भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और द्वीपीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन की विशाल संभावनाओं का बेहतर उपयोग करने की दिशा में केंद्र सरकार ने लक्षद्वीप पर विशेष फोकस बढ़ा दिया है। लक्षद्वीप के अगाटी में 31 अगस्त को आयोजित मत्स्य पालन लोकसंपर्क कार्यक्रम में देश की समुद्री संपदा के सतत और वैज्ञानिक उपयोग, मछुआरों की आय बढ़ाने, गहरे समुद्र में मछली पकड़ने, समुद्री शैवाल की खेती, सजावटी मत्स्य पालन और मत्स्य आधारित पर्यटन को बढ़ावा देने पर विस्तार से चर्चा हुई।
भारत सरकार के मत्स्य पालन, पशुपालन एवं दुग्ध उत्पादन मंत्रालय के मत्स्य विभाग की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं दुग्ध उत्पादन एवं पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह, राज्य मंत्री प्रो. एस.पी. सिंह बघेल तथा लक्षद्वीप और दादरा एवं नगर हवेली तथा दमन एवं दीव के प्रशासक प्रफुल खोड़ा पटेल सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और मत्स्य क्षेत्र से जुड़े हितधारक शामिल हुए।
कार्यक्रम में महिला मत्स्यपालकों और मछुआरों की भी भागीदारी रही। इसका उद्देश्य लक्षद्वीप के मत्स्य समुदायों की वास्तविक जरूरतों को समझना और समुद्री संसाधनों को आजीविका तथा आर्थिक विकास से जोड़ने के लिए ठोस रणनीति तैयार करना रहा।
लक्षद्वीप में 1 लाख टन से अधिक मत्स्य क्षमता
उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने लक्षद्वीप को भारत की अमूल्य समुद्री संपदा बताते हुए कहा कि द्वीप समूह में मत्स्य पालन की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। लक्षद्वीप को लगभग 4,200 वर्ग किलोमीटर के लैगून क्षेत्र और करीब 4 लाख वर्ग किलोमीटर के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (EEZ) का लाभ प्राप्त है।
उन्होंने कहा कि इस विशाल समुद्री क्षेत्र में उपलब्ध संसाधनों का वैज्ञानिक और जिम्मेदार तरीके से उपयोग किया जाए तो यह द्वीप समूह के आर्थिक विकास और स्थानीय समुदायों की समृद्धि का बड़ा आधार बन सकता है।
उपराष्ट्रपति के अनुसार लक्षद्वीप में 1 लाख टन से अधिक की मत्स्य पालन क्षमता मौजूद है। इसमें करीब 94,000 टन टुना और टुना जैसी प्रजातियों की संभावित क्षमता शामिल है। ऐसे में टूना आधारित मत्स्य पालन लक्षद्वीप के लिए रोजगार, आय और निर्यात के नए अवसर पैदा करने वाला प्रमुख क्षेत्र बन सकता है।
हालांकि इस क्षमता का उपयोग पर्यावरणीय संतुलन और समुद्री संसाधनों के संरक्षण के साथ किया जाना जरूरी है। उपराष्ट्रपति ने वैज्ञानिक कटाई, डिजिटल प्राधिकरण प्रणाली, पोत निगरानी, अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन और टिकाऊ मत्स्य पालन पद्धतियों को अपनाने पर विशेष जोर दिया।
समुद्री अर्थव्यवस्था में लक्षद्वीप की अहम भूमिका
भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था में लक्षद्वीप का रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। भौगोलिक रूप से छोटा होने के बावजूद यह द्वीप समूह समुद्री संसाधनों के मामले में अत्यंत समृद्ध है।
कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गया कि मत्स्य पालन और जलीय कृषि को केवल पारंपरिक आजीविका के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे आधुनिक समुद्री अर्थव्यवस्था के एक उभरते हुए क्षेत्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
गहरे समुद्र में मछली पकड़ने, उच्च मूल्य वाली मछलियों के उत्पादन, मछली प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन, समुद्री शैवाल और सजावटी मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में निवेश से स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्यमिता के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
