कहा कि वाटरशेड विकास केवल जल संरचनाएं बनाने का कार्यक्रम नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य खेत में पानी पहुंचाना, भूमि की उत्पादकता बढ़ाना और किसान की आय एवं आजीविका को मजबूत करना है।
यही दृष्टिकोण वाटरशेड परियोजनाओं को केवल निर्माण आधारित कार्यक्रम से आगे ले जाकर किसान-केंद्रित विकास कार्यक्रम बनाता है।
1.40 लाख हेक्टेयर में एक फसल से दो और तीन फसल तक
वाटरशेड परियोजनाओं से किसानों के खेती पैटर्न में भी बदलाव देखने को मिला है। केंद्रीय मंत्री ने बताया कि वाटरशेड हस्तक्षेपों के परिणामस्वरूप लगभग 1.40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ऐसा बदलाव आया है जहां पहले किसान मुश्किल से एक फसल ले पाते थे।
अब इन क्षेत्रों में किसान दो और कई स्थानों पर तीन फसलें तक ले रहे हैं।
यह बदलाव जल उपलब्धता बढ़ने के कृषि पर पड़ने वाले प्रत्यक्ष प्रभाव को दर्शाता है। जब वर्षा जल को स्थानीय स्तर पर रोका जाता है और भूजल पुनर्भरण बढ़ता है, तो किसानों के लिए फसल के दौरान पानी की उपलब्धता में सुधार हो सकता है।
इससे खेती की तीव्रता बढ़ाने और उपलब्ध भूमि से अधिक उत्पादन लेने के अवसर पैदा होते हैं।
बागवानी और सब्जी उत्पादन का विस्तार
वाटरशेड हस्तक्षेपों का प्रभाव केवल पारंपरिक फसलों तक सीमित नहीं रहा है। मंत्री के अनुसार कई क्षेत्रों में बागवानी, सब्जी उत्पादन और उच्च मूल्य वाली फसलों का विस्तार हुआ है।
कृषि में फसल विविधीकरण किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। पारंपरिक फसलों के साथ यदि किसान सब्जियों, बागवानी और अन्य उच्च मूल्य वाली फसलों को अपनाते हैं तो उन्हें अपनी कृषि आय के स्रोतों में विविधता लाने का अवसर मिलता है।
हालांकि ऐसी खेती के लिए पानी, बाजार, तकनीक और बेहतर कृषि प्रबंधन की जरूरत होती है। वाटरशेड विकास के माध्यम से पानी की उपलब्धता में सुधार इन गतिविधियों के विस्तार के लिए आधार तैयार कर सकता है।
केंद्रीय मंत्री ने इसे योजनाओं की वास्तविक सफलता बताते हुए कहा कि किसानों के जीवन में आने वाला यह परिवर्तन ही विकास कार्यक्रमों के प्रभाव का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण है।
1.24 लाख जल संचयन संरचनाओं का निर्माण और पुनर्जीवन
WDC-PMKSY के तहत अब तक 1.24 लाख जल संचयन संरचनाओं का निर्माण और पुनर्जीवन किया गया है।
इन संरचनाओं में चेक डैम, नाला बंध, परकोलेशन टैंक, गांव एवं खेत तालाब, मेड़बंदी, ट्रेंच, जलाशय तथा वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण से जुड़ी अन्य संरचनाएं शामिल हैं।
इनका उद्देश्य बारिश के पानी को तेजी से बहकर बाहर निकल जाने से रोकना, उसे स्थानीय स्तर पर संग्रहित करना और जमीन के भीतर पानी के पुनर्भरण को बढ़ावा देना है।
वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों में बारिश की मात्रा और उसका वितरण दोनों अनिश्चित हो सकते हैं। ऐसे में बारिश के दौरान उपलब्ध पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
जल संचयन संरचनाएं इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इनसे एक ओर सतही जल की उपलब्धता बढ़ सकती है, वहीं दूसरी ओर भूजल स्तर के पुनर्भरण में भी सहायता मिल सकती है।
3.08 लाख हेक्टेयर में मिली सुरक्षात्मक सिंचाई
वाटरशेड विकास के प्रयासों से अब तक 3.08 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में सुरक्षात्मक सिंचाई उपलब्ध हुई है।
सुरक्षात्मक सिंचाई का महत्व विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक है जहां खेती मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर रहती है। यदि वर्षा कम हो जाए या बारिश के बीच लंबे अंतराल की स्थिति बन जाए तो फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में उपलब्ध अतिरिक्त जल स्रोत फसल को बचाने में मदद कर सकते हैं।
