भारत में किसानों को उचित कीमत पर यूरिया उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार बड़े पैमाने पर सब्सिडी देती है। यूरिया की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए जब देश को विदेशों से यूरिया आयात करना पड़ता है, तब आयातित यूरिया पर भी सरकार को बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, आयातित यूरिया के लिए निर्धारित करीब 33,592 करोड़ रुपये की सब्सिडी में से लगभग 92.4 प्रतिशत राशि पहले ही इस्तेमाल हो चुकी है। इसका मतलब है कि चालू वित्त वर्ष में आयातित यूरिया की सब्सिडी के लिए निर्धारित बजट का बड़ा हिस्सा शुरुआती अवधि में ही खर्च हो गया है।
यह स्थिति सरकार के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में यूरिया की कीमत किसानों के लिए लंबे समय से नियंत्रित रखी गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत, गैस की लागत, समुद्री मालभाड़ा और रुपये की विनिमय दर जैसे कारकों में बदलाव का सीधा असर सरकार के सब्सिडी खर्च पर पड़ता है। यदि वैश्विक कीमतों या आयात लागत में दोबारा बढ़ोतरी होती है, तो निर्धारित बजट से अधिक राशि की जरूरत पड़ सकती है।
आयातित यूरिया पर क्यों बढ़ता है खर्च?
भारत दुनिया के सबसे बड़े यूरिया उपभोक्ताओं में शामिल है। देश में खेती के बड़े क्षेत्र और धान, गेहूं, गन्ना तथा अन्य फसलों में नाइट्रोजन उर्वरक की भारी मांग के कारण यूरिया की खपत काफी अधिक है। सरकार घरेलू उत्पादन बढ़ाने के बावजूद पूरी मांग को देश के भीतर उत्पादित यूरिया से पूरा नहीं कर पाती। ऐसे में आयात के जरिए कमी को पूरा करना पड़ता है।
आयातित यूरिया की लागत घरेलू यूरिया की तुलना में काफी अलग होती है। सरकार किसानों को यूरिया नियंत्रित कीमत पर उपलब्ध कराती है और वास्तविक लागत तथा किसानों से प्राप्त कीमत के बीच के अंतर को सब्सिडी के माध्यम से पूरा किया जाता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने पर सरकार का वित्तीय बोझ भी बढ़ सकता है।
यूरिया सब्सिडी की व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसानों को खेती के लिए जरूरी नाइट्रोजन उर्वरक ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बावजूद अपेक्षाकृत कम कीमत पर मिलता रहे। लेकिन इसके साथ सरकार के बजट पर लगातार दबाव भी बना रहता है।
92.4 प्रतिशत सब्सिडी खर्च होने का क्या मतलब?
यदि आयातित यूरिया के लिए करीब 33,592 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था और उसका लगभग 92.4 प्रतिशत इस्तेमाल हो चुका है, तो गणना के आधार पर करीब 31,025 करोड़ रुपये की राशि खर्च हो चुकी है। यानी लगभग 2,567 करोड़ रुपये के आसपास की राशि ही निर्धारित प्रावधान में शेष रहती है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सब्सिडी का खर्च केवल यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमत पर निर्भर नहीं करता। आयात की मात्रा, घरेलू उत्पादन, बंदरगाह तक पहुंचने की लागत, विनिमय दर और किसानों की वास्तविक मांग जैसे कई कारक अंतिम खर्च को प्रभावित करते हैं।
इसलिए यदि आने वाले महीनों में आयात की जरूरत बढ़ती है, तो सरकार को अतिरिक्त प्रावधान करना पड़ सकता है।
किसानों पर सीधा असर नहीं, लेकिन सरकार की चिंता बढ़ी
आयातित यूरिया सब्सिडी का बड़ा हिस्सा खर्च होने का तत्काल असर किसानों पर यूरिया की कीमत के रूप में पड़ना जरूरी नहीं है। सरकार का उद्देश्य ही यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद किसानों को यूरिया नियंत्रित कीमत पर उपलब्ध कराया जाए।
लेकिन सरकार के लिए चुनौती यह है कि सब्सिडी का खर्च लगातार बढ़ता रहा तो उर्वरक क्षेत्र के लिए बजट में अतिरिक्त राशि की आवश्यकता पड़ सकती है। इससे केंद्र के कुल राजकोषीय खर्च पर दबाव बढ़ सकता है।
सरकार को एक तरफ किसानों को पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध कराना है, वहीं दूसरी तरफ सब्सिडी खर्च को भी नियंत्रित रखना है। यही वजह है कि घरेलू यूरिया उत्पादन बढ़ाने, गैस की लागत को नियंत्रित करने और आयात स्रोतों को विविध बनाने पर जोर दिया जाता है।
घरेलू उत्पादन बढ़ाना क्यों जरूरी?