मछुआरों के लिए पीएमएमएसवाई के तहत 62 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं
उपराष्ट्रपति ने लक्षद्वीप के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत 62 करोड़ रुपये से अधिक की मत्स्य विकास परियोजनाओं को मंजूरी दिए जाने की सराहना की।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य मत्स्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, मछुआरों की आय बढ़ाना, आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देना और समुद्री सुरक्षा में सुधार करना है।
कार्यक्रम के दौरान PMMSY के तहत विभिन्न लाभार्थियों को योजनाओं का लाभ भी वितरित किया गया। इनमें पारंपरिक मछुआरों के लिए गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाली नौकाओं की खरीद में सहायता, पुरानी नावों और जालों के प्रतिस्थापन के लिए मदद, पारंपरिक एवं मोटर चालित नौकाओं के लिए सुरक्षा किट तथा संचार एवं ट्रैकिंग उपकरण शामिल रहे।
मछुआरों को किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) की सुविधा उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया, ताकि उन्हें अपनी गतिविधियों के लिए संस्थागत वित्त तक बेहतर पहुंच मिल सके।
गहरे समुद्र में मछली पकड़ने से बढ़ेंगे अवसर
लक्षद्वीप में वर्तमान में अधिकांश मत्स्य गतिविधियां सीमित समुद्री क्षेत्रों के आसपास केंद्रित हैं, जबकि गहरे समुद्र में उच्च मूल्य वाली प्रजातियों की पर्याप्त संभावनाएं मौजूद हैं।
सरकार का जोर अब मछुआरों को आधुनिक नौकाओं, सुरक्षा उपकरणों, संचार एवं ट्रैकिंग तकनीक और वैज्ञानिक मछली पकड़ने की पद्धतियों से जोड़ने पर है।
लक्षद्वीप प्रशासन की ओर से बताया गया कि लगभग 1.2 करोड़ रुपये की लागत से 16 गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले जहाजों को मंजूरी दी गई है और इनका निर्माण कार्य शुरू हो चुका है। मछुआरों को पूर्ण वित्तीय सहायता के साथ इन जहाजों के माध्यम से गहरे समुद्र में उपलब्ध संसाधनों तक जिम्मेदार तरीके से पहुंच बनाने का अवसर मिलेगा।
इससे विशेष रूप से उच्च मूल्य वाली येलोफिन और स्किपजैक टूना जैसी प्रजातियों के उत्पादन को बढ़ावा मिलने की संभावना है।
उत्पादन और क्षमता के बीच बड़ा अंतर
लक्षद्वीप में टूना मत्स्य पालन की वास्तविक क्षमता और वर्तमान उत्पादन के बीच काफी अंतर है। प्रशासक प्रफुल खोड़ा पटेल के अनुसार, येलोफिन और स्किपजैक टूना जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों की अनुमानित वार्षिक मत्स्य क्षमता करीब 1 लाख मीट्रिक टन है, जबकि वर्तमान उत्पादन लगभग 15,000 मीट्रिक टन ही है।
यह अंतर एक ओर चुनौती है तो दूसरी ओर बड़ा अवसर भी है। यदि समुद्री संसाधनों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, आधुनिक तकनीक, बेहतर नौकाओं, कुशल मछली पकड़ने, कोल्ड चेन, प्रसंस्करण और बाजार व्यवस्था के साथ सतत उपयोग किया जाता है तो लक्षद्वीप में मत्स्य क्षेत्र की आर्थिक क्षमता कई गुना बढ़ सकती है।
हालांकि उत्पादन बढ़ाने के साथ समुद्री पारिस्थितिकी और मछलियों के प्राकृतिक भंडार का संरक्षण भी जरूरी होगा।
‘लक्षद्वीप सस्टेनेबल टूना’ ब्रांड बनाने की तैयारी