इसका सीधा संबंध किसान की उत्पादन स्थिरता से है। बारिश आधारित किसान के लिए केवल अधिक उत्पादन ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि सूखे या कम बारिश की स्थिति में फसल को बचा पाना भी उतना ही जरूरी है।
28.50 लाख किसानों को मिला लाभ
WDC-PMKSY के तहत किए गए विभिन्न हस्तक्षेपों से अब तक 28.50 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं।
किसानों को मिलने वाले लाभ केवल सिंचाई तक सीमित नहीं हैं। वाटरशेड विकास में भूमि उपचार, जल संरक्षण, कृषि क्षेत्र में सुधार, बागवानी, पौधरोपण और ग्रामीण रोजगार जैसी गतिविधियां भी शामिल हैं।
जब जल और भूमि संसाधनों में सुधार होता है तो उसका प्रभाव खेती के साथ-साथ ग्रामीण परिवारों की आजीविका पर भी पड़ सकता है।
इसी वजह से सरकार वाटरशेड परियोजनाओं के परिणामों को किसान-केंद्रित संकेतकों से मापने पर जोर दे रही है।
1.45 लाख हेक्टेयर में वनीकरण और पौधरोपण
वाटरशेड विकास में जल संरक्षण के साथ प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को भी महत्व दिया जा रहा है। अब तक 1.45 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण, बागवानी और पौधरोपण किया गया है।
पेड़-पौधे और वनस्पति भूमि संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भूमि पर वनस्पति आवरण बढ़ने से मिट्टी के कटाव को कम करने और वर्षा जल के बेहतर उपयोग में मदद मिल सकती है।
वाटरशेड क्षेत्र में भूमि, पानी और वनस्पति को एक-दूसरे से जुड़े संसाधनों के रूप में देखते हुए काम किया जाता है। यही कारण है कि जल संचयन के साथ पौधरोपण और भूमि उपचार जैसी गतिविधियों को भी कार्यक्रम में शामिल किया गया है।
2.85 करोड़ मानव-दिवस का रोजगार सृजन
WDC-PMKSY के तहत किए गए कार्यों से 2.85 करोड़ मानव-दिवस का रोजगार भी सृजित हुआ है।
जल संचयन संरचनाओं के निर्माण, भूमि उपचार, पौधरोपण और अन्य वाटरशेड गतिविधियों में स्थानीय स्तर पर श्रम की आवश्यकता होती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।
इस प्रकार वाटरशेड विकास का प्रभाव दो स्तरों पर दिखाई देता है—एक तरफ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और दूसरी तरफ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को रोजगार के माध्यम से समर्थन।
यदि वाटरशेड परियोजनाओं को स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ लागू किया जाए तो इनसे पैदा होने वाली आर्थिक गतिविधियों का लाभ गांव के स्तर पर अधिक व्यापक हो सकता है।
परियोजनाओं की सफलता अब खर्च से नहीं, परिणाम से मापी जाएगी
समीक्षा बैठक में केंद्रीय मंत्री ने राज्यों को एक महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि वाटरशेड परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल व्यय के आधार पर नहीं होना चाहिए।
इसके बजाय यह देखा जाना चाहिए कि परियोजना के कारण जमीन की स्थिति में कितना सुधार हुआ, जल उपलब्धता कितनी बढ़ी, कितने क्षेत्र में सिंचाई पहुंची, फसल सघनता में कितना बदलाव आया और भूमि की उत्पादकता तथा किसानों की आजीविका पर क्या असर पड़ा।
इस दृष्टिकोण से योजनाओं के क्रियान्वयन में जवाबदेही और परिणाम आधारित निगरानी को बढ़ावा मिल सकता है।
केंद्रीय मंत्री ने राज्यों से पारदर्शी, तकनीक-सक्षम, प्रदर्शन-आधारित और जन-केंद्रित तरीके से काम करने का आग्रह किया।
समयबद्ध क्रियान्वयन पर जोर