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में यूरिया उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। नए और पुनर्जीवित यूरिया संयंत्रों के संचालन से घरेलू उत्पादन में वृद्धि हुई है। इसका उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और देश की उर्वरक सुरक्षा को मजबूत करना है।
इसके बावजूद खेती के मौसम में मांग अचानक बढ़ने पर आयात करना पड़ता है। खरीफ और रबी दोनों मौसम में यूरिया की मांग अधिक रहती है। मानसून की स्थिति, फसल क्षेत्र और किसानों द्वारा उर्वरकों के इस्तेमाल का पैटर्न भी मांग को प्रभावित करता है।
अगर घरेलू उत्पादन लगातार बढ़ता है और आयात की आवश्यकता घटती है, तो सरकार को आयातित यूरिया पर सब्सिडी के रूप में कम रकम खर्च करनी पड़ सकती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमत भी अहम
यूरिया एक वैश्विक कमोडिटी है। इसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग और आपूर्ति के आधार पर बदलती रहती है। प्राकृतिक गैस की कीमत भी यूरिया उत्पादन की लागत को प्रभावित करती है क्योंकि यूरिया निर्माण में गैस महत्वपूर्ण कच्चा माल है।
किसी बड़े उत्पादक देश में उत्पादन प्रभावित होने, गैस की कीमत बढ़ने, समुद्री परिवहन महंगा होने या किसी बड़े आयातक देश द्वारा बड़ी मात्रा में यूरिया खरीदने से वैश्विक कीमतों में तेजी आ सकती है।
इसके उलट यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति पर्याप्त हो और प्रमुख आयातक देशों की मांग कम हो, तो यूरिया की कीमत नीचे आ सकती है। ऐसी स्थिति में भारत के लिए आयात लागत घट सकती है और सब्सिडी पर दबाव कुछ कम हो सकता है।
उर्वरक सब्सिडी की बड़ी चुनौती
भारत की उर्वरक सब्सिडी व्यवस्था किसानों को उत्पादन लागत नियंत्रित रखने में मदद करती है। लेकिन लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अस्थिरता रहने पर सरकार के लिए इसका वित्तीय प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
यूरिया के मामले में समस्या और बड़ी है क्योंकि किसानों के लिए इसकी कीमत लंबे समय से नियंत्रित है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लागत बदलती रहती है, लेकिन किसानों के लिए कीमत में उसी अनुपात में बदलाव नहीं होता। इस अंतर को सरकार को सब्सिडी के जरिए पूरा करना पड़ता है।
यही वजह है कि आयातित यूरिया सब्सिडी के बजट का 92.4 प्रतिशत इस्तेमाल होना एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है। यह बताता है कि सरकार को वर्ष के बाकी हिस्से में यूरिया की उपलब्धता और आयात जरूरतों पर लगातार नजर रखनी होगी।
आगे सरकार के सामने क्या विकल्प?
सरकार के सामने सबसे महत्वपूर्ण विकल्प घरेलू यूरिया उत्पादन को और मजबूत करना है। इसके साथ गैस आपूर्ति, संयंत्रों की क्षमता और उत्पादन दक्षता में सुधार भी जरूरी है।
दूसरा विकल्प आयात की बेहतर योजना बनाना है। यदि सरकार वैश्विक बाजार में अनुकूल कीमतों के दौरान पर्याप्त मात्रा में यूरिया खरीद लेती है, तो अचानक कीमत बढ़ने के समय महंगे आयात से बचा जा सकता है।
तीसरा महत्वपूर्ण पहलू उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। कृषि विशेषज्ञ लंबे समय से किसानों को मिट्टी की जरूरत के अनुसार नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश आधारित उर्वरकों के संतुलित उपयोग की सलाह देते रहे हैं। यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल को कम करने से न केवल सरकार की सब्सिडी लागत पर दबाव घट सकता है, बल्कि मिट्टी की सेहत को भी फायदा हो सकता है।
सरकार के लिए आगे की राह
आयातित यूरिया सब्सिडी का 92 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इस्तेमाल हो जाना सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय संकेत है। अभी सबसे बड़ी प्राथमिकता किसानों को समय पर पर्याप्त यूरिया उपलब्ध कराना है, ताकि बुवाई और फसल विकास के महत्वपूर्ण चरण में उर्वरक की कमी न हो।
इसके साथ सरकार को आयात की लागत, अंतरराष्ट्रीय कीमतों और घरेलू उत्पादन की स्थिति पर नजर रखनी होगी। यदि शेष अवधि में आयात की जरूरत बढ़ती है, तो अतिरिक्त बजट प्रावधान की आवश्यकता हो सकती है।
कुल मिलाकर, आयातित यूरिया पर बढ़ता सब्सिडी खर्च भारत की उर्वरक सुरक्षा और वित्तीय प्रबंधन दोनों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। किसानों के लिए सस्ती यूरिया उपलब्ध रखना जरूरी है, लेकिन इसके साथ घरेलू उत्पादन बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना और उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा देना भी उतना ही जरूरी होगा। आने वाले महीनों में वैश्विक यूरिया कीमतें और भारत की आयात जरूरत यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी कि सरकार को उर्वरक सब्सिडी के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन जुटाने पड़ते हैं या नहीं।