सरकार लक्षद्वीप की टूना मछली को अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक अलग पहचान देने की दिशा में भी काम कर रही है। राज्य मंत्री प्रो. एस.पी. सिंह बघेल ने बताया कि निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने और मछुआरों की आय में सुधार के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सतत विकास प्रमाणन प्राप्त करने तथा “लक्षद्वीप सस्टेनेबल टूना” ब्रांड विकसित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
यदि लक्षद्वीप की टूना को सतत मत्स्य पालन और गुणवत्ता के प्रमाणन के साथ वैश्विक बाजार में स्थापित किया जाता है, तो इससे स्थानीय मछुआरों को बेहतर बाजार और मूल्य प्राप्त हो सकता है।
इसके लिए मछली पकड़ने के बाद उचित हैंडलिंग, शीत श्रृंखला, गुणवत्ता नियंत्रण, प्रसंस्करण और निर्यात मानकों का पालन महत्वपूर्ण होगा।
समुद्री शैवाल बनेगा महिलाओं और युवाओं की आजीविका का माध्यम
लक्षद्वीप में केवल मछली पालन ही नहीं, बल्कि समुद्री शैवाल की खेती में भी बड़ी संभावनाएं देखी जा रही हैं। सरकार ने लक्षद्वीप को समुद्री शैवाल क्लस्टर के रूप में अधिसूचित किया है।
आईसीएआर-सीएमएफआरआई के सहयोग से एक समुद्री शैवाल बैंक को भी मंजूरी दी गई है। लगभग 2 करोड़ रुपये के निवेश से 575 समुद्री शैवाल संवर्धन इकाइयों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इस पहल का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिलाओं, युवाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए रोजगार और उद्यमिता के अवसर पैदा करना है।
समुद्री शैवाल का उपयोग विभिन्न औद्योगिक और खाद्य क्षेत्रों में किया जाता है। ऐसे में इसकी खेती के साथ प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन को जोड़ा जाए तो द्वीपों में स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त आर्थिक गतिविधियां विकसित की जा सकती हैं।
300 से अधिक सजावटी मछली प्रजातियों की मौजूदगी
लक्षद्वीप में 300 से अधिक सजावटी मछली प्रजातियों की मौजूदगी सजावटी मत्स्य पालन के क्षेत्र में भी बड़े अवसर का संकेत देती है।
सरकार सजावटी मत्स्य पालन को एक संभावित आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित करने पर काम कर रही है। अगाटी में एक सजावटी मछली हैचरी स्थापित की गई है, जबकि PMMSY के तहत तीन पालन इकाइयों को मंजूरी दी गई है।
सजावटी मत्स्य पालन को पर्यटन के साथ जोड़कर भी नए अवसर बनाए जा सकते हैं। इससे स्थानीय युवाओं और छोटे उद्यमियों को व्यवसाय शुरू करने का अवसर मिल सकता है।
‘मिशन रंगीन मछली 2031’ का विमोचन
कार्यक्रम की एक प्रमुख उपलब्धि “मिशन रंगीन मछली 2031” की रणनीतिक कार्य योजना का विमोचन रहा। इसका संबंध सजावटी मत्स्य पालन के विकास से है।
सजावटी मछलियों की मांग घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मौजूद है। यदि इस क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रजनन, गुणवत्तापूर्ण बीज, बेहतर पालन तकनीक, रोग प्रबंधन और बाजार संपर्क को मजबूत किया जाए तो यह छोटे स्तर के उद्यमियों के लिए आय का अतिरिक्त माध्यम बन सकता है।
लक्षद्वीप जैसे पर्यटन केंद्रों में सजावटी मत्स्य पालन को पर्यटन गतिविधियों से जोड़ने की संभावनाएं भी मौजूद हैं।
मत्स्य आधारित पर्यटन को भी मिलेगा बढ़ावा
लक्षद्वीप की प्राकृतिक सुंदरता और समुद्री जैव विविधता इसे पर्यटन के लिहाज से विशेष बनाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए PMMSY के तहत 19 मनोरंजक मत्स्य पालन इकाइयों को मंजूरी दी गई है।
मनोरंजक या रिक्रिएशनल फिशिंग को पर्यटन के साथ जोड़कर स्थानीय समुदायों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। इससे पर्यटकों को नई गतिविधियां मिलेंगी और स्थानीय लोगों को अपनी समुद्री विशेषज्ञता का आर्थिक उपयोग करने का अवसर मिलेगा।