वाटरशेड परियोजनाओं का लाभ तभी प्रभावी रूप से किसानों तक पहुंच सकता है जब उन्हें निर्धारित समय सीमा में पूरा किया जाए। निर्माण में देरी या विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी से परियोजना के अपेक्षित परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
इसीलिए समीक्षा बैठक में राज्यों और कार्यान्वयन एजेंसियों से समन्वित तरीके से काम करने का आह्वान किया गया।
सरकार का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि स्वीकृत परियोजनाओं को तेजी से जमीन पर उतारा जाए और उनका लाभ अंतिम छोर तक पहुंचने वाले किसानों तथा ग्रामीण परिवारों को मिले।
‘वाटरशेड यात्रा’ और ‘वाटरशेड महोत्सव’ से जनभागीदारी
केंद्रीय मंत्री ने वाटरशेड विकास को केवल सरकारी कार्यक्रम के रूप में सीमित नहीं रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
उन्होंने बताया कि ‘वाटरशेड यात्रा’ और ‘वाटरशेड महोत्सव’ के माध्यम से वाटरशेड विकास को जन-आंदोलन का रूप देने का प्रयास किया गया है।
जल संरक्षण का स्थायी समाधान केवल सरकारी निवेश से संभव नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदायों, किसानों और ग्रामीण संस्थाओं की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है।
जब ग्रामीण समुदाय जल संरचनाओं और प्राकृतिक संसाधनों को अपनी सामुदायिक संपत्ति के रूप में देखते हैं तो उनके संरक्षण और बेहतर उपयोग की संभावना बढ़ती है।
इसी सोच के तहत वाटरशेड विकास को जल एवं भूमि सुरक्षा के साथ कृषि सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
सूखे के खिलाफ ग्रामीण भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीति
भारत के कई ग्रामीण क्षेत्र वर्षा पर निर्भर कृषि पर आधारित हैं। मानसून में कमी या बारिश के असमान वितरण का सीधा असर कृषि उत्पादन और किसान की आय पर पड़ सकता है।
ऐसे में वाटरशेड विकास सूखे के प्रभाव को कम करने की एक महत्वपूर्ण रणनीति बन सकता है। इसका उद्देश्य केवल पानी का भंडारण करना नहीं, बल्कि पूरे जलग्रहण क्षेत्र में पानी और भूमि के बेहतर प्रबंधन के माध्यम से कृषि को अधिक लचीला बनाना है।
बारिश के पानी को रोकना, भूजल पुनर्भरण बढ़ाना, मिट्टी का संरक्षण करना, सिंचाई क्षेत्र बढ़ाना और फसल सघनता में सुधार करना—ये सभी प्रयास मिलकर वर्षा आधारित कृषि की क्षमता को मजबूत कर सकते हैं।
किसान की आय से सीधे जुड़ा है जल प्रबंधन
किसान की आय का एक बड़ा हिस्सा फसल उत्पादन पर निर्भर करता है। फसल उत्पादन के लिए पानी की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। यदि पानी की कमी के कारण किसान केवल एक फसल ले पाता है, तो उसकी कृषि आय की संभावनाएं सीमित रहती हैं।
वहीं यदि जल संरक्षण और सिंचाई सुविधाओं के कारण वह दो या तीन फसलें ले पाता है, तो उपलब्ध भूमि से अधिक उत्पादन और आय की संभावना बनती है।
इसीलिए वाटरशेड विकास को किसान की आय के संदर्भ में देखना जरूरी है। 1.40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में एक फसल से दो और कई स्थानों पर तीन फसल होने का बदलाव इस दिशा में महत्वपूर्ण संकेत है।
उच्च मूल्य वाली फसलों से बढ़ सकती है कृषि की आर्थिक क्षमता
वाटरशेड क्षेत्र में बागवानी, सब्जी और उच्च मूल्य वाली फसलों के विस्तार का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है। इन फसलों के माध्यम से किसान अपनी खेती में विविधता ला सकते हैं।
हालांकि उच्च मूल्य वाली फसलों के लिए बाजार, भंडारण, परिवहन, तकनीकी सलाह और गुणवत्तापूर्ण कृषि इनपुट की आवश्यकता होती है। इसलिए वाटरशेड विकास के साथ कृषि मूल्य श्रृंखला और बाजार से जुड़ी सुविधाओं को मजबूत करना भी किसानों के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