हालांकि पर्यटन आधारित मत्स्य गतिविधियों में भी पर्यावरणीय संरक्षण और जिम्मेदार संचालन को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा।
सहकारी समितियों और एफएफपीओ को मजबूत करने पर जोर
सरकार ने मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों (FFPOs) और मत्स्य सहकारी समितियों को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया है।
संगठित समूहों के माध्यम से छोटे मछुआरों को सामूहिक रूप से इनपुट खरीदने, मछली का संग्रह करने, प्रसंस्करण कराने और बाजार तक पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है।
मूल्यवर्धन के स्तर पर भी सहकारी समितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। यदि मछली को केवल कच्चे रूप में बेचने के बजाय ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रसंस्करण और ब्रांडिंग के साथ बाजार में उतारा जाए तो मछुआरों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
समुद्री सुरक्षा और डिजिटल तकनीक पर विशेष जोर
आधुनिक मत्स्य पालन में समुद्री सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है। गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के दौरान मौसम, समुद्री परिस्थितियों और संचार से जुड़े जोखिम बढ़ जाते हैं।
इसीलिए सरकार मछुआरों को सुरक्षा किट, संचार उपकरण और ट्रैकिंग सिस्टम उपलब्ध कराने पर जोर दे रही है। डिजिटल प्राधिकरण प्रणाली और पोत निगरानी व्यवस्था को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
इन तकनीकों से न केवल मछुआरों की सुरक्षा में मदद मिल सकती है, बल्कि मत्स्य संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन और नियमों के पालन की निगरानी भी बेहतर तरीके से की जा सकती है।
भारत का समुद्री खाद्य निर्यात 73,890 करोड़ रुपये
केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने भारत के मत्स्य क्षेत्र की बढ़ती क्षमता का उल्लेख करते हुए बताया कि देश का मछली उत्पादन 2013-14 में 95.7 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में 197.75 लाख टन हो गया है।
उन्होंने बताया कि व्यापार संबंधी चुनौतियों के बावजूद समुद्री खाद्य निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और वित्त वर्ष 2025-26 में यह रिकॉर्ड 73,890 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
यह आंकड़ा बताता है कि भारत के लिए समुद्री खाद्य क्षेत्र केवल घरेलू खाद्य और रोजगार का साधन नहीं है, बल्कि विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाला महत्वपूर्ण क्षेत्र भी बन चुका है।
भारत के पास विशाल समुद्री संसाधन
भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था का आधार उसका विशाल समुद्री क्षेत्र है। देश के पास लगभग 11,099 किलोमीटर लंबी तटरेखा और करीब 24 लाख वर्ग किलोमीटर का विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र है।
भारतीय EEZ में समुद्री मत्स्य पालन की क्षमता लगभग 58.6 लाख मीट्रिक टन अनुमानित है। यह क्षेत्र लगभग 50 लाख मछुआरों की आजीविका का आधार है।
मत्स्य पालन का योगदान केवल रोजगार और आय तक सीमित नहीं है। यह खाद्य सुरक्षा, पोषण, ग्रामीण एवं तटीय अर्थव्यवस्था तथा निर्यात आय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
गहरे समुद्र में छिपे हैं नए अवसर
देश में मछली पकड़ने की अधिकांश गतिविधियां वर्तमान में तट से लगभग 40 से 50 समुद्री मील के क्षेत्र में केंद्रित हैं। इसके मुकाबले गहरे समुद्री क्षेत्रों में उच्च मूल्य वाली प्रजातियों के दोहन की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं।
टूना और टूना जैसी प्रजातियां इस क्षेत्र में विशेष महत्व रखती हैं। लक्षद्वीप इन प्रजातियों के लिए प्राकृतिक रूप से अनुकूल क्षेत्र होने के कारण भारत के समुद्री खाद्य निर्यात को नई गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सरकार ने भारतीय EEZ और खुले समुद्र से मत्स्य संसाधनों के सतत उपयोग के लिए नियम और दिशानिर्देश तैयार किए हैं। उद्देश्य यह है कि संसाधनों का उपयोग हो, लेकिन समुद्री पारिस्थितिकी और भविष्य की मत्स्य क्षमता प्रभावित न हो।
संरक्षण के साथ विकास जरूरी
लक्षद्वीप में मत्स्य पालन की संभावनाएं जितनी बड़ी हैं, समुद्री पर्यावरण की संवेदनशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। द्वीपों की अर्थव्यवस्था समुद्र और उसके प्राकृतिक संसाधनों पर काफी हद तक निर्भर है।
इसलिए अधिक मछली उत्पादन के लक्ष्य के साथ संसाधनों के संरक्षण पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। वैज्ञानिक आकलन, जिम्मेदार मछली पकड़ने की तकनीक, निर्धारित नियमों का पालन और समुद्री जैव विविधता की रक्षा भविष्य की रणनीति का हिस्सा होना आवश्यक है।
उपराष्ट्रपति ने भी इस बात पर जोर दिया कि दीर्घकालिक समृद्धि और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए समुद्री संसाधनों का संरक्षण तथा जिम्मेदार मत्स्य पालन जरूरी है।
लक्षद्वीप में बन सकता है समुद्री अर्थव्यवस्था का मॉडल
लक्षद्वीप में टूना, समुद्री शैवाल, सजावटी मछली, गहरे समुद्र में मत्स्य पालन, प्रसंस्करण और मत्स्य आधारित पर्यटन को एक साथ विकसित करने की संभावनाएं मौजूद हैं।
यदि इन सभी गतिविधियों को आधुनिक बुनियादी ढांचे, वैज्ञानिक अनुसंधान, बाजार संपर्क, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता से जोड़ा जाता है तो लक्षद्वीप देश में समुद्री अर्थव्यवस्था के एक सफल मॉडल के रूप में उभर सकता है।
सरकार की योजनाओं का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मछुआरों को बेहतर तकनीक, वित्त, सुरक्षा, कौशल और बाजार उपलब्ध कराना भी है।
अगाटी में आयोजित मत्स्य पालन लोकसंपर्क कार्यक्रम ने यह स्पष्ट किया है कि लक्षद्वीप आने वाले समय में भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। करीब 1 लाख मीट्रिक टन की अनुमानित उच्च मूल्य वाली टूना क्षमता और वर्तमान उत्पादन के बीच मौजूद अंतर को वैज्ञानिक एवं सतत तरीके से कम करने की बड़ी संभावना है।
इसके साथ ही समुद्री शैवाल की 575 इकाइयां, 300 से अधिक सजावटी मछली प्रजातियां, 19 मनोरंजक मत्स्य पालन इकाइयां और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने वाले 16 स्वीकृत जहाज लक्षद्वीप में मत्स्य क्षेत्र के विविधीकरण की दिशा दिखाते हैं।
सरकार द्वारा PMMSY के तहत 62 करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं को समर्थन, मछुआरों के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता, सुरक्षा और संचार उपकरण, KCC सुविधा तथा सहकारी समितियों और FFPOs को मजबूत करने की पहल से स्थानीय समुदायों को नई आर्थिक संभावनाएं मिल सकती हैं।
सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि समुद्री संसाधनों का उपयोग “अधिकतम दोहन” के बजाय “सतत और वैज्ञानिक दोहन” के सिद्धांत पर किया जाए। यदि विकास, संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों के बीच संतुलन कायम किया जाता है, तो लक्षद्वीप न केवल मछुआरों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, बल्कि भारत के समुद्री खाद्य निर्यात और समुद्री अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई देने वाला प्रमुख केंद्र भी बन सकता है।