यदि जल उपलब्धता के साथ इन सुविधाओं का बेहतर समन्वय होता है तो वाटरशेड परियोजनाओं का आर्थिक प्रभाव और व्यापक हो सकता है।
‘हर बूंद’ के बेहतर उपयोग का लक्ष्य
भारत में पानी एक सीमित और महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। ऐसे में वर्षा जल का अधिकतम उपयोग करना और स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण बढ़ाना ग्रामीण विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
वाटरशेड विकास इसी सिद्धांत पर आधारित है कि बारिश के पानी को जहां गिरता है, उसके आसपास अधिक से अधिक रोककर उसका उपयोग किया जाए और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा दिया जाए।
केंद्रीय मंत्री का “हर बूंद पानी का बेहतर उपयोग” करने का संदेश इसी व्यापक सोच को सामने रखता है।
आगे की चुनौती: परिणामों को टिकाऊ बनाना
WDC-PMKSY के तहत बड़ी संख्या में परियोजनाएं स्वीकृत होने और जल संरचनाओं के निर्माण के बाद अगली महत्वपूर्ण चुनौती इन परिसंपत्तियों को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखना होगी।
जल संचयन संरचनाओं का रखरखाव, सामुदायिक भागीदारी, पानी का विवेकपूर्ण उपयोग और भूमि संसाधनों का संरक्षण इनके दीर्घकालिक प्रभाव के लिए आवश्यक होंगे।
साथ ही परियोजनाओं के परिणामों की नियमित निगरानी भी महत्वपूर्ण होगी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि जल उपलब्धता, सिंचाई, फसल सघनता और किसानों की आय में वास्तविक सुधार कितना हुआ है।
निष्कर्ष
WDC-PMKSY 2.0 के तहत 52.93 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 1,220 परियोजनाओं, 12,404 करोड़ रुपये की स्वीकृत लागत, 1.24 लाख जल संचयन संरचनाओं, 3.08 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सुरक्षात्मक सिंचाई, 28.50 लाख लाभान्वित किसानों, 1.45 लाख हेक्टेयर वनीकरण एवं पौधरोपण और 2.85 करोड़ मानव-दिवस रोजगार के आंकड़े वाटरशेड विकास के व्यापक दायरे को दर्शाते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि उन 1.40 लाख हेक्टेयर क्षेत्रों में दिखाई देती है जहां वाटरशेड हस्तक्षेपों के बाद किसानों को एक फसल से आगे बढ़कर दो और कई जगह तीन फसलें लेने का अवसर मिला है। बागवानी, सब्जी और उच्च मूल्य वाली फसलों का विस्तार भी जल उपलब्धता में सुधार से पैदा होने वाली संभावनाओं को दर्शाता है।
अब केंद्र सरकार का जोर परियोजनाओं की गति बढ़ाने के साथ उनके वास्तविक प्रभाव को मापने पर है। भूमि सुधार, जल उपलब्धता, सिंचाई, फसल सघनता, उत्पादकता और किसान की आजीविका में बदलाव को परियोजना की सफलता का आधार बनाया जाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
यदि राज्यों और कार्यान्वयन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, पारदर्शिता, तकनीक आधारित निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ वाटरशेड परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाता है, तो वर्षा आधारित और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में कृषि को अधिक मजबूत बनाया जा सकता है।
“विकसित भारत के लिए सूखा-मुक्त भारत” के लक्ष्य में वाटरशेड विकास की भूमिका इसी कारण महत्वपूर्ण है। जल और भूमि का संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि किसान की आय, कृषि सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि का भी आधार है। सरकार का लक्ष्य अब वाटरशेड विकास को एक योजना से आगे बढ़ाकर जल सुरक्षा, भूमि सुरक्षा, कृषि सुरक्षा और ग्रामीण समृद्धि के राष्ट्रीय अभियान के रूप में स्थापित करना है।
